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मध्यप्रदेश की महिला टीवी पत्रकारों का योगदान

मध्यप्रदेश की महिला टीवी पत्रकारों का योगदान

छाया : मीडिया मैगज़ीन

सृजन क्षेत्र
पत्रकारिता, रेडियो और सोशल मीडिया
मीडिया विमर्श

मध्यप्रदेश की महिला टीवी पत्रकारों का योगदान

• विभा वत्सल

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में महिला पत्रकारों का आगमन अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं रहा है। अरसे तक पत्रकारिता पर पुरुषों का क़ब्ज़ा रहा। माना गया कि महिलाओं के लिए यह क्षेत्र नहीं है। ख़ास कर हिंदी अख़बारों में मृणाल पांडे को छोड़ कर कोई दूसरी महिला संपादक नज़र नहीं आती। जब पत्रकारिता में महिलाएं आईं भी उन्हें सिलाई-कढ़ाई, खान-पान जैसे मुद्दे सौंपे गए। लगा कि वे कुछ बौद्धिक हैं तो कला-संस्कृति के फीचर पन्ने उनके हवाले कर दिए गए। बहुत गिनी चुनी महिला पत्रकार होंगी जो बिल्कुल ठोस ख़बरों की दुनिया में- जिन्हें हार्ड न्यूज़ कहते हैं- रही होंगी, जो अख़बार का संस्करण निकाला करती होंगी । नब्बे के दशक में नवभारत टाइम्स की इरा झा अकेली पत्रकार थीं जो संस्करण निकाला करती थीं।

इस माहौल में टीवी पत्रकारिता आती है और उसमें महिलाओं का आगमन किसी धमाके से कम नहीं होता है। मध्य प्रदेश की महिला पत्रकारों पर बात करने से पहले इस परिदृश्य को समझना इसलिए ज़रूरी था कि भोपाल, इंदौर और जबलपुर जैसे बौद्धिक-सांस्कृतिक और काफी हद तक आधुनिक शहरों के बावजूद मध्य प्रदेश में दिल्ली-मुंबई वाला खुलापन अरसे तक नहीं रहा। तो मध्य प्रदेश की जिन लड़कियों ने इस माहौल में मीडिया में क़दम रखे, वे जैसे जलते हुए अंगारों पर पांव रख रही थीं- वह भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उस दुनिया में, जहां पहली बार महिला पत्रकार आतंकी घटनाएं कवर कर रही थी, राजनीति पर बहस कर रही थी, बाढ़ और सूनामी में पांव भिगोती हुई रिपोर्टिंग कर रही थी। मध्य प्रदेश की लड़कियों ने साबित किया कि वे इस प्रक्रिया में कहीं से पीछे नहीं हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि इन लड़कियों ने 90 के दशक में टीवी पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बदलकर रख दिया। इस दौर में महिलाएं बिल्कुल विस्फोट की तरह आईं और छा गईं। जिस देश में लड़कियां पिता या भाई के साथ मोहल्ला पार करती थीं वे अब अपने दम पर हमलों के बीच, सुनामी के बीच, तूफान के बीच जैसी खबरों को बड़ी बेबाकी से कवर करने लगीं। लेकिन इसकी राह इतनी भी आसान नहीं थी। इन्हें कई सन्देहों से पार पाना था मसलन क्या ये रात की पाली कर पाएंगी? किसी महिला की कामयाबी को- अगर वह ऐंकर हो तो कुछ ज़्यादा ही- उसके चरित्र से जोड़ दिया जाता रहा। मगर सच ये है कि इन सब कसौटियों को झटकती हुई, इस ओछेपन के पार जाती हुईं जब वे फील्ड में उतरती हैं तब वे बिल्कुल अकेले होती हैं, उनके भाई, उनके पति, उनके दोस्त या तथाकथित संरक्षक उनके साथ नहीं होते अकेले वे और उनकी हिम्मत साथ होती है।

लेकिन मध्य प्रदेश की टीवी पत्रकारिता में महिलाओं का हिस्सा देखने के लिए इस दौर से कुछ पीछे चलें- अस्सी के दशक में, जब पहली बार छोटे-बड़े शहरों में टीवी चैनल खुल रहे थे और रोज़ रात नौ बजे पूरा हिंदुस्तान एक साथ बैठकर टीवी समाचार देखा करता था। इन समाचारों में एक चेहरा आता था- सलमा सुल्तान का।

दरअसल 15 सितम्बर 1959 से दूरदर्शन का आगाज हुआ और करीब पांच-छह साल बाद यानी 1965 में 5 मिनट के न्यूज़ बुलेटिन की शुरुआत हुई।  प्रतिमा पुरी, भारत की पहली न्यूज़ रीडर थीं। इसके अलावा गोपाल कौल रोज़ खबरें पढ़ते नज़र आते थे। इस दौरान 1967 में दूरदर्शन में एक और चेहरा सलमा सुल्तान का जुड़ा। खूबसूरत जुबान की धनी सलमा सुल्तान के खबरें पढ़ने का किस्सा भी काफी दिलचस्प है। डॉ कुमार विमलेन्दु सिंह अपने एक लेख में लिखते हैं,  “एक बार कुछ ऐसा हुआ कि गोपाल कौल, बुलेटिन पढ़ना नहीं चाह रहे थे लेकिन सब उन पर, इसके लिए दबाव बना रहे थे। गोपाल कौल अगले दिन सिर मुंडवा कर आ गए और उन्हें इस तरह टेलीविज़न पर नहीं भेजा जा सकता था। यही वह दिन था जब पहली दफ़ा, सलमा सुल्तान से पूछा गया कि क्या वे बुलेटिन पढ़ लेंगी?” सलमा मान गईं और फिर उनकी आवाज, उनका अंदाज़, दूरदर्शन की पहचान बन गया। सलमा सुल्तान ने 31 अक्टूबर 1984 को दूरदर्शन की शाम की खबरों में इंदिरा गांधी की हत्या की खबर दी थी। 30 सालों तक दूरदर्शन में बतौर एंकर काम करने के बाद उन्होंने लेन्सव्यू प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक प्रोडक्शन हाउस बनाया। जिसमें सामाजिक विषयों पर धारावाहिकों का निर्देशन करने लगीं। इसमें “पंचतंत्र से” और “सुनो कहानी”  “जलते सवाल” जैसे धारावाहिक इनके प्रोडक्शन हाउस की एक बेहतरीन पेशकश थी।

90 के दशक में भारत में सैटेलाइट टीवी का आगमन हुआ। उसी समय आंध्रप्रदेश के ईनाडू ने तेलुगु भाषा में एक चैनल की शुरुआत की। तेलुगु से एक चैनल की शुरुआत हुई मगर जल्द ही ईटीवी नेटवर्क ने देश के विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में कई समाचार चैनलों का विस्तार किया। ईटीवी शायद एकाधिकार वाला देश का पहला मीडिया नेटवर्क है। इसी समय ईटीवी से 1998 में मुक्ता पाठक जुड़ीं, जिन्हें  मध्यप्रदेश की पहली महिला टीवी पत्रकार कहा जाता है। मुक्ता का लक्ष्य शुरू से ही पत्रकार बनने का था और वे टीवी की दुनिया में कदम रखने के पहले पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रही थीं। अपने 22 साल के जद्दोजहद भरे करियर में उन्हें कई अवॉर्ड से भी नवाजा गया है। फिलहाल वे आईएनडी से जुड़ी हैं। ये उनकी जीवटता ही है कि इतने सालों के बाद भी इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाई हुईं हैं।

2000 तक देश में 24 घन्टे के न्यूज़ चैनल सिर्फ दो ही थे।  ज़ी न्यूज़ और आजतक। जिसमें ज़्यादातर IIMC जैसे संस्थानों से आनेवाली लड़कियां थीं और मध्यप्रदेश से आने वाली लड़कियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी। लेकिन साल 2002 प्राइवेट चैनलों के उदय का दौर रहा। आजतक, ज़ी के अलावा सहारा, NDTV और स्टार न्यूज़ जिसे अब हम ABP के नाम से जानते हैं, अस्तित्व में आए। इस दरमियां महिला पत्रकारों की नई पौध तैयार हुई। ये वो महिलाएं थीं जो टीवी न्यूज से पहले अखबारों में तजुर्बे हासिल कर रही थीं या फिर किसी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अपनी कलम की धार को तेज़ करने का हुनर सीख रही थीं। जिन्हें अपने काम से खुद को साबित करना था, उपहास के बदले सम्मान पाना था। वहीं पुरुषों के बीच अकेले काम करना और कपड़ों और समझ को लेकर तंज को परे रख आगे बढ़ना था। साल 2000 के अगस्त महीने में भोपाल की तृप्ति श्रीवास्तव ने दिल्ली का रुख किया और ज़ी न्यूज़ में बतौर इंटर्न जॉइन किया। उस वक्त इन्वेस्टिगेटिव शो “इनसाइड स्टोरी” काफी लोकप्रिय था। उस टीम में तृप्ति इकलौती लड़की थीं। खोजी पत्रकारिता से जो खबरों की समझ विकसित हुई वह उन्हें आजतक के दरवाजे तक खींच ले आई। तृप्ति बताती हैं कि “2002 में मैंने बतौर रिपोर्टर आजतक ज्वाइन किया, जो तब देश का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ 24 घंटे का न्यूज़ चैनल बन चुका था। रिपोर्टिंग के साथ एंकरिंग भी की लेकिन वहां हेल्थ रिपोर्टर से क्राइम रिपोर्टर बनने का सफर किसी संघर्ष से कम नही था। कोई लड़की क्राइम कवर सकती है ये साबित करना थोड़ा मुश्किल ज़रूर था लेकिन असंभव नहीं।” करीब 12 साल तक देश के नम्बर वन चैनल में रिपोर्टिंग और एंकरिंग का तजुर्बा हासिल करने के बाद 2013 में तृप्ति ने बीबीसी हिंदी के साथ एक नई पारी शुरू की। फिलहाल वे अब बदलते वक्त के साथ मीडिया के बदलते स्वरूप यानी यूट्यूब के एक न्यूज़ चैनल के साथ खबरों का विश्लेषण कर रही हैं।

वहीं बड़वानी जिले के एक छोटे से शहर सेंधवा की रहने वाली दीप्ति चौरसिया ने आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद कुछ सालों तक दिल्ली में संघर्ष करती रहीं लेकिन उन्हें 2001 में उन्हें भोपाल में जाकर ठौर मिला। यहां उन्होंने ईटीवी के साथ शुरुआत की। उस वक्त रीजनल न्यूज़ चैनल एक्सपेरिमेंटल दौर से गुजर रहा था, कंटेंट को लेकर उधेड़बुन जारी थी। लेकिन दीप्ति अपनी जगह बनाते हुए क्राइम और कला-साहित्य को कवर करने लगीं। जल्द ही उन्हें देश के सबसे बड़े बैनर आजतक में जाने का मौका मिला। 9 साल के नेशनल न्यूज़ चैनल में काम करने के दौरान उन्होंने मध्यप्रदेश के बदलते हर दौर को कवर किया। लेकिन जब वे एक मां बनी तो खबरों को लेकर ज़्यादा संवेदनशील हो गई। वे बताती हैं, ” एक खबर आई कि एक शख्स लापता है और बाद में सूचना मिली कि उसने अपने तीन-चार साल के बेटे की हत्या कर आत्महत्या कर ली। खबर की टोह लेने जब दीप्ति उसके घर पहुंचीं तो उसकी पत्नी ने पति की कोई खबर मिलने की आस में उन्हें कसकर पकड़ लिया। दुर्भाग्यपूर्ण बात ये थी कि पति और बेटे की मौत की खबर देने वाली मैं ही थी। इस खबर को कवर करके मैं भोपाल आ गई लेकिन इस घटना से उबरने में मुझे तीन-चार दिन निकले।” 20 साल के पत्रकारिता के क्षेत्र में रात-बिरात, वक्त-बेवक्त या फिर चुनावी खबरों के लिए 15-15 दिन बेटी को छोड़कर उन्हें घर से बाहर रहना पड़ा। लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए वे बिना ब्रेक फिलहाल न्यूज़ नेशन में अपनी गरिमामयी मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं। इनके खाते में फीमेल फेसिंग मीडिया अवॉर्ड और झाबरमल शर्मा अवॉर्ड समेत कई अवॉर्ड है।

न्यूज़ चैनलों की आमद जैसे-जैसे बढ़ी वैसे ही कुछ बदलने  का जज़्बा लिए महिला पत्रकारों की फौज भी तैयार हो रही थी। फिर चाहे वो दिल्ली हो, भोपाल हो या फिर इंदौर। उन्हीं में से एक हैं भोपाल की तेजतर्रार पत्रकार शिफाली। कर्नाटक में “द हिन्दू” की एक महिला पत्रकार से इतनी प्रभावित हुई कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गईं। शुरुआत प्रिंट में तपकर की और फिर सहारा न्यूज़ चैनल से टीवी के छोटे पर्दे में आ गई। ये छोटा पर्दा उन्हें ज़िन्दगी में विस्तार दे गया। एक साल के बाद ही सॉफ्ट न्यूज़ से पॉलिटिकल खबरों के लिए चुन ली गई और फिर शुरू हुआ चुनाव की खबरों के लिए मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ के दूरदराज गांवों में भटकना। कला-संस्कृति में सिमटी हुई शिफाली वैचारिक स्तर पर अपने संपादकों को ये भरोसा दिलाने में कामयाब हो गई कि चाहे पॉलिटिकली इंटरटेनमेन्ट शो ही क्यों ना हो उसे वे हार्डकोर मुद्दे में बदलने का माद्दा रखती हैं। अपनी मेहनत और रिश्ते की प्रगाढ़ता के चलते खबरें शिफाली के पास आने लगीं। हालांकि इस पर शिफाली को अपनी ही बिरादरी के एक पत्रकार से तंज सुनने को मिला, “चूंकि ये लड़की है इसलिए ब्रेकिंग इसे आसानी से मिल जाती है।” इस पर शिफाली कहती हैं कि, “दैनिक स्वदेश में एक जिद कर ली थी कि पत्रकारिता समाज की जो मानसिकता है उसे तोड़ना है। इसलिए इस तरह की बातें कुछ समय तक परेशान की मगर फिर मैंने ध्यान देना बंद कर दिया” शिफाली का सहारा से टीवी पत्रकारिता का सफर वॉयस ऑफ इंडिया तक पहुंचा और ज़िन्दगी में एक स्पीड ब्रेकर आया। जब एक स्त्री के लिए पत्रकारिता दोहरा संघर्ष बन गई। एसोचैम का एक सर्वे कहता है कि माँ बनने के बाद 40  फीसदी महिलाएं पत्रकारिता छोड़ देती हैं। लेकिन ये शिफाली की काबिलियत ही थी कि उन्होंने तेज़ी से बढ़ रहे टीवी पत्रकारिता को अपनी लेखनी और कंटेंट की बदौलत कदमताल मिला लिया। दूसरी पारी की शुरूआत उन्होंने टीवी18 मध्यप्रदेश से की। सहारा समय के जमाने में जो शामें शिफाली की भारत-भवन में गुजरती थी ये उसी का नतीजा था कि उनकी दुष्यंत कुमार या फिर बशीर बद्र साहब पर की गई स्टोरी को खूब सराहना मिली। इतना ही नहीं जिस चुनावी खबरों से शिफाली ने शुरुआती दौर में अपनी पहचान बनाई थी वही चुनाव दूसरी पारी में फिर एक सुनहरा मौका लेकर आया। 2018 के मध्यप्रदेश छत्तीसगढ के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में एक नए मिज़ाज का शो सियासी सफर से। शो की अवधारणा थी बस-ट्रेन के मतदाताओ के जरिए सियासी नब्ज़ टटोलना। लेकिन जल्द ही ये सफर बस से उतरकर सड़क से होते हुए देहातों तक पहुंच गया। फिर इसमें शिवपुरी विधानसभा सीट का आजादी के बाद से अंधेरे में डूबा गांव भी आया और बालाघाट का वो आदिवासी इलाका भी जहां पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था। इन्ही रास्तों और तमाम तरह की इबारतों ने शिफाली को  ENBA Award तक पहुंचाया। हर मौके और हर मिले कोने को जगमगाने की ज़िद ही थी की कवियों और साहित्यकारों की संगत ने उन्हें एक कवियित्री के तौर पर भी स्थापित कर दिया।

उसी बीच Jarno एक्टिविस्ट के नाम से मशहूर NDTV की रिपोर्टर रुबीना ख़ान शापू दिल्ली से भोपाल आईं। जिन्होंने लंबे समय तक मध्यप्रदेश के लिए रिपोर्टिंग की। वे हफ़्तों लगाकर ज़मीन से जुड़े मुद्दों को दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करती थीं। उन्होंने कभी दफ्तर में बैठकर खबरें नहीं गढ़ी बल्कि वे गांव की गलियों का रास्ता नापते हुए कहानी की हकीकत बयां करने में यकीन रखती थीं। उन्हें महिला होने के नाते बच्चों और महिलाओं से सम्बंधित खबरों को कवर करने भेजा जाता था लेकिन गहन अवलोकन क्षमता और पैनी दृष्टि की वजह से उन्होंने खबरों के इस संसार में धारदार रिपोर्टिंग की। चाहे वो बेटी बचाओ आंदोलन हो या फिर कुपोषण। अपनी रिपोर्ट में इतना रच बस जाती थी कि खबर के ऑन एयर होने के बाद भी कई दिनों तक उससे निकल नहीं पाती थीं। अपने 18 साल के करियर में उन्होंने महिलाओं और उनके स्वास्थ्य के मुद्दे को बेहतरीन तरीके से उठाया जिसके एवज में उन्हें प्रतिष्ठित UNDP सिल्वर अवॉर्ड से भी नवाजा गया। समाज से जुड़े मुद्दों जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन, जाति व्यवस्था या सती प्रथा पर खबरें तो खूब करने को मिलीं लेकिन पुरुषों के दुर्ग माने-जाने वाले पॉलिटिकल खबरों के लिए अपनी जगह बनाने में उन्हें भी जद्दोजहद करनी पड़ी। बिल्कुल वैसे ही जैसे कोहनी से धक्का मार-मारकर थोड़ा ही सही गेट खोलते रहना पड़ता है। मुख्य रिपोर्टर की अनुपस्थिति में धीरे-धीरे राजनीतिक खबरें कर अपना लोहा मनवाया। हिंदी-अंग्रेजी में अच्छी पकड़ होने के कारण उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी दोनों चैनलों में काम किया। दोनों चैनलों के वातावरण पर बकौल रुबीना खान शापू, “हिंदी मीडिया में चाटुकारिता भरी पड़ी है। यहां महिलाओं का शोषण अंग्रेजी के बनिस्बत ज़्यादा होता है। बॉस के सामंती रवैये की वजह से हमेशा उसके रहमोकरम पर काम करने का मौका दिया जाता है।” हालांकि वक़्त और हालात उन्हें इस पेशे से दूर ले गया।

माइक-कैमरा-लाइट से पहली बार वास्ता 2002 में इंदौर की रिपोर्टर श्रुति अग्रवाल का सहारा समय मध्यप्रदेश से हुआ। अपराध और 2004 का विधानसभा चुनाव भी उन्होंने कवर किया। लेकिन उनके लिए सबसे यादगार रहा सिंहस्थ 2004 का कवरेज। वे बताती हैं,  “पहली बार कोई रीजनल चैनल महाकुंभ ( सिहंस्थ) कवर कर रहा था।  सहारा समय ने हाथीपाला में एक बड़ा घर किराए पर लिया, जहां हमने अपना पीसीआर बनाया था। हर छोटी से छोटी- बड़ी से बड़ी घटना को कवर किया जा रहा था। इसके साथ सबसे रोचक-अद्भुत खबर एक महिला नागा साध्वी को कवर करना था। उनके साथ रहकर-समझकर जाना कि नागा साध्वियां भी धुनी पूजन से लेकर हर तरह की साधना करती है। यहां कवरेज के समय महिला होने का पहली बार फायदा मिला। पुरुष साथी जहां महिला नागा साध्वी के करीब भी ना जा सके थे। वे मुझे ना सिर्फ इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुईं बल्कि अपने साथ साध्वियों के मठ भी ले गईं। अपनी दिनचर्या-पूजा-साधना सभी से परिचय करवाया।” इतना ही नहीं अपने साहसिक रिपोर्टिंग के लिए विख्यात श्रुति बताती हैं कि महिला होना कभी भी उनके प्रोफेशन में आड़े नहीं आया। उन्होंने सिमी के मुखिया सफदर नागौरी के गांव में जाकर ग्राउंड रिपोर्ट की भी की। श्रुति बताती हैं, “उस समय पहली पत्रकार थी जो महिदपुर होते हुए नागौरी गांव पहुंची थी। वहां सफदर नागौरी के परिवार से बातचीत की थी। इसी समय बुरहानपुर में दंगा हुआ था। वहां ओवी वैन लेकर सबसे पहले पहुंची थी। यहां बर्बाद हो चुके गुलाबगंज मोहल्ले में सबसे पहले पहुंचने वाले पत्रकारों में से थी।”

वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जगमगाहट ने नर्मदा किनारे हरदा की रहने वाली ऋचा साकल्ले को प्रिंट मीडिया से टीवी पत्रकारिता की ओर ले गया। बकौल ऋचा, “टीवी के लिए एक आकर्षण काम कर रहा था मुझे पता चला सहारा टीवी के लिए साक्षात्कार हो रहे हैं तो खुद को आजमाने के लिए मैं भी इंटरव्यू देने पहुंच गई। सिलेक्शन हो गया तो दिल्ली में 14 नवंबर 2002 को वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के नेतृत्व में सहारा समय मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ ज्वाइन कर लिया।” ऋचा ने अपने 18 साल के टीवी पत्रकारिता में महिलाओं को लेकर एक और भ्रम को खारिज कर दिया है। या कहें कि लगभग चटका दिया है, वह यह कि पत्रकार होने के लिए यह कतई जरूरी नहीं कि लड़कों की तरह कपड़े पहने जाएँ। या बस रूखी-सूखी लड़कियाँ ही पत्रकार हो सकती है। अपने नारीत्व का सम्मान करते हुए और शालीनता कायम रखते हुए भी सशक्त पत्रकारिता की जा सकती है। यही वजह है कि सहारा समय नेशनल से टीआरपी के जैसे छलांग लगाकर पिछले 12 साल से ऋचा सबसे तेज़ चैनल आजतक में हैं। ये उनकी प्रतिभा की चमक ही है कि मध्यप्रदेश की इकलौती टीवी पत्रकार हैं जो एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं।

आज परिदृश्य बदल चुका है। राष्ट्रीय या फिर क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल में ऐसा कोई भी कोना नहीं बचा है जहां महिलाएं आत्मविश्वास और दक्षता से मोर्चा न सम्भाल रही हों। कोरोनाकाल हो, सियासी मसला हो या फिर मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन रात के 2 बजे भी भोपाल की रंजना दुबे और कोमल शर्मा को फील्ड में मुस्तैदी से खड़ा देखा जा सकता है। इसके अलावा एबीपी की रिपोर्टर रत्ना शुक्ला, NDTV की एंकर अदिति राजपूत, आज तक की असिस्टेंट प्रोड्यूसर अपूर्वा बिल्लौरे, ज़ी न्यूज़ की जिया शर्मा और सोनल श्रीवास्तव , आईबीसी की रिपोर्टर शालिनी हार्डिया, सहारा की हरप्रीत रीन,कटनी की वंदना तिवारी और इंदौर के केएनए न्यूज़ चैनल की ख़ुशबू यादव प्रमुख हैं। अगर हम डेस्क की बात करें तो ज़्यादातर चैनलों में सुबह की शिफ्ट में सृजन की जिम्मेदारी इनके कंधों पर होती है। हर बड़ी खबर पर इनकी पैनी नज़र होती है। इनके आने से न्यूज़ का चरित्र भी बदला है। खबरों को लेकर वांछित संवेदनशीलता चाहे वो बलात्कार की खबर हो, दहेज उत्पीड़न या फिर महिलाओं पर हो रहे अत्याचार जैसी खबरों को लेकर नजरिया और सोच में परिवर्तन आया है। ऐसे ही बदलाव का अनुभव जब मैं सहारा से 2005 में NDTV से जुड़ी तो पहली बार किसी चैनल में महिलाओं को डॉमिनेट करते देखा। उन्हें खबरों से खेलते, निर्णय लेते और अपनी आवाज़ बेहद मजबूती से रखते देखा। यहां महिला-पुरुष के बीट में कोई खाई नहीं दिखी। यहां मुझे सुबह-शाम और प्राइम टाइम के बुलेटिन तक की जिम्मेदारी मिली। NDTV में ही पहली बार एक महिला कैमरामैन को देखा, जो कंधों पर भारी-भरकम कैमरा लादे शॉट्स-बाइट्स का पीछा कर रही थी। उसके बाद फिर एक लड़की मुझे इस साल माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में कैमरा लेकर दौड़ती दिखी। मैं वहां गेस्ट फैकल्टी के तौर पर क्लास लेने गई थी। लक्ष्मी अपने कैमरे में कॉलेज में होने वाले हर प्रोग्राम को कैद कर रही थी। उसके जुनून और कुछ हटके काम करने का ख्वाब दिल को बड़ा सुकून दे गया। ये सुकून भी टीवी पत्रकारिता की पहली पीढ़ी की ही देन है जो तीसरी पीढ़ी की महिला पत्रकारों को अपने सपनो  को पूरा करने का हौसला दे पाई। हालांकि महिलाएं आज भी ऐसे बदलाव के मोड़ पर हैं, जहां उन्हें एक लंबा रास्ता तय करना है।


लेखिका पत्रकार हैं ।

© मीडियाटिक

 

 

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