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मध्यप्रदेश की प्रमुख महिला पत्रकार एवं संपादक

मध्यप्रदेश की प्रमुख महिला पत्रकार एवं संपादक

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मध्यप्रदेश की प्रमुख महिला पत्रकार एवं संपादक

सारिका ठाकुर

मध्यप्रदेश में महिला पत्रकारिता की विवेचना से पूर्व राष्ट्रीय परिपेक्ष्य से राज्य स्तर तक पत्रकारिता की आमद पर एक दृष्टि डालना अपेक्षित है। 

विश्व में पत्रकारिता का प्रारंभ 131 ईसा पूर्व रोम में हुआ था। इसी वर्ष वह पहला अखबार प्रकाशित हुआ जिसका नाम था –एक्टा दियुरना(दिन की घटनाएँ)। तब तक कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था, पत्थर या धातु की पट्टिका पर समाचार अंकित किये जाते थे। ये रोम के प्रमुख स्थानों पर रखी जाती थी एवं इस पर ग्लेडियेटरों के युद्ध परिणाम के साथ, महत्वपूर्ण नियुक्त एवं नागरिक सभाओं के निर्णय आदि के बारे जानकारी दी जाती थी। इसके बाद की समयावधि में कागज़ एवं छपाई मशीन आदि का आविष्कार हुआ एवं पत्रकारिता विकास पथ पर बढ़ती रही। 

भारत में पत्रकारिता की शुरुआत 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने की। उन्होंने अंग्रेजी समाचार पत्र ‘कलकत्ता जेनरल एडवाईजर’ के नाम से निकालना शुरू किया जिसका नाम बाद में ‘हिक्की गजट’ पड़ गया ।

कलकत्ता जेनरल एडवाइजर के शुरू होने के 38 वर्ष बाद 1818 में बंगला समाचार पत्र ‘दिग्दर्शन एवं ‘समाचार दर्पण’ का प्रकाशन शुरू हुआ एवं जिसके 8 वर्ष के बाद हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत जुगल किशोर शुक्ल के दैनिक समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तंड’ से हुई। मूलतः कानपुर के निवासी जुगल किशोर शुक्ल पेशे से वकील थे एवं कलकत्ते में बस गए थे।

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता ने 1840 में ‘ग्वालियर’ नाम से प्रकाशित उर्दू दैनिक के माध्यम से दस्तक दिया। 1848 में संपादक प्रेम नारायण ने प्रदेश को पहले हिंदी दैनिक(मालवा अखबार) का सौगात दिया।  

महिला पत्रकारिता की दृष्टि से सन 1888 एवं रतलाम दोनों ही महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि इसी वर्ष हेमंत कुमारी देवी ने रतलाम से ‘सुगृहणी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था। सुगृहणी महिलाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रकाशित की गयी थी। उस समय देश में पत्रकारिता स्वतंत्रता आन्दोलन को धार देने के लिए एक मजबूत शस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था जिसमें महिलाओं की संख्या नगण्य थी। इसलिए इतिहास में हेमंत कुमारी देवी का नाम ‘देश की पहली महिला संपादक के रूप में भी दर्ज किया जाता है।

• हेमंतकुमारी देवी

हेमंतकुमारी चौधरी का जन्म लाहौर में 1868 में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबू नवीन चन्द्र राय था। उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर, आगरा एवं कलकत्ता(वर्तमान कोलकाता) में हुई। उनका विवाह सिलहट के राजचन्द्र चैधुरी(अपभ्रंश चौधरी) से हुआ जो रतलाम रियासत की नौकरी के सिलसिले में रतलाम आ गए थे और उन्हीं के साथ हेमंत कुमारी भी रतलाम आ गईं। वे मूलतः बांग्ला भाषी थीं परन्तु हिंदी से उन्हें अतिरिक्त अनुराग था। वे रतलाम रियासत की तत्कालीन महरानी को हिंदी पढ़ाने जाया करती थीं। उस समय आजपास की महिलाओं की स्थिति को देखकर उन्हें ऐसी पत्रिका की जरुरत महसूस हुई जो उन्हें जागरूक कर सके। जिस समय उन्होंने ‘सुगृहणी’ का प्रकाशन शुरू किया था उस समय उनकी आयु मात्र बीस वर्ष थी। इस लिहाज से हम उन्हें देश की सबसे कम उम्र की महिला संपादक भी कह सकते हैं।

एक खूबसूरत आगाज़ के बाद भी लम्बे समय तक की अखरने वाली चुप्पी के बाद कुछ कुछ महिलाओं ने सम्पादक के नाम पत्र लिखने शुरू किये परन्तु पत्रकार के रूप में किसी विशेष महिला का दर्ज नाम नहीं मिलता । सन 1902 में जबलपुर से संपादक सुमित्रा देवी द्वारा प्रकाशित ‘आर्य वनिता’ का उल्लेख पंडित माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ वर्ष 3-अंक 6 के पृष्ठ 172 पर अवश्य किया है। इसके अतिरिक्त आर्य वनिता अथवा उसकी संपादक सुमित्रा देवी के विषय में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

इसके बाद लगभग 30 वर्षो तक किसी महिला ने पत्रकार ने मध्यप्रदेश पत्रकारिता की दुनिया में कदम नहीं रखा। हालाँकि मुख्यधारा की पत्र पत्रिकाओं में महिलाओं के लिए परिशिष्ट आदि छपने शुरू हो गए थे जिसमें महिलाओं ने स्वतंत्र रूप से लिखना शुरू कर दिया था। उदहारण के लिए 1920 से दादा माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में ‘कर्मवीर’ प्रकाशित होने लगा था जिसमें ‘महिला जीवन’ नाम से अलग से कॉलम रखा गया। कई लेखिकाओं को इस अखबार में स्थान भी दिया गया तथापि ‘मील का पत्थर’ नज़र नहीं आता कहीं।   इसके बाद वाली समयावधि में उन विशिष्ट महिला संपादकों का उल्लेख आवश्यक है जो मध्यप्रदेश में जन्मी परन्तु अन्य राज्यों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

• सुभद्रा कुमारी चौहान

क्रांति, साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम परिचय का मोहताज नहीं है।  परन्तु यह एक विडंबना ही है कि मध्यप्रदेश में जन्मी हिन्दी महिला पत्रकारिता को प्रदेश में वह महत्व नहीं मिल सका, जिसकी वह अधिकारिणी थी। यही कारण है कि यहां की महिला पत्रकारों को उत्तर प्रदेश में जाकर अपनी कलम के जौहर दिखाने पड़े। उनमें प्रमुख थी प्रदेश की प्रसिद्ध साहित्यकार और पहली महिला सत्याग्रही सुभद्राकुमारी चौहान। उन्होंने 1947 में नारी पत्रिका का संपादन किया, जो बनारस से निकली थी। प्रवेशांक में सुभद्राजी ने लिखा- ‘आज हम अपनी बहिनों के सम्मुख यह पत्रिका उपस्थित कर रहे हैं। नारी समाज की उन्नति के लिए और जागृति उत्पन्न करने और एक दूसरे के विचारों का आदान प्रदान करने के लिए कोई उपयुक्त पत्र न था। इस आवश्यक कमी की पूर्ति के लिये हमने नारी का प्रकाशन आरंभ किया है, आज हमारा देश स्वतंत्र हो गया है और सभी दिशाओं में जागरण के लक्षण प्रकट हो रहे हैं। नारी समाज सदा से सब देशों में उत्थान में सहायक रहा है। आज भी हम अनुभव करते हैं कि भारतीय नारी समाज को देश में सभी भागों में सक्रिय सहयोग देना आवश्यक है।’

• हीरा देवी चतुर्वेदी

सप्रे संग्रहालय के संस्थापक श्री विजयदत्त श्रीधर की मौसी श्रीमती हीरादेवी चतुर्वेदी जो सरस्वती संपादक श्री देवीदयाल चतुर्वेदी मस्त की धर्मपत्नी थीं, ने नवम्बर 1947 से 1950 तक मनोरमा का सम्पादन किया। हीरादेवी के सम्पादन कौशल की सराहना आचार्य शिवपूजन सहाय ने भी मुक्त कण्ठ से की थी। 2 मई 1925 को खण्डवा में जन्मी हीरादेवी मनोरमा की सम्पादकीय में लिखती हैं-प्रशंसकों से जो प्रोत्साहन हमें मिला उसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं, साथ ही जिन सज्जनों ने हमारी त्रुटियां न दर्शाकर हमारी निन्दा की उनकी भी हम गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में वन्दना ही करते हैं- वंदौं खल जस शेष सरोषा। सहस वदन बरणैं परदोषा।

• राजकुमारी बघेल, प्रभा रत्ना एवं  असफिया खान  

आजादी के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में इक्का दुक्का महिलाएँ ही सामने आईं , दुर्भाग्यवश कुछ पत्र-पत्रिकाओं के अलावा उनके अथवा उनके योगदान से सम्बंधित जानकारी कहीं उपलब्ध नहीं है। स्वतन्त्रता के पश्चात् सर्वप्रथम जबलपुर से राजकुमारी बघेल का जिक्र आता है जो ‘राजकमल’ नामसे महिला पत्र का संपादन एवं प्रकाशन कर रही थी। सप्रे संग्रहालय, भोपाल में राजकमल की कुछ प्रतियां उपलब्ध हैं। पत्र के प्रथम अंक में प्रकाशित सामग्री, सम्पादकीय से सहज ही एक पत्रकार व संपादक के रूप में राजकुमारी बघेल के वैचारिक दमख़म का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने महिला विषयक मुद्दों की गंभीर पड़ताल के साथ-साथ सार्थक बहस के लिए जगह बनाती हुई सी प्रतीत होती है।  

इसके ठीक 18 वर्ष बाद वर्ष 1968 में संपादक के तौर पर ‘प्रभा रत्ना’ का नाम आता है जो भोपाल से प्रकाशित ‘बेताल’ साप्ताहिक अखबार की सम्पादक थीं। बेताल के पुराने अंकों को देखकर स्पष्ट होता है कि ‘बेताल’ मुख्यधारा से प्रभावित अखबार था जिसमें राजनैतिक घटनाक्रमों को प्राथमिक स्थान देते हुए सामाजिक समस्याओं को भी यथोचित स्थान दिया गया था। संपादक राजकुमारी बघेल से सम्बंधित कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।  

1968 में ही ‘त्रैमासिक परीक्षक’ पत्रिका का उल्लेख भी कुछ स्थानों पर मिलता है जिसके संपादक  मंडल में उषा मित्तल एवं सरला माथुर का नाम दर्ज है, परंतु इस त्रैमासिक के पुराने अंक अथवा संपादक मंडल में शामिल महिलाओं का परिचय अतीत के गर्त में कहीं छिपा है।  ऐसी ही के गुमनाम सी संपादक हैं असफिया खान जो 1971 में इंदौर से प्रकाशित आठ पन्नों के साप्ताहिक ‘शिवदेश’ में संपादक के तौर पर दर्ज हैं ।  

इसके बाद 1975 में उज्जैन से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘कालिदास दर्शन’ में संपादक के रूप में उषा भाटिया का, 1978 में छतरपुर से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘क्रांतिकृष्ण’ के संपादक के रूप में ‘मृदुबाला श्रीवास्तव, भोपाल से 1979 में प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘तरुण दुनिया’ में संपादक शीला दुबे एवं इसी वर्ष छिन्दवाड़ा से प्रकाशित पत्रिका ‘ग्रहण’ के संपादक के रूप में विद्यामीना एवं 1981 में भोपाल से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र ‘तुरंत’ में संपादक के रूप में प्रभावती सिंह का नामोल्लेख मिलता है। इसके बाद की कड़ी अटूट है ज्सिमें हर साल नए पत्र-पत्रिकाओं के साथ महिला संपादको का नाम भी जुड़ने लगा। उदाहरण के लिए –

1982 में ग्वालियर से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘मृदंग’ की संपादक प्रेमलता गुप्ता  

1982 में भोपाल से प्रकाशित अखबार ‘रम्भा टाइम्स’ की संपादक रम्भा शर्मा

1982 में छतरपुर से प्रकाशित अखबार ‘जनहित दर्शन’ की संपादक सुभद्रा देवी ‘पहाड़िया

1982 में छतरपुर एवं पन्ना से एक साथ प्रकाशित अखबार ‘केन लहर’ की संपादक साजिदा बीबी

1983 में साप्ताहिक ‘बुरहनपुर टाइम्स’ की संपादक मालती प्रजापति एवं ‘मेरा पत्र’ अखबार की संपादक वनमाला चतुर्वेदी

1984 में त्रैमासिक पत्रिका ‘जीवन वैभव’ की संपादक प्रेमलता पाण्डेय, जगदलपुर से प्रकाशित ‘बस्तरिया’ अखबार की संपादक मणिकांता बोस एवं भोपाल से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘विचारों की दौड़ की संपादक आरती वर्मा, 1985 में इंदौर से प्रकाशित अखबार राजपूत की संपादक सरिता सक्सेना आदि।

पत्र-पत्रिकाओं के प्रिंट लाइन में प्रायः कई डमी नाम भी मिले, जिनमें अधिकाँश नाम ऐसी महिलाओं के होते हैं जिनके पति, भाई अथवा पिता पत्र-पत्रिका के असल मालिक व संपादक होते हैं, परन्तु वे अपना नाम नहीं दे सकते। अतः घर की महिलाओं के नाम बतौर सम्पादक छाप दिए जाते हैं। तथापि कुछ ऐसे नामों का जिक्र आवश्यक है जिनका योगदान अप्रतिम है परन्तु उनसे सम्बंधित विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है जैसे –गोरा बादल की संपादक सरोज लालवानी, अंतर्यात्रा एवं चकमम की संपादक निशा व्यास, आश्वस्त की संपादक डॉ. तारा परमार। इस कड़ी में महत्वपूर्ण नाम डॉ. नुसरत बानो रूही का आता है जिनका जीवन सामजिक उत्थान के लिए ही समर्पित रहा। अपने जीवन काल में उन्होंने बढ़ता कारवाँ एवं मध्यप्रदेश शान्ति व एकता नाम से दो पत्रिकाओं का प्रकाशन व संपादन किया। इसी प्रकार प्रसिद्ध कथाकार मेहरुन्निसा परवेज दैनिक नयी दुनिया में नियमित रुप से स्तम्भ लिखती थीं। वर्ष 2003 से वह भोपाल से समरलोक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन व संपादन कर रही हैं, जिसकी गिनती देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में होती है।

• पुष्पा सिन्हा  

वर्ष 1982 से ‘कस्तूरबा दर्शन’ का संपादन कार्य कर रही पुष्पा सिन्हा कस्तूरबा ग्राम ट्रस्ट के माध्यम से पत्रिका से जुडीं। उनके पिता स्वतन्त्रता सेनानी थे एवं स्वतंत्रता के पश्चात दैनिक जागरण सहित कुछ अखबारों के साथ जुड़े रहे। इसलिए पत्रकारिता से प्रारंभिक परिचय उन्हें घर में ही मिल गया था। कस्तूरबा ग्राम ट्रस्ट से जुड़ने के बाद सामाजिक उत्थान हेतु नेताओं द्वारा दिए गए भाषणों को सुनना, नोट्स लेकर उस पर रिपोर्ट तैयार करने जैसा दायित्व उन्हें सौंपा गया जिसे उन्होंने लम्बे समय तक निभाया और बाद में उन्हें सम्पादक बना दिया गया। सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ कस्तूरबा दर्शन के स्वरूप में भी काफी परिवर्तन आया है तथापि आज भी अपने उद्देश्यों के प्रति सचेत है ।

• ज्योत्स्ना मिलन 

सुप्रसिद्ध साहित्यकार ज्योत्स्ना मिलन जिस प्रकार अपनी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार अनसूया की संपादक के तौर पर भी जानी जाती है। अनसूया का प्रकाशन गुजरात से इला भट्ट कर रही थीं। 1985 में भोपाल के गांधी आश्रम इलाजी की मुलाक़ात ज्योत्स्ना जी से हुई और उन्होंने अनसूया का सम्पादन भार उन्हें सौंप दिया, जिसे उन्होंने बड़ी शिद्दत से निभाया। हालाँकि अनसूया साहित्यिक पत्रिका न हो कर श्रमिक महिलाओं की समस्या एवं उनके हित में प्रकाशित पत्रिका है तथापि विषय के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव के कारण ज्योत्स्ना जी अप्रैल 2013 तक इस पत्रिका के साथ जुड़ी रहीं।

• मृणाल पांडे

महिला पत्रकारिता की दृष्टि से मध्यप्रदेश जहां एक ओर हिन्दी महिला पत्रकारिता का जनक है वहीं दूसरी और उसने शिखर भी छुआ है। मां शिवानी से साहित्यिक संस्कार लेने वाली पत्रकारिता क्षेत्र का बड़ा नाम मृणाल पाण्डे प्रसार भारती बोर्ड की पहली महिला अध्यक्षा हैं। वर्ष 1984 से पत्रिका वामा के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता की जमीन पर अपने पाओं रखे जिसके बाद वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान और दैनिक हिन्दुस्तान की  संपादक रहीं। कुछ समय तक दूरदर्शन पर समाचार प्रस्तोता की भूमिका अदा कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी।  

• सुधा मलैया

बहुआयामी प्रतिभा की धनी सुधा मलैया ने वर्ष 1993 में ‘ओजस्विनी’ महिला पत्रिका की शुरुआत की। अपने प्रथम अंक से ही ओजविस्नी के माध्यम से उन्होंने महिलाओं से सम्बंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाने में सफ़ल रही हैं। वह एक साथ राजनीति, समाज सेवा, पत्रकारिता और अपनी गृहस्थी जैसी जिम्मेदारियां एक साथ संभालती रही हैं, तथापि ओजस्विनी के माध्यम से महिला विषयक मुद्दों पर चर्चा के लिए जमीन तैयार करने में इनका महत्वपूर्व योगदान रहा है। 

• सर्वमित्रा सुरजन

अविभाजित मध्यप्रदेश में  1974 में जन्मी सर्वमित्रा सुरजन, दैनिक देशबन्धु की संपादक हैं। वे विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता कर रही हैं। दैनिक देशबन्धु के संपादकीय विभाग में विभिन्न जिम्मेदारियों को संभालने के साथ, उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक साहित्यिक पत्रिका अक्षर पर्व का संपादन भार संभाला। 1999 से 2001 तक वे रूस में देशबन्धु की ब्यूरो चीफ भी रहीं। 2001 से 2008 तक रेडियो वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा के लिए छत्तीसगढ़ से सेवाएं दीं। 2001 से 2002 तक भारतीय विद्या भवन, मुंबई के सहयोग से चल रहे मास मीडिया इंस्टीट्यूट में बतौर फैकल्टी कार्यरत रहीं। 2004 से 2005 तक नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया व मायाराम सुरजन फांउडेशन के सहयोग से ग्रामीण पत्रकारिता व पंचायती राज के लिए चलाई कार्यशालाओं में बतौर प्रशिक्षक कार्य किया। इस दौरान छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों में जाकर काम किया। प्रौढ़ शिक्षा के लिए राज्य संसाधन केंद्र, छत्तीसगढ़ में बतौर अध्यक्ष कार्य किया। 2016 में सर्वश्रेष्ठ राज्य संसाधन केंद्र का पुरस्कार माननीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के हाथों ग्रहण किया। नवसाक्षर साहित्य लेखन में सर्वमित्रा निरंतर सक्रिय रहीं। महिलाओं, बच्चों व मानवाधिकार के मुद्दों पर उन्होंने निरंतर लेखन किया। उनकी किताब मीडिया, समाज व मानवाधिकार के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से उन्हें पुरस्कृत किया गया। उनकी रचनाएं नया ज्ञानोदय, हंस आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। सर्वमित्रा सुरजन आकाशवाणी में विभिन्न परिचर्चाओं में समय-समय पर हिस्सा लेती रहती हैं। पठन-पाठन, संगीत, नाटक व पर्यटन में गहरी रूचि रखने वाली सर्वमित्रा हिन्दी, अंग्रेजी व रूसी की जानकार हैं।

• विद्युलता

हिंदी की प्रोफ़ेसर रहीं विद्युलता जी को जीवन में कुछ नया करने की चाहत पत्रकारिता के क्षेत्र में ले आई| जिस जमाने में महिलाओं के लिए पत्रकारिता का क्षेत्र बंद कमरों या डेस्क वर्क तक सीमित था उस जमाने में विद्युलता जी ने राजनीति सहित सभी चुनौतीपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग की|  23 वर्ष की आयु में शिखरवार्ता से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली विद्युलताजी ने 1986 से 1998 तक नई दुनिया, दैनिक भास्कर जैसे अलग-अलग अखबारों के साथ-साथ कुछ वर्ष स्वतंत्र रूप से काम किया। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें काम छोड़कर घर बैठना पड़ा| उसी दौरान त्रैमासिक पत्रिका औरत की रुपरेखा बनी| तब से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है| राजनीति से अधिक सामाजिक विषयों में रूचि रखने वाली विदुलता जी ने सम्पादक के तौर पर स्त्री विषयक लगभग सभी मुद्दों को इस पत्रिका में जगह दी, चाहे वह महिला बुनकरों की समस्या हो या उम्रकैद प्राप्त महिला कैदियों की स्थिति| उल्लेखने है कि ऐसे चुनौतीपूर्ण मुद्दों की रिपोर्टिंग आज वही वे खुद ही करती हैं| औरत के सभी अंक विभिन्न कोण से महिलाओं की दशा का दस्तावेजीकरण कहा जा सकता है। वर्तमान में वे पत्रिका ‘औरत’ के संपादन के साथ ही संस्था ‘वुमेन्स मीडिया इन इंडिया’ की सदस्या हैं ।

• विनीता श्रीवास्तव

भोपाल से प्रकाशित महिला पत्रिका ‘तुलिका’ की संपादक विनीता श्रीवास्तव अपने अग्रज की उत्प्रेरणा से पत्रकारिता से जुडीं। उनके अग्रज दिल्ली प्रेस से जुड़े हुए थे एवं सरिता तथा मुक्ता के ब्यूरो चीफ थे। दिल्ली प्रेस से कई महिला विषयक पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रही हैं, जिसे जानने और समझने का उन्हें भरपूर अवसर प्राप्त हुआ। छात्र जीवन से ही लेखन में भी अभिरुचि रही। वर्ष 1996 -97 के आसपास वे सबसे पहले दैनिक ‘चौथा संसार’ से जुडीं, जहाँ उन्होंने लगभग 3 साल काम किया। इसके बाद परिस्थितिवश वे भोपाल आ गईं एवं ‘दैनिक स्वदेश’ से बतौर प्रदेश स्तर की क्षेत्रीय समाचार संपादक नियुक्त हुईं। इसके बाद वे नवभारत से जुड़कर महिला परिशिष्ट सुरुचि संभालने लगीं। इस बीच अपनी पत्रिका निकालने का ख्याल भी बीच-बीच में आता रहा। वर्ष 2002 में पत्रिका ‘तुलिका’ ने आकार लिया। विनीताजी ने इस पत्रिका का स्वर क्रांतिकारी अथवा विद्रोही रखने के स्थान पर सकारात्मक रखा। ऐसी महिलाओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया जिन्होंने अपने दम पर अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2008 में ‘तुलिका मिसेज एमपी’ प्रतियोगिता की शुरुआत की, जिसकी प्रथम विजेता एक 65 वर्षीया महिला थीं। इस प्रतियोगिता का मकसद घर की चारदीवारी में छिपी हुई प्रतिभा को बाहर निकालना एवं उन्हें मंच प्रदान करना था। विनीता श्रीवास्तव आज भी तुलिका के माध्यम से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं।

•  डॉ. आरती

प्रायः पत्रकारिता का आशय समकालीन महत्वपूर्ण घटनाओं का रोजनामचा मान लिया जाता है। यदि इसे सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में लें तो प्रदेश में कई विषयों पर आधारित पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ जिन्हें प्रकाशित और संपादित करने वाली महिलाएं रही हैं। इनमें डॉ.आरती का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है क्योंकि पत्रकारिता एवं साहित्य दोनों ही क्षेत्रों से इनका गहरा जुड़ाव रहा है। रीवा जिले के गोविन्दगढ़ में जन्मी आरती हिंदी साहित्य में पी.एच.डी हैं। कैरियर के प्रारंभिक दौर में कई पाक्षिक, साप्ताहिक अख़बारों के साथ-साथ ईटीवी, साधना चैनल वॉइस ऑफ़ इंडिया जैसे चैनलों के साथ लगभग 10 वर्षों का सफ़र रहा। वर्ष 2008 में इन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘समय के साखी’ का प्रकाशन एवं संपादन शुरू किया। इसके साथ ही कुछ वर्षों तक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ” मीडिया मीमांसा” और “मीडिया नव चिंतन” पत्रिकाओं के कई अंको का सम्पादन भार सम्भाला। रबिन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के वृहत कथा कोश कथादेश के संपादन कार्य से भी सम्बद्ध रहीं। इसके अलावा आरती जी का एक कविता संग्रह ‘मायालोक से बाहर’ एवं उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक नरेश सक्सेना का व्यक्तित्व और कृतित्व” प्रकाशित हो चुके हैं।  

पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान देने वाली महिलाएं भले ही संख्या में कम रही हों, उनके प्रयासों से भावी पीढ़ी के लिए सरल सुलभ वातावरण अवश्य निर्मित हुआ है। यही वजह की चुनौती पसंद कई युवतियां कैरियर के तौर पर पत्रकारिता को न केवल चुन रही हैं बल्कि सफल भी हो रही हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि हमारा प्रदेश अनुकूल वातावरण नहीं होते हुए भी महिला पत्रकारों की दृष्टि से काफी समृद्धशाली माना जा सकता है। आज प्रदेश के हर बड़े पत्र में महिलाएं  कार्यरत हैं और अपनी कार्यशैली से पत्रकारिता जगत में अपनी साख छोड़ रही हैं तथापि यह भी रेखांकित करने योग्य है कि बड़े पद तक पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या आज भी न्यून ही है।

स्रोत: बातचीत पर आधारित

सामग्री सहयोग: मंगला अनुजा, अंजना त्रिवेदी

 

 

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