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डॉ. मंगला अनुजा

डॉ. मंगला अनुजा

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डॉ. मंगला अनुजा

पत्रकारिता क्षेत्र की अकादमिक विशेषज्ञ डॉ मंगला अनुजा का जन्म फ़र्रुख़ाबाद, उप्र में 12 अगस्त 1957 को अपने ननिहाल में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्ण हरि पचौरी शिक्षक और जाने-माने साहित्यकार थे। तीन बहनों एवं दो भाइयों में सबसे बड़ी मंगला जी की परवरिश प्रगतिशील वातावरण में हुई। भारतीय परिवारों में वैसे भी सबसे बड़ी संतान को विशेष महत्त्व प्राप्त होता है। मंगला जी के माता-पिता वैसे भी बेटे और बेटी में फ़र्क भी नहीं करते थे।  बचपन से ही उन्हें पिता के साथ काव्य गोष्ठियों में सम्मिलित होने एवं वरिष्ठ कवियों को सुनने-समझने का अवसर मिला। इसलिए वे बहुत ही छोटी उम्र से कविताएँ लिखने लगीं थीं। पचौरी जी सीहोर जिले के पचामा ग्राम में पदस्थ थे। सीहोर तब साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न स्थान था। देश के बड़े-बड़े साहित्यकार गोष्ठियों में सम्मिलित होने सीहोर आते थे। शुरुआत में मंगला जी अपने पिता की कविताएँ मंच पर सुनाया करती थीं, बाद में खुद भी लिखने लगीं तो आयोजक उन्हें भी स्नेहपूर्वक आमंत्रित करने लगे। जब काव्य पाठ की बारी आती वरिष्ठ कवि जन उनके सबसे छोटे होने के कारण कहते कि ‘पहले अनुजा को बुलाएं’। धीरे-धीरे मंगला जी को लोग अनुजा के नाम से ही जानने लगे और उन्होंने अपना नाम रख लिया मंगला अनुजा।

मंगला जी की प्राथमिक शाला से लेकर महाविद्यालय तक की शिक्षा-दीक्षा सीहोर में ही हुई। वर्ष 1973 में उन्होंने वहां महारानी लक्ष्मीबाई उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से हायर सेकंडरी करने के बाद डिग्री कॉलेज से स्नातक के लिए दाखिला लिया। इस बीच मंचों पर काव्य पाठ का सिलसिला जारी रहा। मंगला जी ने रूमानी या श्रृंगार के बजाय व्यंग्य कविताओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वर्ष 1973 में उनकी  ‘72 की बाढ़’ शीर्षक से एक कविता सीहोर से प्रकाशित एक साप्ताहिक अख़बार में प्रकाशित हुई :

भयंकर थी बाढ़ / बह गया बाढ़ में मांग का सिन्दूर / हो गए खिलौने कितने ही चूर चूर / कितनी ही भुजाएँ अकेली रह गईं /

कितनी ही खुशियाँ लोगों की बह गईं / कोई गया जान से / कोई गया आन से / नेता जी देख रहे / बैठे वायुयान से…

मंगला जी की यह रचना व्यापक रूप से सराही गई। उन दिनों हास्य-व्यंग्य कविताओं में शैल चतुर्वेदी, काका हाथरसी, माया गोविन्द का बोलबाला था। ऐसे कवियों के साथ मंच साझा करना मंगलाजी के लिए भी गर्व की बात थी। वर्ष 1978 में हिन्दी विषय से एम.ए.प्रीवियस की परीक्षा के बाद माता-पिता की इच्छा से कॉलेज में वरिष्ठ श्री मनमोहन शर्मा के साथ उनका विवाह हो गया। बाद में वे भारतीय खाद्य निगम में नियुक्त हुए। विवाह के बाद भी मंगला जी का कविता कर्म और पढ़ाई, दोनों ही जारी रहे। उन्होंने एम.ए. और बी.एड किया। वर्ष 1980 में पुत्र आद्यांत को जन्म देने के बाद स्वयं को सक्रिय रखने के लिए वे एक निजी स्कूल में दसवीं – ग्यारहवीं के बच्चों को हिंदी और संस्कृत पढ़ने लगीं। वर्ष 1983 में आशना विद्यालय की ओर से उन्हें तत्कालीन राज्यपाल के हाथों विशिष्ट शिक्षक सम्मान प्रदान किया गया। वर्ष 1989 में सप्रे संग्रहालय में वे शोध प्रबंधक के तौर पर जुड़ीं और तब से वहीं की होकर रह गईं। वर्ष 1995 में वे संग्रहालय की निदेशक बन गईं।

पुस्तकों के बीच वक़्त बिताने के रोमांच ने उन्हें गूढ़ शोध के लिए प्रोत्साहित किया। वर्ष 1994 में उन्होंने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य’ विषय पर पी.एच.डी. किया। सप्रे संग्रहालय के संचालक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर तब नवभारत में संपादक थे। उनके प्रोत्साहन से वे अखबार के स्थायी स्तम्भ ‘स्त्री’ के लिए लिखने लगीं जो काफी लोकप्रिय हुआ था। इस स्तम्भ के माध्यम से मंगला जी ने स्त्री विमर्श पर आधारित कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे। उसके बाद अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखने लगीं। इसके समानांतर वे अपने शोध कार्यों में भी लगी थीं। वर्ष 2008 में डी लिट् के लिए शोध प्रबंध पर कार्य प्रारंभ हुई जो 2018 में पूरा हो सका। इस बीच पत्रकारिता के विषय पर उनकी पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं, जैसे – वर्ष 1996 में पहली पुस्तक ‘भारतीय पत्रकारिता: नींव के पत्थर’ का पहले और वर्ष 2018 में दूसरा संस्करण मप्र हिन्दी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित हुआ, जबकि वर्ष 2002 में ‘छत्तीसगढ़: पत्रकारिता की संस्कार भूमि’ का प्रकाशन सप्रे संग्रहालय ने किया।

वर्ष 2004 में मंगला जी की स्वराज संस्थान, मध्यप्रदेश द्वारा प्रकाशित सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी आई जो काफी चर्चित हुई। दरअसल, पुस्तक के आने से पहले तक सुभद्रा कुमारी चौहान की जन्म तिथि नागपंचमी ही मानी जाती थी। उनके वास्तविक जन्म दिनांक पर कोई प्रमाणिक जानकारी कहीं भी उपलब्ध नहीं थी। सप्रे संग्रहालय में पुराने अख़बारों के पन्ने पलटते हुए उन्होंने पता लगाया कि वर्ष 1904 में नागपंचमी, 15 अगस्त को पड़ी थी। इस खोज के कारण मंगला जी अपनी इस पुस्तक को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं।

वर्ष 2010 में मंगला जी की एक और पुस्तक प्रकाशित हुई ‘पत्रकारिता के युग निर्माता’। इस पुस्तक में देश की पहली महिला पत्रकार हेमंत कुमारी देवी चौधरी पर मंगला जी ने कई प्रमाणिक जानकारियाँ उपलब्ध करवाई हैं। यह पुस्तक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की शोध परियोजना के अंतर्गत प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी। वर्ष 2019 में स्वराज संस्थान द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘बलिदानी गांधी’ भी प्रशंसित हुई । मंगला जी के गूढ़ अध्ययन पर आधारित शोध पत्र  ‘गांधी और गणेश’ भी चर्चित रहा। इस शोधपत्र में गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गांधी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसका वाचन उन्होंने 125वीं गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में किया था। मंगला जी की हालिया कृति ‘आधी दुनिया की पूरी पत्रकारिता’ 2019 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक देश भर में चर्चित हुई। वैसे भी उनकी पुस्तकें पत्रकारिता के छात्रों के लिए श्रेष्ठ संदर्भ ग्रंथों में गिनी जाती हैं।

 

संदर्भ स्रोत: मंगला अनुजा से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

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