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संगीता राजगीर

संगीता राजगीर

छाया : स्व संप्रेषित

विकास क्षेत्र

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

कोई भी काम अपने आप में स्त्रियोचित या पुरुषोचित नहीं होता लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसे भेदभाव से हमारा वास्ता पड़ता ही रहता है। भोपाल की पक्षी विज्ञानी संगीता राजगीर बचपन से ही डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थीं लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जो उन्हें जंगल की खूबसूरत दुनिया में लेकर आ गया। दरअसल, उनका बचपन आम बच्चों जैसा ही था। छात्रा के रूप में भी सामान्य सा ही जीवन रहा। उन्होंने गायन, नृत्य या खेलकूद जैसी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया। उनके पिता श्री एस.के. राजगीर अतिरिक्त जिलाधीश थे, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं और माँ श्रीमती सीमा राजगीर गृहणी हैं। चार बहनों और चार भाइयों में संगीता सातवें स्थान पर हैं। उनका जन्म भोपाल में 29 मई 1979 को हुआ था।

संगीता जी के माता-पिता ने कभी पुत्र-पुत्री में भेद नहीं किया। बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर ऊँचे ओहदे तक पहुंचें, यही उनकी प्राथमिकता रही। ख़ास तौर पर संगीता जी के पिता की धारणा थी कि मेडिकल का क्षेत्र लड़कियों के लिए ज्यादा बेहतर है। यही वजह है कि संगीता जी की दोनों बड़ी बहनें डॉक्टर बनीं। बाद में एक भाई ने भी मेडिकल के क्षेत्र को ही चुना, जबकि एक बहन वकालत कर रही हैं। बहनों के मेडिकल में आने के बाद यह लगभग तय था कि संगीता जी भी डॉक्टर ही बनेंगी। वर्ष 1991 में हायर सेकेंडरी में जब उन्हें विषय का चुनाव करना था तो उन्होंने विषय जीव विज्ञान लिया। दो बार पीएमटी की परीक्षा में बैठीं लेकिन असफल रहीं। वर्ष 1995 में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जूलॉजी से स्नातकोत्तर किया। दरअसल उनकी रूचि वनस्पति विज्ञान की अपेक्षा जंतु विज्ञान में ज्यादा थी। वर्ष 1997 में एम.ए.सी.  करने के बाद पीएचडी के लिए संगीता जी का पंजीयन हो गया, इसके साथ ही वे प्रशासनिक क्षेत्र में जाने के लिए परीक्षाओं की तैयारियां भी करने लगीं।

यही उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। पीएचडी के लिए शोध का जो विषय उनकी गाइड ने सुझाया उसमें उन्हें वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में पक्षियों और उनसे जुड़े विविध विषयों का अध्ययन करना था। पक्षी विज्ञान पर आधारित इस विषय में कितने पेंच हैं, यह उन्हें तब पता चला जब वे अध्ययन के लिए वन विहार पहुंची। प्राथमिक जानकारी पुस्तकालयों से एकत्र करने पर भी कुछ ख़ास मदद नहीं मिली क्योंकि उनमे छपे चित्र श्वेत-श्याम होते थे जिनके जरिये किसी पक्षी को पहचान पाना भी मुश्किल होता था। इसके अलावा शोध का तकनीकी पक्ष भी सरल नहीं था, जिसके अंतर्गत पानी की गुणवत्ता, मौसम की आर्द्रता, मिट्टी, वनस्पतियों की विशेषताएं जैसे बिन्दुओं पर गहन अध्ययन शामिल था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उन्हने पक्षियों के विषय में मात्र सामान्य ज्ञान भर था। संगीता जी को यह भी पता चला कि पक्षियों के विषय पर विगत बीस वर्षों में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में एक भी शोध नहीं हुआ है। कहते हैं कितनी भी बड़ी चुनौती हो अगर जिद और जूनून हो तो रास्ता निकल ही आता है। ऐसा ही संगीताजी के साथ हुआ। वन विहार के तत्कालीन प्रबंधन और वन विहार में कार्यरत सभी गाइडों ने बहुत सहयोग दिया। वे अपनी स्कूटी से मुंह अँधेरे वन विहार पहुँच जातीं। यह अपने आप में अलग किस्म का जोखिम था क्योंकि अल सुबह जब सुबह की पहली किरण भी नहीं फूटती तब वे घर से निकलती थीं और उस समय सड़क बिलकुल सुनसान ही रहती थी। परिवार के लिए भी यह एक तनाव का कारण था, जबकि कुछ लोगों के लिए उपहास का, क्योंकि जंगल में जाकर अकेले चुपचाप पंछियों को निहारना किसी के गले नहीं उतर रहा था।

यह सिलसिला चल ही रहा था जब वन विहार में ‘बर्ड वाचिंग’ के लिए एक शिविर लगा, जिसे प्रशासन अकादमी और विश्व वन्यजीव कोष (वर्ल्ड वाइल्ड फण्ड) ने आयोजित किया था। संगीता जी ने उस शिविर में हिस्सा लिया। उन्हें महसूस हुआ अध्ययन के लिए पक्षियों को अकेले निहारना ही बेहतर है क्योंकि कई लोगों को देखकर पक्षी उड़ जाते हैं, हालाँकि इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से मिलना-जुलना ज़रुर हो जाता है। इसके अलावा शिविरों में विशेषज्ञ भी बुलाए जाते थे जिनसे मदद मिल जाती थी। कुछ वर्ष शिविरों में निरंतर हिस्सा लेने के बाद चार पांच ऐसे लोगों के साथ उनकी टोली बनी जो शिविर समाप्त होने के बाद भी इस काम को जारी रखना चाहते थे। संगीता जी और उनके साथियों ने मिलकर   ‘भोपाल बर्ड्स’ नाम से एक संस्था बनायी। इसके बाद की यात्रा में शोध की गति धीमी हो गयी लेकिन  पक्षियों को करीब से जानने और समझने का काम चलता रहा। इस काम से कोई आर्थिक लाभ न होने के बावजूद उन्होंने संस्था के बैनर तले छोटे-छोटे शिविरों का आयोजन भी शुरू कर दिया। इस सबके बीच लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी कब पीछे छूट गई, उन्हें पता भी नहीं चला।

वर्ष 2008 की बात है, मप्र ईको पर्यटन बोर्ड में उन दिनों गोपा पाण्डेय अधिकारी थीं। उन्होंने रेडियो उद्घोषकों के लिए कार्यशाला का आयोजन किया ताकि रेडियो के जरिये पारिस्थितिकी के बारे में लोगों को जागरूक किया जा सके। इसी कार्यशाला में संगीता जी की संस्था को भी प्रेजेंटेशन देने के लिए बुलाया गया था। संगीता जी की प्रस्तुति को गोपा जी ने बहुत पसंद किया और उन्होंने कहा कि ऐसी जानकारी बच्चों को ज़रुर होनी चाहिए। इसके बाद ढाई सौ बच्चों को लेकर मप्र के विभिन क्षेत्रों में उन्होंने आठ-दस शिविरों का आयोजन संगीता जी के साथ मिलकर किया। लोग जुड़ने लगे और शिविर की सफलता को देखते हुए पुनः 2011 में ‘अनुभूति’ नाम से शिविरों का आयोजन प्रदेश में जिला स्तर पर किया गया। इसमें वन विभाग, एप्को, खेल एवं युवा कल्याण विभाग और  स्कूल शक्षा विभाग का सक्रिय सहयोग था। इन तमाम गतिविधियों के कारण संगीता जी का शोध का काम बहुत ही धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था, जिसमें क्षेत्र आधारित कार्य तो हो चुका था, लेकिन थीसिस लिखा जाना अभी बाकी था। लेकिन शिविरों के दौरान मिले समय का संगीता जी ने सदुपयोग किया और अंततः उनकी थीसिस पूरी हो गई।

इस बीच परिवार ने विवाह के लिए भी ज़ोर देना शुरू कर दिया। कुछ रिश्ते भी आए लेकिन जैसे ही बात उनके काम पर आती लोग पीछे हट जाते। कई लड़कों और उनके परिजनों ने यहाँ तक कह दिया कि “ यह क्या काम होता है, सुबह-सुबह जंगल में निकल जाना और पंछियों को देखना। औरत इतनी सुबह घर से निकल जाएगी तो नाश्ता कौन बनाएगा? बच्चों को कौन देखेगा? लम्बे अरसे तक एक जैसे जवाब सुनने के बाद संगीता जी ने जब गंभीरता से विचार किया तो उन्हें लगा कि लड़के वालों का इसमें कोई दोष नहीं। वे वैसी ही पत्नी या बहू चाहते हैं जैसी आम तौर पर होती हैं, घर की देखभाल करने वाली या दस से पांच की नौकरी करने वाली। अगर घरवाले साथ न दें तो वास्तव में बच्चों पर ध्यान देना संभव ही नहीं होगा। इस नतीजे तक पहुँचने के बाद उन्होंने विवाह करने का इरादा ही छोड़ दिया। परिवार में अब भी यह चर्चा उठ ही जाती है और वे हंसकर टाल जाती हैं।

 इस बीच संस्था से जुड़े पुराने सभी साथी पीछे छूट गए ख़ालिक मोहम्मद साहब को छोड़कर। वे 2006 से ही पहली संस्था के गठन से ही संगीता जी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और जाने माने पक्षी विशेषज्ञ हैं। संगीता जी वर्तमान में ‘भोपाल बर्ड्स’ संस्था की अध्यक्ष होने के अलावा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की राज्य समन्वयक, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो की स्वैच्छिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम कर रही हैं।

 उपलब्धियां

-30 से भी अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध कार्य प्रकाशित

-पक्षियों, तितलियों एवं अन्य जैव विविधताओं पर लघु पत्रिकाओं और ब्रोशर आदि का प्रकाशन

-वर्ष 2014 से गौरैया दिवस आयोजित कर 10 हज़ार से अधिक कृत्रिम घोंसलों का मप्र जैव विविधता बोर्ड के सौजन्य से वितरण

-वर्ष 2019 में गांधी नगर गुजरात में 130 देशों के सम्मेलन में सारस संरक्षण विषय पर मप्र का प्रतिनिधित्व व प्रेजेंटेशन

-मप्र के भोज वेटलैंड क्षेत्र में स्थानीय समुदाय के सहयोग से सारस संरक्षण कार्यक्रम का क्रियान्वयन जिसके बाद उस क्षेत्र में सारस की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई।

-विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में नेचर क्लब के साथ मिलकर पर्यावरण जागरूकता पर कार्यक्रम आयोजित करना।

संदर्भ स्रोत: संगीता राजगीर से सारिका ठाकुर  की बातचीत पर आधारित

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