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डॉ. वीणा सिन्हा

डॉ. वीणा सिन्हा

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डॉ. वीणा सिन्हा

• वंदना दवे

प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ, प्रशासनिक अधिकारी और नामचीन साहित्यकार डॉ वीणा सिन्हा का जन्म छत्तीसगढ़ के सुकमा में 24 अगस्त 1957 को एक  महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ। पिता का नाम श्री मुरलीधर पाटकी तथा मां का नाम बिन्दु सरस्वती है। पिता जी लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे। माँ कुशलता से घर संभाल रही थीं। वीणा जी चार बहनों में तीसरे नंबर पर हैं। इनका बचपन आजादी के बाद विकसित हो रहे भारत में बीता। उस वक्त जीवन की सहूलियतें  बहुत  धीमी गति से गांवों तक पहुंच रही थी। वे जब छोटी थी तब गांव में बिजली नहीं पहुंची थी। इसलिए आटा तैयार करवाने के लिए भी सुकमा से 56 किमी दूर जगदलपुर जाना होता था। यदि किसी कारण आटा समय पर नहीं आ पाता तो घर में ही घट्टी में गेहूं आदि पीसकर आटा तैयार किया जाता था। घट्टी का परिश्रम ही इनके जीवन की घुट्टी बन गया और वीणा जी के मजबूत व्यक्तित्व निर्माण में सहायक रहा।

डॉ. वीणा सिन्हा का पूरा बचपन गांवों में ही बीता। शुरुआती शिक्षा सुकमा के शासकीय विद्यालय में ही हुई। उस वक्त शिक्षकों में आदिवासी शिक्षक भी होते थे। गाहे बगाहे वे स्थानीय भाषा हल्बी का प्रयोग किया करते थे। लोकभाषा और लोक व्यवहार देखते हुए समझते हुए वीणा जी शासकीय पढ़ाई के साथ साथ ग्राम्य जीवन को भी जीती जा रही थीं।आदिवासियों को नजदीक से देख रही थी। इस समाज की परेशानियों को भी महसूस कर रही थीं। पिताजी का तबादला भाटापारा, अमरकंटक के राजेंद्र नगर, छिंदवाड़ा और पन्ना होता रहा और वे अलग अलग गांवों से अनुभवों और अनुभूतियों को समेटती जा रही थी। अपने ज्ञान में अनौपचारिक शिक्षा का वृहत दायरा जोड़ती जा रही थीं।

वीणा जी पढ़ने में काफी होशियार और मेहनती थीं। ग्यारहवीं बोर्ड की परीक्षा उन्होंने पन्ना के शासकीय विद्यालय से पास की। तब तक तय हो गया था कि डॉक्टर बनना है। डाॅक्टरी की पढ़ाई के लिए अंग्रेज़ी जानना बहुत ज़रूरी था। स्कूल में इसकी सुविधा नहीं थी तो वीणा जी ने अंग्रेज़ी माध्यम के हिसाब से पूरे पाठ्यक्रम की किताबें खरीद लीं, स्वाध्याय किया और राज्य की मेरिट लिस्ट में जगह बनाई। हिन्दी विषय में पूरे प्रदेश में प्रथम आईं। उस समय छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। इस तरह एक विशाल राज्य में मेरिट में पास होना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

पीएमटी में चयन होने के बाद वीणा जी ने रीवा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। यहीं से गायनेकोलॉजी में एम डी किया। वहीं नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ हेमन्त सिन्हा जी से उनकी मुलाकात हुई। वे लखनऊ के थे और रीवा मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे। लगभग पांच साल साथ में पढ़ने के बाद एम डी सेकंड ईयर में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए। चिकित्सक बनने से पहले ही गांव में रहते हुए जो पृष्ठभूमि  तैयार हुई थी, उसी वजह से पढ़ाई के बाद दोनों ने ग्रामीण आदिवासियों के बीच काम करने का निश्चय किया। डाॅक्टर बनने के बाद तमाम सुख सुविधाओं को नज़रअंदाज़ कर इन्होंने गांवों में ही रहने का फैसला किया। इस निर्णय में डाॅ हेमन्त का भी पूरा सहयोग रहा। दोनों ने जब एम डी करने का सोचा, तब भी बड़े तालमेल और दूरंदेशी के साथ विषय का चयन किया। वीणा जी ने गायनी विषय लिया और डाॅ हेमन्त ने ऑप्थेमोलाॅजी चुना। एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के लिए काम के कोई घंटे निश्चित नहीं रहते, वक़्त – बेवक़्त मरीज़ को जब ज़रुरत हो, उसे देखना ही पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए सिन्हा दंपत्ति ने आपसी समझदारी से एक तालमेल बनाया।

पढ़ाई के कुछ समय बाद मप्र राज्य चिकित्सा सेवा के जरिए दोनों का नौकरी के लिए चयन हो गया। जांजगीर, कोरकोमा, बैहर में चिकित्सा विशेषज्ञ बने। बैहर तब बालाघाट जिले का एक गांव था, जहां नल की सुविधा भी नहीं थी। बहुत चुनौतीपूर्ण जीवन था। इसके अलावा डॉक्टरों की कमी के कारण मरीज़ को बेहोश भी खुद ही करना होता था और जटिल ऑपरेशन भी करने होते थे। आदिवासियों को समझाना भी टेढ़ी खीर था। नौकरी करते हुए देखा कि आदिवासी महिलाओं में खून की बहुत कमी होती है। फिर भी कड़ी मेहनत करती है। पति शराब पीकर पड़े रहते हैं। उस वक़्त उन्होंने जाना कि ग्रामीण महिलाओं का जीवन कितना दूभर होता है। कन्या भ्रूण हत्या भी पांव पसार रही थी। लोग अकोला, गोंदिया जाकर यह सब कर रहे थे। उस समय पीसी पीएनडीटी एक्ट – जिसके जरिए कन्या भ्रूण हत्या को कानूनी अपराध घोषित किया गया था, की पूरी प्रक्रिया को डाॅ सिन्हा ने देखा और उससे जुड़ी रहीं।

इस दौरान बेटा और बेटी दोनों का जन्म हो चुका था। बेटा तो बैहर के सरकारी स्कूल में पढ़ भी रहा था। बिटिया भी बड़ी हो रही थी। साढ़े पांच साल बैहर में रहने के बाद बच्चों की पढ़ाई को देखते हुए सिन्हा दंपत्ति बालाघाट आ गये। बालाघाट भी तब एक कस्बा था। बच्चों के भविष्य को देखते हुए यहीं बसने का निर्णय लिया तथा नर्सिंग होम के लिए ज़मीन भी ख़रीद ली। लेकिन ढाई साल बाद पदोन्नति होने पर पन्ना जाना हुआ। पन्ना की प्राकृतिक सौन्दर्य ने उन्हें आकर्षित किया तो डॉक्टरों की कमी के चलते बढ़ती मातृ मृत्यु दर ने व्यथित भी किया। वीणा जी और हेमन्त जी ने तय किया कि उन्हें पन्ना में ही रहना है। चौदह सालों तक वे यहाँ के गांवों और  गलियों में घूमे। स्त्री स्वास्थ्य और लैंगिक भेदभाव को लेकर लोगों की सोच बदलने के लिए काफी मशक्क़त की।

पन्ना से निकलने के सालों बाद घटी एक घटना का ज़िक्र करते हुए वीणा जी बताया कि एक बार किसी बैठक के सिलसिले में दिल्ली जाना हुआ। वहां मप्र के अतिथि गृह मध्यांचल भवन ठहरी हुई थीं। 26 जनवरी का दिन था। वहां कुछ और लोग भी आए थे। एक महिला ने मुझे देखा। वो टीकमगढ़ से थी। उसने मुझसे कहा आप पन्ना में डाॅक्टर थी तब मेरी बेटी का जन्म पन्ना जिला अस्पताल में आपके हाथों हुआ था। उस वक्त बेटी होने से मैं खूब रोई थी। तब आपने मुझे कहा था यह बेटी तुम्हारा नाम रोशन करेगी। देखिए आज यही बेटी तीरंदाजी में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने के लिए दिल्ली आई है। इस घटना ने मुझे बड़ा रोमांचित किया।

पन्ना में जिला चिकित्सा अधिकारी रहते हुए वीणा जी ने लोगों की खूब काउंसलिंग की। वहीं उन्होंने साहित्य सृजन को मूर्त रूप दिया। साहित्य के प्रति रुझान के बारे में वे बताती हैं कि गांवों में हम चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियों में रहे हों, मगर माता पिता ने स्कूली पढ़ाई के साथ अन्य पत्रिकाएं और किताबें पढ़ाने का भी ख्याल रखा। घर में हिन्दी, अंग्रेज़ी और मराठी की किताबें आती थी। शायद पढ़ने की आदत और अनुभव के विशाल केनवास ने लेखन को सहज प्रवृत्ति में तब्दील कर दिया। आई (मां) और हेमन्त जी ने भी लेखन के लिए प्रोत्साहित किया। पहले डायरी में लिखती थी, जिसे यहां आकर उसे डाॅ हेमन्त ने टाइप करवाया। एक बार टाइप किए हुए पन्नों पर हिन्दी के जाने माने आलोचक और संपादक कमला प्रसाद जी की निगाह पड़ी, तब उनके प्रोत्साहन से लेखन यात्रा अधिकृत रूप से शुरू हुई। उनके कारण रीवा में दिग्गज साहित्यकारों के एक कार्यक्रम में कविता पाठ किया। इस कार्यक्रम से आत्मविश्वास बढ़ा। इसके बाद प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन जी से मुलाकात हुई। उन्होंने गद्य लेखन में रुचि जागृत की। फिर उपन्यास लिखने का सिलसिला भी शुरू हुआ। विभिन्न पत्रिकाओं में  वीणा जी की रचनाएं प्रकाशित हुई हैं, दूरदर्शन और आकाशवाणी में उन्हें रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया गया है। उनके संग्रह  ‘कभी टूटता नहीं साॅबीबोर’ की कविताओं में अनेक देशों की यात्राओं के अनुभव हैं। साॅबीबोर दरअसल पोलैंड में एक नाज़ी कैंप था। उस भयावहता में जिजीविषा पर पुस्तक का शीर्षक आधारित है।

सिन्हा दंपत्ति के बेटे और बेटी दोनों ही अमेरिका में निवासरत हैं। वीणा जी विभिन्न पदों पर अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन सफलता पूर्वक कर रही हैं। उन्होंने पच्चीस बरस आदिवासियों और ग्रामीणों के बीच स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया। स्वास्थ्य के राष्ट्रीय कार्यक्रमों को लागू करने में महती भूमिका निभाई। नर्सिंग होम संशोधन एक्ट से जुड़ी हुई हैं। पिछले तीन सालों से कोविड महामारी से निपटने के लिए मप्र सरकार द्वारा डॉ वीणा को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) की एडिशनल डायरेक्टर तथा राज्य सर्विलांस अधिकारी के पद पर रहते हुए उन्होंने कोविड महामारी को नियंत्रित करने व निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रदेश में काफी उल्लेखनीय कार्य किया।

वीणा जी की अब तक प्रकाशित पुस्तकें :

1. कविता संग्रह : “तुम्हें जाना है मैंने”

2. उपन्यास : महाभारत में ययाति कन्या माधवी से प्रेरित “पथ प्रज्ञा”

3. अंग्रेज़ी उपन्यास “unless a perfect rhythm set in”

4. अंग्रेज़ी कविता संकलन “A Glow in the Mirror”

5. हिन्दी कविता संग्रह”सुबह की धूप”

6. हिन्दी कविता संग्रह “फिर भी जीना लड़की”

7. हिन्दी कविता संग्रह कभी टूटता नहीं साॅबीबोर

इनमें कई पुस्तकों पर राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिले हैं :

1. ‘पथ प्रज्ञा’ उपन्यास की पांडुलिपि को राष्ट्रीय पुरस्कार

2. डाॅक्टर्स के जीवन पर लिखा उपन्यास ‘सपनों से बाहर’ को वागीश्वरी पुरस्कार

3. ‘कभी टूटता नहीं साॅबीबोर’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार

 

संदर्भ स्रोत :  डॉ. वीणा जी से  वंदना दवे की बातचीत पर आधारित 

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