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संगीत में डॉक्टरेट हासिल करने वाली पहली महिला डॉ सुमति मुटाटकर

संगीत में डॉक्टरेट हासिल करने वाली पहली महिला डॉ सुमति मुटाटकर

प्रेरणा पुंज
अपने क्षेत्र की पहली महिला

संगीत में डॉक्टरेट हासिल करने वाली पहली महिला डॉ सुमति मुटाटकर

• डॉ मल्लिका बनर्जी 

हम सब जानते हैं कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध का दौर भारतीय संस्कृति के जागरण का काल था और साथ ही सदियों से उपेक्षित  भारतीय महिलाओं के पुनरुत्थान का भी दौर था। ऐसे ही दौर में एक संभ्रांत परिवार में 10 दिसंबर 1916 को सुमति जी का जन्म हुआ। उनके पिता गजानन अम्बरेडकर तत्कालीन मध्य प्रांत के बालाघाट में जिला न्यायाधीश थे और उन्होंने सुमति जी को विद्यालयीन शिक्षा देने की ठान ली थी, साथ ही उनमें बचपन से ही संगीत में गहरी रुचि देख श्री अम्बरेडकर ने उन्हें  शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा दिलाने का भी निश्चय किया। उस समय एकमात्र सरकारी स्कूल अमरावती में था, जहां लड़कियों के पढ़ने की व्यवस्था थी। सुमति जी का वहां दाखिला हो गया और जब वे 10 साल की थीं, तब उनके पिता का कहीं और तबादला हो गया। उन्होंने सुमति जी को उसी स्कूल के छात्रावास में दाखिल करवा दिया। साथ ही संगीत शिक्षा के लिए उन्हें अमरावती में ही पंडित वामन बुवा जी के पास भेजा जाने लगा।

अपने माता-पिता की पहली संतान सुमति जी की प्रतिभा बचपन से ही नज़र आने लगी। वे हर कक्षा में अव्वल नंबरों से पास होती थीं साथ ही खेलकूद में – खास तौर पर बैडमिंटन में उनका गहरा रुझान था। गणित में उनका दिमाग खूब चलता था। उनके स्कूल के साथी श्री कमल गोखले बताते हैं कि मैट्रिक की  परीक्षा में गणित के जिस प्रश्नपत्र को सुलझाने में अधिकतर छात्रों को कठिनाई का सामना करना पड़ा, उसे सुमति जी ने आसानी से सुलझाया था। विद्यालयीन शिक्षा के बाद सुमति जी विश्वविद्यालय में भी गणित विषय लेकर ही पढ़ने लगीं। उनकी बहुत चाह थी कि वे गणित में ही आगे बढ़ें। लेकिन इस समय घर के बड़ों ने उनके विवाह के लिए ज़ोर देना शुरू कर दिया। उन के पिता भी अनचाहे ही घर के सदस्यों के दबाव में आ गए और उनका विवाह श्री विश्वनाथ लक्ष्मण मुटाटकर – जो गणित के ही प्राध्यापक थे, के साथ करवा दिया गया। ससुराल वालों के रूढ़िवादी होने के बावजूद वे पति के समर्थन से आगे भी पढ़ती रहीं और उनकी गायन की शिक्षा भी पं. सांवलाराम जी के यहाँ जारी रही। हालाँकि घरेलू ज़िम्मेदारियों के चलते उनकी एमए की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। लेकिन सुमति जी हतोत्साहित होने के बजाय संगीत में अपना मक़ाम ढूंढने में जुट गईं।

उनके जीवन का अगला पड़ाव लखनऊ के मॉरिस कॉलेज में था। अपने पिता और पति दोनों के आग्रह से सुमति जी लखनऊ के मॉरिस कॉलेज में संगीत के गहन अध्ययन के लिए चली गईं। उस से पहले वे संगीत विशारद तक की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकीं थीं। यहाँ भातखण्डे संगीत संस्थान में उन्होंने पंडित रातंजनकर से संगीत की प्रायोगिक और शास्त्रीय दोनों ही पक्षों का गहन अध्ययन किया। संस्कृत की अच्छी जानकार होने के नाते उन्होंने सभी प्राचीन ग्रंथों को भी मथ डाला। अंतत: संगीत निपुण की उपाधि प्राप्त करने के बाद ही वे अपने गृहस्थ जीवन में लौटीं। ज़ाहिर है कि उनके लिए उस समय में ये सब कर पाना बहुत ही कठिन था। घर के अन्य सदस्यों ने और घरेलू ज़िम्मेदारियों ने कदम – कदम पर उनके सामने कई कड़ी चुनौतियाँ रखीं पर अपनी दृढ़ता, पिता और पति के पूर्ण समर्थन के बूते उन्होंने तमाम मुश्किलों को पार कर लिया। इस तरह संगीत में डॉक्टरेट हासिल करने वाली पहली महिला का गौरव उन्होंने हासिल किया।

सुमति जी ने 1943 से आकाशवाणी में गाना शुरू कर दिया था परन्तु इसके लिए उन्हें मुंबई जाना पड़ता था। सन 1947 में नागपुर में ही आकाशवाणी का केंद्र खुल गया, जहाँ से वे अपने कार्यक्रम देती रहीं। लखनऊ में पं. रातंजनकर जी से उन्होंने ध्रुपद-धमार और ख़याल दोनों ही विधाओं की शिक्षा ली थी, लेकिन उनका झुकाव ध्रुपद की ओर था। हर कार्यक्रम में वे पहले ध्रुपद या धमार, उसके बाद ख़याल गाती थीं। धीरे धीरे उनका ध्रुपद गायन में एकमात्र महिला गायक के रूप में ख्याति बढ़ती गई। यहाँ मैं ज़िक्र करना चाहती हूँ कि सुमति जी की समकालीन एक और महिला ध्रुपद गायिका रहीं हैं –  असगरी बाई, जो टीकमगढ़ राज दरबार में गाती थीं और बाद में चिमनलाल गुप्ता से विवाह कर के आगरा में बस गईं। वे एक बहुत ही प्रतिभाशाली सुकंठी गायिका तो थीं, लेकिन उन्हें निजी गोष्ठियों के अतिरिक्त संगीत के बड़े आयोजनों में सुना नहीं जा सका। असगरी बाई की सार्वजानिक प्रस्तुतियां 1980 के दशक में शुरू हुईं और उनकी असाधारण प्रतिभा को काफ़ी सराहा गया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया, मध्यप्रदेश शासन ने भी उन्हें तानसेन सम्मान से नवाज़ा। बहरहाल, जिस समय सुमति जी ध्रुपद की प्रस्तुतियां दे रहीं थीं, उस समय राष्ट्रीय स्तर पर कभी असगरी जी का नाम सुनने में नहीं आया।

सुकोमल व्यक्तित्व की धनी सुमति जी के गायन में एक आश्चर्यजनक बात थी। वे जितनी वो सुकुमार थीं, उनकी आवाज़ और गायन शैली उतनी ही ओजपूर्ण थी। उनके गायन में गंभीरता, वर्षों का अनुशीलन और परिपक्वता साफ़ झलकते थे। सीखने के मामले में उनका दृष्टिकोण मधुकरी वृत्ति का रहा। पं. रातंजनकर से आगरा गायकी को भलिभांति सीखने के बाद भी उन्होंने पं. राजा भैया पूँछवाले से ग्वालियर घराने की गायकी में ख्याल, ठुमरी,टप्पा और अष्टपदी सीखा, रसूलन बाई से उपशास्त्रीय संगीत की बारीकियों को सीखा, इसके अलावा उ. विलायत खां साहब, उ. मुश्ताक हुसैन खां, पं. अनंत मनोहर जोशी और पं. बुरहानपुरकर से भी समय समय पर कई चीज़ें सीखीं।

अब तक हम सुमति जी को एक गायिका के हैसियत से देख रहे थे. पर संगीत को शायद सुमति जी की सेवा की और ज़रुरत थी। सन 1952 में श्री बी वी केसकर भारत सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बने, उन्हें शास्त्रीय संगीत में बहुत अधिक रूचि थी। उन्होंने आम जनता में शास्त्रीय संगीत के प्रति रुचि जागृत करने के लिए और संगीत के कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए कई प्रयास किए। उनमें से खास थे आकाशवाणी से नियमित रूप से नियत समय पर शास्त्रीय संगीत का प्रसारण और राष्ट्रीय स्तर पर अखिल भारतीय संगीत का कार्यक्रम का प्रसारण। इस काम को सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्होंने सुमति जी से आकाशवाणी में कार्यक्रम निदेशक (संगीत) का पद संभालने का आग्रह किया। 1953 में सुमति जी यह दायित्व ग्रहण करने आकाशवाणी मुख्यालय, दिल्ली आ गईं और 1956 तक उन्होंने इस पद पर अपनी सेवाएं दीं। उन्हें  प्रयोग के तौर पर इस पद पर लाया गया था, यह देखने के लिए कि आकाशवाणी में ऐसे अधिकारियों का संगीत के कार्यक्रमों पर कैसा प्रभाव पड़ता है। सुमति जी ने इस पद को बखूबी सम्भालते हुए एक संपूर्ण नए विभाग  “केन्द्रीय संगीत एकांश ” की संरचना की जिसे देश भर के संगीत के कलाकारों के ऑडिशन, अखिल भारतीय संगीत के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने तथा संगीत के कार्यक्रम सम्बन्धी नीति निर्धारण का काम सौंपा गया। इसके साथ ही सन 1954 में सालाना रेडियो संगीत सम्मेलन के कार्यक्रम की शुरुआत भी हुई, जिसकी परिकल्पना में सुमति जी की सक्रिय भूमिका रही।

इस के बाद 1956 से 58 तक सुमति जी ने डिप्टी चीफ़ प्रोड्यूसर का पद सम्हाला,लेकिन फिर घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण उन्हें आकाशवाणी से विदा लेनी पड़ी। इसके बाद उन्हें 1965 से 1968 तक फिर एक मौका मिला वही पद और इस अवसर का सदुपयोग उन्होंने आकाशवाणी संग्रहालय को स्थापित करने में किया। आकाशवाणी में 15 वर्ष काम करने के बाद 1968 में सुमति दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत और ललित कला संकाय में प्रोफेसर नियुक्त हो गईं। यहीं से वे बतौर ,संगीत विभाग की डीन के रूप में सितम्बर 1981 में सेवानिवृत्त हुईं। अपने कार्यकाल में सुमति मुटाटकर ने संगीत पर अनेक शोध कार्यों का निर्देशन किया। उन्होंने  संगीत पर अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। शास्त्रीय गायक होने के साथ सुमति संगीत विशेषज्ञ और इतिहासकार भी थीं। संगीत के विद्यार्थी ही नहीं, दिग्गज संगीतकार भी शास्त्रीय संगीत की धुनों और रागों की बारीकियां समझने के लिए उनके पास आया करते थे। वर्ष 1979  में संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें संगीत कला में उनके योगदान के लिए फेलोशिप प्रदान की। मध्यप्रदेश सरकार ने 2001 में उन्हें अपने सर्वोच्च पुरस्कार कालिदास सम्मान से सम्मानित किया। इससे पहले वर्ष 1999 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा। 28 फ़रवरी, 2007 को दमे की बीमारी के इलाज के दौरान कलकत्ता के एक अस्पताल में उनका देहांत हो गया। वे अपने पीछे एक बेटी छोड़ गईं।

डॉ मल्लिका बनर्जी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन की प्रमुख हस्ताक्षर हैं। प्रस्तुत आलेख उनके ब्लॉग ‘ मल्लिका बनर्जी डॉट वर्डप्रेस डॉट कॉम ‘ पर प्रकाशित और मीडियाटिक टीम द्वारा संपादित है, कुछ इनपुट्स श्री राकेश दीक्षित के हैं।

 

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