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सरोज शर्मा 

सरोज शर्मा 

छाया: स्व संप्रेषित

सृजन क्षेत्र
टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच
प्रमुख प्रतिभाएँ

सरोज शर्मा 

सुविख्यात अभिनेत्री सरोज शर्मा का जन्म ग्वालियर में 26 जनवरी 1955 में हुआ था। उनके पिता बी.एम. शर्मा ग्वालियर में ही सेंट्रल रेलवे में कार्यरत थे। उनकी माँ पुष्पा देवी गृहिणी थी लेकिन उनमें पढ़ने की बहुत ललक थी। विवाह के बाद उन्होंने हायर सेकेण्डरी से लेकर स्नातकोत्तर तक की शिक्षा हासिल की। इस बीच चार बच्चे भी हुए जिनकी देखभाल में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। सरोज जी हायर सेकेण्डरी तक की शिक्षा रेलवे स्कूल से हुई। वे चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं, लेकिन परिवार में कभी लड़के-लड़की का फ़र्क उन्हें महसूस नहीं होने दिया गया। बचपन से उन्हें नृत्य का बड़ा शौक था। अपने पीछे रौशनी कर नृत्य की अलग-अलग मुद्राएँ बनाकर वे दीवार पर अपनी परछाईं बनातीं। ‘शैडो डांस’ का यह खेल उनके बचपन का पसंदीदा खेल था। उनकी इस अभिरुचि को देखते हुए माता-पिता ने उन्हें नृत्य कक्षा में भी भेजना शुरू कर दिया, जहां वे कथक सीखने लगीं। वे स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेतीं। इसके अलावा रेलवे का अपना सांस्कृतिक प्रभाग भी था, जिसमें समय-समय पर विविध कार्यक्रम होते। इस तरह सरोज जी बचपन से ही नृत्य और नाटक से परिचित थीं।

हायर सेकेंडरी के बाद उन्होंने विज्ञान विषय लेकर के.आर.बी. कॉलेज ग्वालियर में बी.एससी में दाखिला लिया लेकिन कुछ कारणों से वे उसे संभाल नहीं पाईं। एक साल अवकाश लेकर उन्होंने कला विषयों में स्नातक किया और फिर राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली। उस समय नाटक के क्षेत्र में महिला कलाकारों की बहुत कमी थी। कॉलेज की पढ़ाई दे दौरान एक बार निर्देशक सत्यपाल सोलंकी उनके घर आए। वे बिड़ला क्लब द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में किसी नाटक का मंचन करना चाहते थे और उन्हें योग्य अभिनेत्री की तलाश थी। माता-पिता ने कुछ शर्तों के साथ उस नाटक में काम करने की अनुमति दे दी। वह पहला नाटक था जिसमें उन्हें कुछ पारिश्रमिक भी प्राप्त हुआ। उनके अभिनय की खूब सराहना हुई और अन्य नाटक निर्देशकों ने भी उनसे संपर्क करना शुरू कर दिया।

पढ़ाई के साथ-साथ सरोज जी मंचों पर अभिनय भी करने लगीं। उसी दौरान डॉ. कमल वशिष्ठ के निर्देशन में नाटक ‘दुलारी बाई’ में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। इस नाटक का मंचन कला मंदिर हुआ था। मध्यप्रदेश कला परिषद द्वारा आयोजित नाट्य समारोह में डॉ. वशिष्ठ के ही निर्देशन में ‘सिंहासन खाली करो’ एवं रेलवे कॉलोनी द्वारा आयोजित समारोह में ‘पंछी ऐसे आते हैं’ नाटकों में सरोज जी ने यादगार भूमिका निभाई। इस तरह 1972 से 1980 तक ग्वालियर के रंगकर्म में वे सक्रिय रहीं एवं कला मंदिर नाट्य संस्था, आर्टिस्ट कंबाइंडसंस्था एवं बिड़ला क्लब थिएटर से जुड़ी रहीं।

इस बीच स्नातकोत्तर के बाद वह पी.एच.डी. की तैयारी करने लगीं। शोध का विषय था ‘गांधी और जिन्ना का तुलनात्मक अध्ययन’। वे इसकी संक्षेपिका लिखने में व्यस्त हो गयीं। यह वर्ष 1980 का दौर था जब भोपाल में भारत भवन स्थापना के लिए ज़ोर शोर से काम चल रहा था। स्थापना से पूर्व ही सभी विभागों का गठन भी होना था। नाटकों के लिए रंगमंडल की स्थापना हुई जिसके निर्देशक थे ब.व. कारंत। अख़बारों में एक इश्तहार आया  कि रंगमंडल के लिए अभिनेता-अभिनेत्रियों की आवश्यकता है। सरोज जी ने आवेदन कर दिया। वह रंगमंडल का पहला बैच था। कुल एक हज़ार आवेदनों में ढाई सौ अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया जिसमें से पच्चीस कलाकारों का चयन हुआ। उन पच्चीस कलाकारों में लड़कियों की संख्या मात्र 4-5 ही थी। सरोज की के साथ उस बैच में शामिल थी – मीनाक्षी चौहान, रायपुर की नीला अहमद, शोभा चटर्जी, आभा चतुर्वेदी एवं अनिता दुबे। जबकि लड़कों में आलोक चटर्जी, जैन देशमुख, राजकुमार कामले, अरुण वर्मा, राकेश विदुआ एवं मांगीलाल शर्मा जैसे कलाकार थे जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

भारत भवन में प्रशिक्षण का तरीका भी अद्भुत था। प्रतिदिन आठ घंटों की कड़ी मेहनत करवाई जाती, जिसमें अभिनय के विभिन्न पक्षों को संवारने के लिए देश-विदेश से विशेषज्ञ बुलाए जाते। कार्यशालाओं में संवाद आदयगी, अंग संचालन, भावाभियक्ति के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम तक करवाए जाते थे। सरोज जी कहती हैं कि वहाँ जाने से पहले में मंच पर अभिनय करती थी लेकिन भारत भवन जाकर हमें पता चला कि विभिन्न भूमिकाओं के साथ-साथ पोश्चर और जेश्चर किस प्रकार बदल जाते हैं। इसके अलावा भूमिका के लिए ज़रूरी हो तो लाठी और तलवार भांजने जैसी चीजें भी सिखाई गईं। भारत भवन पहुँचने के बाद कारंत जी के निर्देशन में सरोज की का पहला नाटक था ‘चतुर्भाणी’ – जिसका मंचन कालिदास नाट्य समारोह में हुआ। श्री कारंत जी के निर्देशन में ही ‘घासीराम कोतवाल’ में ‘ कोठेवाली गुलाबी’ की भूमिका को यादगार कहा जा सकता है, क्योंकि उस ज़माने के हिसाब से वह बहुत बोल्ड चरित्र था।

भारत भवन में उन्हें श्री कारंत के अलावा एम. के. रैना, रूद्र प्रताप सेन गुप्ता, प्रसन्ना, सुधीर कुलकर्णी, बी.एम. शाह, रॉबिन दास, शेखर वैष्णवी, जयदेव हट्टंगड़ी और अलोपी वर्मा जैसे दिग्गज नाटक निर्देशकों से सीखने और उनके निर्देशन में मंचित नाटकों में अभिनय करने का अवसर प्राप्त हुआ। अंतर्राष्ट्रीय निर्देशकों में जर्मनी के निर्देशक जॉन बेरी के निर्देशन में  ‘छह कश्तियों का सवार’ में अभिनय का मौका सरोज जी को मिला। जर्मनी के ही फ़िट्स वैनविट्स द्वारा निर्देशित ‘खड़िया का घेरा’ में उनकी नकारात्मक भूमिका थी, जिसे खूब पसंद किया गया। यह कॉकेशियन नाटक ‘चाॅक सर्किल’ का बुन्देलखंडी अनुवाद था। इनके ही निर्देशन में ‘पैसा फेंक,तमाशा देख’ नाटक में भी उन्होंने काम किया जो अंग्रेजी नाटक ‘थ्री पैनी ओपेरा’ का हिंदी रूपांतर था।  ‘मिड समर नाईट’ नाटक के हिंदी रूपांतर ‘बगरो बसंत’ एवं ‘टेनिंग ऑफ़ द शू’ – जो ‘तो सम पुरुष न मो सम नारी’ (बुन्देलखंडी में)के नाम से मंचित हुआ था, में भी उन्होंने यादगार भूमिकाएँ निभाईं।

इसके बाद लंदन के नाटक निर्देशक जॉन मार्टिन तीन ग्रीक नाटक लेकर आए – ट्रोजन वुमेन, इसीजीनिया इन एलिफ और क्लाइट्रेमिनिस्ट्रा। इन सबमें भी उन्हें अभिनय का अवसर प्राप्त हुआ, खासतौर पर ‘क्लाइट्रेमिनिस्ट्रा’ नाटक में मुख्य भूमिका निभाना सरोज जी आज भी अपनी उपलब्धि मानती हैं। इसके अलावा उन्हें प्रसिद्ध नाटक निर्देशक जॉर्ज लवांदों के निर्देशन में भी काम करने का अवसर प्राप्त हुआ। भारत भवन के रंगमंडल से वे वर्ष 2002 तक जुड़ीं रहीं, इस दौरान सौ से अधिक नाटकों में अभिनय के अलावा वेषभूषा एवं परिकल्पना में भी दक्षता प्राप्त की। उन्हें  संस्कृति विभाग, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000-2002 सीनियर फ़ेलोशिप भी प्राप्त हुई।

वर्ष 2006 से सरोज जी अपनी नाट्य संस्था ‘कोशिश’ का संचालन कर रही हैं, जिसमें वे अपने निर्देशन में अनेक नाटकों का मंचन कर चुकी हैं। सरोज जी द्वारा अभिनीत प्रमुख नाटक है –घासीराम कोतवाल, दो कश्तियों का सवार, मालविकाग्निमित्रः, महानिर्वाण, स्कन्दगुप्त, राजा लीपर, तुम सआदत हसन मंटो हो, सराय की मालकिन, एक और परिकथा, ध्रुव स्वामिनी आदि। वर्तमान में सरोज जी मुंबई में एक लम्बे धारावाहिक की शूटिंग में व्यस्त हैं। थिएटर के अलावा फिल्मों और धारावाहिकों में भी सरोज जी ने यादगार भूमिकाएं निभाई हैं, जिनमें प्रमुख हैं –

  1. श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म  समर
  2. प्रवेश भारद्वाज द्वारा निर्देशित फिल्म नियति
  3. राम बुंदेला द्वारा निर्देशित फिल्म  क्या कहना आपका
  4. डीडी 1 के लिए सुनो कहानी एवं कस्तूरी कुंडल सजे
  5. मेरे महबूब मेरे सनम जी टीवी (यूटीएन)
  6. ज़र्द पत्ते, मंटो की दुनिया, दस रुपैया, नंगी आवाजें, (ईटीवी उर्दू के लिए)
  7. आओ आकाश को छू लें (इसरो)
  8. आख़िरी सवाल, फैसला, दादी की पाती, शहजादे सलीम लौट आ, तुझपे दिल कुर्बान
  9. अफसाना हजारों हैं, जिंदगी के हादसे, सफ़ेद फाहों के गुम्बद, कल्याणी (डीडी भोपाल)
  10. लाखों में एक (स्टार प्लस)
  11. सावधान इण्डिया (लाइफ ओके चैनल

पुरस्कार एवं सम्मान:

  1. इफ़्तेख़ार नाट्य अकादमी पुरस्कार
  2. 1998-99 : श्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
  3. 2000-2001 : श्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
  4. 2001-2002 : श्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
  5. 2003-2004: श्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
  6. 2004 -2005 : रंग गौरव सम्मान

इसके अलावा राइजिंग कल्चरल सोसाइटी द्वारा रंग अभिनय गौरव सम्मान, त्रिकर्शी संस्था द्वारा विभा मिश्र रंग गौरव सम्मान, नट बुंदेले संस्था द्वारा अलखनंदन रंग गौरव सम्मान

संदर्भ स्रोत – स्व संप्रेषित एवं सरोज जी से बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

 

 

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