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विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला कमला भागवत सोहोनी

विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला कमला भागवत सोहोनी

छाया: अमर चित्र कथा

प्रेरणा पुंज
अपने क्षेत्र की पहली महिला

विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला कमला भागवत सोहोनी

• डॉ शुभ्रता मिश्रा 

देश में महिलाओं के लिए विज्ञान में पीएचडी के द्वार खोलने वाली प्रथम भारतीय महिला सुविख्यात जैव रसायनशास्त्री कमला भागवत सोहोनी का जन्म इंदौर में 18 जून 1911 को हुआ। उनके पिता श्री नारायणराव भागवत और चाचा श्री माधवराव भागवत दोनों रसायनशास्त्री थे, जो तत्कालीन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज़ से रसायन शास्त्र में डिग्री पाने वाले शोधार्थी भी थे। नन्हीं कमला बचपन से ही अपने घर में विज्ञान और शोध की बातों को सामान्य रूप से सुनते हुए बड़ी हुई थीं। घर का वातावरण लड़के या लड़की के भेद जैसी वैमनस्य भावना से कहीं दूर, विज्ञान और अनुसंधान से ओतप्रोत था। कमला जी और उनके परिवार को जैसे पूर्ण विश्वास था कि उनकी विदुषी बेटी ने देश में विज्ञान का परचम लहराने के लिए ही जन्म लिया है। ऐसे सुशिक्षित और उच्च संस्कारों वाले परिवार में जन्मी मेधावी कमला जी ने निर्विघ्न अपनी स्नातक तक की पढ़ाई तत्कालीन बम्बई विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र विषयों में सर्वोच्च अंकों के साथ प्रथम स्थान लेकर उत्तीर्ण की थी।

अपने पिता और चाचा के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए कमला की हार्दिक इच्छा परास्नातक की पढ़ाई टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज़ से करने की थी। उन दिनों टाटा इंस्टीट्यूट में स्नातक उपाधि के बाद विद्यार्थियों को शोधकार्य का अवसर दिया जाता था। अतः कमला जी ने अपने पिता के कहने पर वहां प्रवेश लेने के लिए आवेदन भरा। संस्थान के निदेशक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. सी.वी. रामन सहित देश के अन्य मूर्धन्य वैज्ञानिकों के सानिध्य में शोधकार्य का मौका मिलने की खुशी से कमला बेहद रोमांचित थीं। उनका सपना था कि वे एक दिन वैज्ञानिक बनेंगी। लेकिन उनकी यह प्रसन्नता और विश्वास लिंग भेद की भेंट चढ़ सकता है, इसका ज़रा भी अंदाज़ स्नातक कमला जी को नहीं था।

इंस्टीट्यूट द्वारा तय की गई पात्रताओं पर पूरा पूरा खरा उतरने वाली कमला भागवत को वहां सिर्फ इसलिए प्रवेश नहीं दिया जा रहा था कि वे एक लड़की थीं। बचपन से लैंगिक समानता के माहौल में पली बढ़ीं कमला के लिए यह सोच पाना मुश्किल हो रहा था कि देश का प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थान उन्हें यह तर्क देकर प्रवेश लेने से इंकार कर रहा है कि उस संस्थान में लड़कियों को दाखिला देने की प्रथा नहीं रही है। एक स्वाभिमानी पिता और पुत्री दोनों के लिए यह कारण किसी असहनीय पीड़ा से कम नहीं था। पिता नारायण राव को अपनी बेटी की विज्ञान मेधा पर अतीव विश्वास था, वे ऐसे किसी कुतर्क के कारण अपनी बेटी की प्रतिभा का दमन नहीं होने देना चाहते थे। वे कमला के साथ सीधे निदेशक के दफ्तर पहुंचे और सर सी. वी. रामन के समक्ष अपना पक्ष रखा। आश्चर्य तो तब हुआ जब स्वयं विश्वविख्यात नोबेल पुरस्कार विजेता रामन ने भी अपने लिंगभेदी विचारों से कमला की विद्वता पर प्रहार किया।

कमला जी हमेशा से मृदुभाषी और सौम्य स्वभाव वाली विदुषी थीं, निःसंदेह उनके कोमल मन पर सी. वी. रामन जैसे मनीषी द्वारा स्त्रियों के प्रति व्यक्त उद्गारों ने बेहद आहत किया। अब कमला का मौन मुखर हुए बिना नहीं रह सकता था। अंततः सी. वी. रामन को कमला जी की तर्कपूर्ण विद्वता और गांधी प्रेरित सत्याग्रह के आगे झुकना पड़ा। बहुत से अस्वीकार्य अनुबंधों को अनमनी स्वीकृति देते हुए कमला भागवत टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज़ में प्रवेश पाने वाली प्रथम महिला शोधार्थी बन गईं। इस तरह सन् 1933 भारतीय महिला विज्ञान शिक्षा के इतिहास में किसी वैज्ञानिक संस्थान में स्त्रियों के वैज्ञानिक शोध के द्वार खोलने वाला स्वर्णिम वर्ष बन गया।

कमला भागवत को संस्थान में पढ़ने की अनुमति मिल गई थी, हालांकि उनके लिए संस्थान से मिली यह सहमति किसी चुनौती से कम नहीं थी, क्योंकि उनके लिए जो दिनचर्या निर्धारित की गई थी, वह सीधे तौर पर किसी अप्रत्यक्ष यातना का ही एक रूप था। कमला जी को प्रतिदिन प्रातः पांच बजे लैब में पहुंचने और तब से लेकर रात दस बजे तक लगातार काम करने के लिए कहा गया था। इसके अलावा प्रतिदिन रात में लाइब्रेरी में पढ़ने के लिए भी कहा गया था। परिवार में लाड़ों और मनुहारों में पली बढ़ी कमला जी के जीवन में इतना कठोर संघर्ष बिना अपराध के किसी दण्ड सा लग रहा था। फिर भी उन  जैसी सरस्वती पुत्री की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे ये सब परिस्थितियां मानो कोई बड़ी बात नहीं थीं। कमला जी ने इस अनुशासित योजनाबद्ध दिनचर्या के लिए हामी भरते हुए सिर्फ एक छोटा सा प्रस्ताव रखा कि दो घंटे लॉन टेनिस खेलने के लिए उनको रोज शाम को 4 से 6 बजे तक छुट्टी चाहिए।

टेनिस कमला जी का पसंदीदा खेल तो था ही इसके साथ ही कमला ने अपनी इस मांग के पीछे यह भी तर्क रखा था कि दो घंटे खुली हवा में खेलने से वे स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रख पाएंगी, जिससे वे स्वयं को मिली कठिन दिनचर्या का भी अनुपालन कर सकेंगी। कमला जी की यह शर्त मान ली गई थी। परंतु उनके पिताजी को कमला के रहने, खाने आदि की व्यवस्था की भी चिंता थी। हालांकि उस सब का प्रबंध कमला के लिए कर दिया गया था। उनके रहने की व्यवस्था कैम्पस के ही एक छोटे मकान में की गई थी और रात में एक महिला कर्मचारी के उनके साथ रहती थी। उस समय कमला भागवत की लोकल गार्जियन सर रामन की धर्मपत्नी श्रीमती लोकसुंदरी बनीं थीं। दोपहर का खाना लैब में श्रीनिवासैय्या के साथ और रात का खाना कैम्पस में मौजूद गुजराती मेस में करना तय हुआ था।

कमला भागवत को शोधकार्य के साथ साथ उपकरणों को बनाने से लेकर जैव रसायन में प्रयुक्त होने वाली झिल्लियों को भी स्वयं बनाना सीखना पड़ा था। एक साल के प्रशिक्षण काल में से प्रारंभिक तीन चार महीने इसी तरह के कामों में निकल गए, लेकिन कमला जी की एकाग्रता और अथक प्रयासों ने श्रीनिवासैय्या को पिघला ही दिया और वे उन्हें अपनी बेटी जैसा मानने लगे थे। वहीं कमला भी श्रीनिवासैय्या के व्यवहार में पिता तुल्य भाव अनुभव करने लगी थीं। यहां से कमला जी की शोधयात्रा सही मायनों में शुरू हुई। श्रीनिवासैय्या ने शोधार्थी कमला की शोध क्षमता का लोहा मान लिया। अपने शोध विषय में निष्णात कमला जी की योग्यता को स्वीकारते हुए अंततः संस्थान ने उन्हें जैव रसायन में शोधकार्य के लिए नियमित कर दिया था।

सबसे पहले कमला जी ने विभिन्न पशुओं से मिलने वाले दूध और अलग-अलग दलहनों एवं फलियों में मिलने वाली प्रोटीन और नॉन-प्रोटीन्स पदार्थों के पृथक्करण की प्रक्रिया पर काम किया। उन्होंने अपने शोधकार्य की शुरुआत मनुष्य, गाय, भैंस, भेड़ और गधी के दूध में पाई जाने वाली प्रोटीनों के तुलनात्मक अध्ययन से की। इस शोध का सबसे रोचक परिणाम यह मिला कि पाचन की दृष्टि से शिशुओं के लिए मां का दूध ही सर्वोत्तम होता है। हालांकि, कमला जी के शोध के एक चौंकाने वाले निष्कर्ष ने इस मिथक को तोड़ा कि गाय का दूध मां के दूध का अच्छा विकल्प हो सकता है, क्योंकि कमला के शोध में पाया गया कि बच्चों के लिए गधी का दूध गाय से अधिक बेहतर है। उनके शोध परिणामों के अनुसार गधी के बाद गाय, फिर भेड़ और सबसे अंत में भैंस के दूध विकल्प हो सकते हैं।

कमला जी ने अपने इस शोध में दूध की प्रोटीनों के साथ साथ नॉन-प्रोटीन पदार्थों पर भी काम किया था। अतः उन्होंने पाया कि गधी के दूध के नॉन प्रोटीन को भैंस के दूध में मिलाकर प्रयोग में लाने से भैंस के दूध को शिशुओं के लिए पाचन योग्य बनाया जा सकता है। शोध से यह तथ्य सामने आया कि सभी तरह के दूध में कैसिन नामक एक प्रमुख प्रोटीन पाया जाता है। भिन्न-भिन्न पशुओं के दूध में कैसिन के अणु का आकार अलग-अलग होता है, जिसका संबंध पाचन से होता है। कैसिन का अणु बड़ा होगा तो उसको पचाना कठिन होगा। कमला जी के इस शोध से यह ज्ञात हो सका कि भैंस के दूध में पाए जाने वाले कैसिन का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होने से बच्चे उसे आसानी से पचा नहीं पाते, लेकिन जब उसमें गधी के दूध का नॉन-प्रोटीन मिलाया जाता है, तो भैंस के दूध के कैसिन का आकार छोटा हो जाता है और दूध पाचन के लिए हल्का हो जाता है। कमला भागवत का यह अद्भुत शोध विज्ञान जगत में ” ह्यूमेनाइजेशन ऑफ़ बफैलो मिल्क ” के नाम से जाना जाता है।

कमला जी ने अपनी मेधा, मनीषी आकुलता और दृढ़ निश्चयता से सर सी.वी. रामन की लड़कियों के प्रति सोच को भी बदल कर रख दिया था। कमला भागवत के बाद संस्थान में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी समाप्त कर दी गई थी। अब वे संस्थान की स्थायी शोधार्थी की तरह काम करने लगी थीं। दूध के अलावा उन्होंने दालों और फलियों में पाई जाने वाली प्रोटीन पर भी गहन शोध किए। वर्ष 1936 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज से कमला जी को डिस्टिंक्शन के साथ एम.एससी. की डिग्री हासिल हुई। इसके बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चली गईं, जहां उन्होंने सन् 1937 में सबसे पहले डॉ. डेरिक रिचटर और बाद में डॉ. रोबिन हिल के साथ पादप कोशिकाओं में उपस्थित साइटोक्रोम सी और कोशिकाओं के ऑक्सीकरण संबंधी शोध कार्य करने शुरू किए। शीघ्र ही रोबिन हिल ने कमला जी को नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर फ्रेडरिक होपकिंस की लैब में काम करने का सुझाव दिया। इसके लिए कमला ने कड़ी मेहनत करके फैलोशिप जीती और प्रोफ़ेसर होपकिंस के मार्ग निर्देशन में पीएचडी का काम प्रारम्भ किया।

कमला भागवत ने ” पौधों को ऑक्सीजन पहुंचाने वाली कोशिकाएं ” नामक अपना शोध प्रबंध मात्र सोलह महीनों में पूरा करके केवल चालीस पन्नों में लिखकर जमा कर दिया था। कमला के इतने छोटे से शोध प्रबंध को देखकर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की पीएचडी कमेटी बहुत प्रभावित हुई और तुरंत ही उनका शोध पीएचडी के लिए स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 28 वर्षीय कमला भागवत का नाम विज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय महिला के रूप में स्वर्णाक्षरों में सदा के लिए टंकित हो गया। पीएचडी के बाद कमला भागवत को विश्व के अनेक देशों से शोध और नौकरी के लिए आमंत्रण आए, लेकिन उन सबको ठुकराते हुए देशभक्त कमला भागवत ने अपनी शोध प्रतिभा के माध्यम से देश सेवा को सर्वोपरि माना। कैम्ब्रिज से पीएचडी डिग्री लेकर लौटने के बाद सन् 1939 में वे लेडी हार्डिंग कॉलेज, दिल्ली में स्थापित किए गए नवीन जैव रसायन विभाग की प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष नियुक्त की गईं। इसके बाद पोषण अनुसंधान प्रयोगशाला, कुन्नूर में सहायक निदेशक के रुप में भी उन्होंने काम किया था।

सन् 1947 में कमला भागवत का विवाह बीमा व्यवसायी श्री माधव.वी. सोहोनी से हुआ। श्री सोहोनी से कमला जी की भेंट लंदन में रहने के दौरान हुई थी।  माधव जी दरअसल लंदन यूनिवर्सिटी में एक्टुएरियल साइंस अर्थात जीवनांकिकी के होनहार शोधार्थी थे। विवाह के बाद वे दोनों मुंबई में रहने लगे। इसी बीच उनके दो पुत्रों – अनिल और जयंत का जन्म हुआ। कमला सोहोनी ने आज के विज्ञान संस्थान बम्बई, जो उन दिनों रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कहलाता था, के नव स्थापित जैव-रसायन विभाग में व्याख्याता बनकर अपनी सेवाएं देना शुरू कीं। बाद में वे इसी संस्थान की निदेशक बनीं। यहां भी कमला सोहोनी ने विज्ञान संस्थान की पहली निदेशक बनकर इतिहास रचा था। पूरे जीवन भर कमला सोहोनी ने देश के विभिन्न संस्थानों में विविध पदों पर सुशोभित रहकर अभूतपूर्व शोधकार्य किए।

” नीरा ” पर उनका ऐसा ही एक अद्भुत शोधकार्य बेहद लोकप्रिय रहा है। कमला सोहोनी ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सुझाव पर ” नीरा ” पर काम शुरू किया था। ताड़ और खजूर के पेड़ से निकलने वाले ताजे रस को नीरा कहा जाता है। इस पेय पदार्थ में विटामिन ए, विटामिन सी, और आयरन की महत्वपूर्ण मात्रा पाई जाती है। नीरा पर किए गए कमला जी के गहन शोध से ज्ञात हुआ था कि इस पेय पदार्थ को आहार में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने सिद्ध किया कि आदिवासी समुदायों के कुपोषित किशोर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार के लिए नीरा का प्रयोग एक सस्ते आहार अनुपूरक के रूप में बेहद महत्वपूर्ण है। इस विषय में उनके काम के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बॉम्बे आरे मिल्क प्रोजेक्ट फैक्ट्री के सलाहकार के रूप में उन्होंने दूध को जल्दी दही बन जाने से रोकने के लिए एक नवाचार भी किया था।

कमला सोहोनी एक अच्छी लेखिका भी थीं, उन्होंने कई वैज्ञानिक किताबें लिखीं। यहां तक कि अपनी मातृभाषा मराठी में भी उन्होंने कई किताबें और लेख लिखे। वे उन नौ महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने कंज़्यूमर गाइडेंस सोसाइटी की स्थापना की थी। यह अपनी तरह का पहला सामाजिक संगठन था, जिसने बाजार में खाद्य परीक्षण की गुणवत्ता और माप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने खाद्य पदार्थों की शुद्धता का परीक्षण करने के लिए गृहिणियों के लिए एक किट विकसित की थी। कमला सोहोनी सन् 1969 में सेवानिवृत्त हो गईं थीं, लेकिन उसके बाद लगभग दो दशकों तक उन्होंने कंज़्यूमर गाइडेंस सोसायटी के साथ लगातार काम किया। डॉ कमला कंज़्यूमर गाइडेंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया की सक्रिय सदस्य थीं। वर्ष 1982 में वे इस संस्था की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुनी गईं थीं।

वर्ष 1997 में कमला सोहोनी को उनके विज्ञान के लिए किए गए उत्कृष्ट शोधकार्यों और योगदान हेतु राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1998 में इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने उनका विशेष सम्मान करने के लिए एक अभिनन्दन समारोह आयोजित किया था। इसी कार्यक्रम के दौरान वे अचानक गिर पड़ी और कुछ दिनों तक अस्वस्थ रहने के बाद 28 जून 1998 को भारत की वैज्ञानिक मनीषा डॉ. कमला सोहोनी चिरनिद्रा में लीन हो गईं।

लेखिका विज्ञान लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनका जीवन परिचय https://swayamsiddha.co/डॉ-शुभ्रता-मिश्रा/ पर पढ़ा जा सकता है।

© मीडियाटिक

 

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