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दहेज़ उत्पीड़न क़ानून

दहेज़ उत्पीड़न क़ानून

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दहेज़ उत्पीड़न क़ानून

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के पीछे दहेज़ प्रमुख कारणों में से एक है। शारीरिक-मानसिक यातनाओं के अलावा कई बार दुल्हनों की हत्या तक हो जाती है।  2017 के आंकड़ों के अनुसार दहेज़ हत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में तीसरे स्थान पर है। धारा 498-ए में दहेज़ के कारण पति या उसके रिश्तेदारों के उन सभी बर्तावों को शामिल किया गया है जो किसी महिला को मानसिक या शारीरिक आघात पहुँचाए अथवा उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करे. दोषी पाए जाने पर अपराधियों को अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया है।

समय के साथ इस कानून में कई उतार चढ़ाव देखने को मिलते हैं. प्रारंभ में किसी महिला द्वारा शिकायत किए जाने पर पति और ससुराल वालों की तुरंत गिरफ्तारी हो जाती थी। परन्तु  वर्ष 2017 के जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों –जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उमेश ललित ने ऐसे ही एक मामले पर सुनवाई करते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और यह आदेश जारी किया कि तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी, बल्कि महिला की शिकायत की पहले पड़ताल होगी कि वह सही है या नहीं। पड़ताल तीन लोगों की नई समिति करेगी जो पुलिस विभाग की नहीं होगी। इस समिति को परिवार कल्याण समिति नाम दिया गया। इस नए प्रावधान के पीछे महिलाओं द्वारा दहेज़ उत्पीड़न क़ानून का गलत फायदा उठाना बताया गया। जबकि इसके विरोध में उतरे महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि आज तक ऐसे सुस्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए हैं जो यह बताता हो कि कितने मामलों में 48-ए का दुरुपयोग हुआ।

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस दिशा निर्देश का पुनः परीक्षण करने का निर्णय लिया। पुनः सितम्बर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि दहेज़ प्रताड़ना के मामलों में पति या ससुराल वालों की गिरफ्तारी में परिवार कल्याण समिति की कोई भूमिका नहीं होगी। हालांकि आरोपियों के पास अग्रिम जमानत का विकल्प खुला है।

संपादन – मीडियाटिक डेस्क

 

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