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डॉ. सुशीला टाकभौरे

डॉ. सुशीला टाकभौरे

छाया :  स्व संप्रेषित

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डॉ. सुशीला टाकभौरे

सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुशीला टाकभौरे का जन्म होशंगाबाद की सिवनी-मालवा तहसील के बानापुरा गाँव में 4 मार्च 1954 में हुआ। उनके पिता श्री रामप्रसाद घावरी रेलवे में सफाई कर्मचारी थे। माँ श्रीमती पन्नाबाई अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं, चूंकि परिवार में उनकी माताजी की देख-रेख करने वाला कोई नहीं था, इसलिए सुशीला जी के पिता अपना पैतृक गाँव नेमावर छोड़कर बानापुरा आकर रहने लगे थे। सुशीला जी की माँ अपने सभी बच्चों को भलीभांति शिक्षित होते देखना चाहती थीं, इसलिए उन्हें अपने समुदाय के दूसरे बच्चों की तरह काम में नहीं लगना पड़ा।

सुशीला जी चार भाई और तीन बहनों में पांचवे स्थान पर हैं। पांचवी तक उनकी पढ़ाई गंज प्राथमिक शाला, बानापुरा में ही हुई। इसी दौरान उन्होंने जाति भेद की मानसिकता का सामना किया। यह चुनौती उन्हें जीवन के हर मोड़ पर झेलनी पड़ी। कक्षा में उन्हें सबसे पीछे बैठना होता था। प्यास लगने पर वे घड़े से खुद पानी नहीं ले सकती थीं बल्कि चपरासी उन्हें ओक में पानी देता था। यदि वह उपलब्ध न हो तो घंटों प्यासे रहकर उसकी प्रतीक्षा करना पड़ता था। सन 1965 में वे बानापुरा के मिडिल स्कूल में आ गईं जहाँ यह जाति भेद और भी मुखर स्वरूप में सामने आया।

उनकी भोली सहपाठिनें स्कूल में तो साथ खेल लेती थीं, लेकिन उनके घर जाने पर कभी दहलीज के भीतर बुलाने की हिम्मत न कर सकीं। शिक्षक उन्हें सुशीला हरिजन के नाम से संबोधित करते थे, क्योंकि कक्षा में दो तीन सुशीलाएं थीं। इसके अलावा गांधीवाद की बयार में दलित समुदाय को ‘हरिजन’ नाम देने का चलन भी शुरू हो चुका था। नौवीं कक्षा के लिए उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बानापुरा में नामांकन हुआ। उन दिनों स्वदेशी आन्दोलन भी चरम पर था जिसके प्रभाव में छठवीं से शुरू हुई अंग्रेज़ी भाषा पाठ्यक्रम से हटा दी गई और सुशीला जी को ‘मैट्रिक विदाउट इंग्लिश’ करना पड़ा।

इस बीच घर में पिता और भाई ने ‘लड़की’ के साथ ऊँच-नीच हो जाने के डर से आगे पढ़ाने से मना कर दिया। इस पर उन्होंने भूख हड़ताल कर दी, तीन दिन बाद माँ ने उनका साथ दिया और उन्हें पढ़ाई जारी रखने की अनुमति मिल गई। लेकिन बीच-बीच में शादी का दबाव भी आता रहा जिसे दरकिनार करते हुए वे आगे बढ़ती रहीं। साल 1971 में कुसुम महाविद्यालय, सिवनी-मालवा में बी.ए. के लिए उनका नामांकन हुआ, जिसके अंतिम वर्ष में उनका विवाह नागपुर निवासी श्री सुन्दरलाल टाकभौरे से तय हो गया।

अम्बेडकरवादी श्री टाकभौरे एक मिडिल स्कूल में शिक्षक थे और उम्र में सुशीलाजी से बीस साल बड़े थे, जिसके बारे में शादी के बाद पता चला। बी.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा के बाद 6 जून 1975 में शादी हो गई और वे पति के साथ नागपुर आकर रहने लगीं। नागपुर का जीवन बिलकुल ही अलग सा था। शासकीय अस्पताल के सर्वेंट क्वार्टर में बने एक कमरे के घर में कई लोग रह रहे थे। मध्यप्रदेश में गांधीवादी विचारों का ज़ोर था तो नागपुर में अम्बेडकरवादी दलित पैंथर संस्था का आंदोलन चल रहा था। सुशीला जी पति के साथ आंदोलन और विचार गोष्ठियों में हिस्सा लेने लगीं।

इन भागीदारियों से सुशीला जी के भीतर अपने नागरिक अधिकारों के साथ वर्गभेद और जातिभेद को लेकर समझ विकसित हुई। वे कहती हैं कि हमारे समुदाय के लोगों को ‘हरिजन’ कहना ‘दया भाव’ का एहसास देता था, जबकि बाबा साहेब का विचार स्वयं के प्रति सम्मान भाव को जागृत करता था। दूसरी तरफ नई गृहस्थी की नई-नई समस्याओं से जूझते हुए भी उन्होंने 1976 में  बीएड कर लिया और पति  जिस स्कूल में पढ़ाते थे, वहीं उनकी भी नौकरी लग गई। यहाँ उन्होंने नौ सालों तक नौकरी की, इस बीच हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि भी हासिल कर ली।

उसी दौरान सेठ केसरीमल पोरवाल महाविद्यालय, कामठी में व्याख्याता पद के लिए रिक्ति निकली जिसमें उनका चयन हो गया और अब वे स्कूल टीचर से कॉलेज की व्याख्याता बन गईं। पढ़ने की ललक के कारण साथ ही साथ उन्होंने ‘अज्ञेय के साहित्य में नारी’ विषय पर पी.एच.डी. भी कर ली। वर्ष 1993 में सुशीला जी के दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए – स्वाति बूँद और खारे मोती। दरअसल, वे बचपन से कविताएं और कहानियां लिखती थीं। बानापुरा में रहते हुए उन्हें पता नहीं था कि प्रकाशन के लिए रचनाएं कहाँ भेजना चाहिए। शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हुए न इन सब के बारे में सोचने का अवसर भी उन्हें नहीं मिला। ये संग्रह प्रकाशित होने का सुखद परिणाम यह रहा कि सुशीला जी को कवि सम्मेलनों के आमंत्रण भी मिलने लगे।

इसके बाद की साहित्यिक यात्रा में उन्होंने फिर पीछे पलटकर नहीं देखा। दलित साहित्य में सुशीला टाकभौरे का नाम प्रमुख लेखकों में शुमार होने लगा। घर – परिवार, नौकरी के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियाँ भी बढ़ने लगीं, दूसरी तरफ उसी अनुपात में घर का माहौल भी तनावपूर्ण रहने लगा। लेकिन तमाम झंझावातों से गुजरते हुए भी पच्चीस पुस्तकें सुशीला जी के खाते में दर्ज हो चुकी हैं। इसके अलावा इन्हें पुरस्कारों व सम्मानों से भी नवाज़ा गया है। वे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लेने लंदन एवं दुबई भी गईं। अपने भाई-बहनों में वे अकेली हैं जो इस ऊँचाई तक पहुँच सकी हैं। सुशीला जी एक बेटे और तीन बेटियों की माँ हैं, वे पति और बेटे-बहू के साथ नागपुर में निवास कर रही हैं। उनका रचना कर्म तो जारी है ही।

प्रमुख कृतियाँ :

• कविता संग्रह : स्वाति बूँद और खारे मोती, तुमने उसे कब पहचाना, हमारे हिस्से का सूरज, यह तुम भी जानो,
• कहानी संग्रह : अनुभूति के घेरे, टूटता वहम, संघर्ष, ज़रा समझो
• उपन्यास : नीला आकाश, वह लड़की,  तुम्हें बदलना ही होगा
• एकांकी : रंग और व्यंग्य, नंगा सत्य,
• लेख संग्रह : परिवर्तन ज़रूरी है
• विवरणात्मक : हिंदी साहित्य के इतिहास में नारी, भारतीय नारी, दलित साहित्य: एक आलोचना दृष्टि, मेरे साक्षात्कार, दलित लेखन में स्त्री चेतना की दस्तक, हाशिये का विमर्श
• पत्र संकलन : कैदी नंबर -307(सुधीर शर्मा के पत्र), मेरा पत्र संचयन, कारवां बनता गया, संवादों के सफ़र
• आत्मकथा : शिकंजे का दर्द
• डायरी : ये उन दिनों की बात है

उपलब्धियां :

• मध्यप्रदेश दलित साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट सेवा सम्मान एवं पुरस्कार : 1998
• साहित्य अकादमी, उप्र द्वारा पद्मश्री गुलाब बाई पुरस्कार : 2002
• समन्वय हिमाचल संस्था हिप्र, द्वारा रानी रत्नकुमारी सम्मान : 2007
• रमणिका फाउंडेशन द्वारा सावित्री बाई फुले सम्मान एवं पुरस्कार : 2011
• महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान : 2014

सन्दर्भ स्रोत : स्व संप्रेषित एवं सुशीला जी से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

 

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