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मस्तानी बाजीराव

मस्तानी बाजीराव

 छाया : मस्तानी महल, मऊ सहनिया क्रेडिट : न्यूज़ 18 

अतीतगाथा
मध्यप्रदेश के इतिहास में महिलाएं

मस्तानी बाजीराव

मस्तानी बाजीराव का जीवन काल जितना विवादित रहा है उतना ही विवादित उनका वास्तविक परिचय भी है। छतरपुर जिले से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित मऊ सहानिया में आज भी पर्यटन का मुख्य केंद्र ‘मस्तानी महल’ देखा जा सकता है जिसे 1696 में महाराजा छत्रसाल ने अपनी बेटी मस्तानी के लिए बनवाया था। इस प्रमाण के बावजूद ऐतिहासिक दस्तावेज में मस्तानी के जन्म स्थान को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। इतिहासकार सुशीला वैद्य के अनुसार – बखर और लेखों से मालूम पड़ता है कि मस्तानी अफ़गान और गूजर जाति की थी। उसका जन्म नृत्य करने वाली जाति में हुआ था। गुजरात के गीतों में इन्हें ‘नृत्यांगना’ या ‘यवन कांचनी’ के नाम से संबोधित किया गया है (हिन्दी विश्वकोश, भाग-9, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, संस्करण-1967, पृ.180.) सुप्रसिद्ध इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई ने लिखा है कि मस्तानी का वंश अज्ञात है। परंपरा से वह एक हिंदू पिता और मुसलमान माता की संतान कही जाती है (मराठों का नवीन इतिहास, भाग 2, गोविंद सखाराम सरदेसाई; शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी, आगरा; तृतीय संशोधित संस्करण 1972, पृष्ठ 183.)।

बाजीराव के एक प्राचीन जीवन चरित्र के अनुसार मस्तानी हैदराबाद के निज़ाम की पुत्री थी। नवाब की बेगम ने उसका विवाह बाजीराव से कर देने का आग्रह किया ताकि निज़ाम-बाजीराव की मित्रता स्थायी बन सके। विवाह संस्कार संपन्न किया गया पर प्रत्यक्ष बाजीराव से नहीं वरन उसके खंजर से। बाद में बाजीराव ने उसे अपने पास बुला लिया।कुछ अन्य लेखकों के अनुसार मस्तानी महाराजा छत्रसाल की एक रखैल की पुत्री थी। जब उसने बाजीराव द्वारा दी गयी सहायता के लिए उसे अनेक उपहार आदि दिये तो मस्तानी भी उनमें से एक थी। कुछ और लेखकों ने केवल इतना ही लिखा है कि वह हिंदू माता और मुस्लिम पिता की पुत्री थी(पराक्रमी पेशवा, श्रीनिवास बालाजी हर्डीकर; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, संस्करण 1979, पृष्ठ- 213-214.)। बुंदेलखंडी जनश्रुतियों के अनुसार वह छत्रसाल की मुग़लानी उप पत्नी से उत्पन्न कन्या थी( महाराजा छत्रसाल बुंदेला, डॉ० भगवान दास गुप्त, मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, द्वितीय संस्करण – 2004, पृष्ठ 79 (पाद टिप्पणी)। कुछ लेखों में यह भी दर्ज है कि मस्तानी राजा छत्रसाल की गोद ली हुई पुत्री थी।

बुन्देलखंडी जनश्रुतियों और स्थूल प्रमाण ‘मस्तानी महल’ की रोशनी में मस्तानी को मध्यप्रदेश की बेटी स्वीकार किया जा सकता है जिनकी माँ अफ़गान मूल की थी। मस्तानी खूबसूरत होने के साथ कुशल नृत्यांगना एवं गायिका होने के साथ-साथ घुड़सवारी और तीरंदाजी में भी भी निपुण थी। उसकी परवरिश राजकुमारियों की तरह हुई थी। कलाप्रेमी राजा छत्रसाल अपनी इस बेटी से बहुत प्रेम करते थे। 1727 में मोहम्मद खान बंगश – जो उस समय प्रयाग का सूबेदार था, ने बुन्देलखंड पर हमला कर दिया। राजा छत्रसाल जैतपुर किले में शत्रुओं से चारों तरफ घिर गए थे, जिसमें मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम ने उनकी मदद की और बंगश को पराजित होना पड़ा। छत्रसाल ने पेशवा को धन्यवाद स्वरूप अपनी पुत्री और अपने राज्य का एक तिहाई भाग सौंप दिया।

ब्राह्मण परिवार के बाजीराव विवाहित थे, उनकी पत्नी का नाम काशीबाई था। महाराज छत्रसाल ने भले ही मस्तानी का लालन-पालन पुत्रीवत किया हो, बाजीराव की द्वितीय पत्नी बनने के बाद भी   ससुराल पक्ष के लोगों ने उनका एक मुसलमान की पुत्री कह तिरस्कार ही किया। परन्तु बाजीराव और मस्तानी दोनों तो जैसे एक दूसरे के लिए ही बने थे। 1730 ईस्वी में बाजीराव ने पुणे में मस्तानी के लिए शनिवार वाड़ा  भवन का निर्माण करवाकर उसे मस्तानी महल और उसके द्वार को मस्तानी दरवाजे का नाम दिया। मस्तानी पेशवा के महल में मराठा महिलाओं जैसी वेशभूषा में ही रहती। वह बाजीराव के आराम और सुख दुःख का ध्यान रखते हुए उनके साथ विभिन्न सैन्य अभियानों में भी साथ रहती। दूसरी तरफ बाजीराव से परिवार के लोग रुष्ट होकर उन्हें एक प्रकार से पतित मानने लगे थे, क्योंकि बाजीराव मांस और मदिरा का सेवन करने लगे थे जो कि महाराष्ट्र के ब्राह्मण समाज में पूरी तरह निषेध माना जाता है। परिवार का मानना था कि यह सब मस्तानी के प्रभाव में ही हुआ।

एक समय ऐसा भी आया जब इस प्रेमी युगल के खिलाफ चल रहे षड्यंत्रों ने पारिवार की दहलीज को लांघकर राजनीतिक स्वरूप धारण कर लिया। विरोधी इस प्रेम सम्बन्ध का कुत्सित प्रचार कर आम लोगों की नज़र से उन्हें गिराने की कोशिश करने लगे। दोनों के बीच सम्बन्ध विच्छेद करवाने की भी कई कोशिशें हुईं। 1734 में मस्तानी ने के बेटे को जन्म दिया जिसका नाम शमशेर बहादुर रखा गया। इसी के साथ षड्यंत्रों की आग भी भड़कती चली गई। सन 1739 में किसी कारणवश बाजीराव को पुणे से बाहर जाना पड़ा और मस्तानी उनके साथ नहीं जा सकीं। चिमाजी अप्पा (बाजीराव के छोटे भाई) और नाना साहब (बाजीराव और काशीबाई के पुत्र) ने मिलकर एक योजना बनाई और पूना के पार्वती बाग़ में मस्तानी को बंदी बना लिया गया। इस घटना से बाजीराव अत्यधिक दुखी हुए और बीमार पड़ गए। अवसर पाकर एक दिन मस्तानी कैद से भाग निकली और 4 नवम्बर 1739 को पटास बाजीराव के पास पहुँच गई। दोनों फिर एक हो गए लेकिन इस शांतिकाल की उम्र भी बहुत ही छोटी थी। माँ राधा बाई, पत्नी काशीबाई, काका मोरशेट सहित परिवार के सभी सदस्य पटास पहुँच गए। उन्होंने मस्तानी को समझाया बुझाया और वापस उसे लेकर पुणे लौट गए।

अब मस्तानी के ह्त्या की योजना बनाई जाने लगी क्योकि उनके विरोधियों के अनुसार वही सारी मुसीबतों की जड़ थी। उन्होंने छत्रपति राजा शाहू से मस्तानी की ह्त्या करने की अनुमति मांगी। परन्तु राजा शाहू अत्यंत बुद्धिमान एवं संवेदनशील थे, उनके प्रतिनिधि गोविन्दराव ने जनवरी 1740 में लिखे अपने पत्र में उल्लेख किया है कि मस्तानी के विषय पर मैंने निजी तौर पर राजा की इच्छा का पता लगा लिया है। बलपूर्वक पृथक्करण या व्यक्तिगत निरोध (बंदीवास) के प्रस्ताव के प्रति उस को गंभीर आपत्ति है। वह बाजीराव को किसी भी प्रकार अप्रसन्न किया जाना सहन नहीं करेगा, क्योंकि वह सदैव उसे प्रसन्न रखना चाहता है। दोष उस महिला का नहीं है। इस दोष का निराकरण उसी समय हो सकता है जब बाजीराव की ऐसी इच्छा हो। बाजीराव की भावनाओं के विरुद्ध हिंसा प्रयोग की कैसी भी सलाह राजा किसी भी कारण नहीं दे सकता (मराठों का नवीन इतिहास, भाग 2 गोविन्द सखाराम सरदेसाई)।

1740 की शुरुआत में बाजीराव का नासिर जंग के साथ युद्ध हुआ जो उनके जीवन का अंतिम युद्ध साबित हुआ। उस समय तक किसी को अनुमान नहीं था कि बाजीराव कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। 7 मार्च 1740 को नाना साहेब के नाम लिखी गई चिमा जी की एक चिट्ठी से ज्ञात होता है कि उस समय बाजीराव अवसादग्रस्त थे। चिमा जी ने लिखा है कि – जब से हम एक दूसरे से विदा हुए हैं, मुझको पूजनीय राव से कोई समाचार प्राप्त नहीं हुआ है। मैंने उसके विक्षिप्त मन को यथाशक्ति शांत करने का प्रयास किया, परंतु मालूम होता है कि ईश्वर की इच्छा कुछ और ही है। मैं नहीं जानता हूं कि हमारा क्या होने वाला है। मेरे पुणे वापस होते ही हमको चाहिए कि हम उसको (मस्तानी को) उसके पास भेज दें। (मराठों का नवीन इतिहास, भाग 2 गोविन्द सखाराम सरदेसाई)।

स्पष्ट है उस समय बाजीराव, मस्तानी के वियोग में बेचैन और दुखी थे जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य निरंतर गिर रहा था। 28 अप्रैल 1740 को बाजीराव पेशवा चल बसे, उनके अंतिम क्षण में उनकी पत्नी काशीबाई उनके साथ थीं जो बहुत पहले उन्हें माफ़ कर चुकी थीं। कहा जाता है इसके बाद मस्तानी बाजीराव की चिता के साथ सती हो गईं। इस तरह मस्तानी के जन्म की तरह उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में भी कई कहानियां प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार उन्होंने आत्महत्या कर ली, कुछ मत के अनुसार अत्यधिक शोक के कारण उनकी मृत्यु हुई। उनका शव पूना की पूर्व में स्थित गाँव पाबल भेज दिया गया जो बाजीराव ने उन्हें उपहार स्वरूप दिया था। यहीं मस्तानी को दफना दिया गया, जीर्ण शीर्ण अवस्था में एक साधारण सी कब्र आज भी देखी जा सकती है। बाजीराव और मस्तानी के पुत्र शमशेर बहादुर उस समय बहुत छोटे थे, उनका पालन पोषण काशीबाई की देखरेख में हुआ। अपने जीवन काल में ही बाजीराव ने कालपी और बांदा की सूबेदारी उन्हें देने की घोषणा कर दी थी। शमशेर बहादुर जीवन भर परिवार के वफादार रहे। 1761 में पानीपत की लड़ाई में वे भी मारे गए।

 

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