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परवीन कैफ़

परवीन कैफ़

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परवीन कैफ़

उर्दू शायरी की दुनिया में न केवल मशहूर शायर कैफ़ भोपाली का, बल्कि उनकी बेटी परवीन कैफ़ का भी नाम बड़ी इज़्ज़त और अदब के साथ लिया जाता है। 23 दिसंबर, 1956 को जन्मी परवीन का चार भाई – बहनों में दर्जा दूसरा था। भोपाल के शाहजहानाबाद इलाके में उनका परिवार नानी के रहता था। अभिभावक की भूमिका उनके मामा जनाब वहीद उस्मानी ही निभा रहे थे। वे हारमोनियम के अलावा अलग-अलग साज़ बखूबी बजाया करते थे। उनकी दादी सालेहा ख़ानम को शायरी का शौक था। उनका तख़ल्लुस था अजीज़। हालाँकि उन्होंने कभी किसी मुशायरे या मजलिस में शिरकत नहीं की, लेकिन घरेलू आयोजनों और दोस्तों-रिश्तेदारों के यहाँ होने वाली महिलाओं की जमघट में वे खूबसूरत अशआर सुनाया करती थीं। यही अनुवांशिक गुण कैफ़ साब से होते हुए उनकी बेटी तक आ पहुंचा। हालाँकि परवीन जी उनकी और उनके भाई-बहनों की परवरिश में ‘कैफ़’ साहब की भूमिका बहुत ही कम रही। कहा जा सकता है कि परवीन जी बचपन उनके साथ पढ़ने वाली उनकी सहेलियों से बिलकुल अलग सा था। 

इस अलग किस्म की परवरिश की वजह कैफ़ साहब की मस्तमौला और घुमंतू किस्म की ज़िन्दगी में ढूंढी जा सकती है। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित क़िताब ‘चेहरे’ में निदा फ़ाज़ली, कैफ़ भोपाली के बारे में लिखते हैं, कि ‘प्रत्येक शहर के रास्ते मकान और छोटे-बड़े शहरी उन्हें अपनी बस्ती का समझते थे। वे मुशायरों के लोकप्रिय शायर थे। जहां जाते थे, मेहनताने की आखिरी पाई खर्च होने तक वे वहीं घूमते-फिरते दिखाई देते थे। एक मुशायरे से दूसरे मुशायरे के बीच का समय वे इसी तरह गुज़ारते थे। उनकी कमाई शराब और ज़रूरतमंदों के लिए होती थी जबकि उनके दूसरे खर्चों की पूरी ज़िम्मेदारी उसी मेज़बान की होती थी, जो मुशायरे का संयोजक होने के साथ उनका प्रशंसक भी होता था।”

बेपरवाह किस्म की जिन्दगी जीने वाले कैफ़ साहब बीच-बीच में याद आने पर घर भी लौट आते, कुछ दिन रुककर फिर आजाद परिंदे की तरह अपनी शायरी की दुनिया में लौट जाते। एक मुशायरे के दौरान ही उनकी मुलाक़ात फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही से हुई और दोनों एक दूसरे के मुरीद बन गए। अब अपनी हर फिल्म में कमाल अमरोही कैफ़ साहब से एक दो गाने तो जरुर लिखवाते जिनमें पाकीज़ा के गीतों ने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। इसके बावजूद मुंबई में स्थायी ठिकाना बनाकर रहने का ख्याल उन्हें कभी नहीं आया। वे अपने परिवार की तरफ से हमेशा बेफ़िक्र रहे क्योंकि उन्हें अपनी पत्नी इफ्तिख़ार बानो पर खुद से भी ज्यादा भरोसा था। इफ्तिख़ार बेगम ने भी कभी उनसे कोई शिकायत नहीं की। कुछ ऐसे ही माहौल में परवीन जी की प्रारंभिक पढ़ाई सुल्तानिया कन्या विद्यालय से हुई क्योंकि वह घर के बहुत पास था। घर में संगीत और साहित्य का माहौल होने के कारण बचपन में ही शायरी कहने का शौक परवीन जी के भीतर जाग उठा।

यह तब की बात है जब वे सातवीं कक्षा में पढ़ रही थीं। लम्बे अरसे बाद उनके वालिद घर आए थे। परवीन जी ने अपनी एक टूटी फूटी सी गज़ल उनको दिखाई। उम्मीद थी कि शाबाशी मिलेगी लेकिन इसके उलट उन्होंने उसे पढ़ते ही फाड़कर फेंक दिया और निहायत नापसंदगी से बोले, “ये सब लिखने की ज़रुरत नहीं है। बहुत ही लिखने का शौक हो तो छोटी-छोटी कहानियाँ लिखा करो।”  यह सुनकर परवीनजी को सदमा सा लगा। यह बात उनके मामाजी को भी बुरी लगी और उन्होंने ऐतराज़ करते हुए उनके वालिद से कहा, इस तरह बच्ची के मन को ठेस पहुँचाना सही नहीं है, कितने अरमान से वह अपना लिखा आपको दिखाने आई थी। कैफ़ साहब कुछ नहीं बोले लेकिन इस घटना का असर यह हुआ कि अब परवीन छुप-छुप कर शायरी करने लगीं। दसवीं तक परवीन जी की शायरियां और नज़्म कुछ अखबारों और स्कूल की पत्रिका में छपने लगी थी।

इसी तरह वे दसवीं तक पहुँच गईं। घर की माली हालत अब भी ठीक नहीं थी। स्कूल में यूनिफॉर्म को लेकर पहले कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन एक दिन सभी को यूनिफॉर्म में आने की ताक़ीद कर दी गई। उस समय परवीन जी के वालिद साहब घर में ही थे। उन्होंने कॉपी में लिखकर दे दिया कि आठ दिन की मोहलत दी जाए, उसके बाद हमारी बच्ची यूनिफॉर्म में ही स्कूल आएगी। ऐसा लिखकर एक दो दिन में वे चले गए और इधर तंगी की वजह से यूनिफॉर्म बन ही नहीं पाया। परवीन जब सामान्य कपड़ों में ही स्कूल पहुंची तो हेड मिस्ट्रेस ने सजा के तौर पर उन्हें धूप में खड़ा कर दिया। अपनी मायूसी पर वे उस दिन रो पड़ी थीं, तभी उन्हें स्कूल की शिक्षिका उषा ठाकुर ने देखा। वे उन्हें अपने साथ ले गईं और पानी पिलाया। जब उन्हें वजह पता चली तो वे बहुत ही दुखी हुईं। ‘फ़िक्र मत करो, सब ठीक हो जाएगा’ कहकर परवीन को उन्होंने घर भेज दिया। उसी दिन शाम को उषा ठाकुर कुछ और शिक्षिकाओं को साथ यूनिफॉर्म  के कपड़ों के सोलह थान लेकर पहुंची ताकि वे जब तक स्कूल में पढ़ें, तब तक उन्हें कम से कम यूनिफॉर्म की दिक्कत न हो। ( इस वाक़ये को याद करते हुए परवीन जी रो पड़ती हैं)    

परवीन जी ने हायर सेकेंडरी हमीदिया गर्ल्स स्कूल से किया है। उन्हीं दिनों स्कूल और कॉलेजों में बेंतबाजी की प्रतियोगिता हुई जिसमें उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। प्रतियोगिता के बाद सैफ़िया कॉलेज के कुछ छात्र उनके पास आए और कहा कि तुम हमारे कॉलेज में आ जाओ, फ़्री एडमिशन के लिए हम मैनेजमेंट से बात कर लेंगे। इस तरह कॉलेज फ़ीस की चिंता भी दूर हो गई। उन्होंने विज्ञान विषय लेकर सैफ़िया कॉलेज में एडमिशन ले लिया। एक बार किसी काम से जियाउद्दीन सिद्दीकी सैफ़िया कॉलेज पहुंचे, वे इंजीनियर थे और शाहजहांनाबाद में ही रहते थे। उन्होंने वहीं परवीन जी को देखा और शादी का पैगाम लेकर खुद उनके घर पहुँच गए। खुद पैगाम लेकर जाने के पीछे वजह यह थी कि उनके घर के लोग ग़रीब घर की लड़की के साथ शादी के लिए राजी नहीं थे। इसलिए सिद्दीकी साहब बारात में कुछ दोस्तों को लेकर ही परवीन जी के घर पहुंचे थे। शादी के बाद परवीन पति के साथ एक किराए के घर में रहने लगीं। कुछ समय के बाद उनके पति का तबादला हो गया और पचमढ़ी में रहने वाले परवीन जी के सास-ससुर ने उन्हें अपने पास बुला लिया। वे उस समय गर्भवती थीं, पचमढ़ी में ही उनके सबसे बड़े बेटे का जन्म हुआ। पति के दोबारा भोपाल तबादला होने तक परवीन जी पचमढ़ी में ही रहीं। 

इस बीच उनकी पढ़ाई छूट गई। वापस भोपाल लौटने पर उन्होंने फिर पढ़ने का मन बनाया और स्वतन्त्र छात्रा के रूप में कस्तूरबा गर्ल्स कॉलेज से कला विषय लेकर स्नातक की उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र छात्रा के रूप में ही स्नातकोत्तर और उसके बाद पीएचडी भी किया। 1983 की बात है, तब तक परवीन जी दो बच्चों की माँ बन चुकी थीं। कैफ़ साहब उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। उन दिनों उनकी नज़्म ‘तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है, तेरे आगे चाँद पुराना लगता है’ काफी मशहूर हुई थी। परवीन जी ने उसी बहर में एक ग़ज़ल लिखी और अपने पिता को सुनाई। लम्बे अरसे के बाद उन्होंने दोबारा ऐसी हिम्मत की थी। परवीन जी के लफ़्ज़ थे –

चुप-चुप सा वो सांवला पैकर कितना सुहाना लगता है
बेगाना होकर भी वो दोस्त पुराना लगता है
तेरी खातिर चंद साँसे महफूज़ रखी हैं, ले जाना
ख़्वाब में वैसे अब भी तेरा आना जाना लगता है

कैफ़ साहब बड़े खुश हुए और परवीन जी से कहा कि इसे किसी अख़बार में छपने के लिए दे दो। पिता की सलाह पर अमल करते हुए परवीन जी ने वो ग़ज़ल उर्दू अख़बार ‘अफकार’ को भेज दी। कुछ दिनों के बाद वहां से एक ख़त आया कि इस ग़ज़ल में कुछ ग़लतियां हैं, अगर आपको मंज़ूर हो तो इसे दुरुस्त करके हम छाप सकते हैं। परवीन जी को बहुत बुरा लगा और अपने पिता के पास जाकर रोने लगीं। उन्होंने समझाते हुए कहा कि यह तो बहुत ही अच्छी बात है, इससे साबित होता है कि वह ग़ज़ल तुमने लिखी है। वरना लोग समझते कि वो मैंने लिखा है। यह सुनकर परवीन जी ने मंजूरी दे दी और वह ग़ज़ल ज़रुरी सुधार के बाद प्रकाशित हो गई। इसके बाद से अख़बारों और बड़ी पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला भी शुरू हो गया। वे मुशायरों में शिरकत करने लगीं। उर्दू साहित्य पर काम करने वाली बड़ी-बड़ी संस्थाओं से बुलावा आने लगा। 

वैसे यह हैरानी की बात है कि पिछले 30 सालों से उर्दू अदब में सक्रिय रहने के बावजूद उनकी मात्र एक किताब वर्ष 2013 में प्रकाशित हुई ‘सफ़र एक उम्र का’ नाम से प्रकाशित हुई। पूछने पर वे बताती हैं कि इस मामले में वे खुद लापरवाह रही हैं। उनके पिता भी ऐसी ही तबीयत के इंसान थे। यही वजह है कि 1991 में उनके इंतकाल के बाद परवीन उनके बिखरे हुए नगमों को समेटने में मसरूफ़ हो गईं और दुबई से कहन-ए-कैफ़, विदिशा से हिंदी में ‘गुल से लिपटी हुई तितली’ मप्र उर्दू अकादमी द्वारा ‘चाँद के पार’ प्रकाशित हुआ। इसके अलावा कुछ और पुस्तकें प्रकाशित हो सकीं। कैफ़ भोपाली के लेखन से जुड़े तमाम सवालों के जवाब के लिए लोग परवीन जी के पास ही पहुँचते हैं। यह इसलिए भी लाज़मी है कि परवीन जी ने अपने पिता के साहित्य पर ही पीएचडी की, जो वर्ष 2000 में पूरी हुई। फिलहाल वे उसी शोध प्रबंध को प्रकाशित करने का प्रयास कर रही हैं ताकि कैफ़ साहब के बारे में और भी तफ़सील से लोगों को जानकारी मिल सके।

परवीन जी वर्तमान में भोपाल में अपने पति के साथ रहती हैं, उनके बड़े बेटे का निधन एक सड़क दुर्घटना में वर्ष 2009 में हो गया, छोटे बेटे दुबई में एक निजी कंपनी में काम करते हैं।

परवीन कैफ़ से सारिका ठाकुर की बातचीत के आधार पर 

© मीडियाटिक

 

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