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डॉ. पुष्पा पटेल

डॉ. पुष्पा पटेल

छाया : स्व संप्रेषित

विकास क्षेत्र
विषय विशेषज्ञ

• वंदना दवे

यदि आपको कहा जाए कि मालकांगनी,पाडर,डिकामली,राजिता का मतलब क्या होता है ? तो शायद आप हैरत में पड़ जाएंगे कि आखिर क्या है इनके मायने। ऐसे ही बहुत सारे विलुप्त हो रहे नामों के पेड़, पौधों और बेलो को संरक्षित करने में जुटी है खरगोन की रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. पुष्पा पटेल।

प्रकृति पुत्री डॉ. पुष्पा पटेल का जन्म मप्र के बड़वानी शहर में 28 अगस्त 1949 को गुजराती भाषी परिवार में हुआ था, वे सात भाई बहनों में सबसे छोटी हैं। उनके पिता स्व. नत्थू प्रसाद पटेल स्वतंत्रता सेनानी थे, जबकि माँ स्व.तुलसी बाई पटेल गृहिणी थीं। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े होने के कारण स्व.पटेल अपनी आजीविका पर ध्यान नहीं दे पाए। इस वजह से परिवार की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय रही। दादा जी की कुछ जमा पूंजी के सहारे तथा मां ने घरों में छोटा-मोटा काम करके अपना घर चलाया। बड़े भाई ने चौथी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़कर मजदूरी व अन्य कार्य करके परिवार के खर्चे में हाथ बंटाया। दो और भाइयों ने भी 11 वीं करने के बाद ही नौकरी कर ली। उनकी तीनों बड़ी बहनों का विवाह बहुत कम आयु में हो गया था। गरीबी के कारण पुष्पा जी को छोड़कर कोई और भाई या बहन अधिक शिक्षा हासिल नहीं कर पाया। चूंकि पुष्पा जी पढ़ने में काफी होशियार थी तो इन्हें पढ़ने के लिए सरकार की तरफ से वजीफ़ा मिलता था। इस कारण इनकी पढ़ाई निर्बाध रूप से चलती रही।

पुष्पा जी ने विद्यालयीन शिक्षा बड़वानी के सरकारी स्कूल से प्राप्त की और सन 1969 में बड़वानी के ही सरकारी कॉलेज से विज्ञान में स्नातक किया। स्नातकोत्तर की उपाधि उन्होंने शासकीय महाविद्यालय खरगोन से सन 1971 में प्रथम श्रेणी और विक्रम वि.वि. की प्रावीण्य सूची में तृतीय स्थान के साथ प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने स्कूल ऑफ स्टडीज उज्जैन से 1984 में पी.एचडी. की। लेकिन प्रतिभावान छात्रा होने के बाद भी पुष्पा जी की राह आसान नहीं थी। पढ़ाई से लेकर नौकरी तक इनकी जद्दोजहद चलती रही। पैसों की तंगी और अकेली लड़की होने का रोड़ा अक्सर इनकी जिंदगी में आता रहा। दृढ़ निश्चयी होने के कारण हर बाधा को दूर कर वे आगे बढ़ती रहीं। बचपन से ही परिवार और प्रकृति के प्रति लगाव होने से पुष्पा जी ने विज्ञान विषय का चयन किया और वनस्पति विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की।

उनकी नौकरी की शुरुआत महज ढाई सौ रुपए महीने पर कसरावद के सरकारी स्कूल में यूडीटी के पद से हुई। कुछ माह बाद ही व्याख्याता के पद पर उनका चयन हो गया। पी.एचडी. करने के बाद बड़वानी के उसी कॉलेज में वनस्पति शास्त्र की सहायक प्राध्यापक के रूप में पदस्थ हुईं, जहां से वे खुद पढ़कर निकली थीं। स्कूल से कॉलेज में नौकरी पाने के लिए भी इन्होंने कठोर संघर्ष किया। नौकरी में तबादलों के दौरान कुक्षी, छिंदवाड़ा, खरगोन में रहने का अवसर मिला। छिंदवाड़ा में तैनाती के वक्त परिजनों व परिचितों ने तबादला रुकवाने को कहा, लेकिन अपने विषय को ध्यान में रखते हुए पुष्पा जी ने इसे वहाँ के जंगलों को जानने-समझने का सुनहरा मौका माना। कुदरती खूबसूरती और औषधीय सम्पदा से भरपूर छिंदवाड़ा,पचमढ़ी और नागपुर के जंगलों की उन्होंने खूब यात्रा की। वे पातालकोट और तामिया भी कई बार गईं। इस जगह का इस्तेमाल उन्होंने वनस्पतियों के अपने ज्ञान को तराशने में किया। वहाँ की अनेक वनस्पतियों को स्थानीय आदिवासियों की दृष्टि से भी समझा।

पुष्पा जी की दो बड़ी बहनों के पति बहुत ही कम समय में चल बसे, उसके बाद बहनों की स्थिति देख उनका मन खिन्न हो गया और उन्होंने विवाह न करने का निश्चय कर लिया। कई अन्य कारणों से भी इन्होंने अकेले रहना ही पसंद किया। सन 2014 में खरगोन के शासकीय महाविद्यालय से वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पुष्पा जी अपना पूरा समय औषधीय और विलुप्त होती वनस्पति की प्रजातियों के संरक्षण और कुछ लेखन कार्य में गुजार रही हैं। उनके पिता ने देश को आजाद करवाने में अपना योगदान दिया था। आज उनकी पुत्री आज़ाद भारत में अपने क्षेत्र को हरा-भरा बनाने, जैव-विविधता के संरक्षण और आबोहवा शुद्ध करने का भरसक प्रयत्न कर रही है। उनका यह काम उसी आंदोलन की ही कड़ी है। डॉ पुष्पा सरकारी मदद की अपेक्षा रखे बगैर अपने तईं कार्य करने में जुटी हैं ।

पुष्पा जी के अनुसार हर जिले में वानस्पतिक उद्यान होना चाहिए और जैव विविधता के लिए विस्तृत कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए। उनके संरक्षण के लिए एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए जहां दुर्लभ और विलुप्त प्रजाति के पौधे लगाए और संरक्षित किए जा सकें। इसके लिए उन्होंने प्रदेश की राजधानी भोपाल के स्तर तक प्रयास किए लेकिन निराशा ही हाथ लगी। उन्होंने स्वयं एक प्लाॅट खरगोन में खरीदा जहाँ वे विभिन्न प्रकार के औषधीय गुणों वाले पौधे लगा रही हैं। कुछ तो बड़े होकर आकर लेने लगे हैं। उनके इस काम में काॅलोनी बनाने वाले भी सहयोग कर रहे हैं। इन्होंने भविष्य हेतु इस नेक कार्य के लिए बजट बनाया हुआ है ताकि पैसों के अभाव में कहीं यह काम अधूरा न रह जाए।

खरगोन के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक रहते हुए जैव-विविधता को लेकर पुष्पा जी ने विद्यार्थियों में एक अलख जगाई है। उन्होंने अलग-अलग जगहों से दुर्लभ प्रजाति के औषधीय पौधों के बीज इकट्ठे किए। इनमें से कुछ उन्होंने उगाए तथा कुछ वन विभाग को दिए और उन्हें महाविद्यालय परिसर और बाहर की खाली जमीनों पर लगाया। आज ये पौधे विशाल रूप ले चुके हैं। 12 बरस पहले दशमूलारिष्ट का श्योनाक नामक पौधा लगाया था। आज इसके आसपास सात आठ पौधे विकसित हो गये हैं। यह हजारों की संख्या में बीज उत्पन्न कर रहा है। महाविद्यालय में अनन्त मूल, गुड़मार, तामेसर, सीता अशोक, वरुण,बीजासार, बारंगा, पारिजात,श्योनाक, शमी आदि पौधे और बेलबूटे लगे हुए हैं।

अपने निवास पर भी उन्होंने गुलबकावली, अडूसा, पत्थरचट्टा, वज्रदंती, एलोवेरा, अनंतमूल, अन्तमूल, ब्राह्मी, मालकांगनी, अपराजिता, चित्रक, कुकड कांदा, हल्दी, गूगल, वरुण, पाडर, डिकामाली आदि पौधे लगाए हैं। पुष्पा जी का अपना छोटा सा संग्रहालय है, इसमें लगभग सौ प्रजातियों के पेड़-पौधों के फल या बीज सहेज कर रखे गए हैं। जल्द ही वे इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने वाली हैं। उन्होंने स्वयं सेवी संस्था ‘आस्था ग्राम ट्रस्ट’ की ज़मीन के साथ, गोकुल आवासीय योजना की जमीन, बड़वाह आश्रम की ज़मीन, महेश्वर में एक किसान के खेत में व एक आश्रम व अन्य कई स्थानों पर भी विलुप्त प्रजातियों के पौधे लगाए हैं। इन पौधों में चित्रक, टक्का, कमल, गुगल, पुत्रंजीवा, दहीकढ़ी, कुसुम, मेढासिंगा, सीवन, सलाई, कुचला, गरुड़फल, कुल्लू, बहेड़ा, खिरनी, चारोली आदि पौधे हैं।

डॉ. पटेल को विलुप्त प्राय तथा औषधीय पौधों के संरक्षण के अलावा साहित्य लेखन में भी रूचि है जैसे कविता, गज़ल, दोहे लिखना। इनके लेखन कार्य में भी पेड़ पौधे प्रमुखता से दिखाई देते हैं। वे शहर में अनेक संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं, म.प्र.लेखक संघ इकाई खरगोन की वे अध्यक्ष और म.प्र. हिंदी साहित्य अकादमी के पाठक मंच की संयोजक रही हैं।

प्रकाशित पुस्तकें

1- काव्य संग्रह : खिल खिल जाए मौलसिरी

2- वन श्री भाग 1 : इसमें 52 पेड़ों पर 4 पन्नों की कविता सहित हिन्दी में उनका वर्णन व खुद के लिये हुए रंगीन छायाचित्र

3- ग़ज़ल संग्रह : “यूँ होता तो अच्छा होता “

प्रकाशनाधीन

1–वन श्री भाग 2 : इसमें 3 सौ पेड़ों, लताओं व छोटे महत्वपूर्ण पौधों का हिन्दी में वर्णन और खुद के लिये हुए रंगीन छायाचित्र

2- दो ग़ज़ल संग्रह

अकादमिक उपलब्धियां

1.राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध पत्रों की प्रस्तुति

2. इंडियन एसोसिएशन फॉर एंजियोस्पर्म टैक्सनॉमी ( IAAT) की आजीवन सदस्य व फेलो व 2 वर्षों तक सलाहकार

3.एसोसिएशन ऑफ़ प्लांट टैक्सोनोमी (APT) की आजीवन सदस्य

4. एक्शन फॉर सस्टेनेबल,एफिकेसियस डेवलपमेंट एंड अवेयरनेस ( ASEA) इंडिया की आजीवन सदस्य

उपलब्धियां

1. वर्ष 2014 में आपके द्वारा जैव विविधता को लेकर किए गए महत्वपूर्ण प्रयास के लिए बायोडायवर्सिटी बोर्ड, भोपाल से खरगोन के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय को प्रथम पुरस्कार

2. वर्ष 2016 में इनके मार्गदर्शन के कारण बड़वानी के एक किसान को बायोडायवर्सिटी बोर्ड से प्रथम पुरस्कार

3.आस्थाग्राम ट्रस्ट खरगोन की मुरुम वाली व पथरीली पहाड़ी पर इनके सुझाव व सहयोग से कईं प्रकार के संकटग्रस्त व औषधीय पेड़ पौधे लगाए गए इस सहयोग से आस्थाग्राम को 2018 में बायोडायवर्सिटी बोर्ड भोपाल से प्रथम पुरस्कार

पुरस्कार एवं सम्मान

1.म.प्र. लेखक संघ भोपाल द्वारा काशीबाई मेहता स्मृति लेखिका सम्मान 2015

2. म.प्र.लेखक संघ गुना द्वारा “गिरिजा कुमार माथुर सम्मान

3.निमाड़ लोक संस्कृति न्यास खंडवा द्वारा सिंगाजी सम्मान 2015

4.मुक्तक लोक लखनऊ द्वारा मुक्तक रत्न सम्मान

5.नवंबर 2019 में Indian Association for Angiosperm Taxonomy द्वारा त्रिवेंद्रम में सम्मान

6.मॉरीशस में “हिंदी साहित्य सेवा सम्मान

यात्राएं

भारत के कुछ राज्यों को छोड़कर पूरे देश का भ्रमण किया है।

यूरोप, यूएस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, यूएई नेपाल, भूटान, मॉरीशस आदि देशों की यात्राएं कर चुकी हैं।

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