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डॉ. शिखा जैन

डॉ. शिखा जैन

छाया : स्व संप्रेषित

विकास क्षेत्र
कृषि एवं उद्यानिकी
प्रमुख महिला किसान

डॉ. शिखा जैन

विदिशा ज़िले की लटेरी तहसील के छोटे से गांव मुरवास में वर्ष 1983 में जन्मीं शिखा जैन प्रदेश की सफल महिला किसानों में शामिल हैं। श्री प्रमोद कुमार जैन और श्रीमती उषा जैन की दो बेटियों  में दूसरे नंबर की शिखा का किसान बनने का सफर काफ़ी मुश्किलों भरा रहा। बचपन ऐसे गांव में बीता, जहां परिवार में लड़कों का होना जरूरी माना जाता था, लेकिन इनके माता-पिता ने कभी भी अपनी दोनों बेटियों को लड़कों से कम नहीं आंका। बल्कि उन्हें हर वो काम सिखाया जिस पर केवल पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था।12 साल की उम्र में पिता ने जब हाथ में राजदूत मोटर सायकल की चाबी थमाई, तब शिखा ने सोचा भी नहीं था कि वे एक दिन ट्रैक्टर का स्टीयरिंग भी थामेंगी।

कृषक पिता और गृहिणी माँ ने तमाम दिक्कतों का सामना करते हुए बेटियों की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। शिखा ने दसवीं तक लटेरी के शिशु मंदिर में पढ़ने के बाद आगे की शिक्षा वहीं के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। फिर बरकतुल्लाह वि.वि. से एमएससी, एमएसडब्ल्यू और पीएचडी (कोरकू जनजाति की महिलाओं का अध्ययन-होशंगाबाद जिले के संदर्भ में) की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूरी होने के बाद 2 वर्ष फैमिली प्लानिंग इंडिया में बतौर काउंसलर काम किया।

शिखा ने बचपन से ही पिता को खेती-किसानी करते हुए देखा लेकिन कभी सोचा नहीं था कि वे इसे व्यवसाय के रूप में अपनाएंगी, लेकिन जब पिता को खेती में तरह-तरह की मुश्किलों से गुजरते हुए देखा, तब मन में विचार आया क्यों न खेती में ही हाथ आजमाया जाए और नई-नई तकनीकों से गांव और आसपास के सभी किसानों को जोड़ा जाए। यही सब सोचकर शिखा ने नौकरी छोड़कर खेती में पिता का साथ देने का निर्णय लिया और साल 2012 में इस क्षेत्र में आ गई. जब खेत में काम करना शुरू किया, तो लोगों ने बहुत मज़ाक उड़ाया। कहा- बिटिया चूल्हा चौका संभालो। पिता को भी बहुत ताने दिए गए कि बेटी की शादी न करके लड़कों वाले काम करवाकर क्या साबित करवाना चाहते हो। लेकिन शिखा ने ठान लिया कि वे अपने आपको साबित करके ही दिखाएंगी।

पिता के दिशा निर्देशन में शिखा ने धीरे- धीरे खेती की सारी तकनीक सीख ली और उनका पूरा साथ देने लगीं। गेहूं और चने की पहली फसल लेने के बाद उन्होंने जब अपनी मेहनत की पहली उपज खेतों में देखी तो इस क्षेत्र में अपना करियर बनाने की उनकी उम्मीदों को मानो पंख लग गए। इसके बाद शिखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वे सिरोंज के पास 70 एकड़ जमीन पर जैविक खेती कर सालाना 8 से 10 लाख रुपये कमा रही हैं।

शिखा को ट्रैक्टर चलाना नहीं आता था तो पिताजी ने प्रोत्साहित किया। जब शिखा ने ना-नुकुर की तो पिता ने हौसला देते हुए कहा कि मशीन औरत-मर्द को नहीं जानती, सिर्फ टेक्नीक जानती है। तुम राजदूत मोटर साइकिल चला सकती हो तो ट्रैक्टर भी अच्छे तरीके से हैंडल कर सकती हो। पिता से मिले प्रोत्साहन के बाद शिखा ने ट्रैक्टर चलाना सीखा। उसके बाद शिखा ने बोलेरो, स्कॉर्पियो सहित कई गाड़ियां चलाईं और अभी भी चलाती हैं। जब पहली बार ट्रैक्टर का लाइसेंस बनवाने आर टी ओ दफ़्तर गईं, तो वहां के अधिकारी ने यह कहते हुए लाइसेंस बनाने से मना कर दिया कि लड़कियां ट्रैक्टर नहीं चला सकतीं, आप फर्जी लाइसेंस बनवा रही हैं। लेकिन शिखा बिना लाइसेंस बनवाए और ड्रायविंग टेस्ट दिए बिना जाने को तैयार नहीं हुईं। आखिरकार अधिकारी को उनकी बात माननी पड़ी और वे उनका ड्राइविंग टेस्ट के लिए तैयार हुए। लेकिन उस वक़्त वहां कोई ट्रैक्टर उपलब्ध नहीं था। इसके लिए शिखा को वहां लम्बा इंतज़ार करना पड़ा। कोई पांच घंटे बाद एक ट्रैक्टर आने पर जब शिखा ने ड्राइविंग टेस्ट दिया, तब जाकर उनका लाइसेंस बना।

शिखा जब पहली बार ट्रैक्टर पर फसल लेकर मंडी पहुंची तो लोगों के बीच कौतूहल का विषय बन गईं। लोगों ने उनके वीडियो बनाए, उनके साथ फोटो खिंचवाई। जिन्होंने मजाक उड़ाया था, अब वे अपनी बेटियों को शिखा की मिसाल देते नहीं थकते। इतना ही नहीं, वही लोग अब इनसे अपनी बेटियों को भी ट्रैक्टर और खेती किसानी का काम सिखाने का आग्रह करते हैं।

खेती करते हुए शिखा ने देखा कि सभी किसान खेती में रासायनिक कीटनाशकों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने फ़ैसला किया कि वे ऐसा नहीं करेंगी। उन्होंने जैविक खेती अपनाने का निर्णय लिया और रासायनिक खाद और कीटनाशक की जगह गोबर-गोमूत्र का उपयोग किया। शिखा अब गोबर गैस प्लांट से तैयार कंपोस्ट खाद का इस्तेमाल कर अनाज और सब्जियां उगाती हैं। आसपास के किसानों को कीटनाशकों से होने वाले नुकसान और जैविक खेती से होने वाले लाभ के बारे के बताने के साथ ही उन्हें जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित भी करती हैं। उन्होंने महिलाओं को खेती किसानी के लिए प्रेरित करने हेतु अपना एक यूट्यूब चैनल ‘शिखा द विलेज गर्ल’ बनाया है। जिसमें वे खेती से जुड़ी छोटी-छोटी बातें और नई-नई तकनीक साझा करती हैं. वे कहती हैं हम हर वो काम कर सकते हैं, जो एक पुरुष करता है।

शिखा को सहारा साक्षरता एजुकेशनल एण्ड सोशल वेलफेयर सोसायटी, जनशक्ति युवा, महिला कल्याण एवं बाल विकास समिति, मैक्स केयर वेलफेयर सोसायटी भोपाल, सर्च एंड रिसर्च डेवलपमेंट सोसायटी भोपाल, कुंजन वेलफेयर सोसायटी भोपाल सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन शिखा का मानना है कि जब कोई महिला उनके काम से, उनकी बातों से प्रेरित होकर उनके सम्पर्क में आती है, वही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार, सम्मान और सफलता है।

शिखा भविष्य में एक सफल किसान के तौर पर खुद को देखती हैं वे मानती हैं कि किसी भी औरत की पहली और आखिरी मंज़िल सिर्फ़ शादी नहीं होती । उसका अपने पैरों पर खड़ा होना वैसे ही ज़रूरी है, जैसे बचपन में पहली बार चलते समय होता है। शिखा आज जिस मुकाम पर हैं, वे उसका सारा श्रेय अपने माता-पिता और बहन डॉ. ऋचा जैन को देती हैं। खेती का काम देखने के साथ-साथ शिखा इन दिनों भोपाल में इग्नू में काउंसलर के रूप में भी सेवाएं दे रही हैं।

संदर्भ स्रोत: डॉ. शिखा जैन से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

 

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View Comments (2)
  • Well done Shikha,Keep it up and go ahead further.Best Wishes always.Try to get associated with nabard to form a swasahayata group of villege women to uplift them too.
    Sachin Bhagwat.

  • विलक्षण प्रतिभा के धनी भारत की इस बेटी को सादर चरण स्पर्श

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