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महिलाओं ने बदल दी गाँव की तस्वीर

महिलाओं ने बदल दी गाँव की तस्वीर

छाया: ब्लॉग माय गव डॉट इन

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पत्रकारिता, रेडियो और सोशल मीडिया
मीडिया विमर्श

महिलाओं ने बदल दी गाँव की तस्वीर

नारी जब कुछ करने की ठान लेती है, तो कुछ ऐसा कर दिखाती हैं, जो समाज को आईना दिखाने के लिए काफ़ी होता है। इसकी जीती जागती और अनूठी मिसाल है रीवा जिले के डभौरा गांव की महिलाओं का “बहिनी दरबार” यानी महिलाओं द्वारा महिलाओं के लिए हाथ से लिखकर तैयार किया गया एक ऐसा बुलेटिन, जिसके जरिये उपयोगी जानकारी उन तक पहुंचती है और उनकी समस्याओं का निराकरण होता है। इस बुलेटिन के शुरू होने की कहानी एक हैंडपंप से शुरू हुई। दरअसल गांव के हैंडपंप पर सवर्णों द्वारा आदिवासी महिलाओं को पानी नहीं भरने दिया जाता था। महिलाओं ने इसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाई और तय किया कि महिलाओं के लिए सामाजिक बदलाव लाने और अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने बकायदा अखबार निकाला जाएगा। यहीं से बहिनी दरबार की नींव पड़ी और 2008 से ये बुलेटिन निकल पड़ा।महिलाओं का, महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा तैयार इस बुलेटिन की सम्पादक से लेकर हॉकर तक महिलाएं ही हैं। ख़ास बात यह कि इस मासिक अख़बार के लिए इन्होंने न किसी संस्था या संगठन का सहारा लिया, न सरकारी नुमाइंदों का मुंह ताका। उनका केवल एक ही संकल्प था – अपने जैसी महिलाओं की आवाज़ बनने और उनकी तकलीफें शासन-प्रशासन के सामने लाने का।

‘बहिनी दरबार’ लिखने वाली सुदूर आदिवासी गाँव की इन महिलाओं का कमाल देखिये। इनके पास न उच्च शिक्षा, न पत्रकारिता की कोई डिग्री और न ही मैनजमेंट की कोई पढ़ाई, बावजूद इसके इन महिलाओं ने महिलाओं की समस्याओं को कलम के जरिये प्रशासन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। आंखों देखी, कानों सुनी और हाथों से  लिखी  – यह अख़बार इन्ही तीन बातों की बुनियाद पर खड़ा है। यानी महिलाएं गाँव में जो देखती हैं, जो सुनती हैं, उसे अपने हाथों से कागज़ पर उतार देती हैं. चाहे फिर वो महिलाओं की रोजमर्रा से जुड़ी समस्या हो, घरेलू हिंसा हो, उनकी जागरूकता से जुड़ी कोई जानकारी हो, सरकारी योजना हो या फिर गाँव की किसी महिला की कामयाबी की कहानी। बुलेटिन से जुड़ी महिलाएं बताती हैं कि गाँव की कोई भी समस्या शासन-प्रशासन तक नहीं पहुँचती थी, न ही स्वास्थ्य, शिक्षा से जुड़ी योजनाओं की जानकारी गाँव के लोगों को मिल पाती थी। इस बुलेटिन के माध्यम से अब महिलाओं में जागरूकता आई है और अब वे अपने अधिकारों की बात भी करने लगी हैं। पिछले साल जब कोरोना महामारी ने देश में दस्तक दी तो इन महिलाओं ने राहत कार्य में भी अपनी भागीदारी बखूबी निभाई। समूह की दस सदस्यों ने लॉकडाउन के दौरान महिलाओं तक सेनेटरी पैड पहुंचाने का जिम्मा उठाया।

सम्पादक उषा यादव बताती हैं कि दलित महिला के साथ पानी को लेकर उपजी समस्या ने हमें बहिनी दरबार निकालने की प्रेरणा दी। 6 महिलाओं से शुरू हुए इस सफर में अब तक डेढ़ हज़ार से भी ज़्यादा महिलाएं जुड़ चुकी हैं। समूह में 60 से अधिक सक्रिय सदस्य हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य महिलाओं के मुद्दों को उजागर करना और उन्हें हल करवाना है। बहिनी दरबार के माध्यम से हमारी कोशिशें अब रंग लाने लगीं हैं। गाँव की महिलाओं  में जागरूकता आई है, उन्हें अपने अधिकारों का बोध होने लगा है, वे अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी होने लगी हैं। महिलाओं को अपने हक की लड़ाई लड़ते देखना समाज के लिए एक सुखद संदेश है। उषा बताती हैं ‘बहिनी दरबार’ के माध्यम से हम न सिर्फ महिलाओं की आवाज़ और समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाते हैं, बल्कि समाधान के साथ उन्हें उनका वाजिब हक दिलाने में भी कामयाब हो रहे हैं। जो बहनें अपने अधिकारों के लिए सामने नहीं आ पाती, वे अपनी बात हमें बताने लगी हैं। बहिनी दरबार के माध्यम से महिलाओं को लाभ मिलने लगा है, राशन की दुकानों से समय पर खाद्यान्न नहीं मिलता था, कलेक्टर से शिकायत के बाद व्यवस्था दुरुस्त हो गई। मनरेगा के तहत जिन महिलाओं को मजदूरी नहीं मिलती थी, उन्हें हमने मजदूरी दिलवाई। घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को भी बहिनी दरबार ने सहयोग किया।

ऐसे तैयार होता है बहिनी दरबार

समूह के सदस्य अखबार की सामग्री के बारे में चर्चा करने के लिए हर महीने की 20 तारीख को बैठक करते हैं और 30 तारीख को इसे प्रकाशित किया जाता है। उन सदस्यों के लिए जो निरक्षर हैं और पेपर नहीं पढ़ सकते हैं, उन्हें समूहों में पढ़ा जाता है ताकि सभी को सामग्री और जानकारी के बारे में पता चल सके। समूह की महिलाएं पहले आदिवासी क्षेत्रों में घर-घर जाकर महिलाओं से बात करती हैं, उनकी समस्याओं से अवगत होती हैं, फिर उसी के अनुरूप 10 पन्ने लिखकर बुलेटिन तैयार किया जाता है। उषा यादव द्वारा संपादित और जनमावती द्वारा बघेली भाषा में हस्तलिखित मासिक समाचार पत्र कहीं छपता नहीं है, बल्कि इसकी फोटो कॉपी निकलवाई जाती है। फिर समूह की सदस्य ही हॉकर बनकर गाँव-गाँव तक इस बुलेटिन को बांटने जाती हैं। फिलहाल इस बुलेटिन की प्रसार संख्या डेढ़ हज़ार के करीब है और 24 गाँव तक इस बुलेटिन की पहुँच है। अलग-अलग गांवों में सावधानी से चुने गए समूहों, सरकारी विभागों और पुलिस अधिकारियों को इसकी प्रतियाँ 10 रुपये में वितरित की जाती हैं।

समूह ने ‘बहिनी दरबार’ के जरिए सोशल मीडिया पर भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है। इसमें जहां एक ओर ‘सबसे बड़ा आम अनुसंधान केंद्र रीवा मा‘ शीर्षक से जिले के कुठलिया गांव में प्रदेश के सबसे बड़े आम अनुसंधान केंद्र के बारे में जानकारी दी गई है, वहीं एक अन्य पोस्ट विश्व मधुमक्खी दिवस के महत्व के बारे में अवगत कराती है। इसके अलावा समय-समय पर विविध विषयों की जानकारी भी ब्लॉग पर साझा की जाती है। ट्विटर और फेसबुक पर भी इसकी गतिविधियां देखी जा सकती है। कहा जा सकता है कि धीमी गति से ही सही, यह अखबार पिछले 13 वर्षों से महिलाओं के बीच उम्मीद की किरण बनकर पहुँच रहा है।

सन्दर्भ स्रोत : ईटीवी मप्र, माय गव डॉट इन, संपादन : मीडियाटिक डेस्क

 

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