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शिवकुमारी जोशी 

शिवकुमारी जोशी 

छाया : समावर्तन पत्रिका

सृजन क्षेत्र
चित्रकला एवं छायाकारी
प्रमुख चित्रकार

शिवकुमारी जोशी 

आलेख : जगदीश चंद्र पंड्या

15 नवंबर 1935 को जन्मी शिवकुमारी जोशी का पूरा जीवन कला को समर्पित  था। कलाकार के साथ-साथ वे कला गुरु भी थीं – सदैव अपने आप में सृजन में डूबी हुई। कहीं अधिक आना-जाना उन्हें पसंद नहीं था। एकान्तप्रियता और प्रचार-प्रसार से दूर रहने के कारण उनकी कृतियां लोगों तक नहीं पहुंच पाईं। विवाह से पूर्व वे प्रो. शिवकुमारी रावत के रूप में जानी जाती थीं। उनके पिता ठाकुर गिरिराज सिंह तत्कालीन देवास रियासत के गाँव जवासिया के जमींदार एवं स्टेट देवास सीनियर के दीवान थे। माँ भीष्म कुमारी रावत का सम्बन्ध बीकानेर राज परिवार से था। पति डॉ. श्रीकृष्ण जोशी प्रख्यात चित्रकार थे।

शिवकुमारी जी की प्रारंभिक शिक्षा ग्राम जवासिया, इन्दौर, बड़ौदा, दिल्ली और इलाहाबाद में हुई। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा उज्जैन विजयाराजे स्कूल में हुई। माधव महाविद्यालय उज्जैन से बी.ए. उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने स्नातकोत्तर चित्रकला की शिक्षा अलीगढ़ से प्राप्त की। आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में 1962 में एम.ए. उत्तीर्ण किया एवं स्वर्ण पदक प्राप्त किया। सन् 1963 में शिक्षा महाविद्यालय, उज्जैन से बी.एड. किया। सन 1968 में महाराष्ट्र के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से चित्रकला में डिप्लोमा पास किया। राजस्थान वनस्थली से फ्रेस्को म्यूरल 1960 में पास किया। बचपन से ही संगीत में रुचि होने के कारण श्रीमती खाण्डेपारकर (संगीत शिक्षिका) से संगीत भी सीखा और मैट्रिक की परीक्षा संगीत से उत्तीर्ण की।  संगीत गुरु स्व. आर.एस. बाघ के निर्देशन में उन्होंने संगीत में थर्ड ईयर पास किया।

कला शिक्षिका ब्रजकुमारी सक्सेना ने शिवकुमारी जी को चित्रकारी की प्रेरणा दी, जबकि माधव महाविद्यालय में बी.ए. की कक्षाओं में स्व. चिन्तामणि हरि खाडिलकर जी ने इस कला का प्रशिक्षण दिया। स्व. वाकणकर द्वारा स्थापित भारती कला भवन की सांध्यकालीन कक्षाओं में शिवकुमारी जी ने सन् 1954 से 1960 तक कला का अध्ययन किया। भारती कला भवन में मुज़फ़्फ़र कुरैशी, सचिदा नागदेव, रामचंद्र भावसार, आरेकर, रहीम गुट्टी, कमल चव्हाण आदि इनके साथी कलाकार थे। स्व. वाकणकर अपने संस्थान में बड़े-बड़े स्थापित कलाकारों को आमंत्रित करते थे एवं उनका डिमान्स्ट्रेशन भी करवाते थे। ऐसे कलाकारों में डी.जे. जोशी, एम.आर. आचरेकर, स्व. किरकिरे और चन्द्रेश सक्सेना आदि शामिल थे। शिवकुमारी जी के घर भी एन.एस.बेन्द्रे, कुमारिल स्वामी, रणवीर सक्सेना, वी.पी. काम्बोज और रामचंद्र शुक्ल सरीखे नामी कलाकार उनका हुनर देखने आते थे।

शिवकुमारी जी ने कला की अनेक विधाओं में जैसे संयोजन, व्यक्ति चित्रण, दृश्य चित्रण, अलंकरण, स्थिर चित्रण, नेचर स्टडी, रेखांकन, कोलाज आदि कार्य किया, किंतु इनकी सर्वाधिक रुचि संयोजन, दृश्य-चित्रण एवं नेचर स्टडी में रही है। संयोजन अधिकांश वॉश और टेम्परा में बनाये। शिवकुमारी जी वॉश तकनीक की सिद्धहस्त कलाकार थीं।  कालिदास साहित्य एवं ग्रामीण जीवन, लोकोत्सव इनके प्रिय विषय थे। कालिदास साहित्य की नायिकाओं का अति सुन्दर लावण्यपूर्ण चित्रण शिवकुमारी जी ने किया। मेघदूत की यक्षणियों का चित्रण तो अद्भुत है।

वॉश पद्धति के अतिरिक्त टेम्परा तकनीक में भी उन्होंने अनेक चित्र बनाये। दृश्य-चित्रण भी इनका प्रिय विषय रहा है। इसके लिए उन्होंने देश के अलग-अलग स्थानों पर कई-कई दिनों तक रहकर जलरंग में सुन्दर दृश्य चित्र बनाए, जबकि तेल माध्यम में फूल-पत्तियों के यथार्थवादी चित्रों की रचना उन्होंने की ह। कमल पुष्प चित्रण उनका प्रिय विषय था। आलेखन के भी चित्र मानवाकृतियों के साथ  बनाए हैं। इनमें गडरिया लोहार परिवार दृष्टिगोचर होता है। कुछ लघु आकार के संयोजन जो मालवा के तीज-त्यौहार से सम्बन्धित हैं, दर्शनीय हैं। जैसे दीप दान, दीपावली, हरियाली अमावस, झूले-झूलती कन्याएं, जवारे को विसर्जित करने जाती हुई महिलाएँ आदि।

उपलब्धियां

सन् 1958 से शासकीय स्तर पर अखिल भारतीय कालिदास समारोह मनाया जाने लगा। इस प्रथम आयोजन का उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया गया। इसी समारोह में अखिल भारतीय कालिदास प्रदर्शनी डॉ. वाकणकर के प्रयास से प्रारंभ हुई। इस प्रदर्शनी में सुश्री शिवकुमारी रावत भी पुरस्कृत हुईं। सिंहस्थ मेला समिति ने भी इन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया था। इसके अलावा विजयाराजे सिंधिया जन्म अर्धशताब्दी 1968 के अवसर पर ग्वालियर में श्रेष्ठ महिला कलाकार सम्मान, जगदीश भसीन मेमोरियल लायब्रेरी उज्जैन द्वारा 1990-91 में , संस्कार भारती उज्जैन द्वारा 2006 में और अष्टम राज्य स्तरीय कालिदास समारोह 2007 में सम्मान उन्हें प्राप्त हुए हैं।

शिवकुमारी जी की पहली एकल प्रदर्शनी 1965 में माधव महाविद्यालय के गाँधी हॉल में आयोजित हुई जिसका उद्घाटन विजयाराजे सिन्धिया ने किया था। दूसरी प्रदर्शनी सीता कला दीर्घा वाकणकर शोध संस्थान (1998) में हुई, जिसमें भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे जी और नरेन्द्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) विशेष रूप से आए थे। तीसरी प्रदर्शनी 2013 में कालिदास अकादमी में हुई। शिवकुमारी जी अखिल भारतीय कालिदास प्रदर्शनी में सन् 1956 से 1967 तक भाग लेती रहीं। रिद्म आई सोसायटी भोपाल प्रदर्शनी (1966), प्रतिकल्पा प्रदर्शनी (1968 उज्जैन), काठमाँडू नेपाल में उनके चित्र प्रदर्शित हुए (1967), माधव महाविद्यालय, उज्जैन के चित्रकला विभाग की प्रदर्शनी (1967-72), जय बांग्ला प्रदर्शनी – इन्दौर (1971) और विश्व हिन्दू परिषद ऑफ अमेरिका प्रदर्शनी (1984) में भी उन्होंने भाग लिया। वे अ.भा. समर स्कूल जबलपुर 1972, फ्रेस्को तकनीक कैम्प इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ 1984, कलावर्त न्यास, उज्जैन 1997-98, मानव संकेत अकादमी, उज्जैन 2002 एवं 2004, कालिदास अकादमी शिविर उज्जैन 2003 जैसे कला शिविरों और कार्यशालाओं में भी शामिल रहीं।

कला गुरु चित्रकार मास्टर मदनलाल जी की स्मृति में प्रारंभ चित्रकला-महाविद्यालय, उज्जैन की वे अवैतनिक प्राचार्य रहीं। 1966 में भारतीय हिन्दी परिषद के 22 वें वार्षिक अधिवेशन में लोक कला चित्र प्रदर्शनी का संयोजन उन्होंने किया। शिवकुमारी जी ने माधव महाविद्यालय उज्जैन और आकाशवाणी, इन्दौर पर कला आलेख तैयार किए।  स्व. पद्मभूषण कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की काव्यकृति ‘मिट्टी की बारात’ का आलेखन उन्होंने किया। संस्कृत के विद्वान प्रो. व्ही. वेंकटाचलम की पुस्तक के सुन्दर चित्र के लिए साहित्य अकादमी,दिल्ली ने शिवकुमारी जी को धन्यवाद प्रेषित किया था।

‘समावर्तन’ मार्च 2019 से साभार

 

 

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