Now Reading
प्रभा वैद्य

प्रभा वैद्य

छाया :

छाया: प्रभा वैद्य के एफ़बी अकाउंट से

विकास क्षेत्र
समाज सेवा
प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता

प्रभा वैद्य

• डॉ नारायण सिंह परमार

बुंदेलखंड अंचल में सदियों से व्याप्त सामाजिक असमानता के कारण यहां की महिलाओं को आज भी अपने अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करना होता है। चारदीवारी में कैद रहकर जीवन बिताती इन महिलाओं के लिए संतुलित भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं और अच्छे कपड़े अभी भी बड़ी उपलब्धि में शामिल हैं। ऐसे में छतरपुर जिले में महिलाओं को न केवल बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में बल्कि उनकी हर परेशानी में साथ खड़े रहकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में प्रभा वैद्य का नाम सामने आता है।

जिला सहकारी केंद्रीय बैंक में प्रबंधक पद पर कार्यरत प्रभा वैद्य का जन्म मऊसहानियां में 1 सितम्बर 1959  सोनी प्रसाद और रामबाई वैद्य के घर हुआ।  पिताजी शिक्षा विभाग सहायक निरीक्षक थे और माँ गृहणी थीं।   प्रभा जी की तीसरी तक की पढ़ाई गांव के स्कूल में हुई, पांचवी-छठी तक की पढाई उन्होंने उप्र के चरखारी में बड़ी बहन के पास रहकर की। फिर पिताजी का तबादला राजनगर हो गया तो आठवीं तक की पढ़ाई छतरपुर में हुई। नौगांव से उन्होंने मैट्रिक किया और वहीँ के बापू महाविद्यालय से 1980 में  ग्रेजुएशन किया।1982 में महाराजा महाविद्यालय छतरपुर से एमकॉम किया। प्रभाजी के पिता उनके ग्रेजुएशन के दौरान ही चल बसे थे। 1983 में भाई ने उनकी शादी करवाई लेकिन वह डेढ़ महीने ही चल पाई। इसके बावजूद प्रभाजी वापस लौटकर गाँव नहीं गईं बल्कि छतरपुर में दीदी-जीजाजी के पास रहने लगीं थी।

अपने व्यक्तिगत जीवन की शुरुआत में ही गहरा आघात लगने के बाद भाई-बहन की मदद से उन्होंने ज़िंदगी को नए ढंग से जीना शुरू किया। उन्होंने सहकारी बैंक में महज 3 सौ रुपए महीने पर अस्थाई क्लर्क के रूप में नौकरी शुरु की। उन्होंने देखा कि बैंक में ऋण के ऐसे मामले अधिक आते थे जिनमें किसान अपनी बेटी के विवाह के लिए कर्ज ले तो लेते थे लेकिन उसे चुका नहीं पाते थे। उन्होंने तय किया कि वे ऐसे लड़कियों को स्वावलंबी बनाने का प्रयास करेंगी। इसके लिए उन्होंने उन्हें सिलाई सिखाना शुरू किया। अपने अल्प वेतन से ही उन्होंने सिलाई मशीनें बांटना शुरू किया। बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का 25 साल पहले शुरू हुआ उनका यह प्रयास अब एक अभियान में बदल चुका है।

परेशान, ज़रूरतमंद किन्तु जुनूनी महिलाओं की तलाश में जुटीं प्रभा जी को सहकर्मियों ने इस कार्य के लिए संस्था बनाने का सुझाव दिया। वर्ष 1999 में उन्होंने दर्शना महिला कल्याण समिति की स्थापना की और उसके माध्यम से उन्होंने समाजसेवा के काम बड़े स्तर पर करना शुरू कर दिया। वर्ष 2002 में राजनगर विकासखंड के हकीमपुरा गांव में एक प्रसूती महिला की अस्पताल ले जाते हुए मौत ने प्रभा जी को झकझोर दिया। उन्होंने गांव-गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अभियान चलाने का प्रण लिया। अपने संसाधनों और सहयोगियों के प्रयास से उन्होंने हकीमपुरा में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू किया। उनके अनुरोध पर राजनगर में पदस्थ डॉ. सुरेश बौद्ध अवकाश के दिनों में इस केंद्र पर आते और गांव के लोगों का इलाज करते। इसके साथ ही दवाएं भी इकट्ठी की जाने लगीं। इस अनूठे अभियान से प्रभावित होकर तत्कालीन कलेक्टर रामानंद शुक्ल ने हकीमपुरा में एक प्रसूति कक्ष का निर्माण कराया। प्रभा जी के इस प्रयास की पूरे देश में खूब चर्चा हुई। केंद्र व राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके इस अभिनव प्रयास का मॉडल परियोजना के रूप में निरीक्षण किया।

महिलाओं पर होने वाली हिंसा के विरुद्ध भी प्रभा जी ने खूब संघर्ष किया। ऐसी घटनाओं की जानकारी मिलते ही वे मौके पर पहुंचती रहीं हैं और पीड़ित महिलाओं को राहत दिलाने का प्रयास करती रही हैं। प्रभा जी के अनुसार उन्होंने घरेलू हिंसा के विरुद्ध अभियान चलाकर करीब 2 हज़ार महिलाओं को पारिवारिक माहौल दिलाने का प्रयास किया है। उन्होंने पाया कि महिलाओं को बुढ़ापे में सबसे अधिक परेशानी होती है। पति के वृद्ध या बीमार हो जाने के बाद बच्चे वृद्ध मां को वह सम्मान नहीं देते हैं जिसकी कि वह हकदार होती हैं। उन्होंने इसी अवधारणा को ध्यान में रखकर ज़िला अस्पताल में वर्ष 2003 में दर्शना वृद्धाश्रम की शुरुआत की, जहाँ इस समय करीब आधा सैकड़ा वृद्ध महिलाएं सुकून के साथ रह रही हैं।

प्रभा जी ने अपनी स्वयंसेवी संस्था के माध्यम से शासन की विभिन्न योजनाओं से जुड़कर जिले में साढ़े 7 सौ से अधिक महिला स्व सहायता समूह बनाए हैं। इन समूहों में 10 हज़ार से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इन महिलाओं को स्वरोजगार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन समूहों की महिलाएं जैविक खेती, अंडरगारमेंट का निर्माण, फूड प्रोसेसिंग जैसे कामों में लगी हुई हैं। प्रभा का वैद्य का कहना है कि परिवार को चलाने और आगे बढ़ाने में महिलाएं, पुरुषों से अधिक योगदान देती हैं इसके बाद भी जब वे बीमार होती हैं या अन्य परेशानी में होती हैं तो परिवार का उन्हें वैसा सहयोग नहीं मिलता जैसा महिलाएं अपने परिवार के प्रति देती हैं। समाज को अपना नज़रिया बदलना चाहिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

© मीडियाटिक

 

विकास क्षेत्र

 
View Comments (0)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Website Designed by Vision Information Technology M-989353242

Scroll To Top