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शैला श्रीप्रकाश

शैला श्रीप्रकाश

छाया : दि पेज ऑफ़ शिल्पा आर्किटेक्ट्स

विकास क्षेत्र
वास्तुशिल्प, इतिहास एवं धरोहर

शैला श्रीप्रकाश

भारतीय वास्तुशिल्प की चर्चा हो और शैला श्रीप्रकाश का ज़िक्र न हो, मुमकिन नहीं है। वे पहली ऐसी भारतीय महिला हैं, जिन्होंने 1979 में उस समय वास्तुशिल्प का अपना काम ‘शिल्पा आर्किटेक्ट’ के नाम से शुरू किया, जब इस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा हुआ करता था और महिलाओं की पहचान इंटीरियर डेकोरेटर से अधिक नहीं होती थी। इसलिए शैला श्रीप्रकाश की राह बिलकुल भी आसान नहीं थी। ज़िद, जूनून और कभी हार न मानने के जज़्बे के कारण वे आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली वास्तुशिल्पियों में से एक मानी जाती हैं। उन्होंने अब तक 12 सौ  से भी ज़्यादा आर्किटेक्चरल प्रोजेक्ट डिज़ाइन किए हैं।

शैला जी का जन्म भोपाल में 6 जुलाई 1955 को लेफ्टिनेंट कर्नल जीकेएस के यहाँ हुआ था। चेन्नई के रोज़री मैट्रिकुलेशन स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की और वहीं स्टेला मैरिस कॉलेज से प्री-यूनिवर्सिटी की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1973 में अन्ना यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग में स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। वे हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन के एग्जीक्यूटिव एजुकेशन प्रोग्राम में भी शामिल हुईं।

बचपन में, उन्होंने शास्त्रीय भारतीय नृत्य, संगीत और कलाओं में प्रशिक्षण लिया। जब वे महज चार साल की थीं, तब उन्होंने भरतनाट्यम सीखना शुरू कर दिया था और 1961 में अपना पहला अरंगेत्रम प्रदर्शन दिया। इसके लिए पद्मभूषण धन्वंतरि रामाराव ने उन्हें आमंत्रित किया था। शैला जी ने लगभग दो दशकों तक भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी नर्तकी के रूप में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वे वीनई (वीणा) वादन में भी सिद्धहस्त हैं। दरअसल, शास्त्रीय नृत्य और संगीत में बेहतर प्रशिक्षण के लिए उनका परिवार चेन्नई में बस गया था। शीला जी वहां डॉ विम्पाती चिन्ना सत्यम की छात्रा थीं और उनके कई नृत्य और नाटकों में मुख्य पात्र बनीं। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत के साथ-साथ चित्रकला और मूर्तिकला का भी अभ्यास किया। वीनई कलाकार के रूप में उन्होंने मशहूर संगीतकार चिट्टी बाबू के साथ राधामाधवम और शिव लीला विलासम को संगीतबद्ध किया और रिकॉर्ड किया।

शैला जी को भारत के अग्रणी वास्तुकारों में तो शामिल किया ही जाता है, उन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिला वास्तुशिल्पियों में भी गिना जाता है। उन्होंने 12 सौ से अधिक परियोजनाओं को डिजाइन किया है, जिनमें से कई स्थानीय कला-संस्कृति के समावेश के लिए जानी जाती हैं। उन्हें रिसिप्रोसिटी को ध्यान में रखकर रचे गए डिजाइन सिद्धांतों के लिए भी जाना जाता है। श्रीमती श्रीप्रकाश वर्ष 2011 में  ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल एजेंडा काउंसिल ऑन डिज़ाइन इनोवेशन,  में डिजाइन और इनोवेशन में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की 16-सदस्यीय टीम की सेवा करने वाली पहली भारतीय वास्तुकार बनीं। उसी दौरान वर्ष 2013 में उन्होंने ‘रेसिप्रोसल डिजाइन इंडेक्स’ तैयार किया जो कम लागत के अलावा पर्यावरण और समुदाय दोनों के अनुकूल था।

उन्होंने सामाजिक-आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए कम लागत वाले पारम्परिक आवासों से लेकर 1987 में वर्ल्ड बैंक के आमंत्रण पर डिज़ाइन किए गए अपनी तरह की पहली ऊर्जा की कम खपत वाली व्यावसायिक इमारतों और बंगलों के डिजाइन तैयार किये। सामुदायिक आवास योजनाएं, एकीकृत टाउनशिप, औद्योगिक इमारतें, कला संग्रहालय, खेल स्टेडियम, शैक्षणिक केंद्र, सार्वजनिक और लक्जरी होटल – ऐसा कोई भी निर्माण क्षेत्र नहीं जहाँ उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज न कराई हो। उनके शोध निष्कर्ष, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सन्दर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।

श्रीमती श्रीप्रकाश, इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की संस्थापक सदस्य हैं। उनके कई वास्तुशिल्प डिजाइन महिंद्रा वर्ल्ड सिटी, न्यू चेन्नई, मद्रास आर्ट हाउस चोलमंडलम आर्टिस्ट्स विलेज, चेन्नई के कुचिपुड़ी आर्ट अकादमी, परानूर रेलवे स्टेशन और वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्त पोषित शहरी परियोजनाओं में देखे जा सकते हैं।  वर्ष 1987 में ‘इंटरनेशनल इयर ऑफ़ शेल्टर फॉर थे होमलेस’ का आयोजन किया गया था, जिसमें आश्रय निर्माण की रूपरेखा तैयार करने के लिए श्रीप्रकाश को आमंत्रित किया गया था। उनकी कई परियोजनाएं पुरस्कृत हुईं हैं। उल्लेखनीय है कि वे अपनी डिजाईनों में भरतनाट्यम, शास्त्रीय भारतीय संगीत, मूर्तिकला और कल्पनाशील वास्तुकला का प्रयोग करती हैं जिसकी वजह से वे सबसे अलग और ख़ास बन जाते हैं। 1993 में, उन्होंने पुनर्नवीनीकरण सामग्री के साथ चेन्नई में एक घर डिजाइन किया और वर्षा जल संचयन के लिए एक प्रणाली तैयार की, जिसे वर्ष 2003 में तमिलनाडु सरकार ने किसी भी भवन निर्माण के लिए अनिवार्य घोषित कर दिया। इस प्रणाली को देश में साफ़ जलस्रोतों के संकट को दूर करने के लिए सबसे प्रभावी और कम लागत वाला समाधान माना गया।

शैला जी एक शिक्षाविद के रूप में भी स्थापित हैं। अन्ना यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग में द्वारा तीन साल के कार्यकाल के लिए ‘बोर्ड ऑफ स्टडीज’ में भी उन्हें आमंत्रित किया गया था।  दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से विषय विशेषज्ञ के रूप में व्याख्यान के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाता है। वर्ष 2002 में बॉल स्टेट यूनिवर्सिटी में विजिटिंग स्कॉलर थीं। वर्तमान में वे जर्मनी में स्थित हनोवर विश्वविद्यालय की विजिटिंग फैकल्टी हैं। वे जोंटा इंटरनेशनल से भी जुड़ी रही हैं। जोंटा महिलाओं के हित में काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसमें क्षेत्र निदेशक के रूप में उन्होंने काम किया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।

वर्तमान में शैला जी की कंपनी ‘शिल्पा आर्किटेक्ट्स, प्लानर्स और डिज़ाइनर’ कई परियोजनाओं पर  काम कर रही हैं, जिनमें एलईईडी प्लेटिनम का ऑफिस बिल्डिंग का अपना डिज़ाइन मुख्यालय भी शामिल है। अन्य परियोजनाओं में हैदराबाद में हीटैक्स प्रदर्शनी केंद्र और लार्सन एंड टुब्रो द्वारा साउथ सिटी टाउनशिप शामिल है जो लगभग 4000 अपार्टमेंट वाली आवासीय टाउनशिप है। एक अन्य बड़ी आवास परियोजना महिंद्रा वर्ल्ड सिटी के भीतर संचालित है। इसके अलावा पांडिचेरी के पास प्रारंभ होने जा रहा ताज 5-स्टार बीच रिसॉर्ट, एचडीएफसी बैंक का कार्यालय भवन, भारतीय स्टेट बैंक का क्षेत्रीय मुख्यालय आदि उल्लेखनीय परियोजनाएं हैं। वर्तमान परियोजनाओं के उनके पोर्टफोलियो में औद्योगिक वास्तुकला ख़ास तौर पर शामिल है।  उन्होंने भारत में ओवीओ बेटरमैन के लिए एक बड़े पैमाने पर विनिर्माण सुविधा और गोदाम का डिजाइन किया और वर्तमान में उद्योग के अग्रणी प्रौद्योगिकी हार्डवेयर निर्माता फ्लेक्सट्रॉनिक्स के लिए एक कारखाना डिजाइन कर रही हैं।

मीडियाटिक डेस्क

सन्दर्भ स्रोत : विकिपीडिया

 

 

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