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वेणी कुंवर

वेणी कुंवर

छाया: रजनीश जैन के फेसबुक अकाउंट से 

प्रेरणा पुंज
विशिष्ट महिलाएं

वेणी कुंवर

सन् 1900 से 1950 के दरमियां  संगीत और नृत्य को संजोने-सहेजने की ज़िम्मेदारी वे उठा रहीं थीं जिन्हें हम तवायफ़ कहते हैं। हालांकि इस पेशे को लेकर बनी नकारात्मक धारणाओं के कारण यह हकीक़त बहुत पीछे छूट जाती है कि उस दौर की तवायफें ऊँचे दर्जे की फनकार हुआ करती थीं। ऐसे फनकारों में सागर की वेणी कुंवर का नाम शुमार होता था। कहते हैं उनकी गायकी से प्रभावित होकर म्यूजिक कंपनी एचएमवी ने उनके गाने रिकॉर्ड करने की पेशकश उनके सामने की थी, जिसे उन्होंने ये कहकर ठुकरा दिया था कि वे नहीं चाहती उनके गाने पान की दुकानों पर बजे।

वेणी कुंवर की शख्सियत समझने के लिए हमें उस दौर के शहर सागर और जबलपुर को समझना होगा। सागर तब एक छोटा सा क़स्बा ही था। यहाँ का कटरा बाज़ार मस्जिद पर जाकर ख़त्म होता था। उसके पीछे शहर की रौनकों वाला इलाका शुरु होता था। इसी इलाके में नामचीन तवायफों के कोठे बने हुए थे, जहाँ वेणी कुंवर का ठिकाना भी था। वेणी कुंवर की गायकी उनकी सभी रिश्तेदार तवायफों – रिक्खा बाई, हीरा कुंवर, श्याम कुंवर और समकालीन मुस्लिम तवायफों मेहंदी वगैरह से कहीं आला थी। सागर में उनका प्रचलित नाम था बेनीबाई। उनका कुनबा सागर में ठीक-ठीक किस दौर में आया यह तो पता नहीं चलता पर एक मकान के बैनामे (रजिस्ट्री) की तफ़सील से एक अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उनकी समकालीन रिश्तेदार तवायफ़ रिक्खाबाई ने अमर टाकीज़ के बाजू वाला अपना मकान शहर के प्रसिद्ध कपड़ा व्यापारी को सन् 1960 के आसपास बेचा था। इस बैनामे को पढ़ने वाले वकील चतुर्भुज सिंह राजपूत के अनुसार  तफ़सील में लिखा है कि उत्तरप्रदेश के जिला हमीरपुर के राठ से सुंदर कुंवर सागर आईं थीं।

समकालीन घटनाओं से पता चलता है कि सन् 1857 की क्रांति में बाँदा रियासत के नवाब अली बहादुर (पेशवा बाजीराव और मस्तानी के वंशज) की रियासत अँग्रेजों द्वारा छीन लिए जाने के बाद यहां से पलायन का एक सिलसिला चला था। उसी दौरान कुछ तवायफों के परिवार सागर आकर बसे थे। सागर में बसी तवायफें, उनके संगीत शिक्षा के गुरु और बजाने वाले साजिंदों की बड़ी संख्या सागर के कटरा जामा मस्जिद से लेकर राधा टाकीज तिराहे के इर्द-गिर्द रहा करती थी। गुजराती बाजार से लेकर नयाबाजार के बगीचों तक ज्यादातर मकान तवायफों और उनसे जुड़े लोगों के ही थे। कालांतर में गुजराती व जैन व्यवसायियों ने क्रमशः ये मकान खरीदे। सुंदर कुंवर के परिवार की शागिर्द बेटियों ने ही कुनबा बढ़ा कर गुजराती बाजार में अपने तीन चार कोठे बना लिए थे। अमर टॉकीज के बाजू में रिक्खाबाई व जय कुंवर,अग्रवाल धर्मशाला के पास हीरा कुंवर, अलंकार टॉकीज के ठीक सामने वेणी कुंवर और श्याम कुंवर के मकान थे। रिक्खा कुंवर और वेणी कुंवर के कोठे लगभग आमने सामने थे। दोनों फनकारों में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी। बताते हैं कि बुंदेला जागीरदारों के दावतनामे रिक्खाबाई को ज्यादा मिल रहे थे, उनके ग्रामोफ़ोन रिकार्ड भी बन कर चलन में आ गये थे जबकि वेणी कुंवर को इन चीज़ों में कोई रूचि नहीं थी।

एक वरिष्ठ वकील बताते हैं कि उनकी मोहब्बत शहर के एक बड़े दबंग ब्राह्मण परिवार के वकील बेटे से परवान चढ़ी थी। बिजावर रियासत की महफिलों में भी वेणी कुंवर का खूब आना जाना था। वेणी ने एक सुंदर सी बेटी को जन्म दिया। लगता है कि इस बेटी की पैदाइश के साथ ही वेणी के भीतर एक अंतर्द्वंद्व छिड़ गया। उन्होंने बेटी का नाम रखा विजय। 1945 के आसपास का समय होगा। विजय कुंवर किशोरावस्था में कदम रख रही थीं। कोठे पर आने वाले मुरीदों की कुदृष्टि उन पर पड़ने लगी थी। वेणी कुंवर ने इन सभी कारणों से शहर छोड़ कर जबलपुर में बसने का फैसला किया जहां वे सागर के गिद्धों की नजरों व ‘कोठे वाली की बेटी’ जैसी अवांछित टिप्पणियों से बचाते हुए बेटी की शिक्षा-दीक्षा करा सकें।

जबलपुर के सेंट नॉर्बट हायर सेकंडरी स्कूल में विजय का नाम लिखाया गया। पढ़ने में लगनशील विजयकुँवर का दाखिला साठ के दशक में भोपाल के हमीदिया मेडिकल कालेज में कराया गया। डॉक्टरी का पाठ्यक्रम पूरा करते-करते मेडिकल कालेज में भी ‘तवायफ़ की बेटी’ वाले तीखे नश्तरों ने विजय कुंवर का मनोबल तोड़ दिया। उसे मेडिकल की पढ़ाई छोड़ कर जबलपुर वापस आना पड़ा। वापस आकर जबलपुर के कॉलेज में आर्ट्स में उन्होंने दाखिला लिया। कालांतर में विजय ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेश सक्सेना से विवाह किया और अपने करियर में भी ऊंचा मुकाम हासिल किया। विजय नरेश उच्च दर्जे की शास्त्रीय गायिका थीं। वे सूरीनाम में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की निदेशक बन कर पदस्थ की गईं। सेवानिवृत्ति के कुछ ही दिनों के बाद उनका देहांत हो गया, जबकि उनकी नातिन पूर्वा नरेश पटकथा लेखिका, रंगकर्मी, नृत्यांगना, अभिनेत्री एवं प्रभावशाली नाट्य निर्देशक हैं।

वेणी कुंवर के जबलपुर जाने के बाद भी सागर में उनका घर और कोठा अपनी पूरी शानो शौकत के साथ कायम था। जब कभी उन्हें सागर या आसपास के क्षेत्र से गाने बजाने का दावतनामा मिलता था वे ज़रूर आती थीं। उनके मुरीदों से पता चलता है वे अपने समय की बेहतरीन गायिका व नृत्यांगना थीं। इधर सागर में उनके मकान की कीमत बढ़ रही थी और गुजराती बाज़ार के व्यापारियों की नज़र उस मकान पर थी। उस पर कब्ज़ा हासिल करने का जिम्मा व्यापारियों  ने कुछ शातिर लोगों को दे दिया। वेणी कुँवर की बहिन (संभवतः श्याम कुँवर) को कर्ज के जाल में फंसा कर उस मकान का बयाना लिखवा लिया गया। फिर औने-पौने दाम देकर मकान खाली करने का दबाव वेणी पर बनाया गया। वे पुलिस और न्यायालय की शरण में पहुंचीं, वकील लगाए। उनके वकील राजा भैया भट्ट थे। उन्होंने बताया कि अस्सी के दशक में एक दोपहर वेणी कुंवर आटोरिक्शा से बदहवास हालत में उनके घर आंईं। बोलीं – ‘वकील साब मेरा मकान कहाँ है।’ वकील भट्ट साहब ने उनके साथ मौके पर जाकर देखा तो मकान गिरा कर ज़मीन समतल कर दी गई थी। सामने एक गेट लगा दिया गया था। फिर वही हुआ जो ऐसे प्रकरणों में आज भी होता है। थाने, कोर्ट सब जगह धक्के। मकान हथियाने में शामिल एक शख्स ने बताया कि पुलिस ने वेणी कुंवर के मकान से मिला कुछ सामान कब्जाधारियों से बरामद किया था और उसे सिटी मजिस्ट्रेट के यहाँ जमा कराया था। उसमें तबला डिग्गी,घुंघरू, आईने,पर्दे और कुछ सजावट का सामान था। यह सामान वेणी कुंवर ने कभी वापस नहीं लिया।

अपनी बेटी और दामाद का सहयोग लिए बिना वेणी कुंवर अकेले ही सागर जिला न्यायालय में मामला लड़ती रहीं। मकान की हिस्सेदार और उनकी रिश्तेदार श्याम कुंवर के बारे में पता चलता है कि उन्हें आँख के इलाज के बहाने कुछ लोग चित्रकूट ले गये और वहां से वे लापता हो गईं। फिर उन्हें कभी किसी ने नहीं देखा। कब्ज़ाधारियों ने ख़बर फैला दी कि वे बनारस चली गई थीं। उनके विषय में आज भी कहा जाता है कि वे काशी नहीं गई थीं, बल्कि उनके साथ कोई अनहोनी हुई थी। वेणी कुंवर ने मकान के राजीनामे का हर प्रलोभन ठुकराया। सन् 1995 के आसपास तक मैंने स्वयं उन्हें सागर न्यायालय में वकीलों के साथ चर्चा करते देखा। स्व.अरविंद पाठक उनके वकीलों में से एक थे जिनसे वे जानकारी साझा करती थीं। कोर्ट परिसर में भी वेणी भव्य जड़ाऊ मलमली लिबास में गहनों के साथ आती थीं। एक समय वह था जब उनकी एक झलक पाने के लिए रसूख और धन चाहिए होता था। अदालत के अलावा कभी-कभी वे आदर्श संगीत महाविद्यालय के शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में पीछे कोने की सीट पर बैठी हुई दिख जाती थीं। जीते जी  कब्ज़ाधारियों  के सामने आत्मसमर्पण न करने वाली इस महिला ने अपनी मृत्यु के बाद बेटी विजय कुँवर को विरासत में ज़ायदाद का मामला भी दिया। भारतीय अदालतों में हज़ारों दीवानी मुकदमों की तरह यह मुकदमा भी अब तक जस का तस है। लेकिन इसके साथ ही संदेश भी कायम है कि ज़मीनखोरों का ताक़तवर गठजोड़ भी एक तवायफ़ की ज़िद को हरा नहीं सका है।

सन्दर्भ स्रोत : फेसबुक पर प्रकाशित श्री रजनीश जैन के लेख ‘प्रेरक किरदारों से भरी वेणी कुंवर की संघर्षकथा’ पर आधारित

 

प्रेरणा पुंज

 

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