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मध्यप्रदेश की प्रमुख समाजसेवी महिलाएं

मध्यप्रदेश की प्रमुख समाजसेवी महिलाएं

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मध्यप्रदेश की प्रमुख समाजसेवी महिलाएं

सामाजिक उद्विकास के क्रम में मनुष्य ने स्वयं से इतर कमजोर तबके के साथियों के प्रति संवेदना और सहानुभूति की भावना को महसूस करना भी सीखा, परन्तु भारतीय समाज में  इसका स्पष्ट स्वरूप गांधी युग से देखने को मिलता है। गाँधीवादी स्वतंत्रता सेनानी अपने परिवार की स्त्रियों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। देश के अन्य हिस्सों की भांति मध्यप्रदेश में भी सामाजिक उत्थान हेतु सक्रिय महिलाओं की पहली पीढ़ी गांधीवादी परिवारों से ही सम्बंधित रहीं। गांधीजी स्वतंत्रता आन्दोलन को गति प्रदान करने के लिए दहलीज के भीतर कैद स्त्री शक्ति का आवाहन कर रहे थे, परिणामस्वरूप कई महिलाएं न केवल आन्दोलन में शरीक हुईं बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करने वाले सुधार कार्यों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद के कालखंड में नई पीढी की महिलाओं ने अपनी बुद्धि और विवेकसे समाज सेवा को अपना कार्य क्षेत्र बनाया और एक उन्नत समाज को गढ़ने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।  

रूढ़ियों के विरुद्ध  

सामाजिक कार्यों में समर्पित मध्यप्रदेश की महिलाओं में सबसे पहला ज्ञात नाम आता है उद्योगपति जमना लाल बजाज की पत्नी जानकी देवी बजाज का, हालाँकि उनका कार्यक्षेत्र वर्धा और उसके आसपास का क्षेत्र रहा। उनके पति गांधीवादी थे एवं उनकी उत्प्रेरणा से सामाजिक हित में सदियों से व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध खड़ी रहीं। उन्होंने स्वयं पर्दा प्रथा का त्याग किया और अन्य महिलाओं को भी उत्प्रेरित किया। राजनीतिक गतिविधियों में उनकी रूचि नहीं थी इसलिए विनोबा भावे के कूपदान, भूदान और गौ सेवा जैसे आन्दोलनों से जुड़ी रहीं। आजादी के बाद भी ग्रामीणों को कुटीर उद्योगों से जोड़कर ग्रामीण विकास में अपना योगदान दिया|  

स्त्री सशक्तिकरण

आजादी के बाद समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ महिलाओं ने राजनीति के द्वार से प्रवेश किया और महिलाओं के समग्र विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, शोषण के साथ साथ बच्चों के विकास के लिए भी काम किये। ऐसी महिलाओं में पद्मश्री गायत्री देवी परमार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे सन 1957 में विधान सभा की सदस्या निर्वाचित हुई एवं उसके बाद वे महिलाओं व बच्चों के हित में ही कार्य करती रहीं। उन्होंने पाया कि बच्चों एवं महिलाओं की समस्या सर्वथा भिन्न होते हुए भी उनमें एक अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इसलिए बाल विवाह, पर्दा प्रथा, समाज से निष्कासित, यौन उत्पीड़ित, घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलवाने जैसे मुद्दों पर काम करने के साथ ही उन्हें रोजगार से भी जोड़ने का प्रयास किया। इनके समानान्तर बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी वे निरंतर काम करती रहीं। स्त्री जीवन से जुड़े विभिन्न पक्ष एक दूसरे से जुड़े होते हैं इसलिए किसी एक मुद्दे पर जोर देने की बजाय उन्होंने समस्या को उसके समग्र स्वरूप में देखते हुए ही प्रयास किये।

मध्यप्रदेश की पहली महिला मुख्य सचिव रही निर्मला बुच एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के अलावा समाज के प्रति अपने दायित्वों को लेकर भी हमेशा सजग रही हैं ।  अपने कार्यकाल के दौरान महिलाओं के हित में कई कल्याणकारी योजनाओं को आकार देने में वे पूरी तरह सफल रहीं । उन्होंने गैरलाभकारी संस्था महिला चेतना मंच की स्थापना 1984 में की । इस संस्था के माध्यम से उन्होंने स्त्री सशक्तिकरण से जुड़े सभी पहलुओं पर यथेष्ट योगदान दिया ताकि वे सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सभी क्षेत्रो में महिलाओं को निर्णायक भूमिकाओं को वहन करने के योग्य बन सकें । पिछले तीन दशकों से अपने प्रयासों के कारण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने कामयाबी हासिल की हैं । वर्तमान में अपनी संस्था के माध्यम से वे महिलओं की शिक्षा, स्वास्थय, जल एवं स्वच्छता, जीवनशैली एवं माइक्रो फाइनेंस आदि के क्षेत्र में काम कर रही हैं ।

अम्मा नाम से प्रसिद्ध गांधीवादी कुसुम कुमारी जैन ने भी सामाजिक हित में इसी मार्ग का अनुसरण किया। मध्यभारत के तत्कालीन मुख्यमंत्री तखतमल जैन की प्रेरणा से उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और 1957 में ग्वालियर नगर निगम की पार्षद एवं 1959 में उप महापौर बनीं। उसी समय महापौर नारायण कृष्ण शेजलवार लम्बे लंदन प्रवास थे, जिसकी वजह से उन्हें महापौर की ज़िम्मेदारी संभाली। इन पदों पर रहते हुए उन्हें सामाजिक सरोकारों को समझने का अवसर प्राप्त हुआ एवं स्त्री सशक्तिकरण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में राजनीति से मन उचाट हो जाने के कारण स्वयं को सामाजिक कार्यों तक सीमित कर लिया। उन्होंने ‘समाज सेवा केंद्र’ नाम से एक संस्था की स्थापना की और महिलाओं व बच्चों के हित में कार्य करने लगीं।  

स्वास्थ्य

समाजसेवा के क्षेत्र में योगदान देने वाली महिलाओं में कुछ ने अपने कौशल को जनसेवा का माध्यम माध्यम बना लिया। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ीं मध्यप्रदेश की पहली स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. भक्ति यादव एवं डॉ. लीला जोशी इसी श्रेणी की समाज सेविकाएं हैं। ये अपने काम को धनोपार्जन का माध्यम न मानकर समाजसेवा का जरिया मानती थीं। पद्मश्री डॉ. भक्ति यादव को कई बड़े अस्पतालों से काम के लिए प्रस्ताव मिला परन्तु उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र इंदौर के मिल क्षेत्र में स्थित बीमा अस्पताल को चुना और वहीं अपनी सेवाएं देती रहीं। बाद उन्होंने स्वयं ‘वात्सल्य’ नाम से नर्सिंग होम की स्थापना की जहां वे संपन्न परिवार के मरीजों से भी नाम मात्र के लिए ही फीस लेती थीं एवं गरीब मरीजों का निःशुल्क इलाज करती रहीं। उन्होंने अपने काम से कभी अवकाश नहीं लिया। जीवन के उत्तरार्ध में वे स्वयं ओस्टियो पोरोसिस नामक हड्डियों की बीमारी से ग्रस्त हो गईं, तथापि 91 वर्ष की आयु तक निरंतर निर्धनों का इलाज करती रहीं। 

इसी प्रकार पद्मश्री डॉ.  लीला जोशी अपने कैरियर के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहीं, परन्तु सेवानिवृत्ति के बाद मदर टेरेसा से प्रभावित होकर समाज सेवा से जुड़ गईं। उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र रतलाम जिले को बनाया। उनका ध्येय है आदिवासी बहुल क्षेत्र को रक्ताल्पता से मुक्त करवाना। उन्होंने इस क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं के लिए कई स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया और उनका निःशुल्क इलाज किया। वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की एकमात्र ऐसी महिला हैं जो आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्त्री रोगों के प्रति महिलाओं को जागरुक कर रही हैं। इसलिए उन्हें लोग ‘मालवा की मदर टेरेसा’ कहते हैं। अब तक वे साढ़े 3 लाख से अधिक बालिकाओं को जागरूक कर चुकी है जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि जिले में मातृ मृत्यु दर में कमी आने लगी।

भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कई भ्रामक अवधारणाएं प्रचलित हैं, परिणामस्वरूप प्रत्येक मानसिक रोग को पागलपन के सन्दर्भ में ही देखने और समझने की प्रवृत्ति रही है। इंदौर की बेटी और देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने की बहू नीरजा बिड़ला लम्बे समय  इस विषय पर सामाजिक चेतना जागृत करने का प्रयत्न कर रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य ख़ासतौर पर अवसाद से पीड़ित मरीजों के हित में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। वर्ष 2016 में उन्होंने ‘एम्पावर’ नाम से एक संस्था की स्थापना की एवं अवसाद पीड़ित लोगों के हित में काम करना प्रारंभ किया। इस संस्था के माध्यम से   अवसाद से उबरने में सहायता प्रदान करने के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता सम्बन्धी कार्य भी किये जाते हैं। कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान 3 अप्रैल 2020 में इस संस्था के द्वारा हेल्प लाइन नम्बर लांच किया गया जिस पर पीड़ित किसी  भी समय फोन कॉल कर जरुरी परामर्श ले सकते हैं।  इसके साथ ही वे आदित्य बिड़ला वर्ल्ड एकेडमी और आदित्य बिड़ला इंटिग्रेटेड स्कूल की अध्यक्षा होने के साथ कई अन्य संस्थाओं को संरक्षण भी प्रदान किया है। वे ‘प्रथम’ और ‘मेक अ विश’ जैसी संस्था की संचालक मंडल की सदस्या भी हैं।

इसी दिशा में प्रयासरत  मनोविज्ञान की गहरी समझ रखने वाली माया बोहरा भी लक्ष्य एवं स्पंदन संस्थाओं के माध्यम से निराश, हताश एवं अवसादग्रस्त लोगों को सहायता प्रदान कर रही हैं। अब तक सैकड़ों लोगों को वे आत्महत्या करने से बचा चुकी हैं। इसके अलावा वे यूएनएफपीए, मध्यप्रदेश शासन समग्र शिक्षा अभियान एवं आर.ई.सी. फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में शासकीय शालाओं में पढ़ने वाले नौवीं से बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए ‘उमंग’ हेल्पलाइन का संचालन कर रही हैं।

इसी तरह काकोली राय वर्ष 1986 से मनोवैज्ञानिक सलाहकार के रुप में कार्य कर रही हैं । वर्ष 1989 में अपने पति के साथ मिलकर इन्होने ‘दिग्दर्शिका इंस्टिट्यूट ऑफ़ रिहैबिलिटेशन एंड रिसर्च’ नाम से एक स्वयंसेवी संस्था की शुरुआत की ।  मध्यप्रदेश में यह अपनी तरह की पहली संस्था है जो मानसिक अस्वस्थता से ग्रस्त मरीजों के लिए व्यापक स्तर पर काम कर रही है। बाद में काकोलीजी ने पुराने और जटिल मानसिक रोगियों के इलाज एवं पुनर्वास के लिए रॉय इंस्टेंट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज की भी स्थापना की ।  दोनों संस्थाओं की मदद से कई लोग मानसिक व्याधि से मुक्त होकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

विकलांगों के प्रति गहरी संवेदना रखने वाली पद्मश्री कांता त्यागी ने सन 1978 में निवाली के निकट झाकर में दो विकलांग बच्चों से आश्रम की नींव रखी। इस आश्रम की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य था विकलांग बच्चों को समुचित उपचार के साथ उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आधारभूमि तैयार करना। वर्तमान में यहाँ 130 बच्चे निवास कर रहे हैं  जहां उनके उपचार के साथ शिक्षा की व्यवस्था भी है। यह आश्रम न्यास द्वारा संचालित है जिसके माध्यम से कई बच्चों की निःशुल्क शल्य चिकित्सा उपलब्ध करवाई गए एवं आज वे विकलांगता से मुक्त होकर सहज जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कांता जी ने अपना कार्यक्षेत्र विकलांगों के उपचार तक सीमित न रखते हुए उनके सामाजिक-आर्थिक पक्षों को भी मजबूत बनाने का प्रयास किया । इसके अलावा वे निवाली स्थित कस्तूरबा वनवासी कन्या आश्रम की निदेशिका भी थीं, जहाँ वे दलित समुदाय की कन्याओं की शिक्षा एवं रोजगार मूलक प्रशिक्षण की व्यवस्था देखती थीं।

‘थैलेमसिया एंड चाइल्ड वेलफेयर’ ग्रुप की संस्थापिका डॉ. रजनी भंडारी पिछले कई वर्षों से थैलेमसिया से पीड़ित बच्चों के इलाज के साथ बाल कल्याण के लिए काम कर रही हैं । वे मध्यप्रदेश बाल संरक्षण आयोग की सदस्या होने के साथ ही कई अन्य संस्थाओं से भी जुड़ी हुई हैं। वे कई शासकीय बाल कल्याण सम्बन्धी योजनाओं के योजना निर्माण एवं उनके क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

स्वभावतः अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करने वाली महिलाएं समय के साथ अनेक व्याधियों से ग्रस्त हो जाती हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों  में इनकी स्थिति और भी चिंताजनक है। सुकर्मा फाउंडेशन की संस्थापिका माया विश्वकर्मा इन्हीं मुद्दों पर समाज का ध्यान आकृष्ट करते हुए महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं । यह संस्था   कैलिफोर्निया और मध्यप्रदेश दोनों स्थानों से पंजीकृत हैं। वे स्वयं कैलिफ़ोर्निया  में निवास करती हैं, परन्तु अपनी संस्था के माध्यम से सुदूर क्षेत्र में निवास करने वाली महिलाओं तक अपनी पहुँच बना चुकी हैं। पैडवीमेन अवेयरनेस कैम्पेन के माध्यम से उनकी संस्था 15 जिलों की लगभग 20 हजार लड़कियों-युवतियों से संवाद स्थापित करने में सफल रही।

शिक्षा

एक युग था जब भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा को निंदनीय माना जाता था जबकि जागरूक वर्ग यह जानता था कि स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए सर्वप्रथम उन्हें शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है।  इसी विचार से क्रान्तिकारी यमुना ताई शेवड़े ने मात्र 6 छात्राओं को लेकर सागर के दीक्षितबाड़े में कन्याशाला की शुरुआत की थी। विद्यालय के विस्तार के लिए एक-एक पैसा उन्होंने दान से एकत्र किया। उन्हीं के प्रयास से 1936 विद्यालय का विशाल भवन तैयार हुआ एवं ‘महिला विद्यालय’ के नाम से इसका उद्घाटन हुआ| यहाँ विजया राजे सिंधिया एवं नेपाल राजपरिवार जैसे रईसों के साथ ही साधनहीन वर्ग की बच्चियां भी पढ़ने आया करती थीं।

शिक्षा के महत्त्व को जानने वाली संपन्न घराने की जयवंती हक्सर ने स्वयं क्षेत्र  में जाकर काम नहीं किया बल्कि अपनी समस्त संपत्ति जयवंती हक्सर प्राइवेट ट्रस्ट’ के नाम कर दी जो बाद में एक सरकारी महाविद्यालय को दान स्वरूप वसीयत कर दी गई। शिक्षा के क्षेत्र में समाज सेविका पद्मश्री शालिनी मोघे का प्रयास कुछ अलग सा था। उन्होंने मात्र स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के स्थान पर समाज के सभी तबकों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अतरिक्त अकादमिक स्तर पर शिक्षण तकनीक को उन्नत बनाने में भी अपना योगदान दिया। उनके हर प्रयास में एक रचनात्मकता विशिष्टता झलकती थी| 1971 में उनके द्वारा स्थापित खिलौना पुस्तकालय ऐसी ही एक पहल थी जिसमें दस वर्ष से कम आयु के बच्चों में वैज्ञानिक समझ विकसित करने के लिए अनूठे खिलौने उपलब्ध करवाए जाते थे। इसी प्रकार वे अपने छात्रों में व्यावहारिक समझ विकसित करने हेतु आस पास के गावों में लेकर जाती थीं| उन्होंने कई शासकीय योजनाओं के साथ जुड़कर भी काम किया। उन्होंने अधिकांश कार्य निःशुल्क ही किए, कहीं से कुछ आमदनी होने पर उसे भी समाज सेवा में ही वे व्यय कर देती थीं।

इसी प्रकार देहरादून में जन्मी चन्द्रप्रभा पटेरिया विवाह के पश्चात जबलपुर पहुंची थीं। शुरुआत में वे सामाजिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेती रहीं, परन्तु वर्ष 1961 में पति के देहांत के बाद अपना समस्त जीवन समाज सेवा के कार्यों में समर्पित कर दिया । हितकारिणी सभा की अध्यक्षा के तौर पर उन्होंने दलित वर्ग की बालिकाओं की शिक्षा पर कई सराहनीय प्रयास किये। हालाँकि वर्ष 1965 में जिला महिला कांग्रेस का गठन किया और महामंत्री बनीं। इस पद का उपयोग भी उन्होंने बालिकाओं व महिलाओं को गाँव-गाँव जाकर पढ़ने और खेल-कूद के प्रति जागरूक करने में ही किया। चंद्रप्रभा जी का सामाजिक विकास के क्षेत्र में बहुमुखी योगदान रहा है। एक तरफ वे अखिल भारतीय हॉकी फेडरेशन की उपाध्यक्षा, मप्र हॉकी एसोसिएशन की अध्यक्षा रहते हुए खेल-कूद को प्रोत्साहित कर रही थीं तो दूसरी तरफ भारत कृषक समाज की जबलपुर इकाई की अध्यक्षा के रूप में कृषि को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रही थीं। इसके अलावा जबलपुर में मेडिकल कॉलेज बनने के बाद वहां काम करने वाली नर्सिंग स्टाफ के लिए पालना घर बनवाया ताकि उनके बच्चों की उचित देखभाल हो सके। वे प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाली समाज की ऐसी सेविका थीं जो बिना किसी शर्त अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थीं। 

इंदौर की अंजलि अग्रवाल विवाह के बाद अपनी सास कृष्णा अग्रवाल की उत्प्रेरणा से समाज सेवा के क्षेत्र में आईं । वे कृष्णा जी द्वारा स्थापित  ‘भारतीय ग्रामीण महिला संघ’  से जुड़कर उन्होंने संस्था और स्वयं के दायित्वों में विस्तार करते हुए किशोरियों एवं बालिकाओं के हित में लम्बे समय से काम कर रही हैं । इसके अलावा वे स्टेट रिसोर्स सेंटर के साथ पिछले 34 वर्षों से योजना, प्रबंधन, एड्वोकेसी, नेटवर्किंग, समन्वय, प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास आदि से सम्बंधित कार्य कर रही हैं । वे वर्ष 2007 से यूनिसेफ व राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल के साथ मिलकर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी अपना योगदान दे रही हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में अपने अभिनव प्रयोग के लिए प्रसिद्ध डॉ. शिबानी घोष वर्ष 2005 से ‘परवरिश- द म्यूजियम स्कूल के माध्यम से वंचित तबके के बच्चों को शिक्षित कर रही हैं । वर्तमान में इस स्कूल से 5 संग्रहालय जुड़े हुए हैं और यहाँ 150 बच्चे पढ़ रहे हैं । यहाँ पढ़ चुके बच्चे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य के क्षेत्र में सफलतापूर्वक अपना स्थान बना रहे हैं ।

देह व्यापार एवं यौन उत्पीड़न

9 अप्रैल 1935 में हिमाचल प्रदेश के चम्बा ज़िले में जन्मी चम्पा बहन अखिल भारतीय रचनात्मक समाज के सम्मेलन में भाग लेने भोपाल आईं जहाँ उनसे बेड़िया समाज के लिए काम करने वाली एक महिला मिलने के लिए आई। उसने उन्हें बेड़िया समाज की स्त्रियों के बारे में बताया जो पारम्परिक रूप से परिवार चलाने के लिए देह व्यापार करती हैं। वर्ष 1983 में चम्पा बेन पथरिया गईं और बेड़नियों के उत्थान में जुट गईं। उन्होंने वहां सत्यशोधन आश्रम की स्थापना की। यह उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि यह ग्राम अब पूरी तरह देहव्यापार से मुक्त हो चुका। यहाँ की स्त्रियाँ अब साक्षर हैं, वे विवाह कर घर बसा रही हैं, अलग-अलग नौकरियां कर रही हैं। 

पथरिया गाँव के कायाकल्प हेतु जिस प्रकार चम्पा बेन समर्पित रहीं, उसी प्रकार प्रदेश के मुरैना जिले में बेड़िया समुदाय के उत्थान के लिए अरुणा छारी जीवन भर संघर्षरत रहीं। उनके द्वारा संचालित अभ्युदय आश्रम में बेड़िया समाज बच्चों के रहने एवं शिक्षा-दीक्षा के प्रबंध के साथ-साथ उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। इसके अलावा उनके प्रयास से कई लड़कियों को देह-व्यापार के दलदल से निकलकर सामान्य जीवनयापन कर रही हैं।  

स्वावलम्बन

किसी भी समाज में व्याप्त बेरोजगारी विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है| इसलिए कुछ महिलाओं नें समाज हित में इसी विषय को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। इस श्रेणी की जनसेविकाओं में पद्मश्री जनक पलटा मगिलिगन का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। जनक जी एक शोधकार्य के सिलसिले में चंडीगढ़ से इंदौर पहुंची थीं जो कालांतर में उनका कर्मक्षेत्र बन गया। उन्होंने बारली ग्रामीण महिला विकास संस्थान की स्थापना की। भमौरी स्थित इस संस्था के माध्यम से आदिवासी युवतियों की शिक्षा से लेकर उन्हें रोजगार से जोड़ने तक में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अब तक वे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं देश के अन्य राज्यों के 5 सौ से अधिक गावों के पिछड़े और गावों की 6 हज़ार से अधिक आदिवासी युवतियों को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। इसके अलावा डॉ. पलटा का सुदूर झाबुआ जिले के 3 सौ गावों को खतरनाक ‘नारू’ रोग से मुक्ति दिलाने में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा । उन्होंने इंदौर जिले के सनावदिया गांव में स्थापित ‘जिम्मी मगिलिगन सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ संस्था की स्थापना की और वर्तमान में इसी संस्था के माध्यम से युवाओं एवं महिलाओं को विभिन्न रोजगार मूलक प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं| 

इसी प्रकार अपने संघर्षों से उत्प्रेरणा लेकर छतरपुर की प्रभा वैद्य ने महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयत्नरत हैं । वे स्वयं एक सहकारी बैंक में छोटी सी नौकरी करती थीं। वहां उन्होंने कई ऐसे मामले देखे जहां किसान बेटियों की शादी के लिए कर्ज लेते हैं और उसे चुका नहीं पाते हैं। प्रभाजी ने ऐसी लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया। शुरुआत में तो अपनी लघु आय से ही महिलाओं को उन्होंने सिलाई मशीन बांटना शुरू कर दिया। वर्ष 1999 में दर्शना महिला कल्याण समिति का गठन कर परेशान और जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार से जोड़ना प्रारंभ कर दिया। पुनः महिलाओं की स्वास्थ्य सम्बन्धी दिक्कतों को देखते हुए गाँव-गाँव में स्वास्थ्य अभियान चलाने का निश्चय किया। उन्होंने हकीमपुरा में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की शुरुआत की। धीरे-धीरे कार्य क्षेत्र को विस्तृत करते हुए रोजगार एवं स्वास्थ्य के बाद महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को लेकर भी मुहीम छेड़ दिया। इस तरह के घटनाओं की जानकारी होते ही वे मौके पर पहुंचकर पीड़िता को सहायता उपलब्ध करवाएं का प्रयास करतीं। अब तक प्रभा जी शासन की विभिन्न योजनाओं से लाभ उपलब्ध करवाने हेतु 7 सौ से अधिक स्व सहायता समूहों का निर्माण करवा चुकी हैं जिससे 10 हज़ार से अधिक महिलाएं लाभान्वित हुई हैं।

महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जबलपुर की पुष्पा बेरी का उल्लेखनीय योगदान रहा है ।  वे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा स्थापित संस्था ‘देश सेवक सेना’ की सक्रिय सदस्या रही हैं, जहाँ उन्होंने राइफल चलाने की प्रशिक्षण भी लिया था । मूलतः पंजाब की रहने वाली पुष्पा बेरी विवाह के बाद सन 19सन 1952 में जबलपुर पहुंची थीं ।  वर्ष 1952 से 74 तक वे घर से ही 5-10 महिलाओं को जोड़कर उन्हें रोजगार उपलब्ध करवाती । वर्ष 1974 में महिला गृह उद्योग, लिज्जत पापड़ की जबलपुर शाखा की संचालिका के रूप में उन्होंने काम करना शुरू किया और आशातीत सफलता हासिल की । उल्लेखनीय है कि महिलाएं अपने घर में ही पापड़ बनाती हैं एवं जो भी मुनाफा होता है उसे सभी सदस्यों में उनके योगदान के अनुसार बाँट दिया जाता है वर्तमान में साढ़े तीन हज़ार महिलाएं उनसे जुड़कर अपने परिवार को आर्थिक सहयोग दे रही हैं।  जबलपुर में बने लिज्जत पापड़ अपन देश के साथ अन्य कई देशों में भी निर्यात होते हैं।

बाल अधिकार

प्रायः बच्चों की समस्या स्वास्थ्य और शिक्षा से इतर आम विमर्श में स्थान नहीं बना पाते|  बाल अधिकारों के लिए संघर्षरत अर्चना सहाय अपनी संस्था ‘आरम्भ’ के माध्यम से बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं उनके अधिकारों के लिए कार्य करती रही हैं। कार्य के दौरान घर से भागे हुए बच्चों की समस्या ने उनका ध्यान खींचा और चाइल्ड लाइन 1098 के जरिये ऐसे बच्चों को घर तक पहुंचाने में वे मदद करने लगीं| दरअसल क्षणिक आवेश, घरेलू हिंसा आदि के कारण कई बच्चे घर छोड़ देते हैं और रेलवे प्लेट फॉर्म, सड़क किनारे जीवन व्यतीत करने के लिए विवश जाते हैं और कई बार आपराधिक गिरोहों के चंगुल में फंस जाते हैं| अर्चना जी ऐसे बच्चों की मदद के लिए हेल्प लाइन के अतरिक्त उनके आवास की भी व्यवस्था करती हैं| अर्चना जी अब तक हजारों बच्चों को अपने घर पहुंचा चुकीं हैं| उनके द्वारा स्थापित भोपाल और इंदौर के बाल संरक्षण गृह में आज भी कई लावारिस बच्चे अपने भविष्य को नए सिरे से गढ़ रहे हैं। 

प्रदेश की पहली महिला आईपीएस एवं नित्य सेवा सोसायटी  की संस्थापिका आशा गोपाल अपने कार्यकला में सख्त अधिकारी मानी जाती थीं। वे सड़कों और रेलवे प्लेट फार्म पर घूमते बेसहारा बच्चों को आसरा देने के लिए भी याद की जाती हैं । सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद उन्होंने भोपाल के पीपलनेर क्षेत्र में अनाथ बच्चों को घर जैसा वातावरण उपलब्ध करवाने एवं उन्हें रोजगार से जोड़ने  के लिए ‘नित्य सेवा सोसायटी’ की स्थापना की, जहाँ इस समय तीन वर्ष की आयु से लेकर 20 वर्ष की आयु वाले किशोर रहते हैं । नित्य सेवा सोसायटी इन बच्चों की शिक्षा के साथ साथ उन्हें रोजगार से जोड़ने का प्रयास भी करती है। वर्तमान में इस सोसायटी को सेवा निवृत्त मेजर जनरल श्याम श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी निशि श्रीवास्तव संभाल रहे हैं। इसी प्रकार इटारसी की सिस्टर क्लारा  जबलपुर व होशंगाबाद जिलों में रेलवे प्लेटफार्म पर भटकने वाले बच्चों के अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पुनर्वास हेतु ‘जीवोदय’ संस्था के माध्यम से प्रयासरत हैं। इस सन्दर्भ में समाज के वंचित तबके के बच्चों के समग्र विकास के लिए ‘मुस्कान’ नामक संस्था के माध्यम से सक्रिय शिवानी तनेजा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे वंचित वर्ग के बच्चों को  न केवल शिक्षा मुहैया करवा रही हैं बल्कि उनके शोषण, विशेष  समुदाय से समन्धित होने के कारण भेदभाव के विरुद्ध उनके भीतर आत्म सम्मान की भावना जागृत करने में भी मदद कर रही हैं। पारदी, गोंड एवं दलित बच्चों को शिक्षा से जोड़कर उन्हें अपराध के दलदल से बचाने का काम वे बखूबी कर रही हैं ।  बच्चों को संस्थागत उद्देश्य विस्तृत होने के कारण कार्य विस्तार उन समुदायों की महिलाओं के सशक्तिकरण में भी  होता। वे यौन उत्पीड़ित बच्चों और महिलाओं की लड़ाई भी लड़ रही हैं। शिवानी जी विशेष समुदायों के बच्चों को संस्था में रखती हैं, उनके भोजन वस्त्र आवास की व्यवस्था के साथ उचित शिक्षा का प्रबंधन करती हैं एवं आत्मसम्मान से भरे युवा के रुप में विकसित करती हैं, संस्था छोड़ने से पहले उन्हें रोजगार से जोड़ने के लिए भी उचित मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। इसी तर्ज पर अरण्या न्यास की संस्थापिका अर्चना शर्मा मध्यप्रदेश के ‘पारदी’ समुदाय के बच्चों के हित में लम्बे समय से काम कर रही हैं। न्यास के माध्यम से वे बच्चो के भोजन वस्त्र आवास एवं शिक्षा की उचित व्यवस्था करती हैं।

अन्य सरोकार  

सामाजिक विकास के पथ पर कई छोटी-बड़ी मुश्किलें अवरोध बनकर खड़ी हो जाती हैं । मध्यप्रदेश की कुछ समाजसेवी महिलाओं ने उस समस्याओं की पहचान करते हुए उनके निराकरण में अपना जीवन अर्पित कर दिया । दमयंती पाणी भी इसी श्रेणी की समाजसेवी महिला हैं। एक फौजी पिता की पुत्री दमयंती पाणी ने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से कमर्शियल आर्ट्स से स्नातकोत्तर करने के बाद ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट से ‘सामाजिक कार्य’ में दोहरा स्नातकोत्तर किया। नवोदय विद्यालय में शिक्षिका के तौर पर काम करने के दौरान ही स्वयं  के बारे में उन्हें ज्ञान हुआ कि वे ‘नौकरी’ के लिए नहीं बनी हैं। स्वयं को तलाशते हुए  नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़ गईं, उसी दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का अध्ययन किया एवं बापू द्वारा स्थापित सेवाग्राम आश्रम में रहने लगीं। वर्ष 2006 से दमयंती जी छतरपुर के गांधी आश्रम में रहते हुए मध्यप्रदेश गाँधी स्मारक निधि की भूमि पर बड़े कृषि फ़ार्म का जैविक तरीके से संचालन कर रही हैं। वे एक लम्बे अरसे से कृषि तकनीकों, बीज संरक्षण, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक चिकित्सा, आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इसके अलावा मानवाधिकार, समानता एवं सांप्रदायिक सद्भाव के लिए भी विभिन्न आंदोलनों में इनकी सक्रिय सहभागिता रही है।

इसी प्रकार अनघा पॉल पिछले कई वर्षो से समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े और जरुरतमंद तबके के लिए कार्य कर रही हैं। इन्होंने लगभग तेरह वर्ष निजी स्तर पर कार्य करने के बाद वर्ष 2016 में गैर लाभकारी संस्था ‘रिसायकल टू सेव रिसोर्सेज फाउंडेशन’ की शुरुआत की। इसके माध्यम से इस्तेमाल किये गए कपड़े आँगनबाड़ी, वन विभाग, विधिक सेवाएं देने वाले शासकीय एजेंसियों के माध्यम से जरुरतमंदों तक पहुंचाई जाती है। साथ ही दुबारा उपयोग में न आने वाले कपड़े महिलाओं के कौशल विकास कार्यक्रमों में प्रशिक्षण प्रदान हेतु उपयोग में लाये जाते हैं। पुराने मुलायम कपड़ों से नवजात शिशुओं के लिए किट तैयार किये जाते है जिनमें झबले, लंगोटियां, टोपियाँ, रुमाल, ओढ़ना एवं बिछौना जैसी चीजें बनाई जाती हैं। इसके साथ ही अनघा विनोबा भावे के सर्वोदय पात्र से प्रेरणा लेकर गर्भवती महिलाओं, प्रसूता माताओं एवं लम्बी बीमारियों से पीड़ित रोगियों के लिए सूखा राशन एकत्र करने का अभियान चला रही हैं।

इस तरह के प्रयासों की ही अगली कड़ी हैं  ग्राम भारती महिला मंडल की संस्थापिका भारती अग्रवाल, जो विभिन्न जागरूकता अभियानों के साथ आजीविका, स्त्री सशक्तिकरण, कौशल विकास, प्राकृतिक संसाधन विकास, बाल शिक्षा, कार्यात्मक साक्षरता, जल और स्वच्छता  एवं आदिवासी कल्याण जैसे मुद्दों पर उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। 

© मीडियाटिक

 

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