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हिन्दी साहित्य में मप्र की लेखिकाओं का योगदान भाग-3

हिन्दी साहित्य में मप्र की लेखिकाओं का योगदान भाग-3

छाया : अनीता दुबे

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हिन्दी साहित्य में मध्यप्रदेश की लेखिकाओं का योगदान भाग-3

(आधुनिक युग)

सारिका ठाकुर 

हिन्दी साहित्य में गद्य लेखन की परंपरा भारतेंदु युग से प्रारंभ हुई जिसे सुव्यस्थित प्रारूप द्विवेदी युग अर्थात 19वीं सदी के बाद नज़र आता है। उषा देवी मित्रा और सुभद्रा कुमारी चौहान ने साहित्य के कथा जगत में उस काल में प्रवेश किया जिस समय राष्ट्रीय पटल पर शिवारानी(कथा साहित्य), महादेवी वर्मा (काव्य एवं कथा साहित्य), बंग महिला (कथा साहित्य) स्थापित हो चुकी थीं। वस्तुतः 19वीं सदी में कथा साहित्य पदार्पण कर 1918 तक पूर्ण रूपेण स्थापित हो गई। प्रदेश में इसके बाद की कड़ी में महिला कथाकारों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने इस नवीन विधा में भी सहजता से स्थान बना लिया। तथापि काव्य सृजन के प्रति सामानांतर मोह बना रहा। सुविधाजनक स्थिति यह बनी कि अब रचनाकारों के समक्ष एक नवीन विकल्प उपलब्ध था।

• इस युग की महत्वपूर्ण महिला कथाकार एवं कवियित्रियां 

जुगलप्रिया : जुगलप्रिया (वास्तविक नाम कमल कुमारी) भारतेंदु युग की कवियित्री थीं, इनका जन्म विक्रम संवत 1928 में हुआ था। इनकी माता का नाम वृषभानु कुंवरि एवं पिता महाराज प्रतापसिंह देव बहादुर थे । वे ओरछा के शासक थे। जुगलप्रिया का विवाह श्रीमान विश्वनाथसिंह जू से हुआ था। इनकी रचनाएं ‘जुगलप्रिया पदावली’ के नाम से उपलब्ध है जिसमें राधा-कृष्ण के अनन्य प्रेम का वर्णन है । संयोग एवं वियोग को अभिव्यक्त करती हुई उनकी रचनाएं ब्रजभाषा में है। इनका निधन संवत 1978 में ओरछा में हुआ। (शोध प्रबंध –आधुनिक हिंदी कवियित्रियों में सुनीता जैन का स्थान, शोधकरता –एस.वी.. संखुले)

स्त्री काव्यधारा के अनुसार इनका रचना काल संवत 1900-1950 था एवं वे टीकमगढ़ की राजकन्या एवं छतरपुर नरेश विश्वनाथ सिंह की पत्नी थीं।

तोरन देवी शुक्ल ‘लली’ : 1897 में ननिहाल जबलपुर में जन्मी तोरन देवी शुक्ल ‘लली’ अपने समय के स्त्री लेखन की मजबूत हस्ताक्षर मानी जाती हैं। इनकी दो काव्य कृतियाँ ‘जागृति’ एवं ‘साधना’ प्रकाशित है। उनके समय में प्रकाशित होने वाली समस्त पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित होती रहीं और साहित्याकाश में काव्य संग्रह प्रकाशित होने से पूर्व ही वे स्थापित रचनाकारों में सम्मिलित हो चुकी थीं। हालाँकि मंचीय गतिविधयों में वे कभी सक्रीय नहीं रहीं। सन 1940 में हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा इन्हें ‘सकसरिया’ पुरस्कार से नवाजा गया था। 1968 में सन 1968 में मिथिलाधिपति महाराज कामेश्वर सिंह जी –प्रधान भारत धर्म महामंडल’ द्वारा लली जी को ‘साहित्य चन्द्रिका’ की उपाधि से सम्मानित किया गया । इनकी कविताओं में राष्ट्र प्रेम के साथ-साथ देश के महान विभूतियों के प्रति विशेष उदगार के साथ साथ वात्सल्य, प्रेम और करुणा एवं सरोकार आदि अनुभूतियाँ सुस्पष्ट रुप से व्यक्त होती है। ‘साधना’ में कृषको के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए वे लिखती हैं –

कौन हो तुम? कौन जाने
जब न अब तक जान पाये,
दूर ही तुमसे रहे पर तुम रहे उर से लगाये ।
मूढ़ हो ज्ञानियों में या क्षमा साकार हो तुम?
देश के आधार हो तुम । (साधना पृ.23)
सन्दर्भ : स्त्री काव्यधारा पृष्ठ 17 एवं ‘लली’ जी की द्वितीय कृति ‘साधना’ में उल्लेखित विवरण पर आधारित

सुभद्रा कुमारी चौहान (1904 -1948) : इलाहाबाद में जन्मी सुभद्रा कुमारी चौहान विवाह के पश्चात जबलपुर(मप्र) पहुंची थीं। इनके द्वारा रचित दो कविता संग्रह एवं तीन कथा संग्रह प्रकाशित हैं। प्रकाशित कृतियों की संख्या वृहत न होने के बाद भी ये राष्ट्रीय चेतना की सजग लेखिका मानी जाती हैं। इनके द्वारा रचित ‘खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी’ एक कालजयी रचना है जिसने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। सुभद्राजी सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थीं, वे अनेक बार जेल गईं। उनका समस्त जीवन ही राष्ट्रप्रेम के लिए अर्पित रहा इसलिए उनके लेखन में भी भावुकता, श्रृंगार अथवा अवसाद के स्थान पर वीर रस की प्रधानता नज़र आती है। हालाँकि उन्होंने बच्चों के लिए भी रचना की जिसे खूब पसंद किया था। उन्होंने आंतरिक संवेदनाओं को व्यक्त करती हुई कुछ कोमल कविताएँ भी रची हैं जिसके भीतर भी कर्तव्यबोध के सूक्ष्म स्वर सुनाई देते हैं –

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा…’ कहते रुकती है जबान
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!

सेवा करना था जहाँ मुझे
कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
उन कृपा-कटाक्षों का बदला
बलि होकर जहाँ चुकाना था॥

मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना॥

उषा देवी मित्रा : मध्यप्रदेश के साहित्य जगत में उषा देवी मित्रा का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस कालखंड का वे प्रतिनिधित्व करती हैं उस समय की अधिकांश स्त्री रचनाकार काव्य रचना में संलग्न थीं। उनकी समकालीन सुभद्रा कुमारी चौहान कथा साहित्य अवश्य रच रही थीं परन्तु उपन्यास जैसी व्यवस्थित एवं श्रमसाध्य विधा पर उनसे पूर्व किसी ने स्वयं को नहीं आजमाया था। इस दृष्टि से उन्हें मध्यप्रदेश की पहली महिला उपन्यासकार का दर्जा दिया जा सकता है । सन 1897 में जबलपुर में जन्मी उषा देवी मित्रा का जीवन संघर्ष से परिपूर्ण रहा। सुसंस्कृत पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण उनमें लेखन की प्रवृत्ति बाल्यावस्था से ही थी जिसे कालान्तर में आने वाली विपत्तियों ने उर्वरता प्रदान की। तथापि उनकी रचनाओं को मात्र व्यक्तिगत दुखों का दस्तावेजीकरण नहीं कहा जा सकता। पीड़ा, संघर्ष के साथ उनके कथा संसार में स्त्री जीवन के बदलते स्वरूप को सरलता से पहचाना जा सकता है। उनके सात उपन्यास एवं सात कथा संग्रह प्रकाशित हैं। उनके लेखन प्रतिभा से कथा सम्राट प्रेमचंद भी अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने एक बार उषा देवी मित्रा का ‘पत्र-साक्षात्कार’ भी लिया था जिसमें कहानी और साहित्य के विषय में उनके विचारों को उन्होंने जानने का प्रयत्न किया था।

(सन्दर्भ : संत थॉमस कॉलेज, पाला की शोधकर्ता प्रीति आर.द्वारा ‘उषा देवी मित्रा के कथा साहित्य में नारी जीवन के बदलते स्वरूप’ विषय पर पी.एच.डी. हेतु प्रस्तुत शोध पत्र)

मंजुला वीरदेव : इसी समयावधि में आगर-मालवा की सन 1912 में जन्मी बाल साहित्यकार एवं अनुवादक मंजुला वीरदेव की चर्चा भी की जा सकती है। हालाँकि इनके बारे में सुस्पष्ट जानकारियों का अभाव है। कविताकोष में इनकी एक बाल कविता देखने को मिलती है –
फूलों को किसने सिखलाया मधुर-मधुर मुस्काना?
कोयल को किसने सिखलाया मीठा-मीठा गाना?
कौन सूर्य को चमकाकर हरता जग का अंधियारा?
कौन रात को भर देता है चंदा में उजियारा?
इसके अलावा इनके द्वारा कन्हैया माणिक लाल मुंशी की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद भी सीधा चढ़ान के नाम से मिलता है। (सन्दर्भ -स्त्री कथा –संपादक सुधा सिंह)

हीरादेवी चतुर्वेदी : अपने समय की मूर्धन्य कवियित्री हीरा देवी चतुर्वेदी का जन्म 2 मई 1915 को खंडवा में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गाप्रसाद था। वे बचपन से ही काव्य प्रतिभा से संपन्न थीं तथापि देवीदयाल चतुर्वेदी ‘मस्त’ जी से विवाह के उपरांत उस प्रतिभा में और भी निखार आया। देवीदयाल चतुर्वेदी अपने समय के प्रखर पत्रकार एवं साहित्यकार थे। एक समय ‘सरस्वती’ का संपादन भार ‘मस्त; एवं पदुमलाल पुन्ना बख्शी दोनों मिलकर सम्भालते थे। ऐसे साहित्यिक वातावरण में हीरा देवी की बौद्धिक क्षमता एवं प्रतिभा दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा, परिणामस्वरूप वे एक संवेदनशील कवियित्री के रूप में अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व स्थापित करने में सफल रहीं। 1943 में उनका ‘मंजरी’ नाम से प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित हुआ जो कवि दंपत्ति के संयुक्त प्रयास का प्रतिफल था। इस संग्रह में हीरा देवी जी की 14 एवं मस्त जी की 28 कविताएँ संकलित थीं। इसके बाद क्रमिक रूप से सन 1934 में नीलम, सन 1940 में मधुवन, सन 1953 में मधुमॉस एवं सन 1964 में ‘धरती के गीत’ कविता संग्रहों का प्रकाशन हुआ। कविताओं के साथ-साथ गद्य रचना में भी हीरादेवी रूचि रखती थीं। उनके कहानी संग्रह ‘उलझी लड़ियाँ’ का हिंदी साहित्य जगत ने आशातीत स्वागत किया। सन 1951 में उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग ने उन्हें पांच सौ रूपये का पुरस्कार दिया था। इसके अलावा उन्होंने कई उच्च कोटि के एकांकी भी लिखे जो विभन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। बाद में उन्होंने ‘रंगीन पर्दा’ नाम से एकांकी संग्रह प्रकाशित किया जिसमें नौ स्तरीय मंचन योग्य एकांकी हैं।

हीरादेवी ने अपने काव्य में समस्त मनोभावों का कोमल स्पर्श मिलता है, जैसे मंजरी में दांपत्य जीवन, प्रेम, विरह, प्रतीक्षा एवं स्मृति आदि भाव बोध अभिव्यक्त होते हैं। नीलम में वे ईश्वर के प्रति अगाध विश्वास के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना को भी व्यक्त करती हैं। मधुवन एवं मधुमास करुणा, उल्लास एवं आशा से पूरित हैं तो धरती के गीत में मजदूर और कृषक वर्ग की पीड़ा झलकती हैं। वे लिखती हैं –

नहीं चाहती प्रणय मंच पर
गीत पूर्ववत गाऊँ।
चाहूँ केवल देश पुजारिन
बन कर प्राण चढ़ाऊं। (मंजरी पृष्ठ-15)

हीरादेवी ने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता में भी अपना योगदान दिया। वे सन 1924 से प्रकाशित मासिक पत्रिका मनोरमा की 1948-50 के आसपास संपादक बनीं| उनके प्रयास से ही मनोरमा ने काफी प्रगति अर्जित की| (सन्दर्भ: शोधगंगा पर उपलब्ध शोधपत्र (चतुष्टयेतर छायावादी कवियित्रियां) एवं महिला पत्रकारिता, पृष्ठ-152, सं-सुधा शुक्ला)

डॉ. विद्यावती मालविका: साहित्य की अनेक विधाओं में समान दखल रखने वाली विद्यावती जी का जन्म उज्जैन में 13 मार्च 1928 को हुआ था। इनके साहित्य में सामाजिक सरोकार की संतुलित मिकदार को अनुभव किया जा सकता है, जो कोई गहन विषाद अथवा प्रेम से उपजी हुआ साहित्य नहीं था। वे जिस भूमि पर खडीं थीं उसकी बुनियाद बहुत ही मजबूत थी। उनके पिता स्वयं साहित्यकार थे, स्वयं विद्यावती जी हिंदी की व्याख्याता रही हैं, जिन्हें समय-समय पर अग्रणी साहित्यकारों को पढ़ने और गुनने का अवसर प्राप्त हुआ , इतना ही नहीं उनके पीएचडी हेतु (मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव) मार्गदर्शन प्रदान करने वाले महापंडित राहुल सान्कृत्यायन थे। इस तरह विद्यावती जी के रचना संसार में विद्वता एवं सूक्ष्म संवेदना का अद्भुत तालमेल भी नज़र आता है। उन्होंने कविता, एकांकी, जीवनी, निबंध, शोध ग्रन्थ जैसे सभी विधाओं में लेखन किया और विषय वस्तु के रूप में संवेदना, सौन्दर्य, अध्यात्म, पुरातत्व जैसे क्षेत्र का चुनाव किया। उनकी यही प्रवृत्ति उन्हें अन्य समकालीन स्त्री रचनाकारों से पृथक एक भव्य स्वरूप प्रदान करती है।

शकुंतला माथुर: 1922 में दिल्ली में जन्मी शकुन्त माथुर या शकुन्तला माथुर का मध्यप्रदेश से नाता विवाह के बाद जुड़ा। उनके पति एवं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री गिरिजा कुमार माथुर अशोक नगर मप्र के निवासी थे। उन्होंने स्नातक की उपाधि ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से प्राप्त की थी हालांकि आकाशवाणी में नियुक्ति के पश्चात दिल्ली उनका स्थायी पता बन गया । यही वजह है कि मध्यप्रदेश में लेखिका शकुन्त माथुर को भी विवाह के बाद लम्बे समय तक रहने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ, परन्तु निवास का पता कहीं का भी हो इस सत्य को नहीं झुठलाया जा सकता है कि वे मप्र की बहू थीं एवं उन पर गर्व करने का अवसर यह प्रदेश कभी नहीं खोना चाहेगा। साहित्य जगत में शकुन्तला जी का नाम ‘दूसरा सप्तक’ के सन्दर्भ में भी महत्वपूर्ण है जिसमें अज्ञेय ने उन्हें स्थान दिया। पहला सप्तक में किसी महिला रचनाकार को स्थान नहीं मिला था जिसका अर्थ यह था कि महादेवी वर्मा के बाद उनके श्रेणी की कोई अन्य महिला रचनाकार नहीं दर्ज की गई लेकिन वे थीं और निरंतर लिख रही थीं जिसके प्रमाण स्वरूप हम ‘दूसरा सप्तक’ में दर्ज शकुन्त माथुर का नाम तो ले ही सकते हैं। अन्य स्त्री लेखन को सप्तक श्रृंखला में जगह क्यों नहीं मिली यह अलग सा विषय है। शकुन्तला जी की रचनाओं में स्वतंत्रता पश्चात् का उहापोह या उधेड़बन के साथ, अवसाद और उम्मीद दोनों की झलक मिलती है। वे लिखती हैं –
कभी एक ग्रामीण धरे कन्धे पर लाठी
सुख-दुःख की मोटी सी गठरी
लिए पीठ पर, भारी जूते फटे हुए
जिनमें से थी झांक रही गांवों की आत्मा
ज़िन्दा रहने के कठिन जतन में
पाँव बढ़ाए आगे जाता।
शकुन्तला जी की प्रकाशित रचनाओं में कविता संग्रह –चांदनी चूनर, अभी और कुछ, लहर नहीं टूटेगी प्रमुख कृतियाँ हैं।

मालती जोशी : उषा देवी मित्रा ने जिस कथा साहित्य में पहल की उसे बाद की लेखिकाओं ने यथा- मालती जोशी, मन्नू भंडारी, मेहरुन्निसा परवेज आदि ने मजबूती प्रदान की।1934 में जन्मी सुप्रसिद्ध कथाकार मालती जोशी का मध्यप्रदेश से जुड़ाव विवाह के उपरान्त हुआ था। उनके पति भोपाल में इंजीनियर थे। मालती जी ने कविताओं से लेखन की शुरुआत की परन्तु बाद में उन्होंने कथा एवं उपन्यास को अपना लिया। उनकी अनेक प्रकाशित पुस्तकों में 12 उपन्यास हैं। मालती जोशी की कहानियों के अधिकांश पात्र शहर के मध्यम वर्गीय तबके के होते हैं, इसलिए भाषा शैली भी सहज प्रवाह वाली खड़ी हिंदी ही है हालाँकि, मुहावरों, विदेशज शब्दों आदि का भी सुन्दर प्रयोग दिखाई देता है। इनकी कहानियों से आम पाठक सहजता से जुड़ जाते हैं क्योंकि कई प्रसंग स्वयं के जीवन के या आस-पड़ोस के प्रतीत होते हैं।

मन्नू भंडारी : मंदसौर के भानपुरा गाँव में 1931 में जन्मी मन्नू भंडारी के बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था। सभी प्यार से मन्नू पुकारते थे इसलिए लेखन के लिए भी मन्नू नाम ही उन्होंने चुना। उनकी पहली कहानी 1954 में ‘नया समाज’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी एवं 1957 में इनका पहला कहानी संग्रह ‘मैं हार गई’ प्रकाशित हुई, जिससे इन्हें अत्यंत प्रसिद्धि प्राप्त हुई। कथा एवं उपन्यास दोनों ही विधाओं में दक्ष मन्नू जी को उपन्यास ‘आपका बंटी’ एवं ‘महाभोज’ से विशेष प्रतिष्ठा मिली। इनके द्वारा रचित पांच कथा संग्रह, पांच उपन्यास एवं दो एकांकी प्रकाशित हैं। उनके जीवन साथी राजेन्द्र यादव लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार थे लेकिन दोनों के मध्य सहसम्बन्ध का समीकरण कुछ इस प्रकार निर्मित हुआ कि मन्नू जी जीवन के उत्तरार्ध में विवाह के 35 वर्षों के बाद उनसे विलग हो गईं परन्तु अपनी रचनाधर्मिता के साथ अंत तक खड़ी रहीं।

चित्रा चतुर्वेदी : पौराणिक आख्यानों पर नवीन दृष्टिपात करते हुए उसे वर्तमान परिदृश्य के साथ जोड़ने के अद्भुत कौशल से युक्त चित्र चतुर्वेदी प्रसाद परम्परा की लेखिका मानी जाती हैं। वे साहित्य जगत में कार्तिक के नाम से जानी जाती थीं। 20 सितम्बर 1939 में उनका जन्म आगरा में हुआ था। उनके पिता श्री बीके बिहारी की नियुक्त जबलपुर में पहले जज के रूप में हुई थी, उसी समय चित्रा जी भी अपने पिता के साथ जबलपुर पहुंची थीं। हालाँकि स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे इलाहाबाद चली गई थीं। उनके प्रकाशित पुस्तकों में महाभारती, बैजयन्ती एवं तनया उल्लेख हैं। इन उपन्यासों में पौराणिक स्त्री पात्रों की नवीन पड़ताल नज़र आती हैं। उन्होंने पौराणिक पात्रों के जरिये वर्तमान की समस्याओं को देखने का प्रयास किया है। साहित्य में विशेष योगदान के लिए उन्हें मप्र साहित्य परिषद् पुरस्कार एवं उप्र हिंदी संस्थान पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

मेहरुन्निसा परवेज : सन 1944 में बालाघाट में जन्मी मेहरुन्निसा परवेज का हिन्दी साहित्य जगत में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान है। इनके घर में साहित्यिक माहौल नहीं था एवं बाल्यावस्था से ही जीवन के कठोर यथार्थ का सामना करते हुए इन्होनें अभिव्यक्ति के लिए एक रास्ता ढूंढ लिया। इस रास्ते पर चलकर उन्होंने न केवल लोकप्रियता अर्जित की बल्कि जिस त्रासद वास्तविकता से होकर वे गुजर रही थी उसका सामना करने का उन्हें हौसला भी मिला। इनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में तीन उपन्यास एवं चौदह कहानी संग्रह सम्मिलित है।

इस समयावधि की दूसरी शीर्ष पंक्ति में भी कुछ सशक्त स्त्री रचनाकार अपनी विशेष पहचान बनाने में सफ़ल रहीं। जैसे पद्मा पटरथ, ज्योत्स्ना मुनीन्द्र, ललिता रावल, गीता पुष्प शॉ , सुषमा मुनीन्द्र, ज्योत्स्ना मिलन, उर्मि कृष्ण, कृष्णा अग्निहोत्री, ललिता रावल डॉ. मालती शर्मा, डॉ. कांति देवी लोधी आदि।

1923 में एक बंगाली परिवार में जन्मी पद्मा पटरथ साहित्यिक गलियारों में प्रतिष्ठित रचनाकारों में शुमार होती थीं, हालाँकि उनकी मात्र एक पुस्तक –‘मिल के पत्थर’ का ही प्रकाशन हो सका। उस समय वे नियमित रूप से लिख और छप रहीं थीं, प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियों को जगह मिल रही थी। दुर्भाग्यवश उनके बाद उनकी रचनाओं को सहेजा नहीं जा सका और धीरे-धीरे वे नष्ट हो गईं। उनकी पुत्री गीता पुष्प शॉ का विवाह प्रसिद्ध साहित्यकार रोबिन शॉ पुष्प से हुआ। गीता जी एक साहित्यिक माहौल से दूसरे में पहुंची थी, इसलिए लेखन को जारी रखना मुश्किल नहीं था। चुनौती था अपना रास्ता खुद बनाना । उन्होंने हास्य-व्यंग्य का मार्ग चुना और साहित्य जगत में स्वयं के लिए एक सम्मानित स्थान अर्जित किया।

इसी प्रकार 1941 में जन्मी ज्योत्स्ना मुनीन्द्र गुजराती और हिन्दी दोनों भाषाओं को साथ लेकर चलती थीं। इन्होने लेखन की शुरुआत कविताओं से ही की थी। श्री रामानुज तथा श्री धारवाडकर द्वारा सम्पादित ‘दी ओक्सपोर्ट एंथेलॉजी ऑफ़ इन्डियन पोएट्री’ में इनकी रचनाएं प्रकाशित हुई थीं। ये उन कथाकारों में से हैं जो मध्यमवर्गीय महिलाओं की दमित भावनाओं को बखूबी व्यक्त करती हैं। इनके दो उपन्यास –अपने साथ एवं अस्तुका के साथ कुछ कहानी संग्रह प्रकाशित हैं।

प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी की पत्नी इरफाना शरद सुप्रसिद्ध रंगकर्मी होने के अलावा सशक्त लेखिका भी थीं। ज्ञानोदय, चाँद सहित तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में उनकी कहानियां छपती थीं। कुछ उर्दू पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं देखने को मिल जाती थीं । वे ज़्यादातर स्त्री विमर्श पर आधारित कहानियां ही लिखती थीं। धर्मयुग में भी उनकी कुछ रचनाएं प्रकाशित हुई लेकिन बाद में जैसा कि उनकी पुत्री नेहा शरद बताती हैं कि पत्रिका ने यह संकेत दे दिया कि पति-पत्नी दोनों को नहीं छापेंगे, भले ही कितना भी प्रमुख नाम हो। इसके अलावा रेडियो के लिए भी उन्होंने स्क्रिप्ट लिखने का काम किया। उल्लेखनीय है कि मालती जोशी के उपन्यास ‘एक और देवदास’ का रेडियो के लिए उन्होंने नाट्य रूपांतरण किया था। हालाँकि उनकी कोई पुस्तक कभी प्रकाशित नहीं हुई।

लेखिका कृष्णा अग्निहोत्री भी अपने समय की बेलाग लेखिकाओं में शुमार होती हैं, निजी जीवन की विसंगतियां उनके साहित्य में विद्रोह के स्वर बनकर उभरे हैं। उनका जन्म हालाँकि राजस्थान में हुआ था लेकिन बचपन एवं कर्म क्षेत्र मध्यप्रदेश ही रहा। एक तरफ वे बार-बार टूटते हुए रिश्तों की किरचें बटोर रही थीं तो दूसरी तरफ वे लेखन में भी तल्लीन थीं, यही वजह है कि उन किरचों की चुभन उनकी कहानियों में सहजता से महसूस की जा सकती हैं। 18 कहानी संग्रह, 17 उपन्यास, 7 बाल साहित्य के अतिरिक्त आत्मा कथा, डायरी एवं संस्मरण में अपनी समस्त संवेदनाओं को उढ़ेल देने के बाद भी कुछ रिक्तियां वे छोड़ देती हैं जिसकी भरपाई अगली पुस्तक करती हैं और फिर उसमें भी कुछ रह जाता है। पीड़ा, क्षोभ और क्रोध के मिले जुले उत्ताप से खाली हो जाने की मंशा कहीं किसी कृति में नज़र नहीं आई। कुछ रचनाकार इसी इंधन पर अपने सृजन की ईंट पकाते हैं।

इसी कड़ी में उर्मि कृष्ण का नाम भी उल्लेखनीय है। इनका जन्म 1938 में मप्र के हरदा में हुआ था। इनकी पहली कहानी 15 वर्ष की आयु में छपी थी, फिर अपने जीवन का कमान अपनी हाथों में लेते हुए इन्होंने अम्बाला छावनी स्थित कहानी लेखन महाविद्यालय के संस्थापक डॉ. महाराज कृष्ण जैन से विवाह कर लिया। इस विवाह से किसी को आपत्ति नहीं होती यदि महाराज कृष्णन जैन विकलांग न होते। उनके इस कदम ने कई दरवाजे उनके बंद कर दिए तो कई नए दरवाजे भी खुले। उर्मिजी के लिए लिखना और पढ़ना ओढ़ने बिछाने जैसा काम हो गया। वे अब तक इक्कीस किताबें लिख चुकी हैं।

1941 में मालवा अंचल में जन्मी ललिता रावल के लेखन में आंचलिकता ज़रूरी तत्व के सामान निहित मिलता है । इनकी की कुल चार पांच कहानी संग्रह प्रकाशित हैं जैसे –नया एप्रन, कुँवारी माँ, कई तमरी गई हमरी, बिछावन, गेरी-गेरी छाँव। इनकी कहानियों में मालवा की लोक संस्कृति, तीज त्योहार, के साथ-साथ संघर्ष और चेतना के आंचलिक व्यवहार भी दीखते हैं और यही उनके रचनाओं की विशिष्टता है।

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