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रानी कमलापति

रानी कमलापति

अतीतगाथा
मध्यप्रदेश के इतिहास में महिलाएं

रानी कमलापति

एक समय गोंड राजवंश का साम्राज्य मध्यप्रदेश में काफ़ी दूर-दूर तक फैला हुआ था। सन 1484 में गोंड सम्राट संग्राम शाह हुए जिन्होंने 53 साल तक राज्य किया। जब दलपति शाह राजा हुए, तब भी भोपाल गोंड राज्य में था। आगे चलकर भोपाल सहित 54 किलों की स्वामिनी रानी दुर्गावती हुईं।1564 में उनके बलिदान के बाद भोपाल, रायसेन सहित 10 किले बादशाह अकबर ने ले लिए, लेकिन उसने भोपाल के किले समेत पूरा इलाका गोंड राजा आलम सिंह को दे दिया। तब से गोंड शासक भोपाल के राजा रहे।

सन 1705 में गोंड राजा निज़ाम शाह ने विवाह के बाद भोपाल रानी कमलापति को दिया। निज़ाम शाह गिन्नौरगढ़ के राजा सूराज सिंह शाह (सल्लाम) का बेटा था। 16वीं सदी में यह राज्य भोपाल से तक़रीबन 60 किमी दूर 750 गांवों को मिलाकर बनाया गया था। वह एक बहादुर और हर काम में निपुण युवक था। गिन्नौरगढ़ से कुछ ही दूर सलकनपुर रियासत थी, जिसके राजा कृपाल सिंह सरौतिया थे। उनके शासन काल में वहां की प्रजा खुश और संपन्न थी। उनके यहां एक कन्या का जन्म हुआ। उसकी सुंदरता को देखते हुए उसका नाम कमलापति रखा गया। वह बचपन से ही बुद्धिमान और साहसी थीं। शिक्षा, घुड़सवारी, मल्ल युद्ध और तीर कमान चलाने में उन्हें महारत हासिल थी। अनेक कलाओं में पारंगत राजकुमारी अपनी सेनापति की मुखिया भी रही। वह पिता के सैन्य बल और महिला साथी दल के साथ युद्ध में शत्रुओं से लोहा लेती थी।

कमलापति के सौंदर्य की चर्चा चारों ओर थी। उपयुक्त समय पर उसका विवाह निज़ाम शाह के साथ कर दिया गया। कहा जाता है कि वह निज़ाम शाह की सात पत्नियों में से एक थी। निजाम शाह ने रानी कमलापति के लिए वर्ष 1722 में भोपाल में सात मंजिला महल का निर्माण करवाया, जो लखौरी ईंट और मिट्टी से बनवाया गया था। यह महल अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। रानी कमलापति का वैवाहिक जीवन सुखमय था। उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम नवल शाह था। लेकिन निज़ाम शाह का भतीजा आलम शाह अपने चाचा की संपत्ति हड़पना चाहता था और कमलापति को अपना बनाना चाहता था।

आलम शाह ने रानी कमलापति को पाने के लिए एक दिन अपने चाचा निज़ाम शाह के खाने में जहर मिला दिया जिससे निज़ाम शाह का निधन हो गया। निज़ाम शाह की मौत के बाद आलम शाह ने राज्य पर कब्जा कर लिया। पति की मौत के बाद रानी कमलापति अपने बेटे नवल शाह के साथ भोपाल के महल में रहने लगी। लेकिन उसके मन में अपने पति की हत्या का बदला लेने की भावना बलवती थी। इसलिए उसने दोस्त मोहम्मद ख़ान से मदद मांगी, जो उस वक़्त जगदीशपुर (अब इस्लाम नगर) का शासक था। इस काम के लिए रानी ने ख़ान को एक लाख अशर्फियां देने का वादा किया।

दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला किया और आलम शाह का ख़ात्मा कर दिया। इसके बाद रानी दोस्त मोहम्मद ख़ान को सिर्फ़ 50 हज़ार अशर्फ़ियाँ दे पाई थीं और बाक़ी बचे पैसों के बदले उन्होंने भोपाल का एक हिस्सा दे दिया। वरिष्ठ इतिहासकार शंभू दयाल गुरु के अनुसार “जब तक रानी कमलापति जिंदा रहीं तब तक दोस्त मोहम्मद ख़ान ने कभी भी उन पर हमला नहीं किया। दोस्त मोहम्मद ख़ान के साथ उनके संबंध अच्छे रहे। उसने भोपाल पर क़ब्ज़ा उनकी मौत के बाद ही किया।” एक अन्य इतिहासकार रिज़वान अंसारी के अनुसार रानी कमलापति, दोस्त मोहम्मद ख़ान को अपना भाई मानती थीं। उन्होंने बताया, “दोस्त मोहम्मद ख़ान ने भी रानी कमलापति को बहन मानते हुए उनकी मदद की थी और उनके भतीजे से उन्हें बचाया था।”

एक दूसरी कहानी के मुताबिक बाड़ी (रायसेन) का राजा चैनसिंह गिन्नौरगढ़ को हथियाना चाहता था और रानी कमलापति पर भी उसकी बुरी नज़र थी, इसलिए उसने निज़ाम शाह को खाने में ज़हर देकर मार डाला। यह भी कहा जाता है कि गिन्नौरगढ़ पर कब्जे के बाद दोस्त मोहम्मद खान पूरे भोपाल पर भी अपना कब्ज़ा जमाना चाहता था और कमलापति को अपने हरम में शामिल करना चाहता था। उसका नापाक इरादा जानकर कमलापति का 14 वर्षीय बेटा नवल शाह अपने सैनिकों के साथ उससे युद्ध करने चल पड़ा। इस घमासान युद्ध में मोहम्मद खान ने नवल शाह को मार दिया। इस स्थान पर इतना खून बहा कि यहां की जमीन लाल हो गई और इस कारण इसे लाल घाटी कहा जाने लगा। इस युद्ध में 2 लड़के बच गए थे, जो किसी तरह अपनी जान बचाते हुए मनुआभान की पहाड़ी पर पहुंच गए। उन्होंने वहां काला धुआं कर रानी कमलापति को संकेत दिया कि वे युद्ध हार गए हैं और आपकी जान को ख़तरा है।

विपदा आते देख रानी कमलापति ने बड़े तालाब बांध का संकरा रास्ता खुलवाया। इससे बड़े तालाब का पानी रिसकर दूसरी तरफ आने लगा। जिसे आज छोटा तालाब के रूप में जाना जाता है। रानी कमलापति ने अपनी सारी दौलत और जेवरात इत्यादि इस तालाब में डालकर स्वयं जलसमाधि ले ली। दोस्त मोहम्मद खान जब अपनी सेना को साथ लेकर लाल घाटी से इस महल तक पहुंचा, तब तक सब कुछ खत्म हो गया था। इतिहास के स्रोतों के अनुसार रानी कमलापति ने वर्ष 1723 में अपनी जीवन लीला खत्म की थी। उसके बाद ही भोपाल में नवाबों का दौर शुरू हुआ। हालांकि भोपाल में हेरिटेज वॉक आयोजित करने वाले सिकंदर मलिक का कहना है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि दोस्त मोहम्मद ख़ान की वजह से रानी कमलापति ने अपना जीवन समाप्त किया। वे कहते हैं कि “जिस छोटे तालाब में रानी के जल समाधि लेने की बात कही जा रही है, वो उस वक़्त मौजूद ही नहीं था।”

बहरहाल, रानी कमलापति भोपाल की अंतिम गोंड शासक साबित हुई। छोटे तालाब के किनारे उसका महल आज भी मौजूद है। सात मंजिला इस महल की पांच मंज़िलें पानी में डूबी हुई हैं। रानी का अपना कमरा भी पानी के भीतर है। वर्ष 1989 से भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस महल को अपने संरक्षण में ले लिया। इसके साथ एक सुन्दर बागीचा भी है. जिसे कमला पार्क के नाम से जाना जाता है। हाल ही में छोटे तालाब पर एक आर्च ब्रिज बनाया गया है, जिसका नामकरण कमलापति के नाम पर किया गया है। इसी आर्च ब्रिज के पास फरवरी 2020 में भोपाल नगर निगम ने रानी कमलापति की विभिन्न धातुओं से बनी 32 फुट ऊंची एक प्रतिमा स्थापित करवाई है। जबकि 15 नवंबर 2021 को भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति के नाम पर रखा गया है।

सन्दर्भ स्रोत : बीबीसी डॉट कॉम (हिन्दी), फ़ेसबुक तथा अन्य वेबसाइट्स

 

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