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पेरीन  दाजी 

पेरीन  दाजी 

छाया: पत्रिका डॉट कॉम

प्रेरणा पुंज
विशिष्ट महिलाएं

पेरीन  दाजी 

‘ऐसे कैसे बस चढ़ा देता मेरे ऊपर, इतनी हिम्मत थोड़े ही है ………. सिटी बस के ड्राइवर और कंडक्टर यूनियन की हड़ताल चल रही थी, हड़ताल टूटती ना दिखी तो ट्रांसपोर्ट कम्पनी के मालिक दूसरे ड्राइवर, कंडक्टर लाकर सिटी बसों को फिर से सडक़ पर लाने और इनकी हड़ताल तोडऩे की कोशिश कर रहे थे। एक बस सडक़ पर निकल चुकी थी दूसरी को लाने की तैयारी में ही थे। सामने हड़ताल पर बैठे ड्राइवर और कंडक्टर के चहरे उतरे हुए थे, बैचेनी साफ़ झलक रही थी, तभी आटो से सफ़ेद बालों वाली करीब 80-81 वर्ष की महिला उतरी, ड्राइवर और कंडक्टर से कुछ बात की और करीब से निकलती दूसरी बस के सामने दोनों हाथ फैलाकर खड़ी हो गई और बोली-अब जो बस निकलेगी उसे मेरे ऊपर से निकलना होगा…..ये महिला थीं कॉमरेड पेरीन दाजी।

25 नवम्बर, सन 1929 में इंदौर में जन्मी पेरीन दाजी के पिता श्री कैकोबाद मिर्ज़ा, होलकर स्टेट में बायलर इंस्पेक्टर थे और उनकी माँ श्रीमती दीना मिर्ज़ा गृहिणी थीं। उन्होंने दादी के विरोध के बावजूद माँ के सहयोग से आठवीं तक सेंट रेफियल्स में पढने के बाद नवमीं से स्नातक तक की पढाई घर पर रहकर ही पूरी की। कॉमरेड होमी दाजी से भी उसी दौरान सम्पर्क में आयीं। वे उन्हें ट्यूशन पढ़ाने आया करते थे।

होलकर रियासत में उस समय वामपंथियों को आतंकवादी जैसा समझा जाता था, पेरीन ने फिर भी अपनी जिद से परिवार वालों को तैयार किया और मैट्रिक के बाद ही होमी दाजी से सगाई तय हो गयी।

पेरीन और होमी दोनों ने मिलकर तय किया कि शादी पेरीन के स्नातकोत्तर करने के बाद ही करेंगे। लेकिन पार्टी की गतिविधियों के चलते कॉमरेड होमी को कभी भी भूमिगत होना पड़ सकता था, इसलिए पारिवारिक दबाव के चलते पहले ही अर्थात 21 मई, 1950 में शादी करनी पड़ी और वो भी मुंबई के पास ‘उड्वारा’ से क्योंकि होमी वामपंथी थे और पेरीन के पिता होलकर रियासत में नौकरी करते थे। शादी के बाद दोनों ने मिलकर तय किया की होमी जरूरतमंदों को और पार्टी को देखेंगे और पेरीन घर।

पति के वामपंथी होने के कारण सरकारी नौकरी मिलना मुश्किल था, अत: 1 जुलाई 1950 में सेंट रेफियल्स स्कूल में ही 100 रुपये माहवार में उन्होंने पार्ट टाइम नौकरी ज्वाइन कर ली और 42 वर्षों तक अपनी सेवाएँ देती रहीं.

पेरीन ने अपनी नौकरी के दौरान किसी भी सामाजिक गतिविधियों या जुलूस वगैरह में भाग नहीं लिया। क्योंकि कॉमरेड होमी को अपना काम करने देने के लिए,  उनको घर-परिवार के झंझटों से मुक्त रखना था। कॉमरेड पेरीन के शब्दों में ‘मैं जानती थी कि होमी पार्टी के लिए मुझसे ज्यादा उपयोगी हैं…इसलिए मैंने अपनी नौकरी को संभाल कर रखा’।

 होमी जी ने जब सन 1952, 1957 और 1962 के चुनाव लड़े तब भी पेरीन ने बैठकें आयोजित करने, चिट्ठियां  लिखने, पर्चे बांटने जैसे काम सक्रिय रूप से किए।  सन् 1974 में कॉमरेड होमी विधानसभा में मंहगाई के विरोध में प्रस्ताव रखने वाले थे, पुलिस उन्हें बिना वारंट के ही गिरफ्तार करने वाली थी ये बात किसी तरह पेरीन को पता चल गई और उन्होंने होमी को फरार करवा दिया। घर पर होमी को न पाकर  पुलिस पहले उनके पुत्र रूसी और फिर खुद पेरीन को गिरफ्तार करके ले गई और दस दिन तक जेल में रखा।

सन 1967 में छोटे भाई कैकी के गुजर जाने के बाद उनके दो बेटे और पत्नी की जिम्मेदारी भी कॉमरेड होमी पर थी, जो पेरीन ने बखूबी निभाई।

13 जुलाई 1951 को पैदा हुआ बेटा रुस्तम, जिसे सभी प्यार से रुसी कहते थे, सन 1992 में चल बसा और 12 सितम्बर 1952 को पैदा हुई बेटी रोशनी भी कैंसर  के चलते सन 2002 में दुनिया से विदा हो गईं। लेकिन कॉम.पेरीन ने हिम्मत नहीं खोयी।

सन् 1957 में दूसरा विधानसभा चुनाव जीतने के बाद डॉ. शशिकला मायंकर, पेरीन को भारतीय महिला फेडरेशन (एनएफआईडब्ल्यू) में लेकर आईं। सन् 1975 अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया गया था, जो बर्लिन में मनाया गया। इसमें लगभग सभी मुल्कों की महिलाएं सम्मिलित हुई थीं, तब मध्यप्रदेश से  पेरीन और अख्तर आपा  भारतीय महिला फेडरेशन की ओर से बर्लिन वर्ल्ड कांग्रेस में सम्मिलित हुई थीं।

1 जून 1992 में कॉमरेड होमी को पक्षाघात हुआ और  पेरीन को लगा, कि अब पति को उनकी अधिक जरूरत है, तो वे नौकरी से इस्तीफा देकर पति की सेवा में लग गयीं । इसके बावजूद वे सामाजिक गतिविधियों में भाग लेती रहीं।

14 मई 2009 को होमी दाजी के निधन के बाद पेरीन ने अपने को पूरी तरह से  जनसेवा और पार्टी के काम के प्रति समर्पित कर दिया। दिन हो या रात, दूर हो या पास, घरों में काम करने वाली बाईयां हों, कनिष्ठ चिकित्सक, नर्स, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, बीड़ी मजदूर, फैक्ट्री मजदूर, गरीब-अनाथ बच्चे, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, महंगाई विरोध हो या विनायक सेन का समर्थन-  पेरीन सभी में आगे आकर नेतृत्व करती रहीं।

वर्ष 2011 में उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई ‘यादों की रोशनी,’ जिसका विमोचन एक मोची की पत्नी ने किया था। दरअसल होमी जी के देहांत से पूर्व के वर्षों में पेरीन दाजी पुस्तक लिखने में व्यस्त थीं। प्रकाशित होने पर किसके द्वारा विमोचन हो, इस बात पर भी चर्चा होती।पेरीन दाजी ने कह दिया  “किताब का विमोचन उस व्यक्ति से करवाउंगी जो होमी के जूते सिलता था।” होमी जी ने उसकी तलाश शुरू की लेकिन उस मोची की मौत हो गयी थी। अंत में उसकी पत्नी से पुस्तक विमोचन करवाया गया।

82 वर्ष की उम्र में भी पेरीन पर्यावरण जागरूकता की साइकिल रैली में भाग लिया था। वह ज्यादातर बस या पैदल ही चलती थीं।  फरवरी 2019 में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया । उनके घर की दीवार पर एक होमी जी की एक तस्वीर पर टंगी थी, जिस पर दाजी के शब्द अंकित थे- “होमी ने मुझे सिखाया था, जाने के बाद लोग बोलें, सिद्धांतों वाला, नेक इंसान था, औरों के लिए जिया तो ही जाना सार्थक। ” जीवन के अंतिम दिनों में भी वह आँखों में बहुत से सपने और उम्मीदें लिए हर नए दिन, नए उत्साह से तैयार रहती थीं। उन्होंने अपने परिजनों से कह रखा था -मैं मरुँ तो मुझे मजदूरों के श्मशान में ले जाना  । उनकी यह अंतिम पूरी हुई।

संदर्भ स्रोत – मध्यप्रदेश महिला संदर्भ 

 

 

प्रेरणा पुंज

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