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रशीदा बी एवं चम्पा देवी शुक्ल

रशीदा बी एवं चम्पा देवी शुक्ल

छाया: गोल्डमैनप्राइज डॉट ओआरजी

प्रेरणा पुंज
विशिष्ट महिलाएं

रशीदा बी एवं चम्पा देवी शुक्ल

भोपाल गैस त्रासदी की लड़ाई को दुनिया के कोने-कोने तक ले जाने वाली रशीदा बी की कहानी दीये और तूफ़ान की कहानी के समान है। रशीदा बी का जन्म अजीज़ा बी एवं अब्दुल गफूर के घर सबसे बड़ी बेटी के तौर पर 7 फरवरी 1956 को होशंगाबाद जिले के सोहागपुर में हुआ था। सात भाई – बहनों में सबसे बड़ी रशीदा रवायत के मुताबिक़ 7 वर्ष की आयु से ही परदे में रहने की आदी थीं। तेरह वर्ष की उम्र में अब्दुल वाहिद से उनकी शादी हो गई और वे भोपाल आ गईं, उनके पति दर्जी का काम करते थे और रशीदा घर में रहकर बीड़ी बनाती थीं। उनकी ज़िंदगी एक आम ढर्रे पर चल पड़ी थी।

3 दिसंबर 1984 की सुबह, माहौल में एक तीखी गंध फैली हुई थी। लोगों को अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी और वे ताज़ी हवा के लिए घर से बाहर निकलने लगे। धीरे-धीरे भगदड़ सी मच गई, तब तक किसी को पता नहीं था कि आखिर हुआ क्या है। रशीदा के परिवार के पुरुष सदस्य भी घर से बाहर निकल चुके थे, घर में औरतें बेसुध हो चुकी थीं। एक बड़ी सी गाड़ी आई और उन्हें जहांगीराबाद अस्पताल ले जाया गया। वहाँ से लौटने पर पता चला कि ससुर, जेठ और उनके बच्चे घर में नहीं हैं। वे उन्हें ढूंढने पहली बार घर से बाहर निकलीं। शाम को सरकारी घोषणा के बाद सभी को पता चला कि यूनियन कार्बाइड कारख़ाने से गैस रिसी है। बाद में यहाँ- वहाँ पड़े परिवार के सदस्य तो मिल तो गए, लेकिन समय के साथ घर-घर में मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। बस्तियां खाली होने लगीं तो रशीदा का परिवार सोहागपुर आ गया। लगभग छह महीने बाद रोज़ी – रोटी की तलाश में फ़िर भोपाल आकर बस गया। इस हादसे में तत्काल रशीदा बी के परिवार में किसी को कुछ नहीं हुआ लेकिन समय के साथ परिवार के सभी सदस्य धीरे-धीरे काल के गाल में समाते चले गए। हादसे से पूर्व उनकी सिर्फ एक औलाद हुई थी जो कुछ ही महीनों में चल बसा। हादसे के बाद रशीदा बी के पति बीमार रहने लगे थे, उन्हें सांस की बीमारी हो गई थी, साथ ही स्नायु तंत्र प्रभावित होने के कारण उनके दोनों पैर भी बेकार हो गए थे। लम्बा अरसा चारपाई पर पड़े हुए बिताने के बाद 2004 में उनकी मौत हो गई। इस बीच विकिरण के प्रभाव से अलग-अलग किस्म के कैंसरों से पीड़ित होकर जेठ-जेठानी और उनकी तीनों लड़कियों के साथ रशीदा बी के मामा और एक अन्य रिश्तेदार इस दुनिया से चले गए। इस तरह उन्होंने परिवार के सात सदस्यों को गैस हादसे में खो दिया।

रशीदा बी के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी चम्पा देवी शुक्ल का जन्म 16 मई 1952 को जबलपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम गुलाब चंद उपाध्याय और  माँ का नाम सुशीला देवी उपाध्याय है। उपाध्याय जी एक निजी कंपनी में कार्यरत थे। आठ भाई बहनों में तीसरे स्थान पर जन्मी चम्पा की मैट्रिक तक की शिक्षा जबलपुर में ही हुई। वर्ष 1965 में उनका विवाह बद्री प्रसाद शुक्ल से हो गया और वे उनके साथ भोपाल आ गईं। जीवन एक सामान्य गति से व्यतीत हो रहा था। वे तीन बेटे और दो बेटियों की माँ बन चुकी थीं। शुक्ल परिवार यूनियन कार्बाइड कारखाने के निकट स्थित छोला नाके की बस्ती में निवास करता था। 2 दिसंबर, रात के साढ़े बारह बजे किसी के चीखने की आवाज़ आई। वह कारखाने के पास कमरा लेकर रहने वाला एक छात्र था जो लगातार चीखे जा रहा था – गैस रिस रही है, भागो! सभी मारे जाएंगे।

शुक्ल जी आनन-फानन में पत्नी और बच्चों को लेकर बस स्टैंड की तरफ भागे। सड़कों पर दौड़ते – भागते और हाँफते लोगों का सैलाब उमड़ चुका था।  बस स्टैंड तक किसी तरह पहुँच कर एक पत्थरों के ढेर के पास रूककर यह परिवार सुस्ताने लगा तभी बद्री प्रसाद शुक्ल का पैर फिसला, वे छाती के बल गिरे और पत्थरों से घायल हो गए। उस वक़्त सबसे बड़े बेटे की उम्र थी दस वर्ष। दो बेटे भीड़ के साथ आगे बढ़ गए और बिटिया और एक बेटे के साथ चम्पा जी पति के पास ही ठिठक गईं। तब तक दोनों बच्चों के मुंह से झाग निकलना शुरू हो गया। पास ही एक नल था जहां के ठंडे पानी से कुछ देर के लिए वे होश में आते फिर बेसुध हो जाते। पति ने कहा मुझे यहीं छोड़ और तुम लोग जाओ, मगर चम्पाजी वहां से हिली भी नहीं। 

उसी समय एक मुसलमान बुजुर्ग – जो अपने परिवार को किसी सुरक्षित ठिकाने पर छोड़कर आए थे, वहां पहुंचे। उन्होंने चारों को अपनी गाड़ी में बिठाकर हमीदिया अस्पताल छोड़ दिया। वहाँ की स्थिति और भी हौलनाक थी। चम्पा जी ने देखा कि ज़िंदा मगर बेहोश मरीजों को भी उठा – उठाकर शवों के बीच फेंका जा रहा था। इस परिवार ने सोचा कि यदि हम यहीं अचेत हो गए तो हमें भी शवों के साथ अंतिम संस्कार के लिए भेज दिया जाएगा। वे लोग वापस घर आकर अपने बिस्तर पर निढाल हो गए। तब तक शाम होने लगी थी, फिर एक बड़ी सी गाड़ी आई, जिसमें लोगों को घरों से उठाकर भरा जा रहा था। चम्पा जी को जब होश आया तो खुद फिर उसी अस्पताल में पाया। उनका परिवार फिर वहाँ से भागकर वापस अपने घर पहुँच गया क्योंकि उन्होंने देखा कि डॉक्टरों को पता ही नहीं था कि मरीजों को इलाज क्या दिया जाए। 

ज़हरीली गैस का असर समय के साथ साथ गहराता चला गया। हादसे के वक़्त पूरी ताकत लगाकर दौड़ने वाला चम्पाजी के बड़े बेटे के दिल में छेद हो गया। धीरे धीरे वह अवसाद ग्रस्त रहने लगा और एक दिन सल्फास खाकर उसने अपनी जान दे दी। दूसरे बेटे के जिस्म में छाले पड़ गए थे। लम्बे समय तक बीमार रहने के बाद वह भी चल बसा। इसी तरफ तीसरे बेटे ने भी जल्द ही साथ छोड़ दिया। उनके पति का इलाज ज़रूर हुआ लेकिन ज़हरीली गैस के कारण उनके ब्लैडर में कैंसर हो गया। उन्हें लगातार मूत्र स्राव की समस्या होने लगी। बारह साल इलाज के बाद उन्होंने भी दम तोड़ दिया। बेटी विकलांग हो गई, बाद में उसकी शादी भी हुई लेकिन ससुराल वालों ने उसे साथ नहीं रखा। 

सरकार ने गैस पीड़ित महिलाओं को रोज़गार देने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत की थी जिसमें प्रति दिन पांच रूपये मिलते थे। उस समय महीने में डेढ़ सौ रूपये की आमदनी से कई परिवारों को राहत मिली क्योंकि घर में चूल्हा जलने लगा था। यह प्रशिक्षण तीन महीने की अवधि के लिए था। पहले सत्र में सौ महिलाओं का नामांकन किया गया जिसमें रशीदा बी और चम्पा देवी शुक्ल भी थीं। वहाँ मौजूद सभी महिलाओं ने किसी न किसी को खोया था और सभी के सामने कार्बाइड की गैस से उपजी बीमारियों के साथ साथ आजीविका का संकट मुंह बाए खड़ा था। तीन महीने के बाद केंद्र संचालक ने कहा कि कोर्स पूरा हो गया अब नई बैच की महिलाएं प्रशिक्षण लेंगी।

रशीदा बी सहित सौ महिलाएं अचानक हुए इस आदेश से सकते में आ गईं क्योंकि अब तक कोई भी हुनर इस तरह सिखाया नहीं गया था जिसकी मदद से वे स्वतंत्र रूप से रोज़गार कर सकें। केंद्र संचालक ने कह दिया कि आप लोगों को कलेक्टर से बात करनी होगी। रशीदा बी कहती हैं -उस समय मुझे आदमियों से डर लगता था, क्योंकि मैं पर्दे से बाहर कभी निकली ही नहीं। फिर भी सौ महिलाओं में से चम्पा देवी शुक्ल को हिन्दू और रशीदा बी को मुस्लिम महिलाओं की प्रतिनिधि के तौर पर कलेक्टर से बात करने के लिए चुना गया। लेकिन तत्कालीन कलेक्टर ने भी कह दिया कि कल से आने की ज़रूरत नहीं यही। बात करनी है तो मुख्यमंत्री के पास जाओ।  

“मुख्यमंत्री क्या होते हैं” – उन्होंने पूछा तो किसी ने बताया कि मुख्यमंत्री सबसे बड़े होते हैं और वही सभी ज़रूरी फ़ैसले करते हैं। अगले दिन सुबह सात बजे चम्पा देवी शुक्ल और रशीदा बी मुख्यमंत्री का बँगला ढूँढने निकल पडीं। लगभग तीन बजे वहाँ पहुंचने के बाद संतरी ने बताया कि मुख्यमंत्री सुबह के नौ बजे मिलते हैं, इस समय मुलाकात नहीं हो सकती। अगले दिन वे जल्दी पहुँच गईं।   मुलाक़ात के बाद उन्होंने दिलासा देते हुए भरोसा दिलाया कि उन्हें ‘पीस वर्क’ –   से जोड़ दिया जाएगा जिसमें कागज़ की फ़ाइल आदि बनाई जाती हैं। वे प्रसन्नतापूर्वक लौट आई और समूह को यह जानकारी दी। 

लेकिन एक महीने तक प्रशिक्षण स्थल पर बैठने के बाद सिर्फ एक दिन काम मिला और जब वेतन के छह रुपये मिले तो सब्र का बांध टूट गया। हक़ के लिए लड़ाई की ज़मीन उसी समय तैयार हो गई। वेतन के पांच -दस रुपये लेने से इनकार करते हुए वे चार महीने तक कार्य स्थल पर जाती रहीं। लेकिन  जब सुनवाई नहीं हुई तो वर्ष 1987 में भोपाल के वल्लभ भवन में रशीदा बी और चम्पा देवी शुक्ला के अगुआई में सौ महिलाओं के जत्थे ने सत्ताईस दिनों का धरना दिया। तब तक मुख्यमंत्री के पद पर अर्जुन सिंह आसीन हो चुके थे। खरसिया विधानसभा क्षेत्र ( अब छत्तीसगढ़ में ) की सीट खाली हुई थी और  वहाँ चुनाव की तैयारी चल रही थी। मौके की नज़ाक़त देखते हुए महिलाओं के समूह ने खरसिया के मतदाताओं के समक्ष अपनी बात रखने का मन बना लिया।  

यह जानकारी राजनीति के ऊँचे माले तक भी पहुंची।  महिलाओं का गुस्सा ठंडा करने की गरज से उन्हें सरकारी छापाख़ाने में नौकरी का भरोसा दिया गया, जिसके बाद धरना ख़त्म कर दिया गया। लेकिन यह भरोसा भी नए किस्म का छल ही सिद्ध हुआ। समूह की महिलाएं इस मुगालते में थीं कि जिस प्रकार अन्य सरकारी कर्मचारियों को वेतन एवं सुविधाएँ मिलती हैं, उसी प्रकार उन्हें भी मिलेंगी। परन्तु वेतन के तौर पर केवल 429 रुपये उनके हाथ में आए। मजबूरन महिलाओं ने 1987 में गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ का गठन किया और  एक बार फिर रशीदा बी और चम्पा देवी शुक्ल की अगुआई में उन्होंने केन्द्र सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने की ठानी। 

वह 1989 का साल था जब सौ महिलाओं का जत्था पैदल ही देश के प्रधानमंत्री से मिलने चल पड़ा। इस दल में 25 बच्चे भी थे और किसी के पास पैसे नहीं थे। गनीमत थी कि रास्ते में मिलने वाले सहृदय लोगों के सहयोग से खाने-पीने का इंतज़ाम होता रहा। चम्बल के बीहड़ में ऐसा ही सहृदय एक डकैत भी था, जिसने इस दल को भोजन करवाया और चार सौ रूपये दिए। 33 दिन के सफ़र के बाद महिलाएं दिल्ली पहुंची और उन्होंने इण्डिया गेट पर डेरा डाल दिया। वहाँ उनकी मुलाक़ात भोपाल के ही कांग्रेसी नेता सुरेश पचौरी से हुई जिन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी पेरिस जा रहे हैं इसलिए मुलाक़ात नहीं हो सकती। 

उसी दौरान चौधरी देवीलाल  ने महिलाओं को दो हज़ार रुपए यह सोचकर दिए कि शायद वे उस रकम से बहल जाएंगी। परन्तु वे सभी महिलाएं दस दिन तक वहीं डटी रहीं। एक रात लगभग दो बजे छिपते – छिपाते वे प्रधानमंत्री के बंगले तक पहुँच गईं जहां यह पता लगा कि उसी रोज राजीव गांधी पेरिस के लिए निकले थे। महिलाओं की ज़िद देखकर वोरा जी –  उन महिलाओं तक पहुंचे और एक बार फिर भरोसा दिलाया कि सभी महिलाओं की नौकरी स्थायी  कर दी जाएगी, गैस पीड़ितों को इलाज मिलेगा, मैं भोपाल आकर आप लोगों से मिलता हूँ। इस आश्वासन पर भरोसा करते हुए वे भोपाल लौट आईं। 

रशीदा बी के मुताबिक वोरा जी उनके पास कभी नहीं आए। वर्ष 1990 में एक वकील की व्यवस्था कर महिलाओं ने राज्य सरकार के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज करवा दिया। सात साल तक चली सुनवाई के बाद फैसला इनके हक़ में आया। मौखिक तौर पर फ़ैसला यही था कि सभी को समान कार्य का एक समान वेतन और वेतनांतर दिया जाए लेकिन अदालती आदेश की प्रति वकील को नहीं  मिली। बाद में सम्बंधित न्यायपीठ ने कहा कि आपने गलत कोर्ट में केस लगाया है, आपको हाई कोर्ट जाना चाहिए।

अब हाईकोर्ट में मामला दर्ज हुआ तो एक साल बाद वही उत्तर मिला कि आप गलत कोर्ट में हैं, आपको श्रम न्यायालय में जाना चाहिए। लेबर कोर्ट ने फिर  वही फ़ैसला दिया जिसे शिद्दत से दबा दिया गया था कि समान कार्य हेतु समान वेतन और एरियर मिले। यह फ़ैसला वर्ष 2002 में आया जिसके ख़िलाफ़  शासकीय मुद्रणालय ने औद्योगिक न्यायालय में अपील कर दी लेकिन वह मुकदमा हार गया। औद्योगिक न्यायालय ने भी पिछले फ़ैसले को सही ठहरा दिया। मुद्रणालय ने इसके ख़िलाफ़ फिर हाईकोर्ट में अपील की, तीन साल बाद हाईकोर्ट ने भी पिछले फ़ैसले को सही ठहराया। अब विभाग –   ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने 15 हज़ार 3 सौ रुपए वेतन निर्धारित करते हुए दो-दो लाख रुपए सभी को एरियर के तौर पर देने का आदेश दिया। महिलाएं इस निर्णय से संतुष्ट नहीं थी क्योंकि उनकी मांग वर्ष 2002 से एरियर और समान कार्य के लिए समान वेतन की थी। 

यह लड़ाई मात्र समान वेतन और आजीविका की ही नहीं थी। महिलाएं इस बात से भी नाराज़ थीं कि 1990 में सरकार ने 470 मिलियन डॉलर मुआवजे की राशि पर समझौता कर लिया था। यह रकम इतनी मामूली थी कि एक पीड़ित के हिस्से में पांच सौ रुपए भी नहीं आते। दूसरी तरफ यूनियन कार्बाइड के मालिक एंडरसन को दोष मुक्त कर दिया गया था। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ वर्ष 2002 में रशीदा बी और चम्पा देवी के अगुआई में अनशन किया गया। अगले साल उन्होंने अन्न के साथ जल भी त्याग दिया। इसके बाद से समान वेतन, मुआवजे की राशि के साथ-साथ आज तक विकलांग जन्म ले रहे बच्चों के इलाज के लिए अपने संघर्ष को रशीदा बी और चम्पा देवी दुनिया के कोने-कोने तक लेकर गईं। 

साल 2001 में पर्यावरण के लिए कार्य कर रही अमरीकी संस्था ‘ग्रीन पीस’ जो यूनियन कार्बाइड कारखाने के रासायनिक कचरे के निपटान के लिए कार्य कर रही थी, ने जापान में आयोजित एक कांफ्रेंस में रशीदा बी को आमंत्रित किया। दरअसल जापान के मिनमाटा क्षेत्र में औद्योगिक रसायनयुक्त पानी समुद्र में फैल रहा था, जिससे वहां के पानी में पारे की मात्रा बहुत बढ़ गई थी। वहां मछुआरे बीमार रहने लगे थे, साथ ही शिशु अपाहिज पैदा होने लगे थे।  इस मुद्दे पर काम करने वाले संगठनों के सम्मेलन में रशीदा बी झाडू लेकर गईं थीं। लोगों के पूछने पर उन्होंने बताया कि इससे भारतीय महिलाएं अपने घर की सफाई करती हैं और ज़रुरत पड़ने पर पिटाई भी कर सकती हैं, ताकि दुनिया में फिर भोपाल या मिनमाटा जैसी घटनाएं न हों। इस यात्रा में रशीदा बी अकेली ही गई थीं। 

वर्ष 2002 में वे मुंबई में स्थिति डाव कंपनी – जिसने यूनियन कार्बाइड का अधिग्रहण कर लिया था, के दफ्तर में लगभग तीन सौ गैस पीड़ित महिलाओं को लेकर पहुंची। कंपनी के सीईओ को झाड़ू भेंट करते हुए उनकी ईमारत को लाल रंग से महिलाओं ने रंग दिया था। रशीदा बी के अनुसार वह लाल रंग हम भोपालवासियों के खून का और उनके द्वारा की गई हत्याओं का प्रतीक था। इसी साल ग्रीन पीस के सौजन्य से चम्पा देवी एक सम्मेलन में स्विट्ज़रलैण्ड  गईं और गैस पीड़ितों की व्यथा कथा उन्होंने सबके सामने रखी। 

वर्ष 2002 के अगस्त में जोहान्सबर्ग में आयोजित पृथ्वी सम्मलेन ( अर्थ सम्मिट ) में भी झाड़ू लेकर पहुंची। इस आयोजन में दुनिया के सभी राष्ट्र प्रमुखों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव ! कोफ़ी अन्नान भी मौजूद थे। वहां दुनिया के बड़े बड़े उद्योगों के प्रतिनिधियों को देखकर रशीदा बी ने मुआवजे की मांग रखते हुए यह सवाल भी उठाया था कि जिनकी वजह से पर्यावरण की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है, उनके साथ हमें क्यों आमंत्रित किया गया ? इस सम्मेलन से भोपाल गैस पीड़ितों की आवाज़ दुनिया भर में गूँज उठी। रशीदा बी ने डाव कंपनी के प्रतिनिधि को यहाँ भी झाडू भेंट की। इस यात्रा में रशीदा बी के साथ सतीनाथ सारंगी  थे। 

वर्ष 2003 में अमरीका में डाव कंपनी के शेयरधारकों की बैठक आयोजित की गई थी। संस्था ग्रीन पीस के सौजन्य से पुनः रशीदा बी, चम्पा देवी शुक्ल एवं सतीनाथ सारंगी अमेरिका पहुंचे और शेयरधारको के समक्ष गैस पीड़ितों की समस्या रखी। वे लगभग चालीस दिनों तक अमेरिका के विभिन्न राज्यों में स्थित विभिन्न शहरों में गईं और अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने न्यूयार्क में अनशन भी किया था। इसके बाद वे वर्ष 2004 में इटली के मिलानो शहर पहुंचीं  जहाँ पुनः कम्पनी के प्रतिनिधि के समक्ष अपनी मांगों को दोहराते हुए झाड़ू भेंट की। अब तक डाव कंपनी के प्रतिनिधिगण रशीदा बी और उनके झाड़ू –  दोनों से डरने लगे थे। 

19 अप्रैल 2004 को रशीदा बी और चम्पा देवी शुक्ल के संघर्ष को देखते हुए सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया में आयोजित समारोह में गोल्डमैन एनवायरमेंट पुरस्कार प्रदान किया गया।  पुरस्कार की राशि दो लाख डॉलर थी। उस मंच से ही दोनों महिलाओं ने यह ऐलान किया कि “पुरस्कार की राशि वे अपाहिज जन्म ले रहे बच्चों के इलाज, अपना घर-बार खो चुकीं महिलाओं के रोज़गार एवं पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाली ऐसी महिलाओं को पुरस्कृत करने में व्यय किया जाएगा, जो भले ही शिक्षित न हों परन्तु प्रकृति और जीवन का महत्त्व जानती हों। इस विचार को मूर्त देने के लिए वर्ष 2005 में चिंगारी न्यास की नींव रखी गयी, जिसके साथ  चिंगारी पुनर्वास केंद्र भी अस्तित्व में आया। 2007 में पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं को पुरस्कृत करने का सिलसिला शुरू भी हो गया।  गैस पीड़ित महिलाओं को रोज़गार उपलब्ध करवाने वाली योजना को यद्यपि अभी तक साकार नहीं किया जा सका है।  

रशीदा बी और चम्पा देवी शुक्ल दोनों का मुहीम आज भी जारी है। चिंगारी पुनर्वास केंद्र में वर्तमान में एक हज़ार मरीजों का इलाज चल रहा है।रासायनिक प्रभाव के कारण जन्मजात शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों से ग्रस्त मरीजों को अलग-अलग विशेषज्ञता वाले चिकित्सक इलाज कर रहे हैं।  इनमें दुखद पक्ष यह है कि ऐसे मरीजों की आमद का सिलसिला आज भी थमा नहीं है।    

उपलब्धियां

• वर्ष 2004 में गोल्डमैन अवार्ड

• वर्ष  2004 में  अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन द्वारा ऑक्यूपेशनल हेल्थ एंड सेफ्टी अवार्ड

• वर्ष 2008 में चिंगारी ट्रस्ट को कासा एशिया अवार्ड

 
सन्दर्भ स्रोत: रशीदा बी एवं चंपा देवी शुक्ला से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

 

© मीडियाटिक

 

 

प्रेरणा पुंज

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