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रजनी शिर्के

रजनी शिर्के

छाया: स्व संप्रेषित

सृजन क्षेत्र
चित्रकला एवं छायाकारी
प्रमुख चित्रकार

रजनी शिर्के

हस्तशिल्प के क्षेत्र में कढ़ाई या कशीदाकारी का एक अलग ही सम्मान रहा है। एक समय था जब पोषाक में की गई कढ़ाई से किसी व्यक्ति की हैसियत का पता चलता था। वास्तव में कशीदाकारी एक बारीक काम है जिसे साधना बहुत सहज भी नहीं है। लेकिन अगर किसी में जुनून हो तो किसी लक्ष्य को साधना नामुमकिन भी नहीं होता। कढ़ाई या कशीदाकारी के जुनून से लबरेज ऐसी ही एक कलाकार हैं रजनी शिर्के जो रंगों और कूची से नहीं, बल्कि सुई और धागों से चित्रकारी करती हैं। कढ़ाई की यह शैली अपने आप में अनोखी है, जिसमें काम करने वाले कलाकार देश में गिने चुने ही होंगे। ऐसे में रजनी जी की कला का महत्व और भी बढ़ जाता है।

रजनी जी का जन्म भोपाल में 19 दिसंबर 1971 को हुआ। उनके पिता श्री महादेव चोपड़े बीएचईएल में एग्ज़क्यूटिव इंजीनियर थे और माँ श्रीमती कोकिला चोपड़े सुशिक्षित और कुशल गृहणी होने के साथ-साथ सिलाई-कढ़ाई में भी सिद्धहस्त थीं। उन्होंने गृह विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की थी, इसलिए सिलाई-कढ़ाई के तकनीकी पक्ष को भी बखूबी समझती थीं, जिसमें उनकी स्वयं की रचनात्मकता उसे अलग स्वरूप प्रदान करती थीं। घर में गृहशोभा जैसी महिला पत्रिका के अलावा सोवियत नारी पत्रिका भी आती थी जिसमें कढ़ाई के सुन्दर-सुन्दर डिज़ाइन बताये जाते थे, कोकिला जी जिन पर काम करतीं। तीन भाइयों के बीच इकलौती बहन रजनी जी  का बचपन भोपाल में ही बीता। रमन हाई स्कूल से पांचवी करने के बाद राधाकृष्णन गर्ल्स हाई स्कूल, बरखेड़ा से उन्होंने बारहवीं किया।

वे अपनी माँ को सुई-धागे और फ्रेम की सहायता से कपड़ों पर बेलबूटे काढ़ते देखा करती थीं। वे अपने काम काज से फारिग होते ही आँगन या बगीचे में आस-पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर गपशप करते हुए तरह-तरह के टेबल क्लॉथ, चादरें, रुमाल या टीवी कवर जैसी चीजें बना लेतीं। कोकिला जी के हुनर से इन चीज़ों की शक्ल ही बदल जाया करती। यह देखकर मासूम रजनी का मन भी हाथ में सुई धागा लेने के के लिए मचल उठता, लेकिन उसे  सिवाय डांट के कुछ नहीं मिलता। फिर जैसे ही माँ अपना अधूरा काम छोड़कर कहीं जातीं, रजनी उनमें से कुछ धागे या एक दो सुई गायब कर देतीं।वे माँ की सहेलियों से भी वे अक्सर मनुहार करतीं –आंटी, मुझे भी धागा दे दो, कपड़े का टुकड़ा दे दो, मैं भी बनाऊँगी और वे सब हँसते हुए वे चीजें उन्हें दे दिया करती थीं। अब इन चीजों पर किसी की नज़र न पड़े यह ख्याल भी रखना था इसलिए एहतियात के तौर पर तकिये के गिलाफ के भीतर ये चीजें छुपाकर रखी जाने लगीं। बुनाई के लिए साइकिल के स्पोक्स सलाई का काम करते।

कपड़ों की धुलाई के समय जब तकिये के गिलाफ से जब ये चीज़ें अक्सर निकलने लगीं तो कोकिला जी को अहसास हुआ कि उनकी बेटी उनकी ही तरह इस काम से बेहद प्यार करती है। कोकिला जी पढ़ाई लिखाई में किसी किस्म की लापरवाही सहन नहीं करती थीं। लेकिन परिस्थिति बदल गई। गर्मी की छुट्टियों में वे उन्हें खुद सारा सामान लाकर देतीं और छुट्टियां ख़त्म होते ही सारी चीजें एक थैले में भरकर ऊँचे से छज्जे पर रख दी जातीं। कुछ वर्ष इसी तरह बीते। एक बार उनकी अल्पवयस्क मौसी उनके घर आईं। वे पड़ोस में रहने वाली एक दीदी से शेटल वर्क सीखतीं थीं, जब वे वापस गईं तो वह सामान छोड़ गईं जो रजनी जी के लिए किसी खजाने से कम नहीं होता। शेटल वर्क एक दुरूह बुनाई होती है जिसे बनाने के बाद उधेड़ा नहीं जा सकता। उसी समय भोपाल में गैस काण्ड हुआ था। स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए थे, इसलिए समय की कोई कमी नहीं थी। खुद से शुरू हुई कोशिश दसवीं कक्षा में जाकर समाप्त हुई। इस तरह रजनी जी ने उस विधा को सीखकर ही दम लिया। हालाँकि उस वक्त तक स्वयं रजनी जी को भी पता नहीं था कि आगे चलकर ‘सूई-धागा’ उनके जीवन का अहम हिस्सा बन जाने वाला है।

वर्ष 1989 में विज्ञान और गणित विषय से बारहवीं करने के बाद महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में रजनी का नामांकन स्नातक के लिए हुआ। कक्षाएं दोपहर तक ख़त्म हो जाती थीं, उसके बाद काफी समय बचता था। कशीदाकारी के प्रति लगन को देखते हुए कोकिला जी उन्हें लेकर मृगनयनी डिजाईन सेंटर लेकर गईं। वहाँ के प्रशिक्षक उन्हीं के समाज के एक अनुभवी व्यक्ति थे जिन्होंने यह सलाह दी कि अपनी लड़की को पाक कला सिखाओ, ये कढ़ाई का काम सिखाकर क्या होगा। दरअसल, महाराष्ट्रियन समाज में लड़कियों के लिए पाक कला अनिवार्य मानी जाती है और प्रशिक्षक महोदय की भी यही मान्यता थी। मजबूरन, माँ-बेटी को खाली हाथ ही लौटना पड़ा। दो महीने बाद रजनी जी फिर वहाँ गईं, इस बार वे अकेली थीं। उन्होंने अपना उपनाम बताए बगैर बात की और अगले दिन से ही वहाँ सीखने की मंजूरी मिल गई। प्रशिक्षक तीन महीने बाद सेवानिवृत्त होने वाले थे, रजनी जी के काम की सफाई देखते हुए वे भी जी जान से जुटे थे। इस तरह बचपन से संजोए सपने को पूरा करने का मौका उन्हें मिला।

यह सीखना भी महज समय व्यतीत करना भर नहीं था,रजनी जी वास्तव में कड़ी मेहनत कर रही थीं। वे बताती हैं कि एक बार उन्होंने एक पत्ती बनाई जिसे देखकर उस्ताद ने कह दिया कि ये अच्छे नहीं बने हैं। फिर से बनाओ। उन्होंने इस तरह सात पत्तियां बनवाईं,  जो सातवीं पत्ती उन्हें पसंद आई वह बिलकुल वैसी ही थी जैसी उन्होंने पहली बनाई थीं, लेकिन इस प्रयास में उन्होंने सात अलग-अलग तरह की पत्तियों को उकेरना सीख लिया। मृगनयनी में सीखते हुए ही रजनी ने एक बार एक लैंडस्केप बनाया जिसे बहुत ही सलीके से प्रकाश व्यवस्था के साथ अपनी बैठक में लगाया, जिसकी हर किसी ने सराहना की। यह सराहना रजनी के लिए कई अर्थों में महत्वपूर्ण थीं, वे स्वभावतः अपने काम के बारे में बहुत ही कम बोलती थीं और आस-पास के लोग समझ ही नहीं पाते थे कि वे क्या कर रही हैं। यह वह दौर था जब कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही लड़कियों की शादी हो जाया करती थी। आस-पड़ोस में तरह-तरह की बातें होतीं, लेकिन जब उनके काम को लोगों ने देखा फिर वह सिलसिला भी अपने आप थम सा गया। साथ ही परिवार के सभी सदस्यों को भी गर्व अनुभव करता देख मन ही मन उन्हें सुकून सा मिलता था।

एक बार उनके भाई ने उन्हें एक पेंटिंग दिखाई और पूछा कि क्या तुम इसे बना सकती हो? पहली नज़र में देखने पर नामुमकिन सा ही लगा लेकिन उन्होंने कोशिश करने का मन बनाया। जब वह बनकर तैयार हुई तो एक अद्भुत सी कलाकृति सबके सामने थी। इसके बाद दो-तीन और पेंटिंग्स उन्होंने बनाईं। उसी समय राज्य स्तरीय हस्तशिल्प पुरस्कार के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की गईं। इस प्रतियोगिता में रजनी जी को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। लगातार तीन वर्षो तक उन्होंने हिस्सा लिया जिसमे पहले दो साल तृतीय पुरस्कार और तीसरे साल प्रथम पुरस्कार से उन्हें नवाज़ा गया। यह सिलसिला चल ही रहा था, कि वर्ष 1995 में स्नातकोत्तर होने के बाद यवतमाळ के सावित्री ज्योति राव समाज कार्य महाविद्यालय में व्याख्याता श्री अविनाश शिर्के से उनका विवाह हो गया। खुशकिस्मती से उनकी सास भी खुद सीने-पिरोने में माहिर थीं, इसलिए उन्होंने बहू के कशीदाकारी के शौक पर ऐतराज़ नहीं किया।

कुछ समय बाद अविनाश जी के कॉलेज में गणित के व्याख्याता का पद रिक्त हुआ। अविनाश जी से उनके एक सहकर्मी ने कहा कि क्यों न रजनी जी उस जगह आ जाएं। इस सुझाव को अविनाश जी ने सिरे से ख़ारिज कर दिया, जिससे रजनी जी को बड़ा दुख हुआ। पूछने पर अविनाश जी ने कहा कि नौकरी और घर दोनों सँभालने के चक्कर में जिस कला को इतनी मेहनत और लगन से सीखा है वह पीछे छूट जाएगी, इसलिए उन्हें अपने शौक पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। यह बात उन्हें भी ठीक लगी। अविनाश जी के कॉलेज में आसपास के निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियां पढ़ने आया करती थीं, रजनी ने उन लड़कियों से बात की और उन्हें घर पर सिखाने लगीं। इसकी एवज में लड़कियों को कुछ मेहनताना दिया जाता और उनकी कलाकृतियां प्रदर्शनी में रखी जातीं। कुछ सालों तक तो यह सिलसिला चला लेकिन जल्द ही रजनी जी को महसूस हुआ कि हर किसी में उनके जैसा जुनून नहीं होता। इस तरह सीखने-सिखाने का सिलसिला तो थम गया लेकिन रजनी जी का सफर जारी रहा। आज भी उनकी उंगलियाँ सुई और धागों की मदद से कुछ न कुछ रचने में तल्लीन रहती हैं।

31 सालों के अपने करियर में रजनी जी मुंबई की प्रतिष्ठित जहाँगीर आर्ट गैलरी से लेकर इटली के वर्ल्ड ट्रेड फेयर तक में शिरकत कर चुकी हैं। अगस्त, 2021 में वस्त्र मंत्रालय द्वारा  उन्हें नेशनल मेरिट अवार्ड-2018 प्रदान किये जाने की घोषणा की गई। वर्तमान में वे अपने पति श्री अविनाश शिर्के के साथ यवतमाळ, महाराष्ट्र में निवास कर रही हैं। उनके पति  सावित्री ज्योति राव समाज कार्य महाविद्यालय में प्राचार्य हैं। रजनी जी के दो बच्चों में बड़े पुत्र भौतिकी विषय से एमएससी कर रहे हैं और पुत्री नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी से स्टाइल डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं। उन्हें मलाल इस बात का है कि इस कला से जुड़े लोगों की संख्या बहुत कम है। उनकी इच्छा है कि कम से कम बीस लोग ऐसे हों जो उनसे पूरी तरह यह हुनर सीख लें, ताकि यह विधा पूरी तरह लुप्त न हो जाए।

संदर्भ स्रोत: श्रीमती रजनी शिर्के से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

 

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  • बहुत ही सुंदर परिचय दिया गया है रजनी शिर्के जी का । बचपन से लेकर अब तक की उनकी यात्रा को लिखने की शैली इतनी अच्छी है कि अंत तक पढ़ने का मन होता है ।ऐसे ही अनुकरणीय परिचय स्वयं सिद्धा के नाम को सार्थक करते हैं ।बहुत-बहुत बधाई रजनी शिर्के और लेखक को ।

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