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वीरांगना लक्ष्मीबाई

वीरांगना लक्ष्मीबाई

छाया: यूपीटूरिज़म.जीओवी.इन

अतीतगाथा
स्वतंत्रता संग्राम में मप्र की महिलाएं

वीरांगना लक्ष्मीबाई

• डॉ. शम्भुदयाल गुरु

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने बलिदान से स्वाधीनता संग्राम के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी है।  सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने जिस रण कौशल, धैर्य, निर्भीकता तथा शौर्य का प्रदर्शन किया उसकी मिसाल कठिनाई से मिलती है। वे जब तक तलवार सम्हाले रहीं, अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ाती रहीं। उस महासंग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में महिला होते हुए भी रानी का स्थान अद्वितीय था। वास्तव में वीरांगना लक्ष्मीबाई सन् सत्तावन के संग्राम की अग्निशिखा थीं।

वीरांगना लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम की प्रशंसा उनके शत्रु अंग्रेजोंने भी की है। आठवीं घुड़सवार सेना (हुसार), जिससे रानी का अंतिम संघर्ष हुआ, ने अपने रेजीमेंट के इतिहास में लिखा है, वे करीब 24 साल की अत्यंत सुन्दर महिला थी, बहादुरी में पुरूषों के समान घुड़सवारी करते हुए अपनी सेना का नेतृत्व करती रहीं। वे वैसी ही हेकड़ और निडर महिला थी।

रानी का व्यक्तित्व कैसा था? मीडोज़ टेलर ने उनका वर्णन करते हुए लिखा है, वे गोरी और सुंदर थी और उनका रूप रंग उनकी सज्जनता का अहसास कराता था। उनके हाव-भाव से प्रतिष्ठा और दृढ़ निश्चयी होने की झलक मिलती थी।  एक अंगे्रज लेखक स्मिथ ने एक अंग्रेज  वकील जॉन लेंग के हवाले से कहा कि रानी मझौले कद की सुगठित देह्यष्टि की धनी थी। जब वे और कम उम्र की होंगी तो बहुत सुंदर रही होंगी और अब भी आकर्षक हैं। प्रभावशाली और बुद्धिमान दिखती हैं। उनका पहनावा सीधा सादा था और रानी होते हुए भी बहुत कम जेवरात पहनती थीं।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

लक्ष्मीबाई के पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे था। वे पेशवा बाजीराव द्वितीय के भाई चिमाजी अप्पा के साथ काशी आकर बस गये थे। उनका जन्म 19 नवम्बर 1835 को काशी में हुआ। नाम रखा गया मणिकर्णिका, जो छोटे रूप में मनु हो गया। चिमाजी की मृत्यु के बाद यह परिवार बाजीराव की शरण में ब्रह्मावेर्त (बिठूर ) आ गया। लक्ष्मीबाई का बचपन वहीं नाना साहब और तात्या टोपे के साथ बीता। वहीं उन्होंने घोड़े की सवारी तथा शस्त्र चलाना सीखा। बाजीराव ने मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से करा दिया। इस प्रकार साधारण परिवार की मनु एक दिन झांसी की रानी बन गयी। शादी के बाद झांसी में उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

दुर्भाग्य से राजा गंगाधर राव की शीघ्र ही मृत्यु हो गयी, परंतु मृत्यु से पूर्व उन्होंने एक पुत्र गोद ले लिया। उसका नाम रखा गया दामोदर राव। राजा ने ब्रिटिश सरकार को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि उनके बाद राज्य की स्वामी लक्ष्मीबाई को जीवन पर्यन्त माना जाये और पुत्र की माता माना जाये, परंतु डलहौजी की हड़प नीति के चलते यह कैसे संभव था? उसने दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और 7 मार्च 1857 को झांसी को हड़पकर अंग्रेजी राज्य में शामिल कर लिया गया।  राजा की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी और लक्ष्मीबाई को मात्र 5 हजार रूपये की पेंशन मुकर्रर की गयी। अंग्रेजों ने रानी को अपमानित करने की हर संभव कोशिश की। उनको झांसी के किले से भी निकाल दिया गया।

झांसी में क्रांति

अंग्रेज़ों के इन अन्यायों के विरुद्ध केवल रानी ही नहीं राज्य की जनता और झांसी स्थित अंग्रेज़ों की भारतीय सैनिक टुकड़ियों में विद्रोह की भावना पनप रही थी। देश में अंग्रेज़ों के विरुद्ध असंतोष के अन्य कारणों में झांसी का कारण भी जुड़ गया था।  10 मई 1857 को क्रांति की ज्वालाएं मेरठ में धधक उठीं। इसकी सूचना जंगल की आग की तरह शीघ्र ही सारे उत्तर  भारत में फैल गयी। एक जून को झांसी के मिलिटरी केण्टोंनमेंट स्थित दो बंगलों को आग के हवाले कर दिया। फिर तीन जून को 12 भारतीय सैनिक टुकड़ी ने खुला विद्रोह कर दिया। सैनिकों ने खजाने और गोला बारूद के भंडार पर कब्जा कर लिया। झांसी की आम जनता ने केन्ट पर धावा बोल दिया। उन्होंने तीन अंग्रेज अफसरों की हत्या कर दी। जेल से कैदियों को मुक्त कर दिया। सात जून को क्रांति व्यापक रूप से फैल गयी।

अब झांसी पर रानी लक्ष्मीबाई का राज था। वे जानती थीं कि अंग्रेज़ शीघ्र ही बदले की कार्रवाई करेंगे और  शीघ्र ही हमला करेंगे।  अत: रानी पूरी सावधानी से झांसी की रक्षा की तैयारी में जुट गयीं। उन्होंने झांसी के किले में आने वाले संघर्ष के लिए भारी मोर्चाबन्दी कर ली। उन्होंने स्वयं भी पुरुषों सी वेषभूषा धारण कर शत्रु का सामना करने की तैयारी की। उन्होंने अपने सैनिकों का उत्साह इतना बढ़ाया कि रानी के नेतृत्व में वे जीवन मरण के संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार थे। ऐसे सैनिक भी अब उनकी योग्यता के कायल हो चुके थे, जो महिला होने के नाते उनके नेतृत्व में संदेह कर रहे थे।

महिलाओं की फौज

रानी एक दूरंदेशी सैनिक कमाण्डर थी। उन्होंने महिलाओं की जिस तरह फौज खड़ी की उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई।  सैनिकों और गोलंदाजों के रूप में उनकी भर्ती की गयी। जब झांसी में युद्ध छिड़ा तो महिलाओं ने पुरूषों के साथ  कन्धे से कन्धा मिलाकर युद्ध किया। निगरानी की जिम्मेदारी उठायी, तोपखानों के लिए गोला बारूद पहुंचाने का दायित्व उठाया और घायलों की सेवा सुश्रुषा की। इसका अर्थ है कि रानी ने महिलाओं की काबिलियत पर डेढ़ तब सौ साल पहले वह भरोसा जताया जो हम आज भी नहीं कर पा रहे हैं।

झांसी की क्रांति को कुचलने के उद्देश्य से ह्यूरोज की कमान में अंग्रेजी फौज सीहोर, राहतगढ़, सागर, मालथौन होती हुई झांसी पहुंची।  इस बीच उसने सागर में विद्रोह को दबाया। रानी ने किले की प्रत्येक बुर्ज पर तोपें चढ़वा दीं। कुल 51 तोपं थी, जिसमें कड़क बिजली, घन गर्जन ओर भवानी शंकर नामक तोपें प्रसिद्ध हैं। तोपखाने का प्रमुख था मोहम्मद गौस खा, जो अंतिम सांस तक किले की रक्षा करता रहा। रानी की फौज में वीर बुन्देले और अफगान सैनिक भी बड़ी संख्या में थे।

किले की घेराबन्दी

ह्यूरोज ने झांसी के किले की पूर्ण घेराबंदी 23 मार्च को शुरू की।  घुड़सवार सेना के सात शिविर किले को घेरकर स्थापित किये गये, परंतु किले के भीतर भी क्रांतिकारियों  का जोश ऊफान पर था। रानी ने सैनिक नेताओं और नगरवासियों की एक बैठक बुलाकर पूछा कि वे शहर की रक्षा करने के पक्ष में हैं या नहीं? कुछ ने समझौता करने की सलाह दी, परंतु अधिकांश ने अंग्रेज़ों के विरूद्ध संघर्ष का संकल्प लिया। दो सप्ताह तक भीषण संघर्ष जारी रहा। अनेक बार किले की दीवार में शत्रु के गोलों से दरारें पड़ीं और रानी ने स्वयं खड़े  होकर अपनी निगरानी में रातों-रात उनकी मरम्मत करायी। इसी बीच तात्या टोपे भी सेना लेकर झांसी की मदद के लिए आगे बढ़ें, परंतु बेतवा के युद्ध में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। इससे रानी को कोई सहायता नहीं मिल सकी। परंतु अंगे्रजों की बड़ी सैन्य शक्ति और हथियारों के कारण लक्ष्मीबाई को किला खाली करना पड़ा। दामोदर राव को पीठ पर बांधकर रानी भांडेर होती हुई 24 घंटे में इतनी भीषण गर्मी में घोड़े को दौड़ाते हुए करीब 160 किलोमीटर दूर काल्पी पहुंची गयी। वहां राव साहब, तात्या टोपे, बानपुर के राजा मर्दन सिंह, बांदा के नवाब और अनेक क्रांतिकारी नेता मौजूद थे। कौंच और काल्पी के युद्धों में अंग्रेजी फौजों से भीषण संघर्ष हुआ, परंतु दुर्भाग्य से क्रांतिकारियों को उन युद्धों में पराजय का सामना करना पड़ा।

ग्वालियर पर कब्जा

विपरीत परिस्थितियों  तथा अनेक पराजयों के बाद भी क्रांतिकारियों ने हिम्मत नहीं हारी।  उन्होंने एक राय बनाकर, कुशल रणनीति का सहारा लेकर ग्वालियर की ओर कूच किया। तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई, राव साहब ने मिलकर सिन्धिया की सेना के मन में भी विद्रोह की भावना जागृत कर दी। इसीलिए जब जयाजी सिन्धिया ने उनका मुकाबला करने की कोशिश की तो उसके पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी। युद्ध के समय उसकी फौज ने विद्रोह कर दिया। वह क्रांतिकारियों से जा मिली। जयाजी जान बचाकर अंग्रेज़ों के संरक्षण में आगरा भाग गया। ग्वालियर के किले पर अंग्रेज़ों का कब्जा हो गया।

जब ह्यूरोज को ग्वालियर पर स्वाधीनता सेनानियों के अधिकार का समाचार मिला तो वह आश्चर्यचकित रह गया।  उसने फौरन ग्वालियर की ओर कूच किया। इसके साथ ही आसपास की अनेक फौजी छावनियों से अंग्रेजी फौजों को ग्वालियर बुलाया गया। इस प्रकार एक विशाल सेना ने क्रांतिकारियों को ग्वालियर में घेर लिया।

रानी का बलिदान

अंतत: 17 जून, 1858 को वह मनहूस दिन आ पहुंचा जिस दिन रानी लक्ष्मीबाई का अंग्रेजी सेना से अंतिम संघर्ष हुआ, जिसमें रानी ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहूति दे दी।  रानी ने ब्रिगेडियर स्मिथ, जो 8 वीं घुड़सवार सेना की कमान सम्हाले था, के आक्रमण का जोरदार मुकाबला किया। वे दोनों हाथों में तलवारें लिए और घोड़े की लगाम मुंह में दबाए अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा रही थीं। इतने में उन्हें एक गोली लगी और एक घुड़सवार ने तलवार का सिर पर सांघातिक वार किया। रानी इस युद्ध में शहीद हो गयीं। यों उनका अंत कैसे हुआ और उन्हें किस-किस हथियार से सांघातिक चोटें लगीं इस पर भिन्न-भिन्न साक्ष्य हैं, परंतु तथ्य है कि उनका घोड़ा फूल बाग के पास की नहर पार नहीं कर सका। परिणामस्वरूप युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। शत्रु पक्ष वीरांगना की मृत देह भी छू नहीं सका। अनुयायी उनकी देह को ले आये और फूल बाग के पास उनका अंतिम संस्कार कर दिया। उसी स्थान पर अब उनकी घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है।

लेखक जाने माने इतिहासकार हैं।

© मीडियाटिक

 

 

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