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मालविका जोशी

मालविका जोशी

छाया : स्व संप्रेषित

सृजन क्षेत्र
टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच
प्रमुख प्रतिभाएँ

मालविका जोशी

वरिष्ठ रंगकर्मी मालविका जोशी का जन्म  20 अगस्त 1964 को महू में हुआ था। उनके दादा श्री शुभचन्द्र चक्रवर्ती वहां कॉलेज में प्राचार्य थे। माता-पिता भोपाल में रहते थे। मालविका जी दादा-दादी के पास महू में ही रह गईं। वे दादा श्री शुभचन्द्र चक्रवर्ती एवं दादी हिरण्यमयी चक्रवर्ती को ही माता-पिता समझती रहीं। चौथी कक्षा के बाद वे भोपाल आ गईं, लेकिन स्कूल और अन्य प्रमाणपत्रों में हमेशा के लिए माता-पिता के स्थान पर दादा-दादी ही दर्ज हैं जिनका मालविका जी के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही। भोपाल लौटने के बाद धीरे-धीरे उन्हें स्पष्ट हुआ कि जिन्हें वह दादा (भाई) कहती हैं वो उनके पिता है लेकिन इससे ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ा, उनके लिए माता पिता के स्थान पर सदैव दादा-दादी ही आसीन रहे। भोपाल में उन्होंने सेंट जोसेफ कान्वेंट से हायर सेकेण्डरी करने के बाद महारानी लक्ष्मी बाई कॉलेज से स्नातक किया।

बंगाली परिवारों में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की परंपरा रही है। मालविका जी भी को भी ऐसा ही परिवेश मिला, स्कूल के कार्यक्रमों में वह नृत्य प्रस्तुतियां दिया करती थीं, जिसके लिए वे कई बार पुरस्कृत हुईं। उसी दौरान वे द्वारकाधीश संगीत महाविद्यालय, भोपाल से संगीत सीखने लगीं। वहां उनकी गुरु थीं श्रीमती निर्मला भट्ट। एक बार उनकी छोटी बहन ने उनसे कहा कि -“स्कूल वाले सर पूछ रहे हैं क्या आप नाटक में काम करेंगी?”  यह प्रस्ताव विजय तेंदुलकर द्वारा रचित नाटक ‘अंजी’ के लिए था, जिसे रईस हसन निर्देशित कर रहे थे। वे इस नाटक के लिए नायिका की खोज कर रहे थे, जिसके बारे में मालविका जी की छोटी बहन के स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक को भी पता था, उन्हें मालविका जी का ध्यान आया और उसी के मार्फ़त संदेशा भिजवा दिया था  और उन्होंने भी हामी भर दी| मालविका  जी का वह  पहला नाटक था जिसे खूब सराहना मिली।

पहले मंचन के बाद से उन्हें अलग-अलग नाटकों में प्रमुख भूमिकाओं के लिए आमंत्रित किया जाने लगा लिए। दरअसल करियर को लेकर उस समय कोई स्पष्ट सा खाका नहीं था, समय ने अपने प्रवाह से मानो सब कुछ पहले ही तय कर रखा था। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ रंगमंच जीवन का जैसे ज़रूरी हिस्सा बन गया। उस समयावधि में ही वह ऑडिशन पास कर रेडियो नाटकों में भी काम करने लगीं। उनके जीवन का स्वर्णिम दौर था वह जिसमें हर प्रतिष्ठित मंच और सम्मानित निर्देशकों के साथ उन्हें काम करने का अवसर प्राप्त हुआ जैसे – बंशी कौल, प्रशांत खिलवड़कर, प्रभात गांगुली, रईस हसन, अलखनंदन, जयंत देशमुख, राजेश भदौरिया आदि।

श्री कौल से अपनी मुलाकात वह आज भी उपलब्धियों के तौर पर याद करती हैं। उन्होंने प्रभात गांगुली जी के यहाँ मालविका जी को देखा था। एक परियोजना के तहत ‘मोची की बीबी’ नाटक का निर्देशन उन्हें करना था किरदार मोची की बीबी के लिए उपयुक्त प्रतिभा तलाश रहे थे । यह भूमिका मालविका जी को मिली जिसे कई बड़े मंचों पर सराहना मिली।

नाटकों में प्रमुख भूमिका अपने आप में चुनौती होती है, कथा का ताना-बाना उसी के इर्द-गिर्द होता है, मंच पर भी वही सबसे ज्यादा रहता है, तथापि कुछ किरदार लम्बे समय तक याद रह जाते हैं। मालविका को ऐसी ही भूमिका मिली नाटक ‘घेरा’ में जिसे प्रशांत खिरवड़कर ‘रंगायन’ के बैनर तले निर्देशित कर रहे थे। उन्ही के निर्देशन में मंचित नाटक ‘कोमल गंधार’ में भी मालविका जी की यादगार भूमिका थी। वर्ष 1988 में वे निर्देशक प्रभात गांगुली के साथ यूएसएसआर ‘फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया’ में सम्मिलित होने गईं थीं।

उस समय भोपाल में सांस्कृतिक गहमा-गहमी का दौर था, हर दिन कुछ नया हो रहा था, नई-नई प्रतिभाएं अलग-अलग विधाओं से जुड़ रही थीं। सुप्रसिद्ध लेखिका मालती जोशी के सुपुत्र श्री सच्चिदानन्द जोशी का पदार्पण रंगमंच पर हो चुका था। उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन भी किया, अधिकांश में नायिका की भूमिका मालविका जी निभातीं। वर्ष 1988 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए और मालविका उनके वास्तविक जीवन की भी नायिका बन गयीं।

विवाह के बाद अभिनय का वह तूफ़ानी दौर थोड़ा धीमा पड़ा, फिर भी सच्चिदानन्द जी के निर्देशन में कुछ नाटकों के अलावा राजेश भदौरिया के निर्देशन में मंचित ‘लहरों के राजहंस’ जयंत देशमुख के निर्देशन में मृत्युंजय जैसे नाटकों में भी उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। रंगमंच एवं आकाशवाणी के अलावा मालविका जी ने कुछ टेलीविजन धारावाहिकों में भी काम किया, जैसे – असगर वज़ाहत के निर्देशन में बूँद, मंजू सिंह के निर्देशन में दूरदर्शन पर प्रसारित ‘एक कहानी’ आदि। इसके अलावा उन्होंने राजा बुन्देला द्वारा निर्देशित ‘मुझे चाँद चाहिए’ में भी उनकी छोटी सी भूमिका थी।

घरेलू जिम्मेदारियों के अलावा जीवन साथी की नौकरी में तबादले के कारण लम्बे समय तक रंगमंच पर बने रहना काफी मुश्किल था। इसलिए उन्होंने परदे के पीछे की गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया एवं नाटकों में वेषभूषा, नृत्य संयोजन आदि का काम करने लगीं। इसके अलावा विवाह के बाद उन्होंने कई क्षेत्रों में खुद को आजमाया। जैसे रायपुर के निजी स्कूल में सांस्कृतिक समन्वयक रहीं, फिर दिल्ली में इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओपन स्कूलिंग में भाषा सलाहकार का काम किया। साथ ही मध्यप्रदेश के 50वें स्थापना दिवस पर शिक्षा विभाग के लिए एक बैले तैयार करवाया, पुलिस विभाग के लिए बैले किया।

इन सबसे समय बचता तो वे कविताएं लिखतीं। वर्ष 2020 में मालविका जी और सच्चिदानन्द जी दोनों की कविताओं का संग्रह – ‘यूं ही साथ-साथ चलते’ प्रकाशित हुआ। वर्तमान में सच्चिदानन्द जी इंदिरा गांधी नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट के सदस्य सचिव हैं ,जबकि मालविका जी अलग-अलग परियोजनाओं पर स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं। उनके दो बेटे हैं जिनमे बड़ा पुणे में और छोटा माता-पिता के साथ रह रहा है।

संदर्भ स्रोत – स्व संप्रेषित एवं मालविका जी से बातचीत पर आधारित।

© मीडियाटिक

 

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