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फ़ौज़िया अर्शी

फ़ौज़िया अर्शी

छाया : फ़ौज़िया अर्शी

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टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच
प्रमुख प्रतिभाएँ

फ़ौज़िया अर्शी

फ़ौज़िया अर्शी मुंबई सिने जगत में फिल्म निर्माता के रूप में अपनी सम्मानित पहचान बना चुकीं हैं। उनका जन्म 1 फ़रवरी 1976 को भोपाल में हुआ। उनके पिता श्री अहमद अनवार सिद्दीक़ी आबकारी महकमे में मुलाजिम थे, जबकि माँ ख़ुर्शीद इक़बाल निशातपुरा स्कूल में गणित और अंग्रेज़ी की शिक्षिका थीं। फ़ौज़िया के घर का माहौल आम घरों से अलग था। इनकी ख़ाला सुप्रसिद्ध कॉमरेड नुसरत बानो रूही का घर भी पास में ही था, इसलिए घर में देश, समाज और राजनीति से जुड़ी चर्चाएं अक्सर होती रहती थीं। फ़ौज़िया की माँ लड़कियों की शिक्षा को लेकर बहुत सजग थीं, इसीलिए तक़रीबन पचास बच्चियाँ पढ़ने के लिए उनके घर आया करती थीं।

ख़ुर्शीद जी तमीज़ और तहज़ीब की भी सख़्त पाबंद थीं। सामाजिक और घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण बच्चों के साथ उनके संवाद की स्थिति कम ही बन पाती थी। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी फ़ौज़िया की सबसे बड़ी बहन उनसे 15 साल और भाई 10 साल बड़े थे, इसलिए उनके साथ भी दोस्ताना क़ायम होना मुमकिन नहीं था। नतीजतन उन्होंने अपनी एक अलग दुनिया बसा ली। वे पेड़-पौधों, चिड़िया-तितली-बादल से बात करतीं और उन्हीं के साथ ख़ुश रहतीं। वे भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित सेंट जोसेफ़ कॉन्वेंट में पढ़ती थीं। पढ़ना-लिखना या स्कूल जाना उन्हें पसंद नहीं था फ़िर भी स्कूल हर रोज़ जाती थीं ताकि घर में न रहना पड़े। उनके बड़े भाई को गाने सुनने का शौक़ था और यही शौक़ धीरे-धीरे फ़ौज़िया ने अपना लिया।

फ़ौज़िया कहती हैं – मैं परिवार की दुलारी-सी बच्ची नहीं थी, कक्षाओं में जैसे-तैसे पास हो जाती थी, लेकिन तिमाही और छमाही में तो फ़ेल ही होती थी, नतीजतन घर के लोग अक्सर नाराज़ ही रहते थे। दोस्त बनाने का शौक़ बचपन से ही नहीं रहा। पाँचवीं कक्षा में एक कविता लिखी जो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी थी। पाँचवीं में बोर्ड था, माँ ने पढ़ाने में दिन-रात एक कर दिया, नतीजतन उन्हें 91 प्रतिशत अंक मिले। फ़ौज़िया को बचपन में पेंटिंग का बेहद शौक़ था, माँ ने एक बार उसे फ़िज़ूल बताते हुए डाँट दिया तो फ़ौज़िया ने आस-पास के अपने से छोटे बच्चों को इकट्ठा कर ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। उन दिनों वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहीं थीं। उन्हीं दिनों उनकी बड़ी बहन की शादी हो गई और वे अपने ससुराल चली गईं।

फ़ौज़िया अपनी पेंटिंग, ट्यूशन और पेड़-पौधे-बादल जैसे दोस्तों के साथ ख़ुद में ही खोई रहतीं। दसवीं में उनके अंक कम आए, जबकि पिताजी की इच्छा थी कि वे आगे की पढ़ाई गणित और विज्ञान लेकर करें। जिस स्कूल से पढ़ाई चल रही थी उसने वह विषय देने से मना कर दिया, इसलिए सेंट कैम्ब्रिज स्कूल में नामांकन करवा दिया गया। यह भोपाल का पहला अंग्रेज़ी स्कूल है जिसे बेगम सुलतानजहाँ के पुत्र नवाब हमीदुल्लाह ने बनवाया था। इसी स्कूल से फ़ौज़िया ने ग्यारहवीं और बारहवीं तक की शिक्षा हासिल की। बारहवीं में वे बमुश्किल पास हुईं, जिसके लिए उन्हें माँ से बहुत डाँट पड़ी लेकिन उस दौरान उन्होंने जो कुछ कहा वह जीवन भर के लिए सबक बन गया। उन्होंने कहा था कि पढ़-लिखकर एक मुक़ाम पर पहुँचने के बाद ही संगीत या पेंटिंग का शौक़ सार्थक होता है। इस बात की उन्होंने गाँठ बाँध ली।

इस बीच जीवन में एक और बदलाव आया। लगातार दो बेटियों को जन्म देने के कारण उनकी बड़ी बहन का तलाक़ हो गया और वे मायके आ गईं।  इस घटना का फ़ौज़िया के मन-मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ा। उनकी खुशियाँ दोनों बच्चियों के साथ जुड़ गईं। उनकी ख़ातिर फ़ौज़िया ने अपना ही कामकाज शुरू करने का फ़ैसला कर डाला, जिसके बारे में सुनकर उनके घर वाले हैरान रह गए। ख़ास तौर से बड़े भाई को छोटी बहन का बाहर जाकर काम करना बहुत ही नागवार गुज़र रहा था। घर वालों के ऐतराज़ों और नाराज़गियों को दर किनार करती हुई फ़ौज़िया ने कोहेफ़िज़ा में एक तलघर किराए पर लेकर अपने इंस्टिट्यूट की शुरुआत की और ‘पर्सनैलिटी डेवलपमेंट’ की कक्षाएँ लेने लगीं। इस व्यवसाय में कुल पूँजी लगी आठ सौ रूपये जो उन्होंने ख़ुद ट्यूशन के जरिए जुटाए थे।

दूसरी तरफ़ आगे की पढ़ाई के लिए महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज में बी.एस.सी के लिए उनका नामांकन हुआ। उस समय उनकी दिनचर्या बहुत ही व्यस्त थी क्योंकि उन्हें अपना इंस्टिट्यूट और कॉलेज की पढ़ाई – दोनों संभालना था। विज्ञान एवं गणित विषय में अरुचि के कारण वे कक्षाओं से दूर ही रहतीं लेकिन कॉलेज ज़रूर जाती थी। संगीत कक्षाओं से आती हुई स्वर लहरियाँ उन्हें बहुत आकर्षित करतीं। जब इम्तेहान का वक़्त आया तो फ़ौज़िया ने घर में बताए बिना बी.कॉम के लिए फ़ॉर्म भर दिया और अच्छे अंकों से पास भी हो गईं।  घर में थोड़ी- बहुत डाँट पड़ी, फिर सब कुछ सामान्य हो गया। चौदह सालों तक सफ़लतापूर्वक फ़ौज़िया ने अपना इंस्टिट्यूट के जरिए अनेक छात्रों को व्यक्तित्व निर्माण करना सिखाया।

बी.कॉम के बाद उन्होंने आगे भी पढ़ाई जारी रखी और अलग-अलग विषयों में विशेषज्ञता हासिल की। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई की, इग्नू से एम.कॉम. किया। कई कार्यक्रमों में उन्हें बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया जाने लगा। आख़िरकार उनके परिजनों ने उनकी काबिलियत को  स्वीकार कर लिया। फ़ौज़िया कहती हैं – लड़कों को सब कुछ थाली में सजाकर मिल जाता है जबकि लड़कियों को हर कदम अपने आप को साबित करना पड़ता है। इंस्टिट्यूट की ख्याति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही रही थी। उसके वार्षिक महोत्सव कार्यक्रम को उन्होंने एक कंपनी से प्रायोजित करवा लिया, जबकि उस समय ऐसा कोई चलन भोपाल में शुरू भी नहीं हुआ था।  

उसी दौरान फ़ौज़िया को ख़याल आया कि कुछ और भी करना चाहिए। वे एक यतीमख़ाने में लड़कियों को पढ़ाने जाने लगीं। वहाँ की बच्चियाँ बहुत जल्द उनसे हिल-मिल गईं। धीरे-धीरे फ़ौज़िया को बच्चियों के शोषण के बारे में पता चला। उनकी सोहबत में बच्चियाँ विद्रोही हो उठीं थी। वे गलत बातों का विरोध करने लगीं। अंततः उन्हें वहां आने से मना कर दिया गया। फिर भी छुप-छुपकर बच्चियाँ उनसे मिलने आतीं या ख़त लिखतीं। उनकी मदद के लिए फ़ौज़िया एक अधिकारी से मिलीं, जिन्होंने पूरी बात सुनी और यह कह कर भगा दिया कि वहाँ ऐसा कुछ नहीं होता। इस बात ने फ़ौज़िया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आख़िर वे हैं कौन और क्यों उनकी बात सुनी जाए ?’

फ़ौज़िया की ज़िंदगी में यह एक अहम मोड़ साबित हुआ। उन्होंने तय किया कि बस अब मुझे वो करना है जिससे मेरे पास वो ‘ताक़त’ आए कि लोग मेरी बात संजीदगी से सुनें और मानें। इसी सिलसिले में एक दिन उन्होंने अपनी माँ से कहा कि मुझे अपना व्यवसाय बढ़ाना है और मैं मुंबई जाना चाहती हूँ। परिवार एक बार फिर सकते में आ गया। मुंबई की पहली यात्रा मात्र चार- पाँच दिनों की रही, लेकिन 2005 में वे पूरी तरह वहीं बस गईं। अपनी जमा पूंजी  से किराये का घर लेकर पहले छः महीने उन्होंने उस केवल शहर को समझने की कोशिश की।

हर शहर की अपनी अलग फ़ितरत और तासीर होती है और मुंबई का तो अपना ही रुआब है। लेकिन फ़ौज़िया की शख़्सियत में एक ख़ास बात यह है कि वे हैसियत के ऊँचे से ऊँचे माले पर बैठे लोगों के पास जाकर काम माँग सकती हैं या उन्हें नए प्रस्ताव दे सकती हैं। इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। उन्होंने मायानगरी के ओरिएण्टल कॉलेज ऑफ़ मैनेजमेंट से काम माँगा। उनके अनुभव और प्रमाण-पत्रों के बूते उन्हें वह काम मिल भी गया। फ़ौज़िया वहाँ महज  दो घंटे पढ़ाती थीं जिसके एवज़ में उन्हें पच्चीस हज़ार रूपये मिलते थे। उस ज़माने में तो यह लॉटरी खुल जाने से कम नहीं था।

घर से कॉलेज के रास्ते में फ़ौज़िया को अक्सर एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो का बोर्ड दिखता। एक दिन वे वहाँ पहुँच गईं और सलीम भाई नामक व्यक्ति से मिलीं जो महबूब स्टूडियो में साउंड इंजीनियर का काम कर चुके थे और अब अपने स्टूडियो का संचालन कर रहे थे। समय के साथ उनके साथ अच्छी दोस्ती हो गई। एक दिन फ़ौज़िया ने उनसे कहा कि वे अपनी म्यूज़िक कंपनी खोलना चाहती हैं। सलीम भाई को पहले तो यह एक मज़ाक ही लगा लेकिन फ़ौज़िया की संजीदगी देखकर कंपनी का पंजीयन करवाने को कहा। ‘ए’ म्यूज़िक के नाम से कंपनी का पंजीयन होने के चंद रोज बाद ही पहले क्लाइंट के तौर पर एक सज्जन उनके पास आए, जिनमें कोई ख़ास गायन प्रतिभा तो नहीं थी,लेकिन वे कंपनी में निवेश के लिए तैयार थे।

इस तरह पहला अलबम तैयार हो जाने के बाद उसके वीडियो के लिए फ़ौज़िया, विश्व सुंदरी युक्ता मुखी के पास पहुँचीं। उस वक़्त वे फिल्मों में ही काम करती थीं लेकिन फ़ौज़िया की बातों का कुछ ऐसा असर हुआ कि उस अलबम के माध्यम से न केवल उन्होंने म्यूज़िक वीडियो एल्बम में डेब्यू किया बल्कि कॉस्ट्यूम और मेकअप की ज़िम्मेदारी भी ख़ुद उठाई। इस एल्बम को मीडिया कवरेज भी खूब मिला, लेकिन यह काम ज़्यादा लंबा नहीं चल सका क्योंकि 2005 में ही मुंबई में भयंकर बाढ़ आई जिसमें कंपनी को बहुत नुक़सान हुआ। अगले दो-तीन साल फ़ौज़िया को बहुत ही मुश्किल दौर का सामना करना पड़ा। लेकिन हिम्मत हारने के बजाय उन्होंने कंप्यूटर चलाना और नए-नए सॉफ़्टवेयर पर काम करना सीखा और वेब डिज़ाईनिंग, ग्राफ़िक डिज़ाईनिंग जैसे छोटे-मोटे कई काम किए।

उसी दौरान एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने का प्रस्ताव आया। एक बहुत बड़ी कम्पनी को अपना प्रोडक्ट लॉन्च करना था। फ़ौज़िया को लगा कि अब तो अँधेरा छंटने ही वाला है। अगले दिन प्रेज़ेंटेशन देना था, लेकिन उस दिन सुबह जागने के साथ ही न जाने कैसे गले से आवाज़ ही ग़ायब हो गई। डॉक्टर भी कुछ न बता सके, न किसी इलाज का असर हुआ। फिर एक दिन जिस तरह आवाज़ गले से गायब हुई थी, उसी तरह वापस आ गई। आज तक वे नहीं समझ पाईं कि आख़िर ये सब हुआ कैसे। लेकिन इस बीच वह प्रोजेक्ट हाथ से निकल गया, चुनौतियाँ अब भी उसी तरह राह रोके खड़ी थीं। उसी दौर में फ़ौज़िया ने अपनी पहली किताब इंटरनेशनल मार्केटिंग मैनेजमेंट पर काम करना शुरू किया, जिसे 2009 में भोपाल के प्रकाशक ने प्रकाशित किया। इस किताब को बाद में कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया|

वर्ष 2010 ने एक और सदमा दिया। ख़ुर्शीद जी बहुत ज़्यादा बीमार हो गईं, जिसकी वजह से फ़ौज़िया को भोपाल लौटना पड़ा। घर में बीमार माँ के अलावा पिताजी, दो भाई और उनके परिवार के साथ बहन और उनके बच्चे भी थे। ख़ास तौर पर बहन की दोनों बच्चियों को वे अपनी ज़िम्मेदारी मानती थीं। बिना काम के घर बैठना फ़ितरत नहीं थी। इसलिए अब भोपाल में फिर उन्होंने नए सिरे से पाँव जमाने की कोशिश की और एक ऐसे क्षेत्र में जा पहुँची, जिसका कला या शिक्षा से दूर-दूर तक नाता नहीं था। लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप फ़ौज़िया एक कंस्ट्रक्शन कंपनी से जाकर कहा कि आप मुझे काम दें, मैं मज़दूरों से काम करवाऊँगी। यह कंपनी शहर में सीवेज लाइन डालने का काम कर रही थी।

कंपनी के कर्ताधर्ता पहले तो हैरान हुए लेकिन शुरुआत के लिए उन्होंने एक छोटा सा काम दे दिया। अब फ़ौज़िया जे.सी.बी मशीन, ट्रैक्टर और मज़दूरों की सहायता से कंस्ट्रक्शन का काम देखने लगीं। उनका यह नया काम भी चल निकला। इस बीच एक दिन उनकी माँ चल बसीं और उनकी ज़िंदगी उस वक़्त वहीं ठिठक गई। वे कहती हैं, “मेरी ज़िंदगी का मक़सद ही जैसे ख़त्म हो गया। अब तक मैं अपनी माँ के सामने ख़ुद को साबित करने के लिए काम कर रही थी।” कंस्ट्रक्शन कंपनी अपने भाई के हवाले कर उदासियों को अपने साथ लिए वे वापस मुंबई आ गईं।

वर्ष 2011 में वे दिल्ली से प्रकाशित ‘चौथी दुनिया’ अखबार का प्रचार-प्रसार संभालने लगीं। इस तरह अख़बार की दुनिया में उनका प्रवेश हुआ। कुछ ही समय बाद उन्होंने ‘डेली मल्टीमीडिया लिमिटेड’ कम्पनी की स्थापना की,जिसमें बड़ी-बड़ी व्यावसायिक कंपनियों ने निवेश किया। इस कंपनी के बैनर तले सनी देओल, प्रीति जिंटा, अरशद वारसी को लेकर जिस पहली फिल्म का ऐलान हुआ वह थी ‘भैयाजी सुपरहिट’। कुछ कारणों से यह फ़िल्म समय पर रिलीज़ नहीं हो सकी। साल  2012 में वे रजत कपूर के निर्देशन में ‘फ़ेट्सो’ लेकर आईं, जिसे समीक्षकों की सराहना मिली। 2015 में ‘हो गया दिमाग़ का दही’ प्रदर्शित हुई, हास्य एवं चरित्र अभिनेता क़ादर ख़ान की यह आख़िरी फ़िल्म थी।

साल 2016 में फ़ौज़िया ने ‘डी.एम.एल स्टूडियो’ की स्थापना की, जिसमें रिकॉर्डिंग के अलावा पोस्ट प्रोडक्शन से जुड़े सभी काम होने लगे। इसी साल उन्होंने ‘लाउड इण्डिया टीवी’  नाम से मीडिया हाउस की शुरुआत की जिससे कई बड़े-बड़े पत्रकार जुड़े हुए हैं। डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर इस मीडिया हाउस के कई चैनल चल रहे हैं। इसके अलावा  ‘इंडियन रेकॉर्ड्स म्यूज़िक’ कंपनी भी फ़ौज़िया चला रहीं हैं जो उभरते हुए गायकों को मौक़ा देती है।

फ़ौज़िया को कई पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है – वर्ष 2013 में ‘अर्जुन सिंह अलंकरण’, 2016 ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’ सम्मान पत्रकारिता के क्षेत्र में, 2017 ‘बेस्ट वुमन सी.ओ.ओ’ अवार्ड, वर्ष 2018 में ब्रिटेन की संसद ने उन्हें सम्मानित किया, 2018 में ‘एक्सेप्शनल वूमेन ऑफ एक्सीलेंस’ सम्मान, 2020 ‘इंटर कॉन्टिनेंटल क्वालिटी अवार्ड’। इसके अलावा ‘गुरुश्री सम्मान’, ‘एकता सम्मान’, ‘आर.के. म्यूज़िकल सम्मान’ भी उन्हें प्राप्त हुए हैं। इनके अलावा अनेकों सम्मानों से सम्मानित किया गया है | – इस विवरण के लिए जरुरी वर्ष एवं संस्था के नाम के लिए मैसेज किया है.

2020-2021 में कोविड-19 के कारण लगे लॉक डाउन के दौरान जब सभी काम काज ठप्प पड़ गए, तब फ़ौज़िया ने अपनी सामाजिक संस्था ‘केनटेब एजुकेशन एंड वेलफ़ेयर सोसाइटी’ के द्वारा तक़रीबन 20 हज़ार ग़रीबों को खाना मुहैया करवाया, जो निरंतर जारी है। इसी समय उन्होंने एक किताब लिखी  ‘द सन राइज़ेज़  फ़्रॉम द वेस्ट’| वर्तमान में फ़ौज़िया मुंबई के अँधेरी में निवास कर रही हैं। वे स्वयं फ़िल्म निर्माण से संबंधित प्री-प्रोडक्शन और पोस्ट-प्रोडक्शन के सभी हुनर सीख चुकी हैं और निर्माता-निर्देशक के तौर पर एक प्रतिष्ठित स्थान अर्जित कर चुकी हैं। उनके ही शब्दों में –  “बनाने से रास्ते मिली हैं मंज़िलें, ढूँढने से रास्ता बरसों नहीं मिला”…

संदर्भ स्रोत: स्व संप्रेषित एवं फ़ौज़िया अर्शी से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

 

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