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सुषमा शुक्ला

सुषमा शुक्ला

छाया : स्व संप्रेषित 

सृजन क्षेत्र
हस्तशिल्प एवं लोक कला
प्रमुख लोक कलाकार

सुषमा शुक्ला 

मध्यप्रदेश का उत्तर पूर्वी इलाका विंध्य प्रदेश कहलाता है और बघेली यहाँ की लोक भाषा है।  इस भाषा में  गायन को नया मुकाम देने वाली सुषमा शुक्ला का जन्म 30 जून को रीवा में हुआ। श्री राजेश्वर प्रसाद पाण्डेय और श्रीमती रामकली पाण्डेय की पांच संतानों में सबसे छोटी सुषमा को लोक गायकी के गुण विरासत में ही मिले। बचपन से ही बघेली संगीत उनकी रगों में रच बस गया।  रीवा के अंजान उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से बारहवीं तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से प्रभाकर और अवधेश प्रताप सिंह वि.वि. से तीन विषयों में (समाजशास्त्र, एम.एस.डब्ल्यू और संगीत–गायन) में एम.ए. किया।

घर-परिवार और समाज में आये दिन होने वाले उत्सवों में उनकी बड़ी मां, मां और घर की अन्य महिलाएं विभिन्न तरह के लोकगीत गाती थीं। उनके साथ रहते हुए सुषमा जी का रुझान लोकगीतों की तरफ बढ़ा।  वे अपने पिता के साथ हर शनिवार सुंदरकाण्ड के आयोजनों में शामिल होकर सामूहिक रूप से सुर और लय के साथ सुंदरकाण्ड और भजन गाया करतीं। धीरे-धीरे उन्होंने कठिन माने जाने वाले बघेली लोकगीत भी पहले स्कूल और बाद में कॉलेज के कार्यक्रमों के साथ ही अन्य सामाजिक उत्सवों में गाना शुरू किया।

उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने करीब चार वर्ष तक एक संगीत स्कूल ‘स्वरधारा’ का संचालन किया। वर्ष 1992 में रीवा आकाशवाणी की अनुमोदित कलाकार होने के बाद उन्हें प्रदेश के अनेक स्थानों पर प्रस्तुति देने के अवसर मिले। आकाशवाणी, रीवा की तरफ से फरवरी 1998 में शहडोल के विराट मंदिर में पहली प्रस्तुति के बाद बघेली के मूल स्वरूप को प्रस्तुत करने के लिए उन्हें लोगों से खूब सराहना मिली। लोक गायकी में अपनी विशिष्टताओं के कारण वे जल्दी ही आकाशवाणी की उच्च कोटि की कलाकार बन गईं। इसके साथ ही उन्हें राज्य के विभिन्न हिस्सों में आयोजित महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में अपनी गायकी का हुनर दिखाने का मौका मिलता रहा।

वर्ष 1997 में वे ग्राम पड़रा, जिला रीवा निवासी श्री योगेन्द्र कुमार शुक्ला के साथ वैवाहिक जीवन में बंध गईं, लेकिन विवाह के बाद भी उन्होंने संगीत नहीं छोड़ा, बल्कि ससुराल वालों से मिले सहयोग और प्रोत्साहन से वे और अधिक उत्साह के साथ संगीत में रच-बस गईं।

सुषमा जी लम्बे अरसे से बघेली लोक गीत गा रही हैं। यह उनकी मधुर आवाज का ही जादू है कि जिस बघेली को लोग अब तक अनपढ़ देहातियों की भाषा मानते थे, वही बघेली अब लोगों को मीठी लगने लगी है। दिसम्बर 2019 में प्रयागराज में आयोजित ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय शिल्प मेला में मिली प्रशंसा से भाव विभोर सुषमा जी बताती हैं कि इस आयोजन में उन्हें तीन दिन बघेली लोक गीत प्रस्तुत करने का अवसर मिला। वहां बघेली लोकगीतों को कल्पना से अधिक प्रतिसाद मिला।संस्कृति मंत्रालय के अधीन उत्तर मध्य क्षेत्र, प्रयागराज सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक इन्द्रजीत ग्रोवर ने मंच पर आकर कहा कि हमें पता ही नहीं था, बघेली भाषा में इतनी मिठास है। यहां हर कोई बघेली गायन का कायल हो गया है।

सुषमा शुक्ला के बघेली लोकगीत बघेलखंड के अलावा दूसरे प्रदेशों में भी सुने और सराहे जाते है। उनके द्वारा होली के अवसर पर गाया जाने वाला फगुआ, सावन में कजरी और हिन्दुली गीत खासे पसंद किए जाते हैं। इसके अलावा अलग-अलग समुदायों में प्रचलित गीतों पर भी उनकी अच्छी पकड़ है जिसमें आदिवासियों द्वारा शिला, कोल्दहका, यादवों के लिए अहिरहाई सहित अन्य गीत शामिल हैं।

सुषमा जी ने गायन के इस सफर में अनुभव किया कि बघेली लोकगीतों के प्रति लोगों की रुचि तो है, लेकिन इसका साहित्य उपलब्ध नहीं है, जिससे लोगों खासकर युवा पीढ़ी तक इसकी जानकारी नहीं पहुँच पा रही है। उन्होंने तय किया कि अब बघेली बोली और विंध्य की संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए ही काम करना है। बघेली साहित्य अगली पीढ़ी को सुर और लय के साथ उपलब्ध कराने और लोकगीतों का संग्रह करने के उद्देश्य से उन्होंने 7 मार्च 2016 को ‘सुषमा शुक्ला’ नाम से यूट्यूब चैनल बनाया और बघेली गीतों के वीडियो बनाकर उस पर डालना शुरू किया। देखते ही देखते उनकी लोकप्रियता ऐसी बढ़ी कि मात्र डेढ़ साल के भीतर ही वीडियो देखने वालों की संख्या एक करोड़ पार कर गई। इस चैनल पर अब तक लोक संस्कृति से जुड़ी हर विधा के साढ़े 3 सौ से भी अधिक गीत डाले जा चुके हैं। उनके चैनल पर 45 हजार सब्सक्राईबर्स हैं और 1 करोड़ 40 हजार से अधिक लोग इसे देख चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने एक ब्लॉग ‘Bagheli Folk culture’ भी बनाया है, जो तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

विंध्य कोकिला, विंध्य रत्न सहित स्थानीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित सुषमा जी विंध्य की संस्कृति और लोक गायन के संरक्षण को लेकर चिंतित हैं। वे कहती हैं – बघेली लोक- संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए ऐसी शिक्षा पद्धति तैयार हो, जो हमारी युवा पीढ़ी तक आसानी से पहुंचे और इसका साहित्य उनके लिए आसानी से उपलब्ध हो। ये केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, इसमें लोकरस तो है ही, यह हमारी लोक संस्कृति की भी पहचान है। इसीलिए सुषमा जी बघेली लोक गीतों (सोहर बधाई अंजुरी बियाह, नहछू, परछन, गारी, कन्यादान, बरुआ, ऋतुओं के गीत कजरी, बसंत गीत आदि) के सृजन और संग्रह कार्य में जुटी हैं। सुषमा जी रीवा राजघराने के महाराज रघुराज सिंह द्वारा लिखे गए बघेली लोकगीतों को न सिर्फ गाती हैं, बल्कि उनका रिकॉर्ड भी तैयार कर रही हैं जिससे बघेली संस्कृति और रीति रिवाज सदा-सदा के लिए संरक्षित और संवर्धित रहे।

अपने मूल परिवेश को कला का माध्यम बनाकर सुषमा जी ने अपने परिवार की लड़कियों को भी नई दिशा दी है। उनकी बहन की बेटी दिव्यानी पाण्डेय मौसी के पद चिन्हों पर चलते हुए प्रदेश के साथ-साथ मुंबई में बघेली लोक गीतों की खुशबू बिखेर रही है।

जिला न्यायालय में अधिवक्ता उनके पति योगेन्द्र जी के साथ-साथ उनके दोनों बच्चों का उनके इस कार्य में पूरा सहयोग रहता है। उनकी बेटी प्रज्ञा अभी बी.एससी. (एग्रीकल्चर ऑनर्स) अंतिम वर्ष और बेटा देवर्ष इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा है. दोनों बच्चे यूट्यूब चैनल पर उनके गीतों की एडिटिंग और उन्हें अपलोड करने में उनका सहयोग करते हैं।

वर्तमान में सुषमा जी म.प्र. जन अभियान परिषद ब्लॉक-रायपुर कर्चुलियान में ब्लॉक समन्वयक के पद पर कार्यरत हैं।

सन्दर्भ स्रोत: सुषमा शुक्ला जी  से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

 

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