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डॉ. रेखा कस्तवार

डॉ. रेखा कस्तवार

छाया : डॉ. रेखा कस्तवार के फेसबुक अकाउंट से

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डॉ. रेखा कस्तवार

स्त्री विमर्श की विभिन्न कोणों से सूक्ष्म पड़ताल के कारण ख्याति अर्जित कर चुकी लेखिका रेखा कस्तवार हालाँकि बचपन से लिखती रही हैं, लेकिन उनकी लेखनी को असल धार पीएचडी करने के दौरान मिली। रेखा जी का जन्म 17 मार्च 1957 को नागपुर में हुआ। इनका परिवार व्यापार – व्यवसाय से जुड़ा हुआ था। परिवार में अचानक हालात बिगड़ने लगे, एक-एक करके दादा, ताऊ और बुआ का निधन हो गया। उनके पिता श्री विष्णु प्रसाद गुप्ता अकेले हो गए। वे अपने ताऊ और ताई के साथ ही नन्ही रेखा को भी लेकर जबलपुर आ गए। रेखाजी के माता-पिता के बीच कुछ मुद्दों पर असहमतियां चरम पर पहुँच चुकी थीं, नतीजतन रेखा जी की माँ श्रीमती रमा गुप्ता और दादी नागपुर में अपने पुश्तैनी घर में ही रहे। आज इस घटना को रेखा बड़े ही आश्चर्य से देखती हैं क्योंकि उनकी दादी ने बेटे के बजाय बहू का साथ दिया। हमारे समाज में ऐसा कम ही होता है।

इस तरह रेखा जी का बचपन चचेरे दादा-दादी के संरक्षण में बीता। जबलपुर में ही आर्य कन्या शाला में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई। उस स्कूल में पारंपरिक शिक्षण व्यवस्था थी, जिसमें संस्कृत श्लोक पाठ, प्रातः वंदना आदि नियमित रूप से होते थे, साथ ही मंच पर भी श्लोक पाठ आदि का अवसर मिलता था। रेखा जी के व्यक्तित्व में संस्कार और संस्कृति का बीजारोपण उसी समय हुआ। वर्ष 1967-68  में जब वे चौथी में थी उनके पिता भोपाल आकर बस गए। रेखा जी का नामांकन कमला नेहरू कन्या उच्चतर विद्यालय में करवाया गया। होश संभालने के बाद उन्होंने पाया कि पिता के साथ संवाद की स्थिति कम ही बनती, दादी को पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। सख्त अनुशासन भरे माहौल में कहानी की एक किताब तक घर लाने की अनुमति नहीं थी। शुरुआत में वे गुमसुम रहने वाली लड़की थीं, लेकिन बाद में कक्षा में प्रथम आने लगीं। नौवीं कक्षा में स्कूल के वार्षिकोत्सव में प्रहसनों में हिस्सा लेतीं और मिलने वाले पुरस्कारों को अपनी किसी सहेली के घर छुपा देती क्योंकि उन ट्रॉफियों के लिए घर में कोई जगह नहीं थी। स्कूल की तरफ से चुनकर आकाशवाणी के कार्यक्रमों में भी गईं मगर घरवालों से छिपकर। नौवीं कक्षा में ही पहली कविता लिखी – शाला गुलशन और पत्ती कलियाँ, जो स्कूल की पत्रिका में प्रकाशित हुई।

इस बीच एक और घटना हुई। उनके पिता परिस्थितिवश हाई स्कूल भी पास नहीं कर पाए थे। जब रेखा जी सातवीं में पढ़ रही थीं, उस वक़्त उन्होंने 11वीं पास की और जब तक रेखा जी कॉलेज में पहुंची तब तक वे लॉ ग्रेजुएट हो चुके थे। अपने पिता को नियमित छात्र के रूप में कॉलेज जाते और पढ़ाई करते देखना उनकी बेटी के लिए कम अचम्भे की बात नहीं थी, पर वे उन्हें छात्रों के समान जीवन जीते और उन्हें खुश देखकर खुद भी बहुत खुश होती। पिता के इस जज़्बे ने उन्हें जीवन का मूल मंत्र दिया कि शुरुआत कभी भी की जा सकती है। 1973 में 11वीं के बाद सरोजनी नायडू महाविद्यालय में कला विषय लेकर स्नातक के लिए नामांकन हुआ। इसके बाद उन्होंने वहीँ से स्नातकोत्तर भी किया। इस दौरान कॉलेज की पत्रिका में उनकी रचना छपती रही। रेखा जी अपने एक प्राध्यापक से बहुत प्रभावित थीं। परन्तु गहन और गंभीर व्यक्तित्व वाले प्रोफ़ेसर साहब के व्यवहार से उन्हें लगता कि वे उनसे चिढ़ते हैं शायद। छात्रा और शिक्षक के बीच रिश्तों के इन्हीं उलझे धागों को जोड़कर उन्होंने अपनी पहली  कहानी लिखी, इस कहानी को पढ़ने के बाद प्रोफ़ेसर साहब की धारणा भी रेखा जी के प्रति बदली और आगे चलकर अभिभावक के समान उनका साथ दिया।

1976 में रेखा जी का ग्रेजुएशन पूरा हुआ, इस बीच चचेरी दादी और नागपुर में माँ के साथ रह रही सगी दादी – दोनों का निधन हो गया। माँ पिता के पास लौट आईं थीं। इन  परिस्थितियों के कारण  साल भर के लिए रेखा जी की  पढ़ाई रुक गई। इस बीच उन्होंने उन्हीं प्रोफ़ेसर साहब की लाइब्रेरी का भरपूर फ़ायदा उठाया और ढेर सारी पुस्तकें पढ़ डालीं। उन दिनों रेखा जी को हौसला बनाए रखने में और प्रोत्साहित करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। बाद में उन्होंने हमीदिया कॉलेज से हिन्दी साहित्य विषय लेकर स्नातकोत्तर किया। यह समय रेखा जी के जीवन का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है, मानो बरसों से बंद पंख अचानक खुल गए हों। यहाँ उन्हें छात्र जीवन को भरपूर जीने का अवसर तो मिला ही,  प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे हिन्दी के समर्थ संपादक और आलोचक का सानिध्य भी मिला। इस बीच उनके छिटपुट लेख भी छपने लगे थे। मगर जीवन में एक नया मोड़ आया जब रेखा जी का विवाह हुआ।

शिक्षा के प्रति स्वयं और अपनी बिटिया के प्रेम को देखते हुए उनके पिता ने पीएचडी कर रहे अविनाश कस्तवार से उनका सम्बन्ध तय कर दिया। अविनाश जी की माँ स्वयं भी एक विद्यालय में प्राचार्य थीं। नवम्बर 1980 में विवाह के बाद वे अपने ससुराल सागर आकर रहने लगीं। कुछ समय बाद ही रेखा जी  का इस सच से सामना हुआ कि डिग्री हासिल कर लेने से इंसान सुशिक्षित और सुसभ्य नहीं हो जाता। पहली संतान के समय की बात है। पांच माह का गर्भ था और कुछ समस्या खड़ी हो गई थी। एक दिन बिना किसी पूर्व सूचना के उनकी सास और उनके पति उन्हें एक बाबा के पास लेकर गए। वहां उन्होंने चीखते-चिल्लाते मरीजों के साथ अंगीठी पर दहकते हुए चिमटी देखी। बड़े-बड़े बालों वाले भभूत रमाए एक बाबा वहीं खड़ा था। क्या हो रहा है और क्या होने वाला है इस बात को वे समझ पातीं उससे पहले ही बाबा ने आदेश दिया- पीछे घुमा दो!” और पल भर में जलती हुई चिमटी उनकी पीठ पर चिपका दी गई। सामने घुमाओ! ओझा की आवाज गूंजी और पलक झपके दूसरी दहकती हुई चिमटी उनके पेट पर चिपका दी गई। ‘मलहम मत लगना”-ओझा ने आदेश दिया, जिसके बाद उनके पति और सास उन्हें लेकर घर गए। ओझा के आदेश को दरकिनार करते हुए सबसे पहले रेखा जी ने छालों पर मरहम लगाया फिर पति और सास दोनों के सामने मुखर विरोध दर्ज करवाया। प्रतिक्रिया के तौर पर उनके पति ने कहा – मुझे नहीं मालूम था, रेखा इतनी बड़ी नास्तिक होगी।

इस घटना ने मानो वजूद को झकझोरकर रख दिया। एकदम से कोई बड़ा फ़ैसला लेने की स्थिति नहीं थी, तो वे अपने माता-पिता के पास भोपाल चली गईं। जिस दिन बिटिया का जन्म हुआ उसी दिन ससुराल में आग लगने की खबर आई, जिसमे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, बस दीवान में रखी रेखाजी की पुरानी डायरियां, कॉपियां वगैरह जलकर ख़ाक हो गयीं। हाँ कमरे में काफी कुछ सुरक्षित रह गया। किस तरह यह संभव हुआ, आज तक कोई नहीं जानता। समय गुजरता रहा, इस बीच लिखने का अवसर बिलकुल नहीं मिला, पढ़ना भी कभी कभार ही हो पाता था। फिर बेटे का जन्म हुआ। जब वह तीन महीने का था तभी जतारा के एक महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के लिए रिक्ति निकली, जहाँ उन्होंने आवेदन कर दिया और उनकी नियुक्ति हो गई। इस तरह वे  तीन साल की बेटी और तीन महीने के बेटे को लेकर जतारा आ गईं। वह वक़्त चुनौतियों से भरा हुआ था।

कुछ समय बाद  फरवरी 1985 में उनका स्थानांतरण जतारा से रहली हो गया। पुनः1986 में उनका स्थानांतरण रहली से सागर हो गया। यहाँ से भी पुनः ओबेदुल्लागंज 1988 में आना पड़ा। लगभग बाइस वर्षों तक भोपाल से औबेदुल्लागंज बस से आते-जाते हुए गृहस्थी संभाली। 2010 में वहाँ से सरोजिनी नायडू महाविद्यालय,  भोपाल आ गईं और तब से वहीं कार्यरत हैं। अविनाश जी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे, इसलिए घर पर कम ही रहते थे। फिर भी लम्बी बस यात्रा के कारण पढ़ने का सुयोग और विचारों को आकार लेने मिल जाता था। इसलिए पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षात्मक लेखों के छपने का सिलसिला शुरू हो गया। 1999 में उन्होंने पीएचडी के लिए पंजीयन करवाया जो 2004 में जाकर पूरा हुआ। उसी वर्ष उनके पिता चल बसे। पुत्र न होने के कारण रिश्तेदार एक दूसरे से पूछने लगे थे कि अंतिम संस्कार कौन करेगा। उसी वक्त रेखा जी ने यह ऐलान किया कि अपने पिता अंतिम संस्कार वे खुद करेंगी । विरोध के कई स्वर उठे परन्तु वे अपने निर्णय पर अड़ी रहीं। बाद में उनकी माँ उनके साथ रहने आ गईं जिन्होंने बताया कि उनकी भी यही इच्छा थी। हालाँकि कि उस वक़्त दोनों के बीच इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई।

रेखा जी के शोधप्रबंध का विषय स्त्री और पुरुष लेखकों द्वारा गढ़े गए नारी पात्रों के प्रति लेखक के दृष्टिकोण पर आधारित था। यह विषय पीएचडी की उपाधि से कहीं बढ़कर सिद्ध हुआ। कहा जा सकता है कि इसी शोध के दौरान स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं को समझने की दृष्टि विकसित हुई और उनकी लेखकीय ज़मीन तैयार हुई। इस दौरान खूब पढ़ने का अवसर भी मिला और गाइड के तौर पर प्रोफ़ेसर कृष्ण कमलेश का मार्गदर्शन भी मिला। पीएचडी के दौरान ही राजकमल प्रकाशन से संपर्क हुआ जिन्होंने विषय को समझने के बाद उसे प्रकाशित करने में रूचि ज़ाहिर की। वर्ष 2006 में उनका शोध प्रबंध  ‘स्त्री लेखन की चुनौतियां’ के नाम राजकमल प्रकाशन द्वारा छपकर आई और अपने विषय की प्रमाणिक पुस्तक सिद्ध हुई। कई महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में इस पुस्तक को जगह मिली और आज भी यह स्त्री विमर्श की सर्वाधिक प्रामाणिक पुस्तकों में से एक मानी जाती है। इस पुस्तक को मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार से नवाजा गया।

रेखा जी की अगली किताब ‘किरदार ज़िंदा है’  2010 में प्रकाशित हुई। पूर्व में यह दैनिक भास्कर के बुधवारीय परिशिष्ट ‘मधुरिमा’ में श्रृंखला के रूप में प्रकाशित हुआ जिसे पाठकों ने बहुत पसंद किया था। इस पुस्तक को अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्ष 2011 में रेखा जी ने उच्च शिक्षा विभाग के लिए आयोजित राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और प्रोफ़ेसर के तौर पर उनकी सीधी नियुक्ति नूतन कॉलेज भोपाल में हुई। पुनः 2012 में रेखा जी की एक और पुस्तक आई – ‘अपने होने का अर्थ’। रोचक तथ्य यह है कि रेखा जी की कहानियां पत्र – पत्रिकाओं में छपती रही हैं लेकिन उनका एक भी संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ। बावजूद इसके वे सशक्त कथाकारों में शुमार की जाती हैं।

रेखा जी के दो बच्चे हैं। बेटी पारुल की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने उसे अपना व्यवसाय स्थापित करने में मदद की। पारुल फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई कर अपना बुटीक शुरू करना चाहती थीं, जिसके लिए रेखा जी की माँ ने भी साथ दिया और जिस मकान में वे पहले रहती थी उसे बेटी के नाम वसीयत कर दिया। यहाँ आज शहर का जाना – माना बुटीक है। बेटे निमिष बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं। अपने पारिवारिक दायित्वों को निभा चुकने के बाद रेखा जी लेखन कार्य में व्यस्त हैं। उनका एक कहानी संग्रह प्रेस में है और समीक्षाओं पर आधारित पुस्तक प्रेस में जाने के लिए तैयार है।    

रेखा कस्तवार से सारिका ठाकुर की बातचीत के आधार पर 

© मीडियाटिक

 

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