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रीता वर्मा

रीता वर्मा

छाया : रीता वर्मा के एफ़बी अकाउंट से

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टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच
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रीता वर्मा 

प्रदेश में रंगमंच की सर्वाधिक वरिष्ठ कलाकारों में शुमार रीता वर्मा का जन्म,1953 को नागपुर में प्रसिद्ध पत्रकार, रंगकर्मी एवं लेखक श्री तरुण कुमार भादुड़ी और श्रीमती इंदिरा भादुड़ी के घर हुआ। माता-पिता और तीन बहनों के परिवार में जया सबसे बड़ी उसके बाद नीता और सबसे छोटी रीता हैं। जया भादुड़ी सिने जगत की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और सांसद हैं। नीता जी अपनी रूचि के अनुसार ब्यूटीशियन बनीं और लगभग 45 वर्षों तक शारजाह में काम किया जबकि रीता जी ने रंगमंच को अपना लिया। रंगमंच को उन्होंने कभी भी आमदनी या प्रसिद्धि का जरिया नहीं बनाया। वे परिवार, नौकरी और शौक तीनों में संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी प्राथमिकताएं तय करती हैं। यही वजह है कि वे आज भी थियेटर कर रही हैं। मौजूदा समय में वे मंच पर सक्रिय अपने समय की एकमात्र अभिनेत्री हैं।

रीता जी की प्रारंभिक शिक्षा भोपाल में हुई। हायर सेकेण्डरी तक की शिक्षा सेंट जोसेफ कान्वेंट, ईदगाह हिल्स, भोपाल से करने के बाद महारानी लक्ष्मी बाई कॉलेज से स्नातक व स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। पुनः उन्होंने बी.एड और एम.एड. भी किया जिसके बाद केन्द्रीय विद्यालय में बतौर अंग्रेजी  की शिक्षिका नियुक्त हुईं। उल्लेखनीय है कि रीता जी एक नियमित कलाकार के तौर पर आकाशवाणी और दूरदर्शन की भी अनुमोदित सूची में हैं। प्रशिक्षित रंगकर्मी होने के कारण अपने शिक्षण कार्य के दौरान वे अपने स्कूल में नियमित और सुचारू रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराती रहीं। नाटकों, नृत्य-नाटिकाओं एवं रंगकर्म प्रशिक्षण पर उनका विशेष ध्यान रहता था।  

कहना न होगा कि रीता जी को कलाओं का प्रशिक्षण – विशेष तौर से रंगकर्म विरासत में मिला है। 1961-1962 में जब भोपाल में नवनिर्मित रवींद्र नाट्यगृह का उद्घाटन हुआ, तो इस अवसर पर प्रस्तुत गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के लिखे नाटक “शोध बोध” में रीता जी ने एक बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया था। निर्देशक उनके पिता ही थे। यह एक संयोग ही है कि, गुरुदेव एवं रीता जी का जन्मदिन एक ही दिन आता है- ‘7 मई’। उन्हें रंगकर्म में बचपन से ही गहरी रूचि थी। उनके माता-पिता  दोनों ही नागपुर और भोपाल में बंगाली/हिन्दी नाटकों में बढ़ चढ़ भाग लेते थे। रीता जी एवं उनकी दोनों बड़ी बहनें  भी अपने अभिभावकों के साथ दुर्गा पूजा पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल रहते थे। इसलिए रीता जी के बाल्यावस्था से लेकर शिक्षा-दीक्षा के समानांतर नाट्यकर्म भी अनवरत जारी रहा।

सन 1973 में मप्र कला परिषद द्वारा नाट्यकला पर आयोजित दो महीने लम्बी कार्यशाला में रीता जी की भेंट बाबा कारंत से हुई। उनके सानिध्य में उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने का मौका मिला। उसी वर्ष एक और सुअवसर रीता जी को प्राप्त हुआ। उन्होंने बर्लिन में आयोजित 10वें अंतर्राष्ट्रीय युवा महोत्सव में नाट्यकर्मी की हैसियत से भारत सरकार का प्रतिनिधित्व किया। इसी बीच रीता जी और उनके साथियों ने मिलकर ‘रंग शिविर’ नाम से एक समूह का गठन किया। उस समूह में श्री राजीव वर्मा, इरफाना शरद, वेणुगोपाल, टोकेकर जी आदि भी शामिल थे। इस समूह द्वारा मंचित पहला नाटक था विजय तेंदुलकर द्वारा रचित ‘पंछी ऐसे आते हैं’। निर्देशन के लिए इस समूह ने बाबा कारंत को आमंत्रित किया था। तब तक श्री कारंत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक बन चुके थे। अत्यधिक व्यस्तता के कारण बमुश्किल 7-10 दिन का समय उन्होंने निकाला था। उस दौरान सभी प्रतिभागी 18-18  घंटे लगातार अभ्यास करते थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला जारी रहा।

इस बीच श्री राजीव वर्मा से उनकी मैत्री प्रगाढ़ हुई और दोनों ने जीवनसाथी बनने का निर्णय ले लिया। 1976 में दोनों का विवाह हुआ। दोनों ही परिवार के अभिवावक खुले विचारों के थे इसलिए विवाह के बाद किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं आई। राजीव जी नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय में कार्यरत थे। संयोग से श्री राजीव जी का तबादला इंदौर हो गया और रीता जी पति के साथ इंदौर आ गईं। वहां भी रंगमंच में रूचि रखने वाले साथी मिलते चले गए और मिलकर ‘संवाद’ नाम से एक रंग समूह की शुरुआत की। पहला नाटक था विजय तेंदुलकर रचित ‘सखाराम बाइंडर’, जिसके निर्देशन का दायित्व राजीवजी ने उठाया। परन्तु यह सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चला। पहले पुत्र शिलादित्य के जन्म के समय रीता जी पुनः भोपाल अपने माता-पिता के पास आ गईं। 1977 में राजीव जी भी प्रतिनियुक्ति पर भोपाल आ गए।

स्वाभाविक रूप से वर्मा दम्पत्ति की प्राथमिकताओं में अब पहला स्थान परिवार में आए नए मेहमान का था इसलिए निर्देशन और अभिनय को कुछ वर्षों के लिए विराम देना पड़ा।उनके पुत्र शिलादित्य जब ढाई – तीन साल के हुए तब फिर कुछ नाटकों में रीता जी की वापसी हुई, जिसमें पहला था शेक्सपीयर रचित किंग लियर का हिन्दी रूपांतरण –राजा पगला, तीन बेटियाँ। इसका मंचन रवींद्र भवन के मुक्ताकाश प्रांगण में किया गया। उसी मंच पर फिर प्रेमचंद लिखित ‘गोदान’ पर आधारित नाटक का मंचन हुआ, जिसका निर्देशन इकबाल मजीद कर रहे थे। इस नाटक का मंचन उनके नाट्य समूह ‘दर्पण’ के बैनर तले ही हुआ था। रोचक तथ्य यह है कि रीता जी इस नाटक में शिलादित्य को ‘मटरू’ की भूमिका में मंच पर ले आईं।  

रीता जी ने 1980 में केन्द्रीय विद्यालय में सेवाएं देना शुरू किया। 1981 में रीता जी और राजीव जी ने मिलकर भोपाल थिएटर्स की स्थापना की। इस समूह ने अलग-अलग निर्देशकों के निर्देशन में कई नाटकों का मंचन किया है और वह आज भी सक्रिय है। सन 1982 में रीता जी के दूसरे पुत्र तथागत का जन्म हुआ। नौकरी और दोनों बच्चों की देखरेख के कारण नाटक के लिए वक़्त कम ही मिल पाता था लेकिन रीता जी रंगमंच से अलग नहीं हुईं। 1984 में में राजीव जी सरकार की तरफ से उच्च शिक्षा( स्नातकोत्तर) के लिए दिल्ली चले गए। दोनों बच्चों को लेकर रीता जी भोपाल में ही थीं। उस दौरान गर्मी की छुट्टियों में नाटक के लिए मौके निकाले जाते थे। तीन वर्ष दिल्ली रहकर राजीव जी ने अपना स्नातकोत्तर पूरा किया तब तक दूरदर्शन से धारावाहिक चुनौती के लिए उनके पास प्रस्ताव आ गया। इसके बाद धीरे-धीरे वे फिल्मों और धारावाहिकों की शूटिंग में व्यस्त हो गए। 1996 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली।

इस बीच शिलादित्य और तथागत दोनों ही अपनी पढ़ाई के लिए इंदौर चले गए। रीताजी भी स्कूल से छुट्टी लेकर मुंबई ही रहने लगी थीं। वे चाहतीं तो उस दौरान बड़ी आसानी से फिल्मों या धारावाहिक में अभिनय कर सकती थीं, क्योंकि उनके पास न तो प्रतिभा की कमी थी न पहुँच की। परन्तु जैसा कि रीता जी कहती हैं अभिनय हमेशा उनके लिए शौक ही रहा। इसके जरिये नाम या पैसा कमाने की चाहत कभी नहीं रही। अपने परिवार के घरेलू माहौल में ही वे पूरी तरह संतुष्ट थीं। वर्ष 2002 में स्वयं रीता जी ने भी स्वेच्छा सेवानिवृत्ति ले ली। वर्ष 2018 से रीता जी सपिरवार भोपाल में ही निवास कर रही हैं। शिलादित्य लेखन और चित्रकला में रूचि रखते हैं। उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे संयुक्त अरब अमीरात के फुजैरा में प्रोफ़ेसर हैं, जबकि तथागत मुंबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।  

रीताजी कई सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई है। विश्व के सबसे बड़े सेवाभावी संगठन रोटरी इंटरनेशनल की महिला शाखा  ‘इनरव्हील क्लब की वे मंडलाध्यक्ष रहीं। इनरव्हील क्लब में अन्य प्रोजेक्ट्स के अलावा, रीता, ‘गरीब बच्चों के लिया कल्चरल अवेयरनेस’ नाम का एक प्रोजेक्ट चलाती हैं, जिसमें गरीब बच्चों को रंगकर्म के साथ साथ अन्य कलाओं से परिचय कराया जाता है एवं बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए पारितोषिक भी दिया जाता है, इसके अलावा रंगकर्म प्रशिक्षण की अनेक कार्यशालाएं वे विभिन्न स्कूलों में आयोजित कराती रहती हैं। इसके अलावा  ‘ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस, ‘फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन’ एवं ‘वनिता समाज’ जैसी तमाम संस्थाओं में रीता जी सक्रिय और निस्वार्थ सेवाएं दे रही हैं। वे कई शासकीय, अर्धशासकीय एवं निजी संस्थानों की कला-स्कॉलरशिप एवं नाट्य विद्यार्थी चयन समिति में भी हैं, अनेक कार्यक्रमों में वे निर्णायक के रूप में भी जाती रहती हैं।

सुश्री रीता वर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद (एन.सी,ई आर.टी.) में  रहते हुए शिक्षकों के लिए एक पुस्तक लिखी, जिसका विषय था – “स्कूलों में बच्चों को नाटक करना कैसे सिखाया जाए।“ यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई और आज भी शिक्षकों के बीच काफी लोकप्रिय है। देश के कई प्रसिद्ध रंगकर्मियों और निर्देशकों के साथ वे काम कर चुकी हैं। नए दौर के निर्देशकों जैसे – निधि श्रीवास्तव, बालेन्दु सिंह, बिशना चौहान आदि के साथ भी उन्होंने काम किया है। कुछ वर्ष पूर्व रीता जी का एक ‘एकल’ नाटक प्रस्तुत हुआ था – ‘लाइफ ऑन फ़ोन’। ये नाटक एक दुखी माँ की कहानी है, जो मुंबई की एक सच्ची घटना पर आधारित है। इसे दर्शकों, रंगकर्मियों, समाचार पत्रों और आलोचकों ने बेहद पसंद किया। एक प्रकाशक ने तो इससे प्रभावित हो कर इस नाट्य प्रस्तुति को इसी नाम से पुस्तक रूप में भी प्रकाशित किया।

पुरस्कारों व सम्मानों के प्रति स्वभावतः उदासीन रही रीता जी उनकी चर्चा से भी गुरेज करती हैं। तथापि विविध स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्हें अनेक संस्थाओं ने उनके नाट्य कला में योगदान के लिए कई बार सम्मानित किया है. जैसे ‘गुलबर्धन सम्मान’, नागरिक सम्मान’,’अहिन्दी भाषी सम्मान’ एवं ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी सम्मान’ इत्यादि।  इसके अलावा उन्होंने कई वर्षो तक एक होटल का भी संचालन किया। उन्होंने उसके एक हिस्से को कला दीर्घा के रूप  में परिवर्तित कर दिया था जिसकी कलात्मक साज-सज्जा शिलादित्य ने ही की थी। वर्तमान में यह होटल लम्बे समय के लिए लीज़ पर दे दिया गया है।

सन्दर्भ स्रोत : स्व संप्रेषित तथा रीता जी से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

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