Now Reading
पापिया दास गुप्ता

पापिया दास गुप्ता

छाया : स्व संप्रेषित

सृजन क्षेत्र
टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच
प्रमुख प्रतिभाएँ

पापिया दास गुप्ता

वरिष्ठ रंगकर्मी पापिया दास गुप्ता का जन्म 1944 में इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता विमल गुप्ता एक निजी कंपनी में जनरल मैनेजर थे और मां अनिमा गुप्ता कुशल गृहणी होने के साथ-साथ रेडियो सिंगर भी थीं । सात भाई बहनों में पापिया जी सबसे बड़ी हैं। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में ही हुई।

पपिया जी का परिवार अत्यंत आधुनिक एवं प्रगतिशील विचाराधारा वाला था। उनकी माँ और दादी दोनों को बैडमिन्टन खेलने का शौक था, स्थानीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में दोनों डबल्स खेलती थीं। दादी को कार ड्राइविंग का भी बड़ा शौक था। इसके अलावा सांस्कृतिक गतिविधियों की दृष्टि से भी उनका घर एक आदर्श स्थल था। पिताजी रंगकर्मी थे, दुर्गा पूजा के अवसर पर दो-तीन महीने पूर्व से ही तीन आयु वर्ग के कलाकारों वाले नाटकों का रिहर्सल पापिया जी के घर में ही हुआ करता था, इसके अलावा घर में समय-समय पर साहित्यिक सम्मेलनों का भी आयोजन होता था। तीन वर्ष की अल्पायु में पहली बार उन्होंने मंच पर समूह नृत्य में हिस्सा लिया था।

12वीं तक की शिक्षा स्थानीय जगत तारण गर्ल्स स्कूल से हुई। इस स्कूल में किताबी शिक्षा के अलावा अन्य अन्य गतिविधियों पर भी खूब ज़ोर दिया जाता था। उस ज़माने में भी उस स्कूल की लड़कियां वॉलीबॉल की टीम लेकर मास्को गई थीं। पापिया जी कहती हैं हमारे स्कूल में पढ़ाई लिखाई कम खेल-कूद गाना-बजाना ज्यादा होता था। वह स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों(गाना, नाटक एवं नृत्य) में हिस्सा लेती रहीं।

विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान भी वे नाटकों में हिस्सा लेती रहीं। वहीं सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी की दोनों पुत्रियाँ(मृणाल पांडे एवं उनकी बड़ी बहन) भी पढ़ती थीं। रविन्द्र टैगोर द्वारा रचित डांस ड्रामा के हिंदी अनुवाद को सुधरवाने में शिवानी जी अक्सर मदद कर दिया करती थीं। शिवानी जी शांति निकेतन से पढ़ी थीं इसलिए बांग्ला वे बहुत अच्छी तरह समझ लेती थीं।

दर्शकों में उस समय सुभद्रा कुमारी चौहान और सुमित्रानंदन पंत जैसे महान साहित्यकार हुआ करते थे। पापिया जी ने भूगोल विषय लेकर वर्ष 1965 में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उसी वर्ष पापिया जी का विवाह अभियंता श्री रविदास गुप्ता से हुआ और उनके साथ वे वर्ष 1966 में भोपाल आ गईं।

विवाह के बाद कुछ वर्ष गृहस्थी सुव्यवस्थित करने में और शहर को समझने में लग गए। फिर खालीपन सताने लगा। उसी समय उन्होंने हमीदिया कॉलेज से डबल एम.ए.(अंग्रेज़ी) किया। उस समय उनका परिवार बारह सौ पचास क्वार्टर में रहता था, घर के पास ही कैम्पियन स्कूल था जिसमें कुछ वर्ष उन्होंने पढ़ाया, बाद में स्कूल ओल्ड कैम्पियन भवन में स्थानांतरित हो गया। जहाँ वह पढ़ाती थीं वहां वर्तमान में सेंट मैरीज़ स्कूल संचालित है। वर्ष 1968 में वे एम.एल.बी.कॉलेज भोपाल में व्याख्याता के पद पर  नियुक्त हो गयीं। बाद में सरोजनी नायडू गर्ल्स कॉलेज में उन्होंने अपना तबादला करवा लिया। आगे चलकर उन्होंने पीएचडी भी किया और विभाग प्रमुख बनीं।

इधर भोपाल आने के कुछ वर्ष तक रंगमंच से वे दूर ही रहीं क्योंकि किसी से परिचय नहीं था। शुरुआत हुई बांग्ला मंचों से। कुछेक मंचन के बाद भाऊ साब खिरवड़कर से परिचय हुआ और वे ‘रंगायन नाट्य संस्था’ से हमेशा के लिए जुड़ गईं। इस संस्था में रहते हुए पापिया जी ने कई सुप्रसिद्ध नाटकों में चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। ख़ासतौर पर ‘खामोश अदालत जारी है’ नाटक में उनकी लीला बेणारे की भूमिका आज भी कुछ पुराने दर्शकों को याद है। पूरे समय खामोश रहने के बाद अंत में इस पात्र का 22 मिनट का सॉलीलॉकी (स्वगत भाषण) चमत्कृत कर देने वाला था। इस नाटक में मात्र दो महिला पात्र थीं जिसमें उनके साथ इरफ़ाना शरद उनके साथ होती थीं। इस नाटक के 40-50 मंचन हुए थे।

पापिया जी द्वारा अभिनीत लक्ष्मी नारायण लाल द्वारा रचित नाटक ‘व्यक्तिगत’ भी उन दिनों काफी लोकप्रिय हुआ था। उसी समय  बेनु गांगुली रंग समूह ने ग्रीक फ़ेस्टिवल करवाया जिसमें इडिपस और एंटीगनी नाटकों का मंचन हुआ था। पापिया जी को एंटीगनी की भूमिका मिली जिसे खूब सराहा गया। कला की दृष्टि से वह मध्यप्रदेश का स्वर्णिम युग था जिसमें भोपाल दुनिया भर की श्रेष्ठ प्रतिभाओं का मंच बन गया था

भारत भवन स्थापना के पूर्व वे अभिनेत्री के रूप में स्थापित हो चुकी थीं। भारत भवन के कारण कई नामचीन निर्देशक भोपाल आए जिन्होंने बाहर के कलाकारों के साथ भी काम किये। साथ ही वहाँ आयोजित होने वाली कार्यशालाओं में भी बाहर के कलाकार शिरकत करते थे।  बाद में वे भारत भवन एडवायज़री कमेटी की मेंबर एवं मध्यप्रदेश कला परिषद की कार्यकारी सदस्य बनीं। वे बताती हैं –“उस समय शहर के गणमान्य नागरिक (मंत्री, अधिकारी, एवं कला वर्ग के लोग) होते थे। आम जन शायद ही पहुँचते थे। समय के साथ-साथ परिवर्तन हुए, आम जन नाटक देखने आने लगे और बड़े लोग होम थिएटर।“

पापिया जी के कैरियर में  रंगमंच और शिक्षण दोनों सदैव समानांतर चलती रही। कॉलेज में पढ़ाना उनके लिए एक अदद नौकरी जैसा काम नहीं था वरन जिस विषय को वह पढ़ा रही थीं उससे सम्बंधित उनके रिसर्च पेपर  लगातार छप रहे थे, वे सेमिनारों में हिस्सा ले रही थीं, दूसरी तरफ अभिनय के क्षेत्र में मन कुछ ऐसा रमा कि उससे जुड़े हर क्षेत्र में खुद को आजमा रही थीं। आकाशवाणी की ‘ए’ ग्रेड कलाकार रहीं पापिया जी ने सौ से अधिक नाटकों में अपनी आवाज़ दी।

रंगमंच पर लम्बे समय तक सक्रिय रहीं पापिया जी ने अनेक हिंदी, बांग्ला एवं उर्दू नाटकों में अपने अभिनय के साथ-साथ कुछ डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म में भी काम किया। इसके अलावा निर्देशन के क्षेत्र में भी धाक जमाते हुए कई नाटकों का निर्देशन किया।कोरियोग्राफी, वेशभूषा, प्रकाश एवं मंच सज्जा आदि जैसी विधाएं भी उनके लिए अछूती नहीं रही। इस दौरान हिंदी ग्रन्थ अकादमी से उनकी पुस्तक ‘पर्यटन: एक अध्ययन’ भी प्रकाशित हुई। इन सबके साथ नाटकों के लिए स्क्रिप्ट लेखन, अनुवाद आदि साथ-साथ चल रहे थे।

छात्र जीवन से ही कई पुरस्कारों से नवाजी जा चुकीं पापिया दास गुप्ता को वर्ष 2016 का मप्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘शिखर सम्मान प्राप्त हुआ। इसके अलावा इफ़्तेख़ार नाट्य सम्मान एवं मप्र संस्कृति विभाग द्वारा संयुक्त रूप से सम्मान व लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त हुआ। वर्तमान में वे भोपाल में रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं। उनकी पुत्री शिल्पी दासगुप्ता मुंबई में एक सुस्थापित फ़िल्मकार है।

संदर्भ स्रोत – स्व सम्प्रेषित एवं पापिया जी से बातचीत पर आधारित।

© मीडियाटिक

 

 

सृजन क्षेत्र

      
View Comments (0)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Website Designed by Vision Information Technology M-989353242

Scroll To Top