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हिन्दी साहित्य में मप्र की लेखिकाओं का योगदान भाग-5

हिन्दी साहित्य में मप्र की लेखिकाओं का योगदान भाग-5

छाया : अनीता दुबे

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हिन्दी साहित्य में मध्यप्रदेश की लेखिकाओं का योगदान भाग-5

(कविता/गीत/ग़ज़ल)

सारिका ठाकुर 

साहित्य जगत में कथा साहित्य का बोलबाला कुछ कदर बढ़ा कि काव्य विधा कहीं पीछे छूट गया। ज्यादातर रचनाकार अपने कथा संसार में तल्लीन रहे। इसके पीछे एक कारण यह भी रहा हो कि शास्त्रगत परिभाषाओं में काव्य को एक जटिल विधा माना गया है। काव्य रचना से पूर्व छंद विधान एवं नवरसों का ज्ञान जैसी बातें अनिवार्य मानी जाती थीं, यह अभिव्यक्ति से कहीं ज्यादा साहित्य में लावण्य उत्पन्न करने का विषय था जिसे सतत अभ्यास के बाद ही साधा जा सकता था दूसरी तरफ कहानियों का प्रारूप बिलकुल ताजा और निखरा-निखरा हुआ सा था, इसमें स्वयं की तरफ से कुछ और जोड़ने की भी भरपूर स्वतंत्रता मिल रही थी। नतीजा यह हुआ कि काव्य विधा कुछ अंतराल के लिए सुप्त हो गया। इस सुप्तावस्था में ही इस विधा ने धीरे-धीरे अपने स्वरूप को बदलना शुरू कर दिया और वह उस ब्लैंक वर्स अथवा नई कविता के स्वरूप में हमारे सामने आया जिस रूप में आज हम उसे पाते हैं, यानि अब कविता के अनुप्रास के लिए घंटो तुक वाले शब्द के पीछे कवि को जाने की आवश्यकता नहीं है अगर उसके ‘कहन’ में भाव पक्ष एवं कला पक्ष का सुन्दर प्रयोग हुआ हो। बाह्य दृष्टि से भले ही यह एक सरल सा माध्यम प्रतीत होता है वास्तव में यह विधा तलवार के धार पर चलने के सामान है क्योंकि एक सूत बराबर अंतर से कविता गद्य की नदी में गिरकर अपना अस्तित्व खो सकती है। निःसंदेह यह शैली यूरोप साहित्य से आयातित है तथापि इस शैली ने अभिव्यक्ति के नए द्वार खोल दिए जिसमें प्रदेश के नए दौर की कई कवियित्रों ने प्रवेश किया। 

डॉ. मालती शर्मा:  डॉ. मालती शर्मा का जन्म 15 नवम्बर, 1938 को ग्वालियर मध्यप्रदेश में हुआ था।  इन्होंने विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी. इनके 4 प्रकाशित कृतियों में 3 कविता संग्रह-निर्वासन की आंधी (1981) ऑक्टोपस की पेट में बचा एक बीज (1987), दृश्यों से बाहर (1990) एवं एक ललित निबंध- सो फिर …भादों गरजी (1989)  हैं. इन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 1989 में ‘निराला पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था.( शोधगंगा में प्रकाशित महाराष्ट्र की साठोत्तरी हिन्दी काव्यधारा का अनुशीलन. शोधकर्ता: प्रा. संध्या खंडागले, अहमदनगर कॉलेज, अहमद नगर, महाराष्ट्र)

तेजी ग्रोवर: पंजाब के पठानकोट में सन 1955 में जन्मी  तेजी ग्रोवर मध्यप्रदेश में पिछले कई वर्षों से रह रही हैं। इस बीच उन्होंने साहित्य और चित्रकला दोनों ही क्षेत्रों में ख्याति अर्जित की। उनकी प्रमुख कृतियों में  7 कविता संग्रह,  1 उपन्यास,  1 कहानी संग्रह, एक निबंध संग्रह, नोर्वीजी, स्वीडी, फ्रांसीसी साहित्य से 13 पुस्तकों के अनुवाद  एवं चार पुस्तकें बाल साहित्य पर आधारित हैं। कभी-कभी उनकी कविताएँ किसी पेंटिंग की उपशीर्षक सी प्रतीत होती हैं,  उनकी चित्रकला में भी ऐसा ही गूढ़ दृष्टि नज़र आता है, एक साक्षात्कार में वे स्वयं कहती हैं कि –जब मैं अपनी पेंटिंग देखती हूँ तो लगता है मैंने पेंटिंग के रूप में कविताओं को लिखा है, मेरी पेंटिंग में आप लिपि भी देख सकते हैं। तेजी का मानना है कि कविताओं का तनाव पेंटिंग में सहनीय हो जाता है। साहित्य में उनके योगदान और उसे मिले स्थान के आधार पर अपनी पीढ़ी की शीर्ष कवियित्रियों में उन्हें स्वीकार किया जा सकता है।  

वामन हतागले: वामन हतागले का जन्म 1 जनवरी 1949 को छिंदवाड़ा जिले के मोहगाँव हवेली में हुआ था। इन्होंने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की । ये संयुक्त काव्य संकलन ‘क्षितिज’ एवं ‘प्रतीक’ की सहभागी कवि रही हैं। स्वतंत्र रूप से इनके दो काव्य संग्रह –शंखनाद (2002) एवं पुकारता है वतन (2012) प्रकाशित हैं। इन्हें दो बार महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी मुंबई की तरफ से राज्य स्तरीय हिंदी नव लेखन पुरस्कार प्राप्त हुआ है। (शोधगंगा में प्रकाशित महाराष्ट्र की साठोत्तरी हिन्दी काव्यधारा का अनुशीलन. शोधकर्ता: प्रा. संध्या खंडागले, अहमदनगर कॉलेज, अहमद नगर, महाराष्ट्र)

सुधा काशिव: सुधा काशिव का जन्म 23 जुलाई 1957 को सागर में हुआ था। इनकी शिक्षा एम.ए. तक हुई थी, इनके दो काव्य संग्रह –शून्य को खींचकर (1992), वक्त के सांचे में (1995) प्रकाशित हैं. वर्तमान में सुधा नागपुर में निवास कर रही हैं. शोधगंगा में प्रकाशित महाराष्ट्र की साठोत्तरी हिन्दी काव्यधारा का अनुशीलन. शोधकर्ता: प्रा. संध्या खंडागले, अहमदनगर कॉलेज, अहमद नगर, महाराष्ट्र

मीता दास: वरिष्ठ लेखिका मीतादास वर्तमान में भिलाई में निवास कर रही है, परन्तु इनका जन्म एवं शिक्षा-दीक्षा जबलपुर में हुई । मीता जी बांग्ला व हिन्दी दोनों ही भाषाओँ में समान दक्षता रखती हैं एवं दोनों ही भाषाओँ में लेखन करती हैं। इनकी रचनाएं नया  ज्ञानोदय, पहल, वागर्थ, जनसत्ता, पब्लिक एजेंडा, सबलोक, मंतव्य, पाखी, समावर्तन, लहक, समकालीन जनमत, युद्धरत आम आदमी, गांव के लोग, दोआबा, नजरिया, प्रसंग, रेवान्त, संबोधन, शेष, दुनिया इन दिनों, अभिनव मीमांसा, अरावली उद्घोष, देशबन्धु, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, नवभारत, प्रभात खबर, जनसत्ता, दैनिक प्रखर समाचार, दैनिक युग पक्ष तथा अमृतधारा इत्यादि में प्रकाशित होते रहे हैं। इनके तीन कविता संग्रह बांग्ला भाषा में प्रकाशित हैं । इसके साथ ही वे कुशल अनुवादक भी हैं। इन्होंने कई पुस्तकों का हिंसी से बांग्ला एवं बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद किया है। इसके अलावा मीताजी साहित्यिक लेखों में भी रुचि रखती हैं जो समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनका एक कहानी संग्रह व एक कविता संग्रह प्रकाशनाधीन है।

नेहा शरद: सुप्रसिद्ध साहित्यकार शरद जोशी एवं इरफाना शरद की सुपुत्री नेहा शरद भारतीय टेलीविजन की जानी-मानी कलाकार एवं रंगकर्मी होने के साथ स्वभावतः कवियित्री हैं। उनके द्वारा रचित कविता संग्रह ‘खुदा से खुद तक’ को लोगों ने खूब पसंद किया गया था। इसकी भूमिका मशहूर शायर बशीर बद्र साहब ने लिखी थी । देश-विदेश के कई मंचों पर वे काव्य पाठ कर चुकी हैं । इसके अलावा उन्होंने शरद जोशी के अनेक लेखों को संकलित कर 7 पुस्तकों के रूप में प्रकाशित करवाए। इसके अलावा वे नवभारत टाइम्स, जनसत्ता आदि में सतम्भ लिखती रही हैं। लोकमत में  उनका स्थायी स्तम्भ तिलिस्मनामा एक समय खूब लोकप्रिय हुआ था।

नीलेश रघुवंशी:  गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में दक्षता रखती हैं। पांच कविता संग्रहों के अलावा उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित है । वर्तमान गद्य कविता के दौर में ऐसी कविताएँ झट से अपना स्थान बना लेती हैं जो सवाल पूछतीं है या पूछने को उकसाती हैं। नीलेश रघुवंशी की कविताओं में सवाल खुली आँखों से भी तैरते हुए नज़र आते हैं। 

उषा भदौरिया: हिन्दी एवं उर्दू के साथ-साथ पंजाबी, संस्कृत और अंग्रेजी की जानकार उषा भदौरिया के गीत-गजलों के 12 संग्रह प्रकाशित हैं। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में   इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। इन्हें दोनों ही भाषाओं के पाठक वर्ग से प्यार एवं सम्मान प्राप्त हुआ है । 

प्रज्ञा रावत:  अनुपमा रावत एवं संवेदना रावत: प्रसिद्ध कवि भगवत रावत की सुपुत्रियाँ उनकी विरासत को लेकर बखूबी आगे बढ़ रही हैं। भाई बहनों में सबसे बड़ी प्रज्ञा रावत की मात्र एक पुस्तक ‘जो नदी होती’ प्रकाशित है। इस कविता संग्रह को खूब सराहना मिली । इस संग्रह के लिए वर्ष 2012 में उन्हें वागीश्वरी सम्मान से सम्मानित भी किया गया था। प्रज्ञा जी की कविताओं में नई कविता बहुत ही सुन्दर लिबास में सज्जित होती है, जिसमें चुभती हुई कुछ किरचों के साथ ही मुलायम मासूमियत भी उभरकर आती है। इन्होंने अपने पिता के कविता संग्रह का संपादन भी किया है, अपार संभावनाओं के बाद भी उनका कोई अन्य संकलन पाठकों के समक्ष नहीं आया। 

प्रज्ञाजी की दो छोटी बहने हैं और दोनों ही बड़ी बहन की तरह विरासत को लेकर आगे बढ़ रही हैं। अर्थशास्त्र की व्याख्याता अनुपमा रावत लम्बे समय से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में कविताएँ लिख रही हैं। 2021 में अंग्रेजी कविताओं का संग्रह –द हमिंग बर्ड्स एंड अदर पोएम’ प्रकाशित हुआ, जल्द ही वे हिन्दी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करने जा रही हैं। अनुपमा जी के लेखन का केंद्रीय विषय स्त्री विमर्श के साथ सामाजिक समरसता की आकांक्षा ध्वनित होती है। साथ ही, पर्यावरण के मुद्दों पर भी उन्होंने खूब लिखा है। अनुपमा जी की कविताएँ हालाँकि किसी पत्र-पत्रिका में भी देखने को नहीं मिलती लेकिन विभिन्न साहित्यिक गोष्ठियों व सम्मेलनों में उन्हें अक्सर देखा और सुना जा सकता है। वर्तमान में वे पिता की प्रमुख कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद कर रही हैं।   

इसी प्रकार संवेदना रावत भी अपनी दोनों बड़ी बहनों की तरह लेखन परम्परा को आगे बढ़ा रही हैं। पहले कविता संग्रह ‘लड़कियां जो पुल होती हैं’ को वागीश्वरी सम्मान प्राप्त हुआ। कविताओं के साथ ही इन्हें कहानियां सुनाने का शौक है। आदिवासी बच्चों,  अनाथआश्रम तथा आर्थिक रूप से वंचित बच्चों के लिए निरंतर स्टॉरी टेलिंग कार्यशालाओं का संचालन के साथ ही स्वयं भी कहानियां सुनाती हैं। अपने नाम के अनुरूप संवेदनाजी की कविताओं में संवेदना के स्वर बड़ी सूक्ष्मता से उभरते हैं। 

शम्पा शाह-राजुला शाह: प्रसिद्ध साहित्यकार दंपत्ति श्री रमेश चंद शाह एवं श्रीमती ज्योत्स्ना मिलन की सुपुत्रियाँ शम्पा शाह एवं राजुला शाह बड़ी कुशलता के साथ  माता पिता की विरासत को थामे हुई स्वयं की पहचान गढ़ रही हैं। सिरेमिक आर्ट की दक्ष कलाकार शम्पा के वैचारिक लेख प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा वे साहित्यिक गतिविधियों पर आधारित एक यूट्यूब चैनल का भी संचालन कर रही हैं। शम्पा कुशल अनुवादक भी हैं। दूसरी तरफ उनकी छोटी बहन राजुला शाह भी संवेदनशील कवियित्री एवं कुशल अनुवादक मानी जाती हैं। इनके पहले काव्य संग्रह का नाम है ‘परछाईं की खिड़की से’ जिसके बाद उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

बाबूशा कोहली: साहित्य अकादमी के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित बाबूशा कोहली अपनी कविताओं में बिम्बों की सुंदर सी क्यारी सजाती हैं, बहुत कुछ कैनवास पर सजे अमूर्त चित्र की तरह। अमूर्त चित्रों के अर्थ निगमन में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उस चित्र का एक अर्थ वह है जो सिर्फ चित्रकार जानता है और दूसरा अर्थ वह है जो दर्शक लगाते हैं । बाबूशा की कविताएँ भी कुछ ऐसी ही अमूर्त चित्रों की तरह होती हैं जिसमें गुथें हुए बिम्बों के असंख्य सन्दर्भ और परिपेक्ष्य निकाले जा सकते हैं। कविता संग्रह ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ के अतिरिक्त बावन चिट्ठियाँ, प्रकाशित हैं जिसके बाद से उन्हें अग्रणी कवियित्रियों में शुमार किया जाने लगा है।

डॉ. आरती: सवालों के ताने-बाने पर बुनी हुई डॉ. आरती की कविताएं भी लम्बे अरसे तक अपना असर छोडती हैं|  वर्ष 2015 में उनकी कविता संग्रह ‘मायालोक से बाहर’ प्रकाशित हुई। इसके बाद हालंकि कोई अन्य संकलन अब तक नहीं आया है तथापि उनका लिखना जारी रहा। उनकी कविताओं में केंद्रीय विषय ‘स्त्री विमर्श’ अपने विभिन्न आयामों के साथ उपस्थित होता है। उनकी कविताओं में सहजता एक अलग सी कविता प्रतीत होती है जिसे दार्शनिक दृष्टि विशिष्टता प्रदान करती है। डॉ. आरती कविताओं के अलावा अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘समय के साखी’ के माध्यम से गंभीर बहस की जमीन भी तैयार करती हैं। इस पत्रिका का प्रकाशन वे वर्ष 2008 से कर रही हैं जिसमें पाठकों को विश्व स्तरीय एवं राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख साहित्यकारों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है। 

श्रीमती इंदिरा किसलय: इनका जन्म 30 जून सन 1955 को लालबर्रा, बालाघाट, मध्यप्रदेश में हुआ। इन्होंने सागर विश्वविद्यालय से ‘प्रगतिशील काव्य के परिपेक्ष्य में नागार्जुन का योगदान’ विषय में पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की। इनके दो काव्य संग्रह, एक जीवन वृत्त एवं एक पत्र संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

2010 से लेकर 2020 तक के बीच सोशल मीडिया ने हर श्रेणी के लोगों को एक ऐसा मंच उपलब्ध करवाया जहाँ बेलाग और बेलौस अभियक्ति के भी सहज पाठक श्रोता उपलब्ध थे। इस दौर में कवियों की एक बाढ़ सी आई, पांच से सात वर्षों की रचना प्रक्रिया में कुछ थम गए कुछ बह गए। थमने वालों में ऐसे रचनाकर थे जिनके मौलिक गुणों में साहित्य से प्रेम करना पूर्व से ही था। ऐसी प्रतिभाओं ने इस मंच का सदुपयोग स्वयं को तराशने, निखारने और परिष्कृत करने में किया। इस श्रेणी की लेखिकाओं में मालिनी गौतम, तिथि दानी, श्रुति कुशवाहा, शेफाली शर्मा,  संध्या कुलकर्णी, वीणा बुंदेला, शेफाली पाण्डेय, रक्षा दुबे चौबे, शहनाज़ इमरानी, पल्लवी त्रिवेदी, प्रीति अज्ञात आदि का नाम लिया जा सकता है। इनमें भी कुछ रचनाकार  दृष्टि में बने रहने की आतुरता लिए सतत प्रयासरत रहे जबकि कुछ अपने ही संसार में गुम यदा-कदा दिख जाते हैं तथापि उनके साहित्य की समुचित चर्चा हुई। इस नई धारा ने लेखन के लिए एक ऐसा विकल्प उपलब्ध करवाया जिसमें रचनाकारों को पाठकों तक पहुंचने के लिए न तो किसी औपचारिक मंचीय आयोजन की दरकार थी न किसी प्रकाशक की। निःसंदेह श यह माद्यम रद्दी साहित्य का वायस भी बना तथापि नवलेखन को उंचाई में देने में इसके प्रत्यक्ष एवं परोक्ष भूमिका की चर्चा तो होनी ही चाहिए। इस दौर की सबसे अच्छी बात यह है कि काव्य के शास्त्रीय पक्ष पर भी खूब काम हुआ। कई  कवियों ने सोशल मिडिया के विभिन्न समूहों के माध्यम से छंदों, दोहों, गजलों से लेकर जापानी कविता शैली हाईकु, तांका, शेर्न्यू आदि में दक्षता हासिल की, हालाँकि अब भी कुछ रचनाकारों ने स्वयं के लिए निर्बाध लेखन का मार्ग ही चुना।

इस दौर की महत्वपूर्ण कवियित्रियों में प्रमुख हैं –

मालिनी गौतम: प्रदेश की समकालीन लेखिकाओं में मालिनी गौतम का नाम प्रतिनधि हस्ताक्षरों में से एक है। उनका जन्म झाबुआ के आदिवासी अंचल में हुआ, इंदौर व उज्जैन में शिक्षा-दीक्षा हुई एवं सन 1994 में वे गुजरात के आदिवासी अंचल संतरामपुर में बस गईं।  वे अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर हैं लेकिन हिन्दी साहित्य के प्रति विशेष अनुरख रखती हैं। उनकी कविताएँ, गजलें, नवगीत, समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, हंस, पाखी, वागर्थ, अक्षरा, इंद्राप्रस्थ भारती, सदानीरा, दोआबा, पूर्वग्रह, लोकमत समाचार, साक्षात्कार, निकट जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।  अब तक मालिनी गौतम के दो कविता संग्रह, एक गजल संग्रह, एक नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कविताओं का गुजराती, अंग्रेजी, मराठी, मलयाली, उर्दू, नेपाली, पंजाबी, बांग्ला आदि भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। मालिनी गौतम के रचना संसार की विशेषता यह है कि उनके चारों तरफ खिड़कियाँ खुली हुई हैं, वे जीवन की किसी भी समस्या या सुखद-दुखद अनुभूतियों के किसी एक पक्ष को नहीं देखतीं बल्कि उसे उसके समग्र में देखने का प्रयास करती हैं। उनके विमर्श से जीवन का हर हिस्सा गुंथा हुआ मिलता है ।

तिथि दानी ढोबले: जबलपुर की तिथि दानी नए दौर की प्रतिष्ठित कवयित्रियों में से एक हैं। लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं एवं वेब माध्यम पर इनकी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। तिथि जी हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी लिखती हैं। यूरोप की अंतर्राष्ट्रीय वेब पत्रिका ‘वर्ड्स एंड वर्ल्डस’ इनकी अंग्रेजी कविताएँ खूब प्रशंसित हुई हैं। भारतीय उच्चायोग, लंदन की डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी हिदी साहित्य प्रकाशन अनुदान योजना के तहत पहले कविता संग्रह की पांडुलिपि सम्मानित हुई। आधारशिला फाउंडेशन का ‘हिंदी गौरव सम्मान’ के साथ इन्हें म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन का प्रतिष्ठित ‘वागीश्वरी सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया।

श्रुति कुशवाहा: 1978 में जन्मी जबलपुर की श्रुति कुशवाहा ने मध्यप्रदेश के साहित्य जगत में पत्रकारिता के माध्यम से प्रवेश किया, गो कि पत्रकारिता ने लेखन और लेखन दृष्टि दोनों से परिचय करवाया, अनुभूतियों के विस्तृत सागर की बूंदें जब भी छलकीं, श्रुति ने उन्हें कविता का रूप दे दिया। इनके प्रथम कविता संग्रह ‘कशमकश’ को आशातीत सफलता मिली और वे वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित भी हुईं। इसके बाद हालाँकि उनका अन्य कोई संग्रह देखने को नहीं मिलता लेकिन वे निरंतर लिख रही हैं एवं छपती हुई अपनी छाप भी छोड़ रही हैं। इनकी ज्यादातर कविताएँ छंद मुक्त ही देखने को मिलती हैं तथापि छंद में भी इन्होंने खुद को आजमाया है। इसके अलावा कुछ कहानियां भी इन्होंने लिखी हैं। शैली और भावपक्ष दोनों में ही इनकी प्रयोगधर्मिता बखूबी उजागर होती है। 

डॉ. राजश्री रावत राज: अविभाजित मध्यप्रदेश के बिलासपुर में जन्मी डॉ. राजश्री रावत भोपाल में होमियोपैथी चिकित्सा से जुड़ी हैं। बचपन का शौकिया लेखन आगे चलकर उनके जीवन का अनिवार्य अंग बन गया। राजश्री जी की अब तक दो कविता संग्रह, प्रकाशित हो चुके हैं जबकि एक कहानी संग्रह एवं एक गजल संग्रह प्रकाशनाधीन है। वे विगत कई वर्षो से सर्जना नामक स्मारिका का संपादन कर रही हैं, इसके अलावा इन्होंने तीन कहानी संग्रह एवं तीन कविता संग्रह का संपादन भी किया है।

(सन्दर्भ स्रोत : हिन्दी तथा अंग्रेजी-महिला लेखन का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. चन्द्र मुखर्जी, पृं 37 )

सुनीता खत्री: साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरा’ के संपादन से जुड़ी सुनिता खत्री स्वयं भी उम्दा कवियित्री हैं। वे अब तक छह साहित्यिक पुस्तकों का संपादन कर चुकी हैं। पर्यावरण पर आधारित उनकी पुस्तक ‘प्रदूषण समस्या नहीं चेतावनी’ काफी चर्चित रही। इसके अलावा सृजन यात्रा डॉ. राम कमल राय, संवाद एवं हस्तक्षेप (व्याख्यान संकलन) एवं कविता संग्रह तलाश प्रकाशित हैं।

(सन्दर्भ स्रोत : हिन्दी तथा अंग्रेजी-महिला लेखन का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. चन्द्र मुखर्जी, पृं 40  )

अर्चना भैंसारे: हरदा की अर्चना भैंसारे नवलेखन के प्रति गहरा उम्मीद जगाती हैं। पढ़ाई के दौरान हिन्दी साहित्य से परिचय हुआ एवं लेखन के प्रति रूचि जागृत हुई। इनकी कविताएँ समय-समय पर वागर्थ, ज्ञानोदय, साक्षात्कार एवं अक्षरा आदि में प्रकाशित होती रही हैं । पहले कविता संग्रह ‘कुछ बूढ़ी उदास औरतें’ के लिए इन्हें युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इनकी कविताओं में सामाजिक विषमताओं का विद्रूप चेहरा अनावृत होता है। 

डॉ. सुषमा गजापुरे ‘सुदिव’: भोपाल की सुषमा जी, साहित्यिक लेखन के साथ-साथ संपादन में भी रूचि रखती हैं। सुषमा जी ने छठवीं कक्षा से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। संभवतः इसी रुझान के कारण आगे चलकर इन्होंने विषय के रूप में हिन्दी का अध्ययन किया और उसमें पीएचडी की उपाधि हासिल की। इन्होंने लम्बे समय तक साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षर शिल्पी’ का संपादन किया। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में  निरंतर इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। अब तक इनके पांच कविता संग्रह एवं एक शोध ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।  

नेहा नरुका: युवा लेखिकाओं में अपनी पहचान बना चुकीं ग्वालियर की नेहा नरुका महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा से जुड़ कर साहित्यिक विषयों पर आधारित महत्वपूर्ण शोधकार्यों में हिस्सा ले चुकी हैं। बारहवीं कक्षा से ही लेखन के प्रति रूचि जागृत हुई। समसामयिक सृजन 2012 के युवा लेखन विशेषांक में पहली बार इनकी कविता प्रकाशित हुई जिसके बाद से लगभग सभी प्रमुख एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। अब तक सौ से अधिक कविताएँ लिख चुकी हैं। ‘पार्वती योनि’ इनकी चर्चित कविता है, इसके बाद से ही युवा कवियित्री के रूप में इनकी पहचान बनी। हालाँकि अब तक एक भी संग्रह प्रकाशित नहीं है तथापि साझा संकलन ‘सातवाँ युवा द्वादश’   वर्ष 2012 में इनकी कुछ कविताएँ संग्रहीत हैं। इनकी कविताएं वर्जित मुद्दों पर बात ही नहीं करतीं बल्कि एक पक्ष भी रखतीं जिन्हें या तो कान बंद करके खारिज किया जा सकता है या सुनकर विचार के लिए उद्धत हुआ जा सकता है। 

शेफाली शर्मा: बाल साहित्य में एक उभरता हुआ नाम है शेफाली शर्मा का परन्तु लेखन बाल साहित्य तक सीमित नहीं है, इनकी कविताएँ  वागर्थ, समावर्तन, छत्तीसगढ़ मित्र, पाठ पत्रिका, पहले-पहल, साँझी बात, आंचलिका, सुख़नवर, कलमकार, दुनिया इन दिनों, अभिनव सम्बोधन, काव्य स्पंदन, साहित्यायन, शैक्षिक दख़ल, सुबह सवेरे दैनिक समाचार पत्र, लोकजतन समाचार पत्र, सत्यास्त्र समाचार पत्र, पत्रिका एवं दिव्य एक्सप्रेस में छपती रही हैं। स्वतन्त्र रूप से अब तक इनके संग्रह प्रकाशित नहीं हैं तथापि साहित्य अकादमी, दिल्ली एवं सृजनलोक प्रकाशन द्वारा प्रकशित साझे संकलन में इनकी कविताएँ संग्रहीत हैं।

संध्या कुलकर्णी: भोपाल की संध्या कुलकर्णी लम्बे समय से लेखन में सक्रिय रही हैं एवं मध्यप्रदेश साहित्य सम्मलेन से जुड़कर विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेती रही हैं। इनका एक कविता संग्रह खोज का तजुर्मा प्रकाशित है। कविता के साथ-साथ चित्रकला और मृत्तिका शिल्प में भी संध्या अभिरुचि रखती हैं । इनकी रचनाएं पढ़कर प्रतीत होता है मानो कविता इनके स्वभाव में हो। उनके सृजन संसार में अनुभूतियों का सतत प्रवाह है और वह प्रवाह स्वयं माध्यम को तलाश कर व्यक्त होता है चाहे वह मृत्तिका कला हो, चित्रकला हो या कविता हो। तितली फूल पत्तियों की ओट से(ओट से इसलिए कि इनकी कविताओ में बिम्ब विन्यास बड़े ही कोमल लेकिन मारक होते हैं)  इनकी कविताएँ अप्रिय विभीषिकाओं को भी बखूबी व्यक्त करती हैं। 

शहनाज़ इमरानी: भोपाल के मशहूर शायर मक़सूद इमरानी की सुपुत्री शहनाज इमरानी संवेदना और प्रतिरोध के मिश्रित भाव की कवियित्री हैं। यद्यपि कोई भी रचनाकार यह वादा नहीं कर सकता है कि वह सदैव इसी भाव पक्ष को लेकर आगे बढ़ेगा या कुछ निश्चित संवेदना को ही सहेजेगा तथापि मानवीय अनुभूति के एक छोर पर संवेदना हो एवं दूसरे छोर पर प्रतिरोध हो तो शहनाज इमरानी की कविताओं जैसी सूरत में हाज़िर होता है| इनका पहला काव्य संग्रह था ‘दृश्य के बाहर’ जिसकी भूमिका प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी ने लिखी थी। पाठकों के मन में उनकी कविताएं एक चुभन पैदा करती हैं । 

प्रीति अज्ञात: मध्यप्रदेश के भिंड में जन्मी प्रीति अज्ञात आत्मविश्वास से परिपूर्ण समकालीन युवा लेखिकाओं का एक प्रकार से प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्होंने स्वयं को किसी एक विधा में सीमांकित नहीं किया है बल्कि प्रीति किसी भी नई विधा को सीखने जानने और परखने की हिम्मत रखती हैं। विशेषतया वे उन सभी विषयों पर बेलाग विचार प्रकट करती हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष जीवन को प्रभावित करता हो। चाहे वह आमिर खान के तलाक का मामला हो या स्त्रीवाद के बहाने सिलबट्टा विमर्श। बहुमुखी प्रतिभा की धनी प्रीति हस्ताक्षर डॉट कॉम नाम से एक साहित्यिक वेबसाईट का संचालन कर रही हैं, इसके अलावा लम्बे समय से प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं व साहित्यिक वेबसाइटों पर इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। ये अब तक पांच पुस्तकों का संपादन कर चुकी हैं ,  इनका एक कविता संग्रह एवं एक निबंध संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं साथ ही चौदह साझा संकलनों में इनकी रचनाएं संकलित हैं। प्रीतिजी हास्य व्यंग्य में भी उतनी ही सहज प्रतीत होती हैं जितनी किसी गंभीर कविता या विमर्श में। 

पल्लवी त्रिवेदी: यायावर तबीयत की पल्लवी त्रिवेदी पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। विभाग की जिम्मेदारी और साहित्य से मैत्री दोनों बखूबी निभा रही हैं । इनकी कविताओं में सजींदगी के साथ एक मस्तमौलापन भी नज़र आता है। हास्य-व्यंग्य एवं गंभीर कविता दोनों में ही इनकी कलम अपनी सीमा और गहराई का आकलन स्वयं करती हैं। 

प्रतिभा गोटीवाले: भोपाल की प्रतिभा गोटीवाले लेखन के साथ-साथ चित्रकला और सिरेमिक आर्ट में भी दक्ष हैं। जब कोई रचनाकार एक से अधिक कलाओं में दक्ष हो तो उसकी रचनाओं में उन समस्त विधाओं की इंद्रधनुषी आभा नज़र आती हैं । संभव है उनकी चित्रकला में काव्य और सिरेमिक कृतियों में चित्रकला की झलक नजर आए। इनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं एवं समय समय पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। 

मीनाक्षी जोशी: महाराष्ट्र में निवास करने वाली मीनाक्षी जोशी का जन्म स्थान जबलपुर है। मीनाक्षी जी आलोचना, वैचारिक लेखों के साथ, कविता एवं अनुवाद कार्य से जुड़ी रही हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में इनकी 350 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा एक काव्य संग्रह, एक आलोचनात्मक पुस्तक, दो लेख संग्रह एवं इनके द्वारा सम्पादित एक काव्य संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। इन्होंने कई गुजराती कविताओं का अनुवाद किया है जिसके अनेक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इन्हें  स्वामी भीष्म आर्य पुरस्कार, विदर्भ युवा गौरव पुरस्कार, सुभद्रा कुमारी चौहान साहित्य पुरस्कार, सूरज सम्मान, साहित्य सागर मानद उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है।

डॉ. मृद्ला सिंह:  रीवा में जन्मी मृदला सिंह वर्तमान में छत्तीसगढ़ गढ़ में निवास कर रही हैं। ये स्वयं कवियित्री होने के साथ साथ साहित्यिक कृतियों की गहन विवेचना में रूचि रखती हैं। इनके वैचारिक पुस्तकों में सामाजिक संचेतना के विकास में हिन्दी पत्रकारिता का योगदान एवं मोहन राकेश के नाटक-चरित्रों का मनोविज्ञान प्रकाशित हो चुके हैं जबकि ब्रह्मराक्षस (मुक्तिबोध के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित) प्रकाशनाधीन है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की महिला कथाकारों की कहानियां ‘तरी हरि ना ना’ के नाम से प्रकाशित है । इसके अलावा वर्ष 2021 में उनका कविता संग्रह ‘पोखर भर दुःख’ भी प्रकाशित हुआ है जिस पर समीक्षणगण अछि प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इनकी कविताओं में प्रतिरोध के स्वर के साथ उम्मीदों के जुगनू भी जगमगाते हैं।

रक्षा दुबे चौबे: शासकीय पद पर कार्यरत रक्षाजी के जीवन का हिस्सा सामाजिक विषयों, चित्रकला और लेखन से जुड़ा हुआ है। वे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं जहाँ उन्हें जीवन के अलग-अलग रंग देखने का अवसर मिलता है। यह देखना और उन्हें महसूस करना उनकी कविताओं, लघु कथाओं, चित्रों और छायाकारी में ऊर्जा बनकर प्रवाहित होती है। वे ज्यादातर सामसायिक विषयों पर कविताएँ लिखती हैं। एक कविता संग्रह –सहसा कुछ नहीं होता प्रकाशित है। उनकी कृतियों को देखकर स्पष्ट होता है, अभिव्यक्ति के माध्यम का चुनाव इनकी अनुभूतियाँ स्वयं करती हैं, इसलिए वे अत्यंत सहज बिम्बित होती हैं।

दीप्ति कुशवाहा: नरसिंहपुर में जन्मी दीप्ती कुशवाहा नागपुर में रहती हैं। कविता, निबंध एवं अनुवाद तीनों विधाओं में लम्बे समय से सक्रिय हैं। इनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें पहली  आशाएं हैं आयुध नाम से कविता संग्रह हैं एवं दूसरी ‘मोतियन चौक पुराओ एक कला पुस्तिका है। दीप्ति की कृतियों में उनका सौंदर्य बोध स्पष्ट नज़र आता है। उनके आर्ट पीस में वह सुन्दरता बनकर उतरती है और कविताओं में संवेदना।

सीमा हरि शर्मा:  भोपाल की सीमा हरि शर्मा हिन्दी साहित्य की मेधावी छात्रा रही हैं। शिक्षा दीक्षा उज्जैन में हुई एवं वर्तमान में भोपाल में निवास करती हैं। कुछ समय महाविद्यालय में प्राध्यापिका के रूप में अपनी सेवा देने के बाद वर्तमान में घर-बार सँभालते हुए साहित्यिक सृजन में व्यस्त हैं। इनका एक गीत संग्रह ‘गीत अंजुरी’ के नाम से प्रकाशित है इसके अलावा कई साझा संग्रहों में इनकी रचनाएं संकलित हैं, जैसे -1. गीत प्रसंग 2. दोहा प्रसंग 3. नवगीत का मानवतावाद 4. अपूर्वा गीत संग्रह 5. काव्य कुंज 6. साहित्यगंधा-कवयित्री विशेषांक 7. सूरज है रूमाल में 8. पाँव गोरे चांदनी के (प्रेम गीत संग्रह) । सीमाजी के गीत महज तुकों का मिलान भर नहीं होता बल्कि एक परिपक्वता भी झलकती है, साथ ही अनुभूतियों में व्यापकता भी देखी जा सकती है ।   

कविता नागर: कवियित्री के रूप में चर्चित कविता जी के लेखन की शुरुआत कहानियों से हुई। मुख्यतः मॉमस्प्रेसो और प्रतिलिपि जैसे वेबसाइटों पर उनकी कहानियां प्रकाशित होती थीं। बाद में उनका रुझान कविताओं की ओर हुआ। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं। इसके अलावा वे मध्यप्रदेश साहित्य सम्मलेन, देवास से भी जुड़ी हुई हैं।

शीरीन भावसार: नवोदित कवियित्रियों में शीरीन भावसार तेजी से अपना जगह बना रही हैं। किस्सा कोताह, विश्वगाथा, अहा जिन्दगी सहित प्रमुख पत्र-पत्रिकों में निरंतर इनकी रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं। हालाँकि अभी तक इनकी एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं है तथापि सम्मेलनों और गोष्ठियों में इन्हें प्रायः देखा जा सकता है । शीरीन भावसार डिजिटल माध्यम में भी सक्रिय हैं जहाँ इनकी कविताएं खूब पसंद की जाती हैं।

श्रद्धा सुनील: नए दौर की कवयित्रियों में श्रद्धा सुनील का नाम उल्लेखनीय हैं। श्रद्धा जी शास्त्रीय संगीत की कुशल गायिका होने के साथ-साथ संवेदनशील कवयित्री भी हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा आकाशवाणी से भी प्रायः इनका कविता पाठ प्रसारित होता है। इनके काव्य संग्रह ‘हिमालय की कंदराओं में’ प्रशंसित है।  

गीत/ग़ज़ल

ममता वाजपेयी: भोपाल की चर्चित गीतकार ममता वाजपेयी ऊर्जावान एवं संवेदनशील रचनाकार हैं। ये गीत, कविता और कहानी तीनों विधाओं में लिखती हैं। छंद, प्रवाह और गेयता गीत के बुनियादी अंग माने जाते हैं जो इनके गीतों में सहज ही मिल जाता है। इनके गीतों का खासियत है कि कल्पना के आकाश में विचरण करने की बजाय वे समाज के आंतरिक और बाह्य यथार्थ को व्यक्त करती हैं। ममता जी के ‘भाव पंखी हंस गीत संग्रह एवं गीत सिन्दूरी गंध कर्पूरी साझा गीत संग्रह प्रकाशित है। इनके रचना संसार में सामाजिक विरोधाभास, समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ प्रकृति और प्रेम अलग तरह से परिभाषित होते हैं।

वर्षा सिंह: सागर की वर्षा सिंह ने पद्य में ‘गजल विधा’ को अपनाया। अब तक उनके छः गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा एक आलोचनात्मक पुस्तक हिन्दी गजल: दशा और दिशा एवं नवसाक्षरों के लिए दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  कोरोना महामारी के काल में कई प्रतिभाओं को असमय इस दुनिया को छोड़कर जाना पड़ा, जिनमे से एक वर्षा सिंह भी थीं। एक गजलकार के रूप में उनसे कई उम्मीदें थीं। विज्ञान की छात्रा होने के बावजूद उन्होंने उर्दू कहन की तमीज और सलीके को अपनी गजलों में बखूबी निभाया है।

मौसमी परिहार: जबलपुर की मौसमी परिहार को बचपन से ही लिखने का शौक रहा है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से उनके लेखन में एक गति और प्रवाह नज़र आता है। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर और उसके बाद पीएचडी के कारण साहित्य की समझ स्वाभाविक रूप से इनमें रही है। वर्ष 2018 में इनका पहला कविता संग्रह ‘लफ्जों में सिमटी यादें’ के नाम से प्रकाशित हुआ, इसके बाद एक नवगीत संग्रह ‘मन भर उड़ान’ प्रकाशित हुआ, जिसे वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्तमान में एक काव्य संग्रह और एक लघुकथा संग्रह पर वे काम कर रही हैं। इनके रचना संसार में एक भावों और शैलियों की विविधता नज़र आती है। कविता, नवगीत और लघुकथा आदि शैलियों में स्वयं को आजमाती हुई नई चीजें सीखने के प्रति किसी छात्रा की भांति आज भी उमंग रखती हैं। 

इंदु श्रीवास्तव– सतना की इंदु श्रीवास्तव गीत-ग़ज़ल की दुनिया मेंएक ख़ास मुकाम रखती हैं। अब तक इनके तीन ग़ज़ल संग्रह (आशियाने की बातें, उड़ना बेआवाज़ परिंदे एवं बारिश में जल रहे हैं खेत)प्रकाशित हैं। एक गीत संग्रह ‘भोर पनिहारिन’ फ़िलहाल प्रेस में हैं। प्रतिष्ठित रजा सम्मान एवं स्पेनिन साहित्य गौरव से सम्मानित इंदु जी के नाम आठ गजलों का एक अल्बम ‘बादलों के रंग’ भी दर्ज है। अपनी गजलों में इंदु जी रदीफ़ और काफिये के अनुशासन को निभाती हुई भी ‘कहन’ को सबसे ऊपर रखती हैं और यही उनकी लेखनी को ख़ास बनाता है।  

© मीडियाटिक

 

 

 

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