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मप्र के खेल जगत में महिलाओं का योगदान  

मप्र के खेल जगत में महिलाओं का योगदान  

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मप्र के खेल जगत में महिलाओं का योगदान  

• विभा वत्सल 

चाहे कुश्ती का दंगल हो या क्रिकेट का मैदान… एथलेटिक्स का ट्रैक हो या बैडमिंटन का कोर्ट… लड़कियां कोई भी मैदान मारने में पीछे नहीं हैं.. खेलना लड़कों का काम है, घर में मां की मदद करना लड़कियों का काम, बचपन से पिलाई जा रही इस घुट्टी के बावजूद मध्यप्रदेश की लड़कियां खेलों में शिखर छू रही हैं। पारंपरिक माहौल की बहुत सारी बेड़ियों को झटकते हुए यहां की बेटियों ने खेल जगत में नए मुकाम हासिल किए हैं। आर्थिक तंगी और असुविधाएं भी इनकी इस राह में रोड़ा नहीं बन सकी है।

पर्वत सी ऊंचाई भी नहीं बनी राह का रोड़ा

इतिहास के पन्ने को पलटने से पहले बात उस ऊंचाई की जिसे मध्यप्रदेश की बेटियां नाप रही हैं। सीहोर के छोटे से गांव भोजनगर की मेघा परमार माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली एमपी की सबसे कम उम्र की पहली महिला पर्वतारोही है। किसान पिता की इकलौती संतान मेघा कहती हैं, “मेरे अंदर ये जुनून था कि जब तक माउंट एवरेस्ट पर चढूंगी नहीं तब तक छोडूंगी नहीं। हालांकि मुझे ये कामयाबी दूसरे प्रयास में मिली। इससे पहले 2016 में रोमांचक और खतरों से भरे खेल में आगे बढ़ रही थी लेकिन उस वक्त मौसम और हिम्मत ने साथ नहीं दिया।” अपने सपने को सच करने का साहस, खतरों से दो चार होने के बाद भी एवरेस्ट पर फतह और मौत को मात देकर एवरेस्ट से सकुशल लौटकर आना ही उन्हें विजेता बनाता है. पर्वतारोही बनने के ख्याल पर मेघा कहती हैं, “मैंने अखबार में पढ़ा था कि मध्यप्रदेश के दो लड़कों ने माउंट एवरेस्ट फतह किया है, मैं य़ह सोचती थी कि ऐसा करने वाली मघ्यप्रदेश की पहली महिला क्यों नहीं बन सकती हूं।’ मेघा बताती हैं कि शुरू-शरू में माता-पिता नाराज़ हुए लेकिन कुछ करने की जिद और मेरे समर्पण को देखने के बाद उनका पूरा सहयोग मिलने लगा। इतना ही नहीं मेघा के हौसलों की उड़ान ही है कि उन्होंने दुनिया के चार महाद्वीपों के सबसे उंची चोटियों को भी नाप दिया है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ की ब्रांड एम्बेस्डर मेघा 2019 में यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एलब्रेस पर तिरंग फहराते हुए वहां से देशवासियों को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दे चुकी हैं। घऱ की चौखट से माउंट एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने वाली मेघा एक इंटरव्यू में कहती हैं कि “अगर आपने आधा रास्ता तय कर लिया है तो वापस मत जाइए क्योंकि आधे रास्ते से वापस आने में उतना ही वक्त लगेगा। इसलिए उतने समय में पूरा रास्ता तय करिए और इतिहास रचिए।” मेघा का सपना दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह कर देश और मध्यप्रदेश का नाम रोशन करना तो है ही गिनीज बुक में नाम भी दर्ज करवाना भी है।

मेघा के अलावा छिंदवाडा जिले के तामिया की रहने वाली भावना डेहरिया भी एवरेस्ट के शिखर पर झंडा गाड़ चुकी हैं। बर्फीली आंधियों और जमा देने वाली ठंड भी भावना के फौलादी इरादे को डगमगा नहीं पाए। एवरेस्ट के ऊपर बिछी बर्फ की सफेद चादर में जहां-तहां दबे मुर्दा शरीर को देखकर भी डर नहीं लगा और दुनिया के सबसे खतरनाक लेकिन सबसे खूबसूरत पहाड़ पर आगे बढ़ती रहीं। मेघा और भावना का सफर भी समानांतर चल रहा है। कुछ ही अंतराल में एवरेस्ट पर पहुंचना और अब तक दोनों ही दुनिया के चार महाद्वीप के सबसे उंचे शिखर पर भारत का तिरंगा लहरा चुकी हैं। भावना ने 2019 में प्रमुख त्योहार होली पर ऑस्ट्रेलिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट कोसीयुस्को पर रंग-गुलाल खेलकर होली मनाई थी तो वहीं, दिवाली के दिन अफ्रीका महाद्वीप का माउंट कोजिअस्को के सबसे ऊंचे शिखर पर रोशनी बिखेरा था। 31 दिसंबर 2019 को साउथ अमेरिका के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट अकोंकागुआ की चढ़ाई के साथ तंजानिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट किलिमंजारो पर तिरंगा फरहा चुकी हैं. भावना ने अपने सफर के बारे में बताते हुए कहती हैं, “तामिया के छोटे-छोटे पहाड़ चढ़ा करती थी। ऊपर जाकर नजारा देखना अच्छा लगता था। लेकिन उस वक्त ये नहीं मालूम था कि पर्वतारोहण जैसी कोई एक्टिविटी भी होती है। कुछ समय बाद सरकार की तरफ से एक एडवेन्चर कैंप लगा तब इससे जुड़े कोर्स और बाकी चीज़ों के बारे में जानकारी मिली।” लेकिन आसमान तक पहुंचने के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ा। चार साल स्पॉन्सर ढूंढने में ही निकल गए। लेकिन इसी भावना के नाम आज गिनिज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं ।

राष्ट्रीय खेल हॉकी में भी छू रही हैं बुलंदियां

ये जुनून और दृढ़ संकल्प मध्यप्रदेश की महिला खिलाड़ियों को विरासत में मिला है। बात राष्ट्रीय खेल हॉकी की करें तो इसे लेकर प्रारंभिक दौर में गजब की दीवानगी थी। तब हर किसी का सपना राष्ट्रीय टीम में शामिल होने का था। सबसे पुराने हॉकी के गढ़ जबलपुर की मिट्टी ने कई खिलाड़ियों को जन्म दिया लेकिन महिला हॉकी को तब गति और लो‍कप्रियता मिली, जब साल 1936 में नागपुर में सीपी एन्ड बरार लेडि‍ज़ हॉकी एसोसिएशन और 1945 में जबलपुर का पहला महिला हॉकी क्लब जुबली क्लब गठित हुआ। उम्मीदों की डगर और ख्वाबों के इस जुनून ने साठ का दशक आते-आते जबलपुर विश्वविद्यालय में महिला हॉकी खिलाड़ियों की तादाद इतनी बढ़ा दी कि महाकौशल महिला हॉकी एसोसिएशन का गठन करना पड़ा। इसके बाद एक से बढ़कर एक खिलाड़ी पैदा हुईं जिसमें चारू पंडित, सरोज गुजराल, सिथिंया फर्नांडीज, गीता राय, कमलेश नागरथ, आशा परांजपे, मंजीत सिद्धू और राष्ट्रीय महिला हॉकी की कप्तान रहीं अविनाश सिद्धू व मधु यादव के नाम प्रमुख हैं।

मध्यप्रदेश की पहली महिला अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी और विक्रम अवॉर्डी अविनाश सिद्धू ने भारतीय हॉकी टीम के कोच, मैनेजर, रैफरी की भूमिका भी निभाई। वे संभवत: देश की एकमात्र महिला खिलाड़ी रही हैं जिन्होंने दो खेल – हॉकी और वॉलीबॉल में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। जबलपुर की रतन नगर निवासी अविनाश सिद्धू ने 1956-57 से खेलना शुरू किया। उनका उन तमाम खेलों में झुकाव ज्यादा था, जिन्हें उन दिनों समाज में सिर्फ लड़के ही खेलते थे। एथलेटिक्स और बॉस्केटबॉल जैसे खेलों के साथ हॉकी उनका प्रमुख खेल बन गया और वे लगातार शिखर की ओर बढ़ती चलीं गर्इं। 1966 से 1975 तक वे भारतीय हॉकी टीम में रहीं और इस दौरान उन्हें 1968 से 1971 के बीच टीम के कप्तान का भी दायित्व मिला। सियोल एशियन गेम्स में भी उन्होंने अपनी भागीदारी सुनिश्चित की ।1983 से 1985 के बीच में उन्हें भारतीय हॉकी टीम के चयनकर्ताओं में शामिल किया गया और फिर टीम में मैनेजर के रूप में जिम्मेदारी संभाली।

वहीं तंगहाल जिंदगी जीने के बावजूद अपना और देश का नाम रोशन किया राष्ट्रीय हॉकी खेल की कप्तान रहीं मधु यादव ने ।मधु के सपनों को गति चार साल की उम्र में ही मिल गई थी ।12 साल की उम्र में स्कूल की तरफ से नेशनल खेलने का मौका मधु को मिल गया था। साल 1979 में जब वो 16 साल की थीं तभी वर्ल्ड कप खेलने कनाडा चली गईं। अर्जुन अवॉर्ड से नवाजी गईं मधु यादव की कप्तानी में भारतीय टीम ने 1989 से 91 तक वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, एशिया कप, इंटरकॉन्टिनेंटल टूर्नामेंट खेले। वे बताती हैं, “लंबा रास्ता इतिहास रचता है वहीं शॉर्टकट में मुकाम तो मिल जाता है लेकिन ना तो इतिहास बनता है और ना ही सम्मान मिलता है।” मधु यादव अब रेलवे में सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर हैं। रोज़ करीब चार घंटे ग्राउंड पर बिताती हैं। इस दौर की महिला खिलाड़ियों के संघर्ष का रंग ही है कि हॉकी में खिलाड़ियों की लंबी फेहरिस्त है ।

ग्वालियर की मेहरा गांव की रहने वाली अंतर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी करिश्मा यादव ने हॉकी की शुरुआत ग्वालियर के दर्पण मिनी स्टेडियम पर 2007 से की थी ।उसके बाद 2009 में करिश्मा का चयन मध्यप्रदेश राज्य महिला हॉकी अकादमी ग्वालियर में हुआ। इसके बाद करिश्मा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। करिश्मा ने हॉकी के लिए अपने गांव के यादव समाज के विरोध का डटकर सामना किया। परिवार ने भी लोगों की परवाह किये बगैर अपनी बेटी के सपोर्ट में खड़ा रहा. इस साल राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च खेल सम्मान विक्रम अवॉर्ड करिश्मा की झोली में आया है। करिश्मा ग्वालियर की पहली और मध्यप्रदेश की तीसरी महिला हॉकी विक्रम अवॉर्डी बन चुकी हैं। करिश्मा से पहले ये अवॉर्ड मधु यादव और अविनाश सिद्धू ले चुकी हैं। आज करिश्मा अपने मेहरा गांव समेत कई लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं। मेहरा गांव की ही 8 से 10 लड़कियां उनसे हॉकी सीख रही हैं।

वहीं अंतर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी इशिका चौधरी ने भी करिश्मा की तरह अपने करियर की शुरूआत ग्वालियर के ही दर्पण मिनी स्टेडियम से की। साल 2012 में इशिका की कड़ी मेहनत के चलते मध्यप्रदेश राज्य महिला हॉकी अकादमी में हो गया ।मज़बूत इरादे और सही प्रशिक्षण की बदौलत इशिका का चयन जूनियर भारतीय हॉकी टीम में हुआ और टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए इशिका ने रूस, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड जैसे कई देशों का टूर किया। 2018 में ब्यूनस आयर्स अर्जेंटीना में आयोजित यूथ ओलंपिक में भारतीय ह़ॉकी टीम की ओर से खेलते हुए सिल्वर मेडल प्राप्त किया। इस साल करिश्मा का नाम एकलव्य अवॉर्ड के लिए चुना गया है। एक इंटरव्यू में सपनों की बात करते हुए इशिका कहती हैं, “मेरा लक्ष्य सीनियर भारतीय टीम में अपनी जगह बनाना और फिर ओलंपिक में अपने देश को गोल्ड मेडल दिलवाना है।” इशिका से पहले करिश्मा यादव, नेहा सिंह और नीरज राणा को एकलव्य अवॉर्ड मिल चुका है.

अभी हाल ही में हॉकी इंडिया कैंप के लिए राज्य के तीन महिला हॉकी खिलाड़यों को चुना गया। इस शिविर के लिए देशभर से कुल चुनिंदा 26 खिलाड़ियों का चयन हुआ। जिसमें भोपाल के जहांगीराबाद की झुग्गियों से निकलीं भोपाल की पहली महिला इंटरनेशनल हॉकी खिलाड़ी खुशबू खान के साथ, मध्यप्रदेश राज्य महिला हॉकी अकादमी की सुमन देवी और इशिका चौधरी को मौका मिला है। जूनियर राष्ट्रीय हॉकी टीम में जगह बनाने का ये सुनहरा रास्ता होता है। महिला हॉकी की कामयाबी का हिसाब इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार के खेलो इंडिया अभियान के तहत जब 32 खिलाड़ियों का चयन हुआ था तो उसमें 12 खिलाड़ी मध्यप्रदेश से ही थीं। यही लड़कियां आगे चलकर ओलंपिक 2024 और 2028 में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी।

हॉकी की बात अगर अधूरी रहेगी अगर यहां जिक्र भारतीय हॉकी टीम की पूर्व कप्तान और अर्जुन पुरस्कार प्राप्त स्वर्गीय सुनीता चंद्रा का ना हो। वे साल 1956 से 1966 तक भारतीय हॉकी महिला टीम के लिए खेलीं और इस दौरान वर्ष 1963 से 1966 तक वे टीम की कप्तान भी रहीं। देश की गौरव और महिला हॉकी को नई उंचाई देने वाली सुनीता चंद्रा का निधन जनवरी 2020 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया ।

क्रिकेट में पीछे नहीं मध्यप्रदेश की बेटियां

अस्सी के दशक में महिला क्रिकेट खुद को विस्तार दे रहा था ।तब खिलाड़ियों के लिए आज जैसी चकाचौंध और व्यवस्था नहीं थी। उस दौर में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी निकलीं। उन्हीं में से एक नाम है इंदौर की संध्या अग्रवाल का, जिन्होंने अपना पहला क्रिकेट टेस्ट मैच 1984 में अहमदाबाद में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था। ये वो दौर था जब टीम बनाने के लिए खिलाड़ी नहीं मिलती थीं।उस दौर में भी वो भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान बनीं और अर्जुन और विक्रम अवॉर्ड से पुरस्कृत हैं. उन बीते दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, तब विदेशी दौरों तक में कोई मैच फीस नहीं होती थी। कोई टीए-डीए नहीं होता था. विदेश जाने और वापस आने का पैसा सरकार देती थी। होटल में ठहरने की सुविधा तो शायद ही कभी मिलती थी। मैदान भी बहुत अच्छी सुविधाओं वाले नहीं थे। लेडी गावस्कर के नाम से मशहूर संध्या महिला क्रिकेट के बेहतर दिनों के लिए रेलवे को धन्यवाद देना नहीं भूलती हैं, वे कहती हैं, ‘साल 1985 में जब से रेलवे ने महिला क्रिकेट टीम बनानी शुरू की तब से दिन सुधरे। उस समय रेलवे ने करीब-करीब सभी महिला क्रिकेटरों को नौकरी दी’। संध्या अग्रवाल 1993 में इंग्लैंड में पांचवां महिला विश्व कप खेल चुकी हैं जहां वह 229 रन बनाकर सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों की सूची में चौथे स्थान पर थीं। महिला क्रिकेट चयनकर्ता, बीसीसीआई में भारतीय महिला टीम की कोच और चयनकर्ता का दायित्व भी निभा चुकी हैं।

इस खेल में पहली बार 1974 में शारदा यादव को राज्य के सर्वोच्च खेल विक्रम अवॉर्ड से नवाजा गया था। इसके बाद राजेश्वरी ढोलकिया, मिनोती देसाई, रेखा पुणेकर, कीर्ति पटेल, चित्रा वाजपेई, रुपाजंलि शास्त्री, सोनाली टैनी, अरुंधति किरकिरे, विन्देश्वरी गोयल, बबीता मांडलिक और पूजा वस्त्रकार इस सूची में अपना नाम दर्ज करवा चुकी हैं.

रीवा, शहडोल, खंडवा, छिंदवाड़ा, उज्जैन जैसे छोटे शहरों से लड़कियों में क्रिकेट का क्रेज बढ़ा है। इसी का नतीजा है कि मध्यप्रदेश टीम में इन ज़िलों से खिलाड़ी खेल रही हैं। जिला स्तर पर क्रिकेट खेलने का परिणाम सिंगरौली की नुजहत परवीन हैं जो भारतीय महिला क्रिकेट टीम में जगह बनाने वाली मध्यप्रदेश के रीवा संभाग की पहली महिला क्रिकेटर हैं। उन्हें इंग्लैंड में हुए महिला वर्ल्ड कप की टीम में शामिल होने का मौका मिला।

वहीं रीवा की होनहार नित्या तिवारी अंडर-19 टीम की कप्तानी कर रही हैं। हाल ही में टीम इंडिया टी-20 वर्ल्ड कप में पहली बार पहुंची और इस टीम में शहडोल की पूजा वस्त्रकार ने अपनी जगह बनाकर न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि देश का नाम भी रोशन किया। इस मैच में पूजा ने अपने बल्ले से वो कारनामा कर दिखाया था जिसे 45 साल के महिला क्रिकेट के इतिहास में आज तक कोई नहीं कर पाया था। इस मैच में पूजा ने 9वें नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए 56 गेंदों में 51 रन की शानदार पारी खेली। क्रिकेट को लेकर राज्य या देश की दीवानगी और जुनून ही है कि 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला क्रिकेटरों का जलवा देखने को मिलेगा।

खो-खो में राज्य को दिलाया सम्मान

खो-खो जैसे पारंपरिक खेल में मध्यप्रदेश की बेटियों का बहुत ही सुनहरा इतिहास और भविष्य है। राज्य के सर्वोच्च सम्मान विक्रम अवॉर्ड सबसे ज्यादा इसी खेल को मिले हैं। अब तक इस खेल में करीब 24 खिलाड़ियों को ये सम्मान हासिल है। इतना ही नहीं अगर इतिहास देखें तो इस खेल में दो खिलाड़ियों को नीलिमा सी सरोलकर को 1974 में और 1981 में सुषमा सरोलकर को मिट्टी से जुड़े इस खेल में अर्जुन पुरस्कार मिल चुका है ।

इसी कड़ी में खो-खो में राज्य का नाम रोशन करने वाली जूही झा किसी पहचान की मोहताज नहीं है। राज्य के सर्वोच्च खेल सम्मान विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित जूही की जिंदगी बहुत मुश्किलों भरी रही है। सुलभ शौचालय से 2016 में एशियन गेम्स में खो-खो में सोने का तमगा जीतने वाली जूही को जब 2018 में विक्रम अवॉर्ड मिला तो इंदौर से भोपाल आने के लिए ट्रेन में रिज़र्वेशन कराने के पैसे नहीं थे। जनरल डिब्बे से अवॉर्ड लेने आईं ।12 साल तक सुलभ शौचालय में काम करने वाले पिता और 5 लोगों को परिवार एक कमरे में रहा। मां सिलाई करके घर चलाने का संघर्ष करती रहीं। लेकिन इसी सुलभ शौचालय से जूही महकीं और सरकारी नौकरी के लिए दो साल से ज्यादा का संघर्ष करने के बाद अब उनके हाथ में एक नौकरी भी है।

इस खेल में पुष्पा भामोदकर को पहली बार 1972 में विक्रम अवॉर्ड मिला था। तब से लेकर अब तक ज्योति प्रभाकर, स्मिता कुलकर्णी, नूतन चतुर, निशा वैद्य, हेमलता काबरा, नीलिमा देशपांडे, अलका दास, सेलजा निजोलकर, अर्चना राठौर, नीता पांडे, रेखा पांडुरंग, सुवर्णा सालसणकर, अर्चना विष्णु पौणिड्रक, शिल्पा जोशी, सोनल जैन, लता विश्वकर्मा, मीनल जैन, चैताली भौमिक, तृप्ति गोस्वामी और ममता लाहौरे को विक्रम अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।

देसी मिट्टी के खेल कबड्डी में कमाल

पहली बार कबड्डी में देश को सोना दिलाने का गौरव दिलाया दर्शना वाकड़े ने। भारतीय कबड्डी को बुलंदियों पर पहुंचाने वाली दर्शना ने 2006 में दक्षिण एशियाई खेलों में कोलंबो में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए पहली बार महिला कबड्डी में स्वर्ण पदक दिलाया। हालांकि दर्शना ने अपने खेल की शुरुआत वॉलीबॉल से की थी, लेकिन आगे चलकर दर्शना ने कबड्डी को अपनाया और फिर पीछे मुडकर नहीं देखा । दो दशक तक कबड्डी टीम की कप्तान और विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित दर्शना वाकड़े का कहना है कि खिलाड़ियों का प्रदर्शन और बेहतर हो सकता है कि अगर मध्यप्रदेश सरकार हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र के तर्ज पर खिलाड़ियों को सुविधाएं दें ।

इस खेल को 1977 में ही विक्रम अवॉर्ड के लिए पुष्पा केंकरे मिल गई थीं। उसके बाद एक बाद एक नाम इस फेहरिस्त में जुड़ते गए। जिसमें जगमीत खनूजा, किरण नकुल, कलावती यादव, पूजा जैन, उज्जवला काठमोरे और नीतू सिंह का नाम प्रमुख है।

टेबल-टेनिस में कामयाबी

हॉकी और क्रिकेट में ही नहीं दूसरे खेलों में भी महिला खिलाड़ियों ने अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। इंदौर में जन्मी रीता जैन 1972 से 75 तक जूनियर गर्ल्स टेबल टेनिस की प्रमुख खिलाड़ी रहीं। उन्होंने उत्तर कोरिया और जापान में प्रतिनिधित्व कर विक्रम अवॉर्ड हासिल किया। इधर, अपने सुनहरे दौर को याद करते हुए विक्रम अवॉर्डी ज्योति मेहता कहती हैं, “पहले का दौर आज के दौर से अच्छा था, पहले सुविधाएं नहीं थी लेकिन ग्राउंड पर पसीना बहाना और समर्पण ज्यादा था। आज के दौर के बच्चे सुविधा संपन्न जरूर हैं लेकिन उनका ध्यान एक जगह ना होकर हर तरफ जाता है। यही वजह है कि आज के खिलाड़ी वो मुकाम नहीं हासिल कर पा रहे हैं। उन्होंने माना कि खेल को लेकर शुरू से ही सरकार और परिवार का सह योग मिलता रहा और वे अपने मकसद में कामयाब हो पाईं ।

वहीं 1997 में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी स्निग्धा मेहता राष्ट्रीय टेबल टेनिस में रजत पदक जीत चुकी हैं। स्निग्धा समेत विक्रम अवॉर्ड हासिल करने वालों में उज्जवला महादिक, रिंकु गुप्ता, सीमा ताई, अंतिमा मित्तल और मेघा देशपांडे का नाम प्रमुख है। इस दौर की खिलाड़ियों की बात करें तो एकलव्य अवॉर्ड से सम्मानित अनुषा कुटुम्बले, दिया चितले, सुतीर्था मुखर्जी, अर्चना कामत, तकमी सरकार और कौशानी नाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है ।

स्वर्ण पर निशाना साधती प्रदेश की बेटियां

शूटिंग में राज्य की महिला खिलाड़ियों ने कामयाबी की मिसाल कायम की है। हॉकी, क्रिक्रेट और खो-खो के बाद शूटिंग की ऐसा खेल में जिसमें राज्य की बेटी राजकुमारी राठौर को अर्जुन अवॉर्ड प्राप्त करने का गौरव हासिल है। वर्तमान में ओलंपिक की तैयारियों के मद्देनज़र मध्यप्रदेश शूटिंग अकादमी की सुनिधि चौहान और चिंकी यादव इंडिया कैंप में विदेशी कोच से ट्रेनिंग हासिल कर चुकी हैं ।

देश को पिस्टल शूटिंग में ओलंपिक कोटा दिलाने वालीं भोपाल की चिंकी यादव को 2019 के विक्रम अवॉर्ड से नवाजा गया है। चिंकी ने पहली बार साल 2012 में समर कैंप में शूटिंग रेंज में खिलाड़ियों को अभ्यास करते देखा और उसके बाद शूटिंग प्रशिक्षक वेदप्रकाश पिलानिया से इस खेल की बारीकियां सीखने लगीं। चिंकी ने 10 मीटर स्पोर्ट्स पिस्टल से शुरुआत की। सामान्य कद काठी की चिंकी पहले तो पिस्टल की आवाज से डर जाती थीं। लेकिन हिम्मत और जज्बे की बदौलत 2013 में 25 मीटर पिस्टल में अभ्यास शुरू किया और बीते साल दिल्ली में नेशनल गोल्ड मेडल टीम इवेंट में और कांस्य पदक व्यक्तिगत स्पर्धा में जीता। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में तीन स्वर्ण, दो रजत और पांच कांस्य पदक देश को दिलाने वाली चिंकी ने राष्ट्रीय शूटिंग प्रतियोगिता में 6 स्वर्ण, 7 रजत और 9 कांस्य पदक अर्जित किए हैं. चिंकी का सपना ओलंपिक में देश को पदक दिलाना है।

प्रतिभा किसी को आगे बढ़ने से कभी नहीं रोक सकती है, बस आगे बढ़ने का जूनून होना चाहिए। भोपाल की सुनिधि  चौहान  ने भी कभी नहीं सोचा था कि वह रायफल शूटिंग में ओलम्पिक कोर ग्रुप में थर्ड पोजिशन प्राप्त कर पाएंगी। श्रमिक की बेटी सुनिधि को बचपन से ही शूटिंग से लगाव था ।वह जब कॉलेज में पहुंची तब एनसीसी में रहकर उनकी रायफल चलाने की हसरत पूरी हुई और यहाँ रहकर सुनिधि को राष्ट्रीय स्पर्धा में प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मिला। उनकी शानदार प्रतिभा से प्रभावित एनसीसी कमांडर आफीसर ने उन्हें शूटिंग खेल में कैरियर बनाने के लिए मध्य प्रदेश शूटिंग अकादमी में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

सुनिधि ने वर्ष 2017 में खेल अकादमी में ट्रायल दिया और उनके अच्छे प्रतिभा प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें मध्य प्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी में प्रवेश मिल गया। सुनिधि की लगन और परिश्रम से उन्हें वर्ष 2018 में त्रिवेन्द्रम में 62वीं एनएससीसी शूटिंग प्रतियोगिता में प्रदर्शन का अवसर मिला और उन्होंने पहला कांस्य पदक अर्जित किया। वर्ष 2019 में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय के.एस.एस.एम.एस.सी. काॅम्पटीशन में मध्य प्रदेश के लिए रजत पदक अर्जित किया। बीते साल सुनिधि ने नेपाल में आयोजित साउथ एशियन गेम्स काठमाण्डू में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को स्वर्ण पदक दिलाया।

बड़े तालाब में पिता के साथ मछली पकड़ते-पकड़ते भोपाल से सटे गोरेगांव की ट्रैप शूटर मनीषा कीर अर्जुन की तरह उड़ती चिड़िया पर निशाना लगाने लगीं। 2018 में 52वीं ISSF वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में मनीषा ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए वर्ल्ड रिकार्ड की बराबरी की और देश को रजत पदक दिलवाया। इस पदक के साथ ही मनीषा वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाली पहली महिला भी बन गईं। 2016 में फिनलैंड में हुए जूनियर शॉटगन कप में मनीषा गोल्ड जीत चुकी हैं. नैशनल और इंटरनेशनल इवेंट में हिस्सा लेकर अब तक मनीषा ने कई मेडल झटके हैं। आठ भाई-बहनों में से एक मनीषा अपनी बहन की बदौलत इस खेल में आईं। वे कहती हैं, “ मछली भेदना मैंने पिता से सीखा था जिसमें बहुत सब्र और तेज़ नजर की ज़रूरत होती है। यही तकनीक मुझे शूटिंग में मददगार साबित हुई।” कभी परिवार का पेट पालने में पिता की मदद करने वाली लड़की से आज देश को ओलंपिक में मेडल की उम्मीद है।

इस खेल में 2002 में पहली बार राजकुमारी डोंडिया को पहला विक्रम अवॉर्ड मिला। इसके बाद पूर्णिमा झझाणें, शिवांगी झलानी, सुरभि पाठक, वर्षा वर्मन, शालिनी संकध, अनम वासित और चिंकी यादव के नाम प्रमुख हैं.

तीरंदाजी में अचूक निशाना

मुश्किलों  से हार कर बैठ जाने वाले मंजिल नहीं पाते, जो हालात से लड़ते हैं जीत उन्हीं की होती है। कुछ कर दिखाने की जिद ही थी एक सामान्य परिवार की बेटी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है और पूरा राज्य उसकी बदौलत गौरान्वित है। एशियाड की सिल्वर मेडलिस्ट जबलपुर की मुस्कान किरार जब मध्यप्रदेश तीरंदाजी अकादमी में चुनी गईं तब वे पहली बार धनुष तक नहीं उठा पाई थीं। उन्हें धनुष की प्रत्यंचा खींचने में 6 माह लग गए थे। रोजाना 6 से आठ 8 घंटे तक ग्राउंड पर पसीना बहाने वाली मुस्कान को राज्य का सर्वोच्च सम्मान विक्रम अवॉर्ड का तमगा हासिल है। मुस्कान उस समय चर्चा में आईं जब उन्होंने 18वें एशियन गेम्स की तीरंदाजी कंपाउंड टीम इवेंट में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। इसके साथ ही वे एशियन गेम्स में हॉकी छोड़कर किसी दूसरे खेल में पदक जीतने वाली मध्यप्रदेश की पहली खिलाड़ी बन गई हैं। इससे पहले मुस्कान ने थाईलैंड में हुए एशिया कप में भारत को स्वर्ण और कांस्य पदक दिलाया था। मुस्कान ने टर्की में वर्ल्ड कप स्टेज-2 में भी देश को रजत पदक दिला चुकी हैं। मध्य प्रदेश राज्य तीरंदाजी अकादमी जबलपुर में वर्ष 2016 से तीरंदाजी  का अभ्यास कर रहीं मुस्कान किरार भुवनेश्वर में आयोजित 37वीं सब जूनियर राष्ट्रीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर चैंपियन बनी थीं। 15 साल की उम्र में जबलपुर स्थित रानीताल राज्य तीरंदाजी अकादमी में पहली बार प्रवेश पाने के बाद मुस्कान ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अकादमी में मुख्य कोच रिचपाल सिंह सलारिया ने मुस्कान के खेल को तराशा है। दो बहनों और एक भाई में मुस्कान सबसे बड़ी है। दिलचस्प बात यह है कि मुस्कान की छोटी बहन भी राज्य तीरंदाजी अकादमी में अभ्यास करती हैं। मुस्कान किरार पिछले साल ही एशिया कप तीरंदाजी में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने कंपाउड कैटेगिरी फाइनल मुकाबले में 139 पॉइंट के साथ मलेशिया की प्लेयर को पीछे छोड़ा। यह मेडल उन्होंने थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में जीता था। मुस्कान को इस सफलता के लिए अपनी पढ़ाई से समझौता करना पड़ा। मुस्कान की  ख्वाहिश एशियाड में देश  को रिप्रेंजट करने की है। मुस्कान ने नीदरलैंड्स में आयोजित 2019 विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप के कंपाउंट टीम इवेंट में भारत को कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया था।

मुस्कान किरार के अलावा तीरंदाजी में सृष्टि सिंह, अनुराधा और लक्षिता फिरके राज्य की झोली में अपनी तीरों से एक के बाद एक पदक डालकर सितारा बनी हुई हैं ।

पानी से सोना निकालने की कोशिश

कैनोइंग कयाकिंग

कहते हैं पानी से पार पाना बहुत मुश्किल है लेकिन उसी पानी में मेहनत कर एक छोटे से जनजाति बाहुल्य जिला डिंडौरी की राजेश्वरी कुशराम ने सम्मान हासिल किया है। किसान परिवार में जन्मी राजेश्वरी को बचपन से तैराकी का शौक था। 2013 में एक टैलेंट सर्च के माध्यम से इस खेल में कदम रखने वाली राजेश्वरी आज राज्य के सर्वोच्च सम्मान विक्रम अवॉर्ड से भी नवाजी जा चुकी हैं। इतना ही नहीं करीब 18 गोल्ड और 3 सिल्वर मेडल भी हासिल कर चुकी हैं। इस खेल में सबसे पहले विक्रम अवॉर्ड का तमगा विद्या रानी को 2011 में हासिल हो गया था। इनके अलावा अंजलि वशिष्ट, नमिता चंदेल को भी ये सम्मान हासिल हो चुका है।

इसी महीने भोपाल की छोटी झील में भारतीय कयानिंग एवं कैनोइंग महासंघ ने ओलंपिक क्वालिफाइंग चैंपियनशिप के लिए चयन ट्रायल किया। इसमें मध्यप्रदेश के 10 खिलाड़ी चयनित हुए। इंडिया कैंप के लिए मध्यप्रदेश कयानिंग एवं कैनोइंग की कावेरी ढ़ीमर, नमिता चंदेल, सुशीला चानू, अंजली वशिष्ट कीर्ति केवट, और सोनिया देवी ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए अपना नाम पक्का कर लिया है। चयनित खिलाड़ी ओलंपिक क्वालिफाई एवं एशियन चैंपियनशिप की तैयारी के लिए होने वाले इंडिया कैंप में प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। इस ट्रायल में देशभर से 83 खिलाड़ियों ने भाग लिया था। ओलंपिक क्वालिफाई एवं एशियन चैंपियनशिप का फाइनल क्वालीफाय राउंड अप 14 से 17 मार्च 2021 तक थाईलैंड के पटाया में खेला जाएगा।

इन खिलाड़ियों में एक नाम एकलव्य अवॉर्डी कीर्ति केवट का है, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर 30 से ज्यादा स्वर्ण, 9 रजत और 5 कांस्य पदक हासिल किए हैं। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्पार्धाओं में एक-एक रजत और कांस्य पदक जीते हैं। लेकिन इस अवॉर्ड तक पहुंचने का सफर मुश्किल भरा रहा है ।आलम ये रहा कि  तैराक खिलाड़ी कीर्ति केवट के खेल में आने की वजह से उनके पिता ने उनसे बातचीत तक बंद कर दी थी ।दरअसल वे कीर्ति को खेल में भेजना ही नहीं चाहते थे। पिता के विरोध और मां की चुपके से मदद ने बेटी को खेल तक पहुंचाया। पिता का विरोध इतना था कि उन्होंने बेटी से बात करना ही बंद कर दिया था। लेकिन बेटी की सफलता और समर्पण के आगे पिता को झुकना ही पड़ा।

ऐसी की कुछ मुश्किलें मुस्लिम समाज से होने के चलते टीकमगढ़ की नाजिस मंसूरी को भी झेलनी पड़ीं। गरीबी और संघर्षों से लड़कर आखिरकार अपनी मंजिल हासिल कर ली। एशियन गेम्स में नाजिस  स्टार खिलाड़ी रहीं।

सेलिंग

होशंगाबाद की इंटरनेशनल सेलिंग खिलाड़ी हर्षिता तोमर ने एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया है। इसी के साथ ही सेलिंग में मेडल जीतने वाली देश की सबसे छोटी महिला सेलर बनने का खिताब भी हर्षिता के नाम दर्ज है। 2013 में हर्षिता भी टैलेंट सर्च के दौरान हर्षिता का सफर सेलिंग के लिए शुरू हुआ। एकेडमी में प्रवेश पाने से पहले हर्षिता ने सेलिंग शब्द तक नहीं सुना था। एकेडमी में रहते हुए उन्होंने बड़ी झील में कोच जीएल यादव से इस खेल को सीखा और बहुत ही छोटी अवधि में न केवल एशियाड तक का सफर तय किया बल्कि मेडल भी जीता। किसान परिवार की बेटी का सपना अब ओलंपिक में पदक जीतना है।

मध्यप्रदेश में बहुत से लोगों ने ड्रैगन बोट के बारे में नहीं सुना होगा और ना ही देखा होगा लेकिन एशियन गेम्स 2018 के ड्रैगन बोट इवेंट में हिस्सा लेने वाली भारतीय टीम में आधे से ज्यादा खिलाड़ी मध्यप्रदेश के थे। वहीं रोइंग में विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित रुक्मणि दांगी हों या सोना कीर, विंध्या संकट, खुशप्रीत कौर, सविता दांगी, मोनिका भदौरिया, ज्योति कुशवाहा या फिर जाह्नवी श्रीवास्तव सबने एक से बढ़कर एक करिश्मा दिखाया है।

तैराकी में महिला खिलाड़ियों का कमाल

बात तैराकी की करें तो 1976 में सरला सरवटे अपना नाम इतिहास में दर्ज करा चुकी हैं। मीना पटेल, मनीषा गुप्ता, अनिता कसबे, संहिता हरदास, श्वेता गोगरे, श्रुति श्रीवास्तव, प्रथा क्षीरसागर और विनीता पाठक ने अपने कारनामे से देश का मान बढ़ाया है।

अब पात एक ऐसे खिलाड़ी की जो लोगों के लिए मिसाल है। बात हो रही है इंटरनेशनल पैरा खिलाड़ी रजनी झा की। रजनी जब एक साल की थीं, तब उन्हें पोलियो हो गया था। डॉक्टर के कहने पर 6 साल की उम्र में स्वीमिंग शुरू की। स्वीमिंग से कुछ फायदा हुआ तो इसे खेल के रूप में अपना लिया। रजनी ने साल 2000 में अपना पहला नेशनल ग्वालियर में खेला, जिसमें उन्हें एक सिल्वर और एक ब्रांज मेडल मिला। अब तक 95 नेशनल और 8 इंटरनेशनल पदक जीत चुकी हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने एकलव्य और विक्रम अवॉर्ड से नवाज चुकी है। इन्हीं पदकों के दम पर खेल कोटे से रजनी परिवहन निगम में क्लर्क हैं।

ढाई किलो का हाथ और मुक्केबाजी के पंच

मुक्केबाजी ऐसा खेल है जिसमें कुछ ही लोग अपनी बेटियों को भेजने का दम दिखा पाते हैं। पहली बात तो बेटी को रिंग में मुक्के बरसाते और दूसरी बात बेटी के सुकोमल हाथों को फौलाद जैसा देखना कुछ अभिभावकों की मानसिकता को चोट पहुंचता है। लेकिन ये लड़कियों की जिद और समर्पण का नतीजा है कि विश्व चैंपियनशिप हो या राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धा या फिर गोल्डन ग्लोन बॉक्सिंग प्रतियोगिता हर जगह पदक जीतकर ही दम लिया है।

बॉक्सिंग में विक्रम अवॉर्ड का सूखा हिमाचल की कृष्णा थापा ने खत्म किया। जिन्हें 2010 में विक्रम अवार्ड से नवाजा गया। कृष्णा के बाद अभी तक किसी और खिलाड़ी को ये सम्मान हासिल नहीं हुआ है। टैंलेंट सर्च के दौरान हिमाचल की रहने वाली कृष्णा थापा भोपाल के बॉक्सिंग एकेडमी पहुंची और मध्यप्रदेश को अपनी खेल भूमि बनाया। जहां उन्हें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई अवॉर्ड हासिल किए।

ऐसी ही एक खिलाड़ी हैं भोपाल की बीस साल की महिला मुक्केबाज श्रुति यादव, जिन्होंने पदक जीतने के जुनून में अपने पैर का घुटना चोटिल होने के बाद असहनीय दर्द को सहते हुए अंतर्राष्ट्रीय  प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पदक जीतकर दर्द को खुशी में तब्दील कर दिया। दरअसल दो साल के अंदर ही श्रुति के दोनों घुटनों का ऑपरेशन हुआ। एक समय श्रुति को ऐसा लगा कि उनका करियर खत्म हो जाएगा लेकिन परिवार और कोच रोशनलाल ने उनका हौसला बढ़ाया और अब रिंग में श्रुति होने वाले ओलंपिक के लिए घंटों पसीना बहा रही हैं।

मुक्केबाजी में एकलव्य अवॉर्ड प्राप्त कर चुकीं अंजलि शर्मा हों या दिव्या पवार, दीपिका वर्मा, दीपा कुमारी, मनी सिंह, सरिता सिंह, नैन्सी प्यासी, नंदिनी, पूर्णिमा राजपूत हों या फिर निशा यादव हों या जिज्ञासा राजपूत अपने मुक्के से चुनौती दे रही हैं। इस सभी खिलाड़ियों का सपना विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली मैरीकॉम की तरह आक्रामक खेल खेलकर खुद इतिहास बन जाने की है।

जूडो के दांव-पेंच में नहीं हैं पीछे

जूडो में सबसे पहले बात सीहोरा के कुर्रो पिपरिया गांव की जानकीबाई की जिन्हें विक्रम अवॉर्ड हासिल करने वाली प्रदेश की पहली ब्लाइंड जूडो खिलाड़ी का गौरव प्राप्त है। जानकीबाई की परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि प्राथमिक शिक्षा पूरी करने का सपना देख सकें। वे जब 5 साल की थीं तब उन्हें चिकन पॉक्स हो गया था। घरेलू इलाज के कारण उन्होंने आंखें गंवा दीं। लेकिन साल 2013-2014 जानकीबाई गौड़ की ज़िंदगी में रोशनी लेकर आया। जूडो संघ के माध्यम से जानकीबाई ने ट्रेनिंग शुरू की और प्रदेश की पहली महिला दृष्टि दिव्यांग जूडो खिलाड़ी बनीं। उन्होंने पांच राष्ट्रीय पदक जीते हैं। पहली बार 2016 में राष्ट्रीय पैरा जूडो प्रतियोगिता में रजत, 2017 में नेशनल ब्लाइंड एंड डेफ जूडो चैम्पियनशिप में महिला पैरा जूडो टीम का नेतृत्व किया और कांस्य पदक जीता है। हालांकि जूडो में पहली बार बबीता कठैत को राज्य का सर्वोच्च सम्मान 1991 में मिला था। इसके बाद टिनि तारे, कमला रावत, मीना स्वामी, बिट्टू शर्मा, संगीता शर्मा, दीप्ति सिंह भदौरिया और फरहत बानो की लंबी सूची है। इन खिलाड़ियों ने अपने-अपने दांव से देश का मान बढ़ाया है।

कराटे में पदक जीततीं बेटियां

ताकत के खेल कराटे ने राज्य को एक से बढ़कर एक खिलाड़ी दिए हैं। इसी कड़ी में पहली बार 2007 में शबा खान ने विक्रम अवॉर्ड हासिल कर राज्य का नाम रोशन किया। इस फेहरिस्त में मध्यप्रदेश कराटे अकादमी की सुप्रिया जाटव का नाम भी प्रमुखता लिया जाता है। बाह के पुरा चुन्नीलाल गांव की इस बेटी को यूएसए कराटे चैंपियनशिप में एलीट डिवीजन में सोना जीतने वाली देश की पहली कराटेबाज होने का तमगा हासिल है। सुप्रिया ने अपना कराटे का सफर गुजरात के अहमदाबाद से किया था। इसके बाद वे एक बाद एक कीर्तिमान गढ़ती चली गईं। दो बार कॉमनवेल्थ कराटे चैंपियन रही सुप्रिया एशियन कराटे चैंपियन कप भी जीत चुकी हैं। 2010 में एमपी टीम में सेलेक्ट होने वाली सुप्रिया कहती हैं, ‘खेलते समय कई बार चोटें लगीं। एक बार मां ने चिंता जताते हुए खेलने से मना किया था लेकिन आर्मी रिटार्ड पिता ने मुझे हमेशा मोटिवेट किया। आज मैं अपने पिता के कारण ये मुकाम हासिल कर पाई हूं.’ फिलहाल सुप्रिया ओलंपिक खेलों में गोल्ड मेडल जीतने की तैयारी कर रही हैं।

सुप्रिया के अलावा इस खेल में जागृति पटेल, संध्या चंद्राकर, रानी सिंघिया का नाम फक्र से लिया जाता है। वहीं एकलव्य अवॉर्ड से नवाजी जा चुकी गार्गी सिंह परिहार यूएसए ओपन कराटे चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल और जूनियर इंटरनेशनल कप में रजत पदक दिलाकर देश का मान बढ़ाया है।

वुशू मार्शल आर्ट में तप करती बेटियां

मार्शल आर्ट का एक स्वरूप है वुशू, जो अभी भारत में उतना लोकप्रिय नहीं है। इसके बावजूद सामान्य परिवार में जन्मीं दीक्षितपुरा निवासी पूर्वी सोनी तथा गोरखपुर की स्वेच्छ जाटव जिन्होने पहले कभी किसी को चांटा तक नहीं मारा था, आज उनकी तलवारबाजी और वुशु के मार्शल आर्ट देखकर लोग सिहर उठते हैं। हवा की तरह फुर्तीले अंदाज में इनके आटर्स ने अब तक अनेक गोल्ड मैडल अर्जित कराए हैं। नेशनल तथा इंटरनेशनल अनेक प्रतिस्पर्धाएं जीतने के बाद दोनों को विक्रम अवार्ड से नवाजी जा चुकी हैं। दोनों फिलहाल ऊर्जा विभाग में सरकारी नौकरी कर रही हैं।  शुरूआत में इस खेल को लेकर पूर्वी के पिता ने विरोध किया लेकिन मां के सपोर्ट के बलबूते पूर्वी ने खेल का सफर आरंभ कर दिया। अथक परिश्रम के बाद स्पर्धाओं का दौर शुरू हुआ और पूर्वी लगातार मैडल दर मैडल जीतती चली गईं। 2016 में उन्हें विक्रम अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2017 में इंटरनेशनल तथा नेशनल में गोल्ड मैडल अर्जित किया। हाल ही में दिसम्बर 2019 में पूर्वी ने एक गोल्ड, दो सिल्वर तथा एक कांस्य पदक अर्जित कर देश-प्रदेश के साथ ही समूची नारी शक्ति का मान बढ़ाया।

पूर्वी के घर जैसा ही माहौल स्वेच्छा के घर में भी था। सभी सीख देते थे कि लड़कियां मार-पिटाई का खेल नहीं करतीं, हालांकि स्वेच्छा के जज्बे के सामने सब बौने पड़ गए और उन्होंने वुशु मार्शल आर्ट के जरिए लगातार राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपना झण्डा लहराया। स्वेच्छा को 2017 में विक्रम अवार्ड प्रदान किया गया. इसके बाद स्वेच्छा को भी ऊर्जा विभाग में सरकारी नौकरी प्रदान कर दी गई। दिसंबर 2019 को जम्मू कश्मीर में आयोजित प्रतियोगिता में स्वेच्छा को 2 सिल्वर तथा 1 कांस्य पदक हासिल है। स्वेच्छा की चार में से तीन बहनें मार्शल आर्ट में ही हैं और वे भी तलवार बाजी में कई पदक जीत चुकी हैं।

इस खेल में पहली बार विक्रम अवॉर्ड नीलम मिश्रा के नाम है। उन्हें ये पुरस्कार 2007 में प्रदान किया गया था। इसके बाद मोनिका नामदेव, शिल्पा केथल, अंजलि कोष्टा और अंकिता रैकवार का नाम प्रमुख हैं।

राज्य की नम्रता बत्रा और अंशिता पांडे इस इस खेल में अपना दम दिखा रही हैं। इंदौर की खिलाड़ी नम्रता के नाम अनेक पद हैं उसमें से खास है एकलव्य अवॉर्ड। जूनियर खिलाड़ी होते हुए पहली बार जब नम्रता ने सीनियर वर्ग में हिस्सा लिया तो स्वर्ण पदक हासिल कर शहर का मान बढ़ा दिया।

छह सालों के तप के बाद जबलपुर की अंशिता पांडे को एकलव्य अवॉर्ड पाने का गर्व हासिल हुआ। खेल की एक-एक बारीकी को समझा और उसे अमल में लाया। अन्य खिलाड़ियों के मुकाबले अंशिता ने अपने खेल को बेहतर बनाने के लए अधिक समय दिया। अंशिता ने नेशनल वुशू स्पर्धाओं में सात स्वर्ण, सात रजत और कांस्य पदक समेत 16 पदक जीते हैं।

शक्ति और संतुलन का भारतीय खेल मलखंभ

अब बात मध्यप्रदेश के राजकीय खेल मलखंभ की। मलखंभ यानि योग का एक्सटेंशन। दोनों में फर्क ये है कि योग ज़मीन पर होता और मलखंभ या तो रस्सी पर या फिर पोल पर होता है। ये आमतौर पर दो से 10 फीट ऊपर होता है। ये मार्शल आर्टस और जिमनास्टिक्स का मिला जुला स्वरूप है। गुरुत्वाकर्षण नियम के विपरीत का खेल है इसलिए थोड़ा कठिन होता है लेकिन ये खिलाड़ी को अतिरिक्त शक्ति और संतुलन भी सिखाता है. इस खेल की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में इसका जिक्र किया था कि ये खेल 20 से ज्यादा देशो में प्रसिद्ध हो रहा है।

द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित उज्जैन के मलखंभ कोच योगेश मालवीय के मुताबिक इस खेल में लड़कों के बजाए लड़कियों की तादाद ज्यादा है। यहां तक कि एनएसडी की दो लड़कियां उनके सेंटर में इसको सीख रही हैं।

वहीं पुरुषों के एकाधिकार वाला यह खेल मालावा की छोटी सी नगरी खाचरोद की यशोदा के खून में बहता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर 8 सिल्वर और 8 ही ब्रॉन्ज मेडल हासिल कर चुकी इस खिलाड़ी को 2010 में एकलव्य अवॉर्ड और 2014 में प्रभाष जोशी पुरस्कार से नवाजा गया है। हालांकि अभी तक इस खेल में किसी महिला खिलाड़ी को विक्रम अवॉर्ड हासिल नहीं है फिर यशोदा की तमन्ना इस तमगे को चूमने की है.

अन्य खेलों में भी अव्वल रही बेटियां

मध्यप्रदेश हर खेल में अपना नाम दर्ज कर रहा है. एथलेटिक्स की बात करें तो विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित अमिता अकोलेकर से लेकर चांदनी श्रीवास्तव तक सुनहरा पीरियड राज्य को देखने को मिला है। वहीं शहर की उड़नपरी कहलाने वाली बुशरा खान ने राष्ट्रीय जूनियर एथलेटिक्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए मध्यप्रदेश को न सिर्फ स्वर्ण पदक दिलाया बल्कि नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बना चुकी हैं।

बैडमिंटन में पार्थी गांगुली ने 1973 में विक्रम अवॉर्ड प्राप्त राज्य की लड़कियों के सपनों को उड़ान दे दी थी। इसके बाद अनिता मदान, वंदना चिपलूनकर, सीमा भंडारी और पूनम तत्वादी ने अपनी उपस्थिति इस खेल में दर्ज करवाई है। वहीं 1980 में प्रभा निगम ने विक्रम अवॉर्ड हासिल कर लड़कियों के लिए इस खेल के दरवाजे खोल दिए थे। चाहे वो इंदिरा श्रीवास, दीपा वर्मा, मधुबाला ठाकुर, चंद्रलेखा राठौर, अर्चना अग्रवाल हों या भारती वैस, रेखा पदम हों या फिर रोजी मिटिल्डा ने इस सर्वोच्च सम्मान को हासिल को राज्य का नाम रोशन किया है ।

घुड़सवारी में अधिकतर पुरुषों का ही दबदबा होता है लेकिन इस राज्य की बेटी सीमा वर्मा ने 1981 में ही अपना दावा ठोंक दिया था। इस खेल में पहला महिला विक्रम अवॉर्ड उन्हीं के नाम है. इसके बाद अभीतक इस खेल में किसी को भी ये सम्मान नहीं मिल पाया है। हालांकि मध्यप्रदेश घुड़सवारी अकादमी की खिलाड़ी आकांक्षा विश्वकर्मा ने कम समय और मुश्किल हालातों में दस से ज्यादा पुरस्कार हासिल कर मिसाल कायम की है। महज छह दिन की उम्र में मां और सात साल की उम्र में पिता खोने वाली आकांक्षा शेल्टर होम में रहीं और वहीं से घुड़सवारी में कदम रखा ।आकांक्षा बताती हैं कि घुड़सवारी अकादमी ने उन्हें नया जीवन दिया है और अब उनका लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश को मेडल दिलाना है ।

बास्केटबॉल, पॉवरलिफ्टिंग, कुश्ती, ताइक्वांडो, हैंडबॉल, शूटिंगबॉल, थ्रोबॉल, फेंसिंग, सॉफ्ट टेनिस, और शतरंज में 1985 में किरण अग्रवाल ने विक्रम और एकलव्य अवॉर्ड प्राप्त शतरंज खिलाड़ी इंदौर की नित्यता जैन हों या सॉफ्ट बॉल में विक्रम अवॉर्ड हासिल कर चुकी नीलू गौड़ हों या पूजा पारेख, सभी अपने-अपने क्षेत्र में राज्य का नाम रोशन कर रही हैं.

और अब एक ऐसी खिलाड़ी की कहानी जो हौंसलों की मिसाल है. जिसके मुरीद सीएम शिवराज सिंह समेत लाखों लोग हैं. बात तान्या डागा की हो रही है. राजगढ़ के ब्यावरा शहर की रहने वाली देश की पहली महिला पैरा साइक्लिस्ट तान्या ने एक पैर से साइकिल चलाकर जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक 2800 किलोमीटर का सफर तय करके इतिहास रच दिया है. 19 नवंबर 2020 से शुरू हुआ ये सफर 31 दिसंबर को पूरा हुआ. इस दरम्यान कई मुश्किलें भी आईं. यात्रा के बीच ही उनके पिता की मौत हो गई लेकिन परिवार ने उन्हें राइड पूरी करने की हम्मत दी. तान्या को बीएसएफ ने भी सम्मानित किया है.

और आखिर में बात खूबसूरत जोड़े की, जिसने 18 जनवरी 2021 को भोपाल के छोटे तालाब में नेशनल पैरा केनो चैंपियनशिप में मनीष कौरव और प्राची यादव कौरव ने डबल गोल्ड मेडल जीते. जन्मजात दिव्यांग दोनों ग्वालियर के रहने वाले हैं और इंटरनेशनल प्लेयर हैं. तीन साल पहले छोटी झील में ट्रायल के दौरान दोनों की मुलाकात हुई और आठ महीने पहले ही लॉकडाउन में दोनों ने लव मैरिज कर ली. अब अपने खेल को निखार रहा ये जोड़ा वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व करेगा.

आज चाहे ग्लैमर का खेल टेनिस हो, क्रिकेट हो या फिर जमीन से जुड़ा खेल कुश्ती, मध्यप्रदेश की धरती ऐसी है कि यहां हर खेल लोकप्रिय हो रहा है. खिलाड़ियों की किसी भी स्थिति में चोटी तक पहुंचने को कोशिश और मध्यप्रदेश सरकार के अथक प्रयास ही हैं कि मध्यप्रदेश खेलों में एक रोड मॉडल बनकर उभरा है. मध्यप्रदेश में खेल का जुनून ही है कि 2006 में जहां खेल बजट 5 करोड़ का था अब वह 150 करोड़ रुपये हो गया है. लेकिन मध्यप्रदेश को खेलों में और निखार के लिए गांवों में छुपी प्रतिभा को ढूंढ़ने की ज़रूरत है, साथ ही अगर खेलों को ग्लैमर और पैशन से जोड़ दिया जाए तो महिला खिलाड़ी ग्राउंड पर पसीना बहाती ज्यादा दिखेंगी। और वो दिन भी दूर नहीं जब प्रदेश की बेटी के गले में ओलंपिक का स्वर्ण पदक दिखाई देगा।

लेखिका पत्रकार हैं ।

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