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मप्र की महिलाओं द्वारा प्रकाशित-सम्पादित पत्र-पत्रिकाएँ

मप्र की महिलाओं द्वारा प्रकाशित-सम्पादित पत्र-पत्रिकाएँ

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मप्र की महिलाओं द्वारा प्रकाशित-सम्पादित पत्र-पत्रिकाएँ

•  अंजना त्रिवेदी

भारत में महिला पत्रकारिता की शुरुआत एक अंग्रेज महिला श्रीमती प्रिटचार्ट से होती हैं जिन्होंने 1833 में प्रकाशित ओरियन्टल ऑब्ज़र्वर – जिसका नाम बाद में इंग्लिशमैन हो गया था, की जिम्मेदारी सम्हाली। इसके पूरे पन्द्रह वर्षों बाद भारतीय भाषा की पहली महिला पत्रकार मोक्षदायिनी देवी ने कोलकाता से सन् 1848 में ‘बांग्ला महिला’ नामक पत्रिका निकाली। महिला पत्रकारों के लिये भी बंगाल की धरती ही प्रथम पाठशाला रही है। गिरीन्द्रमोहिनी देवी (1856-1934) ने ‘जाह्नवी’ नामक बंगला पत्रिका का तीन वर्षों तक सफल सम्पादन किया और उषाप्रभा दत्त ने अगस्त 1863 में ‘बामा बोधिनी’ निकालकर महिला पत्रकारिता को गति प्रदान की। महिला पत्रकारिता मध्य प्रदेश में 1888 से शुरू होती है। लगभग डेढ़ सौ वर्षों की इस यात्रा में कुछ महिला संपादकों ने अपनी कलम से पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ते हुए महिलाओं के अधिकार, उनकी शिक्षा और उनकी नागरिक हैसियत को जगह देते हुए और उनके सपनों को पंख दिए और भावी महिला पत्रकारों के लिए नये रास्ते बनाए। इस लेख हम चर्चा करेंगे मध्यप्रदेश की महिलाओं द्वारा प्रकाशित उन पत्र-पत्रिकाओं की जिन्होंने वर्तमान पत्रकारिता की बुनियाद तैयार की।

सुगृहिणी (1888):  हिन्दी की पहली महिला संपादक बंगभाषी हेमंतकुमारी देवी चौधरी ने फरवरी 1888 में रतलाम से सुगृहिणी निकालकर मध्यप्रदेश को हिन्दी महिला पत्रकारिता का जनक होने का गौरव दिलाया। प्रदेश में छपाई की अच्छी व्यवस्था नहीं होने के कारण उनकी पत्रिका लाहौर, लखनऊ और प्रयाग से छपा करती थी। सुगृहिणी हिन्दी क्षेत्र की महिलाओं की दुर्दशा में सुधार लाने के उद्देश्य से निकाली गई थी। इसके प्रथम अंक में अपील छपी थी- हे प्यारी बहनों! द्वार खोल देखो, तुम्हारे यहां कौन आई है ? तुम लोग क्या इसे पहचानती हो ? यह भी तुम्हारी एक भगिनी है। इसका नाम सुगृहिणी है। तुम्हारे दु:खों को देखकर तुम्हें अज्ञानता और पराधीनता में बद्ध देखकर तुम्हारी यह बहिन तुम्हारे द्वारे पर आई है।

हेमंतकुमारी चौधरी देवी स्त्री शिक्षा और हिन्दी भाषा की प्रबल पक्षधर थीं। यही कारण है कि सुगृहिणी में वे हिन्दी को आदर कैसे मिल सकता है इस पर टिप्पणी करती हैं कि  “कलकत्ता, बंबई प्रभृति देश की स्त्रियों ने यूनिवर्सिटी की उच्च परीक्षाओं को पास करके पुरुषों के समान उपाधि ग्रहण की है परंतु आज तक किसी हिन्दू, हिन्दुस्तानी स्त्री ने यूनिवर्सिटी की परीक्षा नहीं दी, इसका भी एक कारण है कि उक्त देशों की यूनिवर्सिटी में बंगाली, मरहट्टी समादृत हैं, यदि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भी हिन्दी रहे तो स्त्रियों के लिए भी एंट्रेंस की परीक्षा पास करने के निमित्त अनुराग और प्रयत्न होगा।” स्त्रियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से सुगृहिणी में इन लड़कियों की नामावली नियमित रूप से छपा करती थी जो देश के विभिन्न हिस्सों से परीक्षाएं उत्तीर्ण करती थी। जुलाई 1888 में छपा यह समाचार इस कथन की पुष्टि करता है-बंबई के एक भलेमानस ने विज्ञापन दिया कि जो हिन्दू स्त्री एल.एम.एम की परीक्षा पास करके उसके बाद डाक्टरी का काम करेगी उसे वे 15 रु. मासिक वृत्ति देंगे। एक अंक में लिखा गया है ‘‘हमारी सुगृहिणी पत्रिका की हिताकांक्षिणी और लेखिका श्रीमती हरदेवी, लंदन से अपने भाई के साथ स्वदेश में लौट आई हैं। आशा है कि हमारी श्रद्धेया बहन ने इतने दिन लंदन में रहकर जिन-जिन विषयों में उच्च शिक्षा लाभ की है उनसे अपनी देशवासिनी बहनों को उपकार पहुँचाएंगी। ईश्वर उनके सहाय हो।‘‘

सुगृहिणी का प्रकाशन जिस युग में हुआ, उस समय हिन्दी में पत्र – पत्रिकाएं निकालना आसान नहीं था। ऐसे समय में मध्यप्रदेश की धरती से किया जाने वाला हेमंतकुमारी देवी का यह प्रथम प्रयास अविस्मरणीय है, पर हिन्दी भाषियों और इस प्रदेश से उन्हें जो सहयोग मिलना चाहिये था वह नहीं मिला। पत्रिका के प्रकाशन की कठिनाइयों की जानकारी मैनेजर द्वारा बार-बार चंदा देने की अपील से हो जाती है। चौथे वर्ष के प्रथम अंक में मैनेजर का निवेदन छपा था- ‘पाठिका, सुगृहिणी केवल तीन वर्ष की बालिका है। इस छोटी उम्र में बिचारी पर जैसी विपद की आंधी बीती है, इसके पुन: प्रकाशन की आशा नहीं थी। परंतु धन्य है उस विपदहारी भगवान को जिसने इसकी रक्षा की। अब हमारी पाठक-पाठिकाओं से प्रार्थना है कि इस विपद के समय कृपा दृष्टि कीजिए। प्राय: 300/- रुपये ग्राहक-ग्राहिकाओं के निकट प्राप्य हैं।…. ऋणग्रस्त रहकर पत्रिका प्रकाश करना बड़ा कठिन कार्य है। जिस देश की स्त्रियां धर्म लाभ के लिए तीर्थयात्रा और ब्राह्मण भोजन में हजारों रुपये दान करती हैं, उनके निकट से इस क्षुद्र पत्रिका की वार्षिक एक रुपये न्योछावर प्राप्ति की आशा करना अनुचित नहीं।’ यह अपील सिद्ध कर देती है कि हिन्दी क्षेत्र में प्रारंभ से ही खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति नहीं रही। सुगृहिणी के मैनेजर के अनुरोध से यह भी समझा जा सकता है कि यहां अशिक्षा के कारण महिलाओं में पत्रकारिता को लेकर किसी प्रकार की कोई रुचि नहीं थी और ना ही ऐसा कोई वातावरण ही था, जिससे पत्र पत्रिकाओं में महिलाओं की उपस्थिति दर्ज होती। परिणामत: अगले पड़ाव तक पहुंचने में उसे पूरे 14 वर्षों का समय लगा।      

आर्य वनिता (1902): इस मासिक पत्रिका से सम्बंधित विस्तृत जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर द्वारा रचित भारतीय पत्रकारिता कोष में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का सन्दर्भ देते हुए छोटा सा उल्लेख मात्र मिलता है कि “ पंडिता सुमित्रा देवी के संपादन में 1902 में हिंदी मासिक पत्रिका ‘आर्य वनिता प्रकाशित हुई|’ पंडित माधवराव सप्रे के प्रसिद्ध पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के वर्ष 3 अंक 6 पृ. 172 पर संपादक द्वारा प्रकाशित पत्र का विवरण इस प्रकार है –

आर्य वनिता मासिक पत्रिका,  श्रीमती पंडिता सुमित्रादेवी द्वारा सम्पादित इस पुस्तक को पाकर हम अत्यंत हर्षित हुए हैं। इसकी संख्या 2 में लाज और परदा तथा आर्य पत्नी के कर्तव्य  (छत्तीसगढ़ मित्र से उद्धृत) अच्छे लेख हैं। यदि यह पत्र कुछ दिनों  तक जीवित रहे तो स्त्रियों को उससे बड़ा लाभ पहुंचेगा। अभी तक हमारे पास इसकी प्रथम संख्या नहीं आई और न तीसरी संख्या के बाद फिर दर्शन ही हुआ। सप्रेजी ने पत्र के लिये जो कामना की थी वह फलीभूत नहीं हुई और सुमित्रादेवी का प्रयास अल्पकालिक ही रहा। लगभग तीस वर्षों तक फिर इस प्रदेश में किसी भी महिला पत्रकार की पदचाप सुनाई नहीं दी।  10 सितम्बर 1931 में जयाजी प्रताप के पृ. 13 पर चन्द्रकला सहाय बी.ए के बारे में पढ़ने को मिलता है- ‘ग्वालियर राज्य की कन्या धर्म वर्धिनी सभा ने स्त्रियों की लेखन शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से ‘महिला’ नाम की त्रैमासिक पत्रिका निकालना निश्चय किया है। इसमें स्त्रियों के लिखे हुए लेख ही प्रकाशित हुआ करेंगे। पत्रिका का पहिला अंक अक्टूबर सन् 1931 ई. के अंतिम सप्ताह में निकालने का विचार है।’ परन्तु यह विचार कभी मूर्त स्वरूप में सामने नहीं आया।

राजकमल (1951): स्वतंत्र भारत के मध्यप्रदेश में सर्वप्रथम राजकुमारी बघेल द्वारा 1951 में जबलपुर से ‘राजकमल‘ नामक महिला पत्र निकाला गया। इस अख़बार के ऊपर लिखा है कि ‘महिलाओं का एकमात्र मुखपत्र’ इसके प्रथम अंक में ‘नारी क्रय विक्रय’ के एक समाचार पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा गया था, कि ‘‘पिछले कई दिनों से यह ख़बरें बराबर प्रसारित हो रही हैं कि शहर में ऐसे बहुत से गुप्त अड्डे हैं जहां पर भोली-भाली बालिकाएं बहला-फुसला कर लाई जाती हैं। कई मजबूरीवश भी आकर फंस जाती हैं। उन्हें बेचकर या उनसे व्यभिचार करने वाले कुछ नीच व्यक्ति अपना उल्लू सीधा करते हैं। प्रथम ही पुलिस का ध्यान इस ओर नहीं है, इसके विपरीत, पत्रों में चीखने-चिल्लाने पर दो जगह छापा मारा, अपराधी गिरफ्तार हुए किन्तु क्या कारण है कि पर्याप्त प्रमाण मौजूद रहते हुए भी वे कानून के कब्जे से मुक्त होकर स्वच्छंदता से पुनः अपना जाल बिछा रहे हैं। लेख के अंत में संदेश है- ‘धर्म, संस्कृति और नारी की उपेक्षा करके भारत वर्ष में कोई भी राजनीति पनप नहीं सकती। इस पत्र में, महिला विषयक मुद्दों को अत्यंत मजबूती से उठाया गया तथापि महिलाओं की मौजूदगी के लिहाज से इस कालखंड को  शून्यकाल ही कहा जाएगा। ‘राज कमल‘ पत्र ने कुछ हद तक इस शून्यता को भरने का प्रयास अवश्य किया है।

बेताल (1968): विभिन्न संदर्भों में 1968 में जबलपुर से प्रकाशित ‘त्रैमासिक परीक्षक‘ पत्रिका का उल्लेख मिलता है। इसके संपादक मंडल में उषा मित्तल, सरला माथुर रही थीं। इसके अंक अनुपलब्ध हैं एवं अन्य ऐतिहासिक विवरण भी प्राप्त नहीं होते। इसलिए इसकी विषय वस्तु आदि के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती।

1968 में ही ‘बेताल’ साप्ताहिक अखबार का भोपाल से प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसका संपादन ‘प्रभा रत्ना‘ कर रही थीं। टैब्लॉयड आकार के इस अख़बार में मुख्य रूप से चार पृष्ठ रहते थे और राजनीति घटना चक्र को प्राथमिकता देते हुए अलग-अलग समय में अलग-अलग सम्पादकीय देखने को मिलते हैं। ‘बेताल‘ के एक अंक में ‘भूमिगत जल’ पर गंभीर सम्पादकीय देखने को मिलती है।

शिवदेश (1971): 1971 में इन्दौर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘शिवदेश ‘ का प्रकाशन असफ़िया ख़ान ने किया। इस अखबार के कुल आठ पृष्ठ थे, जिसमें राजनीतिक घटनाचक्र एवं सामायिक घटना को प्राथमिकता दी गई थी।

नया नारा : वर्ष 1971 से ‘नया नारा’  का प्रकाशन भोपाल से होने लगा। यह साप्ताहिक समाजवादी अख़बार माना जाता था। इसका संपादन बालमुकुन्द भारती द्वारा किया जाता था। इसके उप संपादन का दायित्व सविता वाजपेयी जी ने उठाया। तब से लेकर आज तक इस अख़बार ने अपनी एक विशिष्ट शैली और मुद्दे के साथ वैचारिक क्रांति को अग्रसर करने का प्रयास किया। भोपाल से निकलने वाले साप्ताहिक सामाचार पत्र ‘नया नारा’ के 1982 के एक अंक में देखने को मिलता है -‘वीरांगना दुर्गावती अकबर के लिए चुनौती।’ ‘मण्डला जिले में स्वतंत्रता संग्राम’ ‘बैगाचक के विकास की प्राथमिक संरचना’ ‘वीरांगना दुर्गावती का परिचय। उपर्युक्त अंक मंडला ज़िले पर केन्द्रित था। ऐसा ही एक अंक मंदसौर ज़िले पर केन्द्रित था। 28 सितम्बर 1982 को बोहरा समाज पर विशेष अंक निकाला गया।

इसी प्रकार 1975 में उज्जैन से उषा भाटिया के संपादन में प्रकाशित कालिदास दर्शन, 1978 में छतरपुर से मृदुबाला जी के संपादन में प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘क्रांतिकृष्ण’ एवं 979 में भोपाल से शीला दुबे के संपादन में ‘तरुण दुनिया’ आदि भी उल्लेखनीय हैं।

तुरंत :1981 में साप्ताहिक समाचार पत्र ‘तुरन्त’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसका संपादन प्रभावती सिंह ने भोपाल से किया। आठ पृष्ठ का यह साप्ताहिक अखबार था। इस अख़बार पहली ही दृष्टि में प्रथम पृष्ठ पर गहरे शब्दों में लिखा नज़र आता है- ‘कलकत्ता इंका का ऐतिहासिक अधिवेशन’  एक कोने में छोटे अक्षरों से अखबार का नाम ‘तुरन्त’ लिखा था। यह देखने पर ‘कलकत्ता’ शीर्षक अखबार का आभास दिलाता है। समाचार पत्र के 5 पृष्ठों में राजनीति, सामाजिक मुद्दे एवं अपराध घटनाओं की विभिन्न खबरें और 3 पृष्ठ पर विज्ञापन थे।

मृदंग :1982 में ‘मृदंग’ साप्ताहिक अखबार प्रेमलता गुप्ता के संपादन में निकला। प्रेमलता गुप्ता अपना प्रकाशन ग्वालियर से करती थी। इस अख़बार की प्रथम पंक्तियां थी ‘नारी शक्ति जागरण का एकमात्र समाचार पत्र‘। यह पत्र समसामयिक राजनीति घटनाओं पर आधारित था। यह छह पृष्ठीय अख़बार था। इनमें सम्पादकीय नज़र नहीं आती।

रम्भा टाइम्स :1982 में ‘रम्भा टाइम्स’  का संपादन रम्भा शर्मा ने भोपाल से किया। इस अखबार के ऊपरी पृष्ठ पर पहली पंक्ति है, ‘विचारों का निष्पक्ष दर्पण।‘ यह शुरुआत में तो टेबलॉयड आकार में निकलता था बाद में नियमित आकार में निकलने लगा। यह अख़बार भी आम अख़बार की तरह राजनीति व समसामयिक घटना प्रधान था। इस अखबार में कविता, सरकारी योजनाओं की जानकारी, ज्ञान-विज्ञान की सामग्री होती थी। ‘रम्भा टाइम्स’ चौदह पृष्ठ का अख़बार रहा।

जनहित दर्शन :1982 में सुभद्रा देवी ‘पहारिया‘ छतरपुर से ‘जनहित दर्शन‘ नाम का प्रकाशन निकाल रही थी। यह अख़बार भी सामान्य अख़बारों की तरह था।

केन लहर : 1982 में ‘केन लहर‘ नाम का समाचार पत्र साजिदा बीवी ने छतरपुर और पन्ना से एक साथ प्रकाशित किया। इसमें समसामयिक ख़बरों का सिलसिला रहा है। नियमित आकर के चार पृष्ठ वाले इस अख़बार के सम्पादकीय पृष्ठ पर महिला का लेख देखने को मिलता है। ‘अधबीच‘ स्थायी स्तम्भ में ‘इक लेखक वर्ष बने न्यारा‘  शीर्षक से अरूणा शास्त्री द्वारा व्यंग्यात्मक आलेख लिखा गया। ऊषा अग्रवाल एवं हेमलता के भी लेख देखने को मिलते हैं।

बुरहानपुर टाइम्स :1983 में साप्ताहिक ‘बुरहानपुर टाइम्स’ का संपादन मालती प्रजापति ने किया। 3 फरवरी 1984 तक यह टैब्लॉयड आकार का अख़बार था, जिसमें आदिवासी अंचल की खबरों को प्रमुखता से स्थान दिया गया। जैसे-असभ्यता, सभ्यता की जननी है, आदिवासियों में गुदना, आदिवासियों के विषेष त्योहार, बच्चों की दुनिया, कोरकू आदिवासियों के देवी देवता, निमाड़ का परम्परागत लोकनाट्य ‘लाठी’, सतपुड़ा के कोरकू आदिवासी आदि।

उस दौर में महिलाओं द्वारा भी कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं सम्पादन किया जा रहा था । उदाहरण के लिए 1983 में वनमाला चतुर्वेदी के संपादन में प्रकाशित ‘’मेरा पत्र’ अखबार, 1984 में प्रेमलता पाण्डेय के संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका अखबार ‘जीवन वैभव’, 1984 में मणिकान्ता बोस द्वारा जगदलपुर से प्रकाशित आठ पृष्ठीय अखबार ‘बस्तरिया’, 1984 में आरती वर्मा द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक अखबार  ‘विचारों की दौड़’ एवं 1985 में सरिता सक्सेना के संपादन में इंदौर से प्रकाशित ‘राजपूत‘ नामक अख़बार आदि रेखांकित करने योग्य हैं।

अनसूया (1985): वर्ष 1985 में सेवा संस्था,अहमदाबाद की पत्रिका अनसूया का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। संस्था की प्रमुख इला भट्ट ने श्रमिक महिलाओं के हित में इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था। वर्ष 1985 में ही भोपाल के गाँधी भवन में ‘सेवा’ संस्था की बैठक चल रही थीं जिसमें सुप्रसिद्ध लेखिका ज्योत्स्ना मिलन भी पहुंची थीं। उसी समय इला भट्ट ने उन्हें पत्रिका के संपादन का कार्यभार सौंप दिया, जिसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक निभाया। अनसूया‘ पत्रिका का मुख्य उद्देश्य श्रमिक महिलाओं (दाईयों, ठेला लगाने वाली महिलाओं, बीड़ी, धूपबत्ती, रद्दी बटोरने वाली, बोझा ढोने वाली, खेत मजदूर आदि) से सम्बंधित जानकारी देना है। यह महिलाओं के श्रम, स्वरोजगार, शासकीय योजनाएं एवं संगठन की गतिविधियों पर आधारित मासिक पत्रिका है। 17-18 पृष्ठ की ‘अनसूया‘ पीडि़त दमित, दलित एवं कामगार महिला की आवाज़ बनी, साथ ही उनको सम्बल प्रदान भी किया। पत्रिका का मूल्यांकन करते समय यह साफ़ तौर से दिखायी देता है कि पत्रिका व्यवसायिकता के मद्देनजर नहीं रही है बल्कि उन महिलाओं का औजार बनी है जो कड़ी धूप में मेहनत कर दो जून की रोटी कमाती है। ऐसी महिलाओं के प्रति नीति-निर्माता क्या कर रहे है, क्या दिक्कतें आ रही हैं, कानूनी कार्यवाही क्या हो सकती है, इन सभी विषयों पर विस्तृत लेखों के साथ ही सफल महिलाओं की उपलब्धि की कहानियों को भी सम्मान के साथ जगह दी है। अनसूया का संपादन और प्रकाशन वर्तमान में प्रीति शांत द्वारा किया जा रहा है। 

ओजस्विनी (1993): वर्ष 1993 से से प्रकाशित ओजस्विनी की संपादक सुधा मलैया हैं। ओजस्विनी पत्रिका के हर अंक में महिला सशक्तिकरण के लिए उत्प्रेरक साहित्य को स्थान दिया जाता है। यह पत्रिका आम महिला पत्रिकाओं से अलग हटकर है। इसके  हर अंक में महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर संवेदनशील विश्लेषण एवं पड़ताल देखी जा सकती है।

अक्षर पर्व : ( 1998) वर्ष 1998 में रायपुर से अक्षर पर्व की शुरुआत हुई। इस साहित्यिक-वैचारिक मासिक पत्रिका की मूलभूत अवधारणा एवं रूपरेखा को मूर्त रूप देने का श्रेय स्वनामधन्य पत्रकार व विचारक स्व. श्री ललित सुरजन को जाता है। उनकी पुत्री सर्वमित्रा पारिवारिक माहौल के कारण पत्र-पत्रिकाओं की प्रकाशन प्रक्रिया से लेकर सामग्री नियोजन एवं संपादन तक सभी कार्यों से आयु के साथ-साथ अवगत होती चली गईं। वे कहती हैं पत्र-पत्रिका एवं उनसे जुड़े काम बचपन से हमारे जीवन का जरुरी हिस्सा रहा है, इसलिए हमें कभी ऐसा लगा ही नहीं कि मुझे इस काम को अलग से सीखने की जरुरत है। सर्वमित्राजी वर्ष 2004 से बतौर सम्पादक अक्षर पर्व में जिम्मेदारी निभा रही हैं। इस पत्रिका ने कम समय में बड़ा स्थान कमाया है। पत्रिका में सार्थक साहित्यिक बहस के साथ-साथ समाज में साहित्य की भूमिका, महिलाओं का स्थान, यात्रा संस्मरण, बदलते परिवेश आदि को बखूबी स्थान मिला है। सम्पादक सर्वमित्रा सुरजन का ध्येय साहित्यिक पत्रिका के माध्यम से प्रासंगिक मुद्दों की स्वस्थ पत्रकारिता करना है।

समर लोक (1999): त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समर लोक का प्रकाशन सुप्रसिद्ध कथाकार मेहरुन्निसा परवेज ने 1999 के आसपास प्रारंभ किया। अगस्त 1998 में मेहरुन्निसा जी के पुत्र ‘समर प्रसाद’ के असमय देहांत के बाद उनकी स्मृति में राजधानी भोपाल से प्रकाशित ‘समरलोक’ की गणना श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में होती है। इसके प्रत्येक अंक में पूर्ववर्ती साहित्यकारों के साथ-साथ वर्तमान समय के शीर्ष एवं उदीयमान साहित्यकारों को समुचित स्थान देने का प्रयास किया जाता है।

औरत (2001): द्विमासिक पत्रिका ‘औरत‘ का प्रकाशन भोपाल से विद्युलता के संपादन में वर्ष 2001 से प्रारंभ हुआ। इसके संयुक्त प्रवेशांक में सम्पादकीय का तेवर उल्लेखनीय  है – मशाल जल रही है मगर रोशन नहीं। औरत की बेहतरी के लिए उठाए गए कदमों के बावजूद गंभीर आकलन यही है कि उसकी स्थिति वातावरण, पति, परिवार, बच्चे और उसका संसार मामूली परिवर्तन के साथ वही है। वह और अधिक हताश, कुंठित और दुखी है -क्या कारण है  ढेरों कानून, ढेरों सामाजिक संगठनों, नारों, बुलन्द आवाज़ों, हड़तालों के बाद भी अपेक्षित परिणाम महिलाओं के हक में नहीं आ रहे हैं। चाहे औरत की सत्ता में भागीदारी हो अथवा सामाजिक क्रांति में कोई अहम भूमिका, बुनियादी परिवर्तन लाने में सारे तथ्य असफल हो रहे हैं, यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा।।:

बिन्ना (2001): दीवार अख़बार ‘बिन्ना’ ने बहुत ही कम समय में लोकप्रियता अर्जित कर ली थी। पत्रकारिता की मुख्यधारा से इतर, ग्राम सेवा समिति, निटाया द्वारा अनेक विचार विमर्श के बाद प्रकाशित इस पत्रिका में सामग्री चयन एवं संपादन के लिए सम्पादक मंडल का गठन किया गया था जिसकी तीन सदस्याएं थीं – गीता श्रीवास्तव, उर्मिला दुबे एवं सीमा चौधरी। कुछ वर्षों के बाद संपादक मंडल में मालती मालवीय भी शामिल हुईं। इस पत्रिका में ग्रामीण महिलाओं की रचनाएं ही शामिल की जाती थीं। सामग्री के लिए आसपास के गावों की वे महिलाएं संवाददाता के रूप में काम कर रही थीं जिन्हें विषय की समझ के साथ लेखन कौशल भी हो। समस्त सामग्री इन्हीं संवाददाताओं द्वारा भेजी जाती थीं। इसकी 4 सौ प्रतियां छपती थीं एवं इसके पाठक वर्ग में ग्राम सभा के सदस्य, पंचायत, स्कूल, आँगनबाड़ी एवं महिलाओं के मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाएं एवं संगठन शामिल थे। पत्रिका का संचालन कुछ संस्थाओं द्वारा प्रदत्त सहयोग राशि की मदद से किया जा रहा था जो लम्बे समय तक जारी न रह सका। वर्ष 2012 में यह पत्रिका बंद हो गई। इस पत्रिका की लोकप्रियता को देखते हुए दूरदर्शन भोपाल ने एक वृत्त चित्र का प्रसारण भी किया था।

तूलिका (2002): वर्ष 2002 में विनीता श्रीवास्तव ने मासिक पत्रिका ‘तूलिका’ का प्रकाशन भोपाल से प्रारंभ किया। तब से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है। संपादन का दायित्व स्वयं विनीता श्रीवास्तव ही उठा रही हैं। यह पत्रिका आम महिलाओं को ध्यान में रखकर निकाली जाती है। तथापि स्त्री विषयक ज़रूरी मुद्दे भी प्रमुखता से उठाए जाते हैं।

समीरा (2005): समीरा का अर्थ है शीतल हवा का झोंका, संवेदना की भाषा। समीरा मासिक पत्रिका का संपादन मीरा सिंह कर रही है। इस पत्रिका का प्रकाशन  वर्ष 2005 से भोपाल से हो रहा है। पत्रिका के मुख पृष्ठ पर लिखा है -‘‘हस्तनिर्मित (इको फ्रेंडली) कागज़ पर मुद्रित पत्रिका। इस पत्रिका का यह अनूठा प्रयास है और इससे एक तरह के विचार का प्रतिपादन भी होता है। यह एक सम्पूर्ण पत्रिका है जिसमें कहानी, गजल, आध्यात्मिक लेख, व्यंग्य  रचनाएं, कानून, चिकित्सा, साहित्य, महिला आदि विषयों पर सामग्री है।

समय के साखी (2008) : वरिष्ठ कवयित्री डॉ. आरती द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका ‘समय के साखी’ का प्रकाशन फरवरी 2008 से हो रहा है। बाबा नागार्जुन अंक, केदारनाथ अंक, भवानी प्रसाद मिश्र एवं प्रतिष्ठित आलोचक डॉ रामविलास शर्मा के कृतित्व का समग्र मूल्यांकन करता अंक प्रकाशित किया गया है।  विश्व क्लासिक में गिने जाने वाले महान लेखक लियो टॉलस्टॉय और लेखक- विचारक फिदेल कास्त्रो पर अंको का प्रकाशन किया गया है। साथ ही युवा 10 लंबी कविताएं, युवा 10 लंबी कहानियां, अनुवाद विशेषांक (अनुवाद सिद्धांत एवं भारतीय व पाश्चात्य क्लासिक) के साथ ही रवींद्रनाथ टैगोर की कहानियों और चित्रकला पर केंद्रित अंक भी प्रकाशित किये गए हैं। पत्रिका के सामान्य अंकों में वरिष्ठ एवं युवा रचना धर्मिता के साथ ही समकालीन- समसामयिक विषयों की पड़ताल और बहस साहित्यिक सामाजिक दृष्टिकोण के साथ सम्मिलित किए गए हैं।

बहिनी दरबार : वर्ष 2008 से प्रकाशित ‘बहिनी दरबार’ हस्तलिखित मासिक अखबार है जिसका प्रकाशन रीवा जिले के डभौरा गांव की महिलाएं कर रही हैं। अखबार लिखने की असल कहानी एक हैंडपंप से शुरू हुई। गांव के हैंडपंप पर सवर्णों द्वारा आदिवासी महिलाओं को पानी नहीं भरने दिया जाता था। महिलाओं ने इसके ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ उठाई और महिलाओं के हित में सामाजिक बदलाव लाने और अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए अख़बार निकालने का निर्णय लिया गया। यहीं से बहिनी दरबार की नींव पड़ी। इस अखबार की सम्पादक से लेकर हॉकर तक महिलाएं ही हैं। बहिनी की संवाददाता जन्मावती बताती हैं, इस अखबार के माध्यम से महिलाओं  में जागरूकता आई है, उन्हें अपने अधिकारों का बोध होने लगा है, वे अन्याय के खिलाफ खड़ी होने लगी हैं। जो बहनें अपने अधिकारों के लिए सामने नहीं आ पातीं, वे अपनी बात हमें बताने लगीं हैं. बहिनी दरबार के माध्यम से महिलाओं को लाभ मिलने लगा है, राशन की दुकानों से समय पर खाद्यान्न नहीं मिलता था, कलेक्टर से शिकायत के बाद समय पर खाद्यान्न मिलने लगा।

इसी प्रकार फरवरी, 1987 से पत्रकार पुष्पा शर्मा ‘सच की परछाईयां’ नाम से आठ पृष्ठीय टैबलॉयड आकार के साप्ताहिक अखबार का निरंतर प्रकाशन कर रही हैं। ‘बीईंग माइंडफुल’ अंग्रेजी में प्रकाशित एक अलग किस्म की पत्रिका है जिसका प्रकाशन एवं संपादन भोपाल से ऋतु पांडेय मिश्र कर रही हैं। यह देश की पहली पत्रिका है जो हर माह किसी नई थीम पर प्रकाशित होती है, इसलिए इसका हर अंक हमेशा नया ही प्रतीत होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी रही हों और संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकने लायक ही क्यों न हो, प्रदेश में सुगृहिणी से लेकर बहिनी दरबार तक महिलाओं द्वारा पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन और संपादन का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

लेखिका अनुभवी पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।  

 

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