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पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी

पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी

छाया : इंडियन एक्सप्रेस

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पुलिस एवं रक्षा
स्थिति एवं योगदान

पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी

समय के साथ महिलाओं का पुलिस में आना अब कोई अटपटी सी बात नहीं रही। कहीं भी किसी भी समय चुस्त-दुरुस्त वर्दी में भागती-दौड़ती, वायरलेस सेट को कानों से सटाए इक्का-दुक्का महिला पुलिसकर्मी दिख ही जाती हैं। परन्तु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि यह क्षेत्र महिलाओं के लिए सहज हो गया है। देश में आधी आबादी महिलाओं की है और भारत सरकार ने वर्ष 2009 में पुलिस में महिला प्रतिनिधित्व को 33 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा गया था।  लेकिन जनवरी 2020 में जारी ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों के मुताबिक पुलिस कर्मियों की कुल संख्या में केवल 10.3 प्रतिशत ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व था, जो कि निर्धारित लक्ष्य से बहुत बहुत कम है। आंकड़ों में देखा जाए तो कुल 20,91,488 पुलिस कर्मियों में से केवल 2,15,504 ही महिलाएं हैं। ये और बात है कि पूरे देश में महिला पुलिस कर्मियों की संख्या में साढ़े 16 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

केंद्र सरकार की मंशा के अनुरूप मध्यप्रदेश में भी पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उपक्रम किए गए। उन्हें भर्ती नियमों में कुछ छूटें दी गईं। मसलन पहले आरक्षक पद के लिए पर महिला की न्यूनतम ऊँचाई 158 से.मी. थी, जिसे 155 से.मी.कर दिया गया। इससे हज़ारों महिलाओं – जो तमाम योग्यताओं के बावजूद केवल कद की वजह से आवेदन नहीं कर पा रही थीं, के लिए यह सुनहरा अवसर सिद्ध हुआ। उम्मीद थी कि इससे पुलिस विभाग में महिलाओं की आमद बढ़ेगी। मगर वास्तविक तस्वीर कुछ और ही है। वर्ष 2013 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हर पुलिस थाने में कम से कम तीन महिला सब इसंपेक्टर और दस महिला पुलिस कांस्टेबल नियुक्त करने की सिफारिश की, ताकि महिला हेल्प डेस्क 24 घंटे अपनी सेवाएँ दे सके। परन्तु ये लक्ष्य कागज़ पर ही सिमट कर रह गए। वर्ष 2016 में भर्ती परीक्षा के बाद कई पद खाली रह गये। वर्तमान में भी कमोबेश यही स्थिति है जिनके सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

पुलिस विभाग में लिंगानुपात को जानने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि विभाग के अनुसार वे स्त्री-पुरुषों में भेद नहीं करते, इसलिए इस प्रकार के आंकड़े भी नहीं रखते। यहाँ तक कि महिला पुलिसकर्मियों के हित में योजनाएं बनाने वाली कल्याण शाखा के पास भी इस तरह का कोई आंकड़ा नहीं है कि प्रदेश के किस थाने में कितनी महिला पुलिसकर्मी तैनात हैं।(संदर्भ: पत्रिका 22.5.17)

सबसे अधिक महिला पुलिस अधिकारी मध्यप्रदेश में

प्रदेश में एक तरफ महिला आरक्षक के पद भी ठीक से नहीं भर पाते हैं, दूसरी तरफ  गृह मंत्रालय की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर में महिला पुलिस अधिकारियों की संख्या यहाँ सबसे ज़्यादा है। मध्यप्रदेश में एडीजी, आईजी, एसपी, अपर एसपी एवं डिप्टी एसपी जैसे पदों पर महिलाएं आसीन होती रही हैं। 2016 की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस विभाग के दफ्तरों में अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा महिलाएं तैनात हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि महिला अपराध के मामलों में मध्यप्रदेश की स्थिति अव्वल है। ऐसे में महिला पुलिसकर्मियों की कमी विचारणीय है।

इसके अलावा इस विषय पर भी विश्लेषण की आवश्यकता है कि वरिष्ठ पदों पर पहुँचने वाली अधिकारी केंद्रीय लोक सेवा आयोग अथवा राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित होकर आती हैं। पदोन्नत होकर उच्च पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या इनमें नगण्य है। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि देहातों में इनकी पोस्टिंग कम ही होती है, ज्यादातर महिलाएँ कागज़ी कार्रवाई से जुड़ी हैं और उन्हें अपना दम-ख़म दिखाने का अवसर कम ही मिलता है।

2016 की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश महिला पुलिसकर्मियों के संख्या 4,294 है, इनमें निरीक्षक-196, एसआई-476, एएसआई-196, हेड कांस्टेबल-476 एवं कांस्टेबल-2829 थे। अन्य राज्यों से तुलना करें तो  महाराष्ट्र में 21,174, उत्तर प्रदेश में 7,505, दिल्ली में 6,976, बिहार में 6,289 हैं।

प्रदेश में महिला पुलिसकर्मियों की चुनौतियाँ

किसी भी क्षेत्र में लिंगानुपात की स्थिति जब संतुलित होती है, तभी उसे लैंगिक भेदभाव से परे माना जा सकता है। चूँकि अन्य क्षेत्रों की भांति पुलिस सेवा भी महिलाओं के लिए पहले वर्जित सा क्षेत्र था, इसलिए अधिकांश व्यवस्थाएं पुरुषों को ध्यान में रखकर ही की गईं। शारीरिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से महिलाएं अलग हैं; इसलिए अपेक्षा की जाती है कि कार्यस्थल पर उनके अनुरूप कुछ व्यवस्थाएं की जाएंगी। जब इन व्यवस्थाओं की कमी होती है तो महिलाएं स्वयं उस क्षेत्र में आने से कतराने लगती हैं; जो आती हैं वे उन तमाम चुनौतियों को अपने पूरे कैरियर के दौरान लादे फिरती हैं। प्रदेश में आमतौर पर जिन समस्याओं से महिलाएं प्रतिदिन दो-चार होती हैं, उनमें प्रमुख हैं –

सुविधा घर का अभाव: पुलिस विभाग द्वारा आयोजित कई कार्यशालों में यह बात खुलकर सामने आई है कि थानों में महिलाओं के लिए अलग से सुविधा घर होना चाहिए। इसके अभाव में महिलाएं कम पानी पीती हैं, जो स्वास्थ्य के लिहाज से ख़तरनाक कहा जा सकता है। इस समस्या पर विभाग द्वारा सहानुभूति पूर्वक विचार करने की मंशा तक नज़र नहीं आती। अभी तक विभाग के पास इस तरह का कोई आंकड़ा भी नहीं है कि प्रदेश के कितने थानों में महिलाओं के लिए अलग से सुविधा घर है और कितने में बनवाने की ज़रूरत है।

हथियार एवं उपकरण अनुकूल न होना: विभाग के लिए तैयार होने वाले उपकरण एवं हथियार (वज़न एवं आकर की दृष्टि से) प्रायः पुरुषों के हिसाब से निर्मित होते हैं जिन्हें इस्तेमाल करने में महिलाओं को अत्यधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वर्दी, टोपी, जूते तक शारीरिक विशेषताओं के अनुरूप नहीं होते। दंगों के समय इस्तेमाल होने वाली बुलेट प्रूफ जैकेट बहुत ही भारी होते हैं, कभी फिट नहीं होते। वे पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में एक महिला पुलिस अधिकारी ने बताया कि जैकेट पहनने पर महिलाओं के सीने की वजह से एक गैप बन जाता है, जहाँ उन्हें आसानी से गोली लगने का ख़तरा होता है।

ट्रांसपोर्ट: पुलिस विभाग के कामकाज में मैदानी पदस्थापना वाले लोगों को काफी भागदौड़ करनी पड़ती है, जिसके लिए विभाग के वाहन का ही ज्यादातर उपयोग होते है, अक्सर इस पर आरक्षक कूदकर ही चढ़ते उतरते हैं, पुरुष होने के कारण उनकी लम्बाई अधिक होती और आसानी से यह सब कर लेते हैं परन्तु कद की वजह से महिलाओं को समस्या आती है, जहाँ त्वरित गति से गाड़ी पर चढ़ने या उतरने की बात हो वहां वे मात खा जाती हैं। यदि इन वाहनों में महिला पुलिसकर्मियों की समस्या को देखते हुए छोटी-छोटी सीढ़ियाँ या फुट रेस्ट बने होते तो संभवतः अपने कार्य में बेहतर परिणाम ये दे पातीं।

लैंगिक भेदभाव: हालांकि समय-समय पर कार्यशाला, सेमिनार आदि आयोजित कर पुलिस विभाग को जेंडर सेंसेटिव बनाने के कई प्रयास किये जाते रहे हैं, तथापि अनुकूल परिणाम अभी भी कोसों दूर हैं। महिला कर्मियों को प्रायः महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों से दूर ही रखा जाता है और उन्हें सुरक्षा जांच जैसे हल्के-फुल्के काम सौंप दिए जाते हैं ।

यौन शोषण: यह चौंकाने वाला तथ्य है कि जिन पुलिसकर्मियों पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होती है वे भी शोषण से परे नहीं हैं। अख़बार की सुर्खी बनी एक घटना 9 जून 2018 की है जब इंदौर के पुलिस कंट्रोल रूम में यह शिकायत आई कि एक आला अफ़सर देर रात महिला पुलिसकर्मियों को बंगले पर बुलाते हैं। शिकायत करने वाली महिला पुलिसकर्मी का नाम सामने नहीं आया परन्तु जिस पर शक था उसका बाद में तबादला करवा दिया गया। लोग 2018 में ही भिंड ज़िले की सब इंस्पेक्टर चेतना शर्मा के हत्याकांड को भी नहीं भूले होंगे। मारे जाने से पहले चेतना शर्मा ने एक पत्र में वरिष्ठ अधिकारी द्वारा यौन शोषण का उल्लेख किया था।

इस तरह की ख़बरें समय-समय पर अखबारों में सुर्खियाँ बनती रही हैं, फिर इन्हें भुला दिया जाता है। इसके बावजूद कई महिलाएं आज भी स्वयं को साबित करने का ज़िद लेकर पुलिस में आ रही हैं और दोहरी चुनौतियों से लड़ रही हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि मनोवृत्ति और कुछ साधनों में सुधार कर ही महिला पुलिसकर्मियों की कार्य क्षमता सम्बन्धी विवेचना की जा सकती है।

दैनिक भास्कर में दिनांक 5 अप्रैल 2022 को प्रकाशित  खबर के अनुसार केंद्र सरकार अब राज्यों में महिला पुलिस की भागीदारी 33% करने के लिए सख्ती बरतने की तैयारी कर चुकी है।  केंद्र का निर्देश है कि हर थाने में 3 सब इंस्पेक्टर, 10 सिपाही महिलाएं होनी चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि जो राज्य पुलिस फोर्स में महिलाओं की संख्या बढ़ाकर 33% नहीं करेंगे, उनका मॉडर्नाइजेशन फंड रोक दिया जाएगा। केंद्र सरकार का मानना है कि बिना सख्ती के राज्य सरकारें गंभीर नहीं हो रही हैं, इसलिए अगर फंड में कटौती होगी तो राज्यों में महिलाओं की भर्ती बड़े पैमाने पर होने लगेगी। गृह मंत्रालय ने देश के सभी थानों में एक महिला हेल्प डेस्क कायम करने का लक्ष्य तय कर रखा है। राज्यों से यह भी कहा गया है कि इस समय पुरुषों के खाली पदों को कन्वर्ट कर महिलाओं के लिए कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टर के अतिरिक्त पद बनाए जाएं। केंद्र सरकार का यह कदम बेहद अहम साबित हो सकता है, क्योंकि पुलिस मॉडर्नाइजेशन के लिए 26 हजार करोड़ रु. का फंड तय किया गया है। यह फंड 2025 तक खर्च होना है और कोई भी राज्य फंड से वंचित नहीं होना चाहेगा।

स्रोत : द वायर, बीबीसी, पत्रिका, अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर 

संपादन: मीडियाटिक

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