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श्रीमती विमला जैन

श्रीमती विमला जैन

छाया : स्व सम्प्रेषित

शासन क्षेत्र
विधि एवं न्याय

विधि विशेषज्ञ – श्रीमती विमला जैन

• सारिका ठाकुर

एक सामान्य गृहणी से न्यायमूर्ति के पद तक पहुँचने वाली विमला जैन का जन्म 11 जुलाई 1952 को सागर जिले के विदवास गाँव में हुआ था। उनके पिता श्री सुन्दरलाल जैन गाँव के सरपंच थे और खेती किसानी के साथ व्यापार भी करते थे। वे लगातार 22 वर्षों तक निर्विरोध सरपंच बने रहे। विमला जी की माँ सुमति रानी जैन कुशल गृहणी थीं। तीन भाई और दो बहनों में सबसे बड़ी विमला जी का बचपन गाँव में भी व्यतीत हुआ। उनके गाँव में केवल तीन ही जैन परिवार थे लेकिन वातावरण सौहार्दपूर्ण था। आसपास निवास करने वाले सभी पड़ोसी परिवार के सदस्य की भांति ही थे। विमला जी और उनके भाई बहनों के लिए सभी काका, काकी, बुआ, भैया और दीदी ही थे।

पांचवीं तक की शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल से हासिल करने के बाद उनका नामांकन सागर के शासकीय विद्यालय में करवा दिया गया जहाँ से उन्होंने 11वीं तक की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद सागर के ही एक कॉलेज में स्नातक के लिए उनका नामांकन हुआ। उस समय लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती थी, तो  वर्ष 1968 में  विमला जी का ब्याह 16 वर्ष की आयु में श्री सुरेश जैन के साथ कर दिया गया। श्री जैन उसी साल डिप्टी कलेक्टर बने थे। उस समय विमला जी स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा थीं। शादी के बाद आगे की पढ़ाई के प्रश्न पर ससुराल में कुछ विरोध हुआ लेकिन सुरेश जी की मदद से कोई समस्या नहीं हुई। सुरेश जी की पहली पोस्टिंग मंडला में हुई थी और उनके साथ विमला जी भी वहां आ गईं। बीच-बीच में सागर जाकर अपनी पढ़ाई भी करतीं। उनके दो देवर भी वहां साथ रहकर पढ़ाई कर रहे थे । इस तरह उस अनूठी नई नवेली गृहस्थी में सुरेश जी के अतिरिक्त सभी विद्यार्थी थे।

वर्ष 1970 में 13 मई से कॉलेज के दूसरे साल की परीक्षा थी। उसी माह उन्होंने अपनी बड़ी बिटिया विद्युत् को जन्म दिया। संयोग से परीक्षा की तिथि आगे बढ़ गई अन्यथा वे उस स्थिति में भी परीक्षा देने के लिए तैयार थीं। स्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने हिन्दी विषय लेकर विक्रम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। इसी दौरान उनके देवर क़ानून की पढ़ाई के लिए आवेदन कर रहे थे जिन्हें देखकर विमला जी ने भी आवेदन कर दिया। उस समय दो डिग्रियों के लिए एक साथ पढ़ाई की जा सकती थी। तीन वर्ष के लॉ की डिग्री और दो वर्ष के एम.ए. की डिग्री उन्होंने सहजता से हासिल कर ली। ऐसा होना किसी अचंभे से कम नहीं था।

क़ानून की आख़िरी साल की परीक्षा के दौरान उन्होंने पुत्र विकास को जन्म दिया। दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ घर की अन्य जिम्मेदारियों को निभाते हुए वे अपनी पढ़ाई के लिए भी वक़्त निकाल लेती थीं। हालाँकि उस वक्त तक अपने करियर को लेकर कोई स्पष्ट रूपरेखा उनके मस्तिष्क में नहीं था। उनकी  इच्छा तो थी शिक्षण क्षेत्र में जाने की, जिसके लिए उन्होंने बीएड भी किया। लेकिन उसी समय सिविल जज की परीक्षा के लिए लोकसेवा आयोग का विज्ञापन जारी हुआ। विमला जी ने भी आवेदन कर दिया। इस परीक्षा के लिए उन्होंने कोई विशेष तैयारी नहीं की। घर के पास ही आयोग का दफ्तर था, जहाँ साक्षात्कार आदि होते रहते थे। विमला जी कुछ देर के लिए वहां चली जाया करती थीं, इसके अलावा उनके देवर भी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, इसलिए कुछ चर्चा उनसे भी हो जाया करती थी जिससे यह समझ जरुर बन गई कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए किस तरह तैयारी करनी चाहिए। पढ़ने के लिए वे घरेलू जिम्मेदारियों के बीच भी समय निकाल लेती थीं।

इस परीक्षा में सफल होने के बाद पहली नियुक्ति इंदौर में ही हुई जहाँ वे पहले से ही रह रही थीं। उस समय प्रशिक्षण की अलग से व्यवस्था नहीं थी बल्कि वरिष्ठ न्यायाधीशों के पास ही काम करते हुए प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया जाता था। विमला जी कहती हैं, कि लॉ कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या तो काफ़ी थी, लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद वकालत को पेशे के तौर पर अपनाने वाली बहुत ही कम थीं। उनकी अपनी बैच में तीन-चार ही लड़कियाँ थीं।

उस दौरान विमला जी के कोर्ट में ज्यादातर मारपीट, गुंडागर्दी वाले छोटे मामले ही आते थे। कई बार मुजरिमों को कठोर सजा भी दी लेकिन कभी किसी तरह की समस्या नहीं आई। वर्ष 1987 में वे एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज बनीं। वर्ष 1998 से 2003 तक वे स्पेशल जज रहीं, उस समय उनकी पदस्थापना रायसेन में थी। वहां उनके पास अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों के मामले आते थे। विमला जी अपने कार्यकाल में आए सभी मामलों को काम का हिस्सा मानती हैं जिसे व्यक्तिगत भावना से उन्होंने हमेशा दूर ही रखा। लेकिन रायसेन के कार्यकाल के दौरान एक मामले को वे आज भी याद करती हैं जब एक गाँव में दंगा भड़क उठा था। उस दौरान हत्याओं के साथ बलात्कार जैसी घटना भी हुई थी। इस मामले में कई गिरफ्तारियां हुई थीं एवं विमला जी की कोर्ट ने एक साथ 52 व्यक्तियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इसी प्रकार रायसेन में ही एक मामले में उन्होंने फांसी की सजा भी सुनाई जिसमें व्यक्ति ने चार व्यक्तियों की हत्या कर दी थी। हमलावर ने एक स्त्री के पेट में चाकू मारा था जिसमें उसका गर्भस्थ शिशु मारा गया लेकिन वह स्वयं बच गई। गर्भस्थ शिशु को भी मृतकों में स्वीकार करते हुए उन्होंने मुजरिम को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

वर्ष 2014 में बतौर हाईकोर्ट जज, जबलपुर से वे सेवानिवृत्त हुईं। इस दौरान वे लगभग 22 वर्षों तक परिवार से दूर रहीं क्योंकि उनका और उनके पति का तबादला अलग-अलग स्थानों पर होता रहा। लेकिन आपसी सामंजस्य के कारण गृहस्थी भी सुचारू रूप से चलती रही। विमला जी के चार बच्चे हैं। बड़ी बेटी विद्युत् जैन कंप्यूटर साइंस विषय में मैनिट के पहले बैच की टॉपर रही हैं और वर्तमान में अमेरिका में रह रही हैं। पुत्र विकास ने कैनेडा से एमबीए किया और वर्तमान में लन्दन में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे छोटी पुत्री विधि मुंबई से एमबीए करने के बाद इंदौर में फ्रेंच पढ़ाने के साथ-साथ भरतनाट्यम भी सिखा रही हैं एवं सबसे छोटे पुत्र विधान बंगलौर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं। विमला जी और सुरेश जी भोपाल में रह रहे हैं।

संदर्भ स्रोत : सारिका ठाकुर से जस्टिस विमला जैन की बातचीत पर आधारित 

 

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