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पूर्णिमा चतुर्वेदी

पूर्णिमा चतुर्वेदी

छाया : पूर्णिमा चतुर्वेदी के फेसबुक अकाउंट से 

सृजन क्षेत्र
हस्तशिल्प एवं लोक कला
प्रमुख लोक कलाकार

पूर्णिमा चतुर्वेदी

निमाड़ी लोक कला में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली प्रदेश की जानी-मानी लोक गायिका पूर्णिमा चतुर्वेदी का जन्म 20 जुलाई 1967 में खंडवा के प्रतिष्ठित साहित्यकार पद्मश्री पं. रामनारायण जी उपाध्याय के परिवार में हुआ। परिवार में 5 बहनों व 4 भाइयों में सबसे छोटी पूर्णिमा को बचपन से ही चित्रकला और संगीत में विशेषकर लोक संगीत में विशेष रुचि थी। पिताजी शिवनारायण जी उपाध्याय किसान व लेखक थे तो माता श्रीमती सुभद्रा देवी सुघढ़ गृहिणी होने के साथ-साथ निमाड़ी लोक संस्कृति की अच्छी जानकार थी। लोक गायन और लोक कला की प्रेरणा पूर्णिमा जी  को अपने परिवार से ही प्राप्त हुई।

संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी पूर्णिमा जी को अपने दादाजी, ताऊजी, माता-पिता भाई-बहनों व भाभियों से समय-समय पर अपनी संस्कृति को गहराई से जानने, समझने और सीखने का पूरा अवसर मिला। पूर्णिमा विरासत में मिली निमाड़ी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में प्रयासरत हैं तथा इस कला को सीखने और सिखाने के सिद्धांत पर सक्रियता से कार्य करते हुए मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में अपनी माटी की खुशबू बिखेर रही हैं। पूर्णिमा जी के प्रयासों का ही परिणाम है कि निमाड़ी लोक चित्र अब निमाड़ी पेंटिंग के नाम से पहचाने जाने लगे हैं।

पूर्णिमा जी की प्राथमिक शिक्षा खंडवा के कस्तूरबा स्कूल और कक्षा 6 से 11वीं तक की शिक्षा महारानी लक्ष्मीबाई उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला खंडवा में हुई।  क्रिश्चियन बुनियादी प्रशिक्षण संस्था, खंडवा से बी.टी.आई टीचर ट्रेनिंग का दो वर्ष का डिप्लोमा और प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से प्रभाकर व सीनियर डिप्लोमा (भाव संगीत में) हासिल किया। बहुमुखी प्रतिभा की धनी पूर्णिमा जी कक्षा चौथी से ही सांस्कृतिक और लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में निमाड़ी लोकगीतों और नृत्यों की प्रस्तुति देकर पुरस्कार अर्जित करती रहीं। यह सिलसिला स्कूल-कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में निरंतर जारी रहा। पढ़ाई पूर्ण करने के बाद सरस्वती शिशु विद्या मंदिर खण्डवा में अध्यापन कार्य करते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों में लोक संस्कृति की अलख जगाती रहीं।

वर्ष 1987 में मप्र विद्युत मण्डल, भोपाल में पदस्थ श्री आनंद चतुर्वेदी – जो अब उप महाप्रबंधक हैं, के साथ उनका विवाह होने के बाद वे भोपाल के उपनगर बैरागढ़ में संयुक्त परिवार में रहने लगीं। यहां रहते हुए उन्हें यह बात बहुत सालती कि इतनी विशाल, समृद्ध निमाड़ी संस्कृति के बारे में यहां कोई नहीं जानता।  ढोलक बजाकर निमाड़ी संस्कार के गीत गाने वाली वे परिवार की एकमात्र बहू थीं।  विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों और रूढ़िगत परम्पराओं के कारण उन्हें अपने काम को विराम देना पड़ा।  हालांकि प्रत्यक्ष रूप से उनके काम को लेकर ससुराल में कोई बंदिशें नहीं थीं, लेकिन स्थितियां ऐसी भी नहीं थीं कि वे बाहर जाकर काम कर सकें।  शादी के बाद शुरू-शुरू में कार्यक्रमों के लिए काफी आमंत्रण आए लेकिन न चाहते हुए भी उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा।  उस समय हाथ आये अवसर छोड़ने की कसक उन्हें हमेशा बनी रही।

वर्ष 1996 में आदिवासी लोक कला परिषद द्वारा आयोजित शिविर में उन्होंने निमाड़ी लोकचित्रों की प्रदर्शनी लगाईं और काफी प्रशंसा भी बटोरी।  इसी वर्ष आकाशवाणी भोपाल में बी श्रेणी की परीक्षा पास करने के बाद वे बीच-बीच में आकाशवाणी में कार्यक्रम देने जरुर जाने लगीं लेकिन परिवार के सदस्य इससे प्रभावित न हों, इस बात का विशेष ध्यान रखतीं इसलिए घर के कामकाज निपटने के बाद वे रिकार्डिंग के लिए दोपहर का समय निश्चित करतीं।  इसके बाद उनके सामने कई अवसर आए लेकिन परिवार को प्राथमिकता देते हुए वे घर पर ही लोक गीतों का अभ्यास एवं लोक चित्रों का सृजन करती रहीं। खाना बनाते समय लोक गीतों का अभ्यास करतीं और जब बच्चे पढ़ाई करते वे भी अपनी कूची लेकर बैठ जातीं और चित्र बनाया करतीं। इस तरह उन्होंने अपनी रुचि और अंदर के कलाकार को जीवित रखा।  

जब बच्चे बड़े हो गए और घर की ज़िम्मेदारियां कुछ कम हुईं, तब 10 वर्षों के अंतराल के बाद वे एक बार फिर जोश और उत्साह के साथ काम के लिए तैयार हुईं, लेकिन अब उन्हें नये सिरे से काम ढूंढने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी। वर्ष 2005 से उन्होंने निमाड़ उत्सव महेश्वर में करीब 100 बच्चों और महिलाओं को लोकचित्रों के प्रशिक्षण के साथ पुनः अपनी लोक कला यात्रा आरंभ की। अब उन्होंने केवल और केवल निमाड़ी संस्कृति को लोगों तक पहुंचाने खासकर युवाओं के बीच इसे लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से करीब 11 वर्ष तक लोक गायन और लोक कला के प्रशिक्षण का काम किया। इसके लिए वे भारत के विभिन्न शहरों में गई। केन्द्र सरकार के दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केंद्र नागपुर (भारत सरकार) द्वारा गुरु शिष्य परंपरा के निमाड़ के लोक चित्रों का छ: माह का प्रशिक्षण दिया यहाँ उन्हें गुरु की उपाधि प्रदान की गई।

दिल्ली में नेशनल म्यूजियम में स्कूल के बालक-बालिकाओं अध्यापिकाओं को एक माह प्रशिक्षण देने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और प्रशिक्षण/कार्यशालाओं द्वारा अपनी विशिष्ट कार्यशैली से लोगों को परिचित कराती रहीं। केरल, त्रिशूर, कोलकाता, दिल्ली, झांसी चंडीगढ़ आदि सभी जगह इनके काम को बहुत अधिक सराहना और प्रशंसा मिली। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी उपलब्धियों और कार्यों से प्रेरित होकर महिलाओं और बच्चों में निमाड़ की संस्कृति को लेकर रुचि जागृत हुई।  उन लोगों ने भित्ती चित्र बनाना और लोकगीत सीखे, जिससे निमाड़ की लोक कला को राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिलने लगी। दूरदर्शन, जी.टी.वी., ई.टी.वी., न्यूज वर्ल्ड आदि चैनल पर लोक गायन की प्रस्तुतियों से निमाड़ के लोकगीतों को भी न केवल एक अलग पहचान मिली, बल्कि सम्मान भी मिला है।

पूर्णिमा जी अपने ताऊजी प्रसिद्ध लेखक और पद्मश्री से सम्मानित पं. रामनारायण उपाध्याय से काफी प्रभावित रहीं। उन्होंने निमाड़ की लोक संस्कृति को लेकर बहुत काम किया था। वे महिलाओं और बच्चों को अपनी मिट्टी से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती पूर्णिमा विलुप्त हो रही निमाड़ की लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में प्रयासरत हैं और निमाड़ लोक गीतों के साथ ही लोक चित्रों के लिए भी काम कर रही हैं।

निमाड़ी लोकगीतों में रची बसी पूर्णिमा ने वर्ष 2012 में भोपाल की महिलाओं को एकत्रित कर ‘निमाड़ी लोकगीत एवं लोकचित्र’ नाम से एक महिला मंडली भी बनाई। लेकिन भोपाल में निमाड़ी लोक गायन में रुचि रखने वाली महिलाओं को ढूंढना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य था। वे अपने आसपास ऐसी महिलाओं को खोजती रहतीं। आखिरकार उनका यह प्रयास रंग लाया और उन्होंने महिलाओं को इकट्ठा कर उन्हें लोकगीतों का अभ्यास कराकर मंचीय प्रस्तुति के लिए तैयार किया। मंडली को मंचीय प्रस्तुति का पहला अवसर वर्ष 2012 में हिन्दी राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के फाग महोत्सव में मिला। इसके बाद उन्हें मध्यप्रदेश शासन के अनेक कार्यक्रमों (पावस पर्व, भोजपुर महोत्सव, भारत पर्व, स्वयंसिद्धा कार्यक्रम, गमक आदि) में लगातार प्रस्तुति का अवसर मिलता रहा.

पूर्णिमा जी निमाड़ लोक गीतों के साथ ही लोक चित्रों के लिए भी काम कर रही हैं। इसके लिए वे घर के अलावा स्कूल-कॉलेजों और अन्य संस्थानों में आयोजित वर्कशॉप में जाकर प्रशिक्षण देती हैं। वे अभी तक आधा दर्जन से अधिक निमाड़ी चित्रकला प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं। ख़ास बात यह कि उन्होंने लोक चित्र बनाने का कोई कोर्स या डिप्लोमा नहीं किया है। पूर्णिमा जी लोक गायन या लोक कला केवल सिखाती भर नहीं हैं, उनकी कोशिश होती है सीखने वाले के दिलो-दिमाग में हमारी संस्कृति पूरी तरह रच-बस जाए इसलिए वे लोक कला और गायन का इतिहास (जैसे -लोक चित्र कब बनते हैं, क्यों बनते हैं, कैसे बनते हैं, लोक गायन क्या है, किस अवसर पर कौन से गीत गाये जाते हैं, उनके पीछे क्या कहानियां हैं) बताते हुए बच्चों और महिलाओं को प्रशिक्षित करती हैं।  

पूर्णिमा जी का मानना है कि सिखा कर जाएंगे तो बहुत कुछ दे जाएंगे इसलिए वे प्रशिक्षण पर ही अधिक ध्यान देती हैं। उनका मानना है लोक कलाएं समय के साथ अंचलों तक सिमट कर रह गई हैं। हमें हमारी  परंपराओं को जीवित बनाए रखना चाहिए क्योंकि इन्हीं की बदौलत क्षेत्रीय पहचान को कायम रखा जा सकता है। बच्चों को लोक कलाओं की प्रेरणा मिलना जरूरी है इसके लिए समन्वित प्रयास होते रहने चाहिए। ऐसा होगा, तभी हमारी पुरातन संस्कृति और परंपरा जीवित रह पाएंगी, वरना भावी पीढ़ी हमारी संस्कृति को बिसराती जाएगी।

पूर्णिमा जी को देश में आयोजित होने वाले अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोक गायन और चित्र प्रदर्शनी/प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित किया जाता है। बात पूर्णिमा जी के लोक गायन की हो या भित्ति चित्रों की, उनकी अपनी एक विशेष शैली और पहचान है। वे कलात्मकता के साथ अपनी संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं। इस कार्य में उनके परिवार के सभी सदस्य पूरा सहयोग करते हैं। अब उनके साथ उनकी दोनों बहुएं प्रियंका और आयुषी भी चित्र बनाने और लोक गायन में सहयोग करती हैं। उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी दोनों बहुएं निमाड़ की हैं और निमाड़ी संस्कृति से भलीभांति परिचित हैं। बड़ी बहू प्रियंका उनके साथ मंच साझा करती हैं जबकि छोटी बहू आयुषी और बेटा अपूर्व इंजीनियर हैं और पूना में आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं। 

सांस्कृतिक क्षेत्र में पूर्णिमा जी के योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार और कई संस्थाओं द्वारा अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। कुछ विशेष पुरस्कार उल्लेखनीय हैं-

सम्मान

• मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा हाल ही में पूर्णिमा चतुर्वेदी को जनजातीय एवं लोक कलाओं के क्षेत्र में निरंतर सृजन कार्य करने पर वर्ष 2020 के शिखर सम्मान से अलंकृत करने की घोषणा की गई है

• वर्ष 2010 में अखिल भारतीय नार्मदीय ब्राह्मण समाज द्वारा नार्मदीय गौरव सम्मान

• म.प्र. के राज्यपाल श्री रामेश्वर प्रसाद ठाकुर द्वारा श्रीमती बालकृष्ण ओबेरॉय विशिष्ट महिला पुरस्कार  

• वर्ष 2017 में संवाद साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक शोध संस्थान उज्जैन द्वारा लोक कला सांस्कृतिक संवाद सम्मान

• वर्ष 2019 में आई.ए.एस. ऑफिसर्स वाइव्ज़ एसोसिएशन (आइसोवा), भोपाल द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में लोक गायक सम्मान

• मालवा लोक कला एवं संस्कृति संस्थान, उज्जैन द्वारा भेराजी सम्मान

• वर्ष 2020 में कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कादम्बिनी अलंकरण से सम्मानित

• अखिल भारतीय निमाड़ परिषद द्वारा वर्ष 2017 का संझा फुली सम्मान

• साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था कला मंदिर भोपाल द्वारा अखिल भारतीय अलंकरण लोक कला संगीत रत्न सम्मान से सम्मानित

• बुन्देलखण्ड समाज विज्ञान शोध संस्थान व पंचायत विकास परिषद द्वारा आयोजित कलाकुंभ कार्यक्रम में निमाड़ी लोक कलाओं पर कार्य करने हेतु सम्मानित

• मप्र शासन के वर्ष 2014 के कैलेंडर के माह अक्टूबर के पृष्ठ पर उनके लोकचित्र प्रकाशित

• विभिन्न पुस्तकों (अक्षरा, अभिरुचि, काउ से का कहिए) के आवरण पृष्ठ पूर्णिमा जी के चित्रों से सुसज्जित

•  पूर्णिमा जी के कार्यों को लेकर सत्र 2012 के लिए नूतन कॉलेज, भोपाल की छात्रा प्रियंका द्विवेदी ने प्रोजेक्ट तैयार किया

लोक चित्रों की प्रदर्शनियां

• अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर स्वयंसिद्धा मेला- गौहर महल, भोपाल

• ‘सृष्टि’ बेटियों पर आधारित लोक चित्रों की प्रदर्शनी- लोकरंग उत्सव भोपाल

• महिला लेखिका संघ के आयोजन ‘चित्रांकन से शब्दांकन’ में लोक चित्रों की प्रदर्शनी एवं उन पर लेखन- मानस भवन भोपाल

• संस्कृति विभाग के द्वारा लोकरंग आयोजन ‘आदिवासी लोक कला व बोली विकास’ में चित्र प्रदर्शनी

• सृष्टि कार्यक्रम में बालिकाओं के संस्कार गीतों पर निमाड़ी चित्रों द्वारा चित्रांकन एवं 5 दिवसीय प्रदर्शनी

• 2013 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शुजालपुर में आयोजित महिला लेखिका संघ के आयोजन ‘चित्रांकन से शब्दांकन’ में लोक चित्रों की प्रदर्शनी एवं उन पर लेखन।

• 29 दिसंबर 2013 को सरोकार संस्था द्वारा बेटियों पर आधारित कार्यक्रम में चित्रों की प्रदर्शनी

• अखिल निमाड़ परिषद द्वारा आयोजित सम्मान समारोह ग्राम सेगांव (खरगोन) में आयोजित निमाड़ी दिवस के आयोजन में निमाड़ के लोक चित्र पर प्रदर्शनी

लोक गीतों की प्रस्तुति

(भारत सरकार एवं मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य प्रतिष्ठित मंचों से)

• राष्ट्रीय भाषा प्रचार समिति हिन्दी भवन भोपाल द्वारा आयोजित होली उत्सव में विगत 11 वर्षो से निमाड़ी लोक गीतों की प्रस्तुति

• दूरदर्शन केंद्र भोपाल के कार्यक्रम ‘लोकायतन’ में लोकगीतों की प्रस्तुति

• संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित पावस महोत्सव (2012 एवं 2013)

• भोजपुर महोत्सव – भोजपुर, जिला रायसेन 

•  रेडियो मिर्ची पर होली गीतों की प्रस्तुति

• आज़ाद हिन्द रेडियो में निमाड़ी लोक गीतों की रिकॉर्डिंग

• दीपोत्सव- गौहर महल

• भारत पर्व संस्कृति विभाग स्वराज संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रम (रतलाम/देवास)

• राज्य स्तरीय कबीर एवं विश्वकर्मा पुरस्कार वितरण समारोह गौहर महल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह हान के समक्ष निमाड़ी लोक गीत एवं लोकनृत्य की प्रस्तुति

• सिंहस्थ 2016 उज्जैन में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में कालिदास मंच से प्रस्तुति

• डायमंड जुबली समारोह, भारतीय जीवन बीमा निगम

• झील महोत्सव, जबलपुर

• दूरदर्शन भोपाल में विभिन्न उत्सवों (होली, दीपावली, रक्षाबंधन, गणगौर आदि) पर लोकगीत एवं लोक नृत्य प्रस्तुत

• सुभाष उत्कृष्ट विद्यालय में संस्कृति संचालनालय मध्यप्रदेश शासन एवं मंदाकिनी सांस्कृतिक समिति के सांस्कृतिक महोत्सव में लोकगीत एवं लोकनृत्य की प्रस्तुति

• बनक- केन्द्रीय पुलिस प्रशिक्षण अकादमी भोपाल संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित कार्यक्रम

• गमक श्रृंखला- जनजातीय संग्रहालय, भोपाल

• अतुल्य भारत कार्यक्रम -उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज

• ‘स्त्री महोत्सव’-दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर

• आदिम जाति कल्याण विभाग के उपक्रम वन्या रेडियो के ग्रामीण प्रसारण के लिए 80 निमाड़ी लोक गीतों की रिकॉर्डिंग आदि

पूर्णिमा चतुर्वेदी से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

 

 

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