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डालिया दत्ता

डालिया दत्ता

छाया :सुश्री कणिनिका तापड़िया के फ़ेसबुक अकाउंट से

सृजन क्षेत्र
संगीत एवं नृत्य
प्रसिद्ध कलाकार

डालिया दत्ता

सुप्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना डालिया दत्ता का जन्म 28 अक्टूबर 1964 को हावड़ा (कोलकाता) में हुआ था। उनके पिता श्री रवीन्द्र चन्द्र दत्ता एक जहाज बनाने वाली कंपनी में मेटलॉजिस्ट और माँ श्रीमती पुरोबी दत्ता शिक्षिका थीं। डालिया जी और उनकी छोटी बहन जीनिया की परवरिश माता-पिता ने बड़े ही लाड़-प्यार से की। पिता की अनुशासनप्रियता ने डालियाजी के व्यक्तिव निर्माण में अहम भूमिका निभाई। डालिया जी जब केवल तीन साल की थीं, उनकी माताजी ने उनका स्थानीय नृत्य कक्षा में नामांकन करवा दिया। बाद में वे लम्बे अरसे तक ब्रज गोपाल बनर्जी से कथक और गुरु अशित चटर्जी से रवीन्द्र नृत्य शैली सीखती रहीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हावड़ा में ही हुई। वर्ष 1978 में उन्होंने वहीं से हायर सेकेंडरी पास करने के बाद रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में नृत्य विषय लेकर स्नातक की उपाधि हासिल की। पुनः ओडिसी नृत्य में उसी विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातकोत्तर भी किया।

अब तक नृत्य डालियाजी के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका था। वे उसे करियर के तौर पर अपनाना चाहती थीं, लेकिन पिता ने चेतावनी दे रखी थी कि यदि उन्होंने नृत्य को करियर के रूप में लिया तो वे पढ़ाई के खर्च बंद कर देंगे। इसे भी उन्होंने चुनौती के रूप में लिया और वर्ष 1985 हावड़ा में छंदक कला अकादमी की स्थापना की और कथक सिखाने लगीं। अकादमी की आय से ही उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च भी निकाला। नौवीं कक्षा से ही मंच प्रस्तुतियों का दौर शुरू हो चुका था, इसलिए उनकी लोकप्रियता भी दिन प्रति दिन बढ़ती चली गयी। ओडिसी नृत्य शैली में विशेष अभिरुचि के कारण उन्होंने पौशाली मुखर्जी एवं मुरलीधर मांझी से से इस विधा में विशेष प्रशिक्षण लिया, साथ ही सुप्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना संयुक्ता पाणिग्रही की कार्यशालाओं में भी समय-समय पर सम्मिलित होती रहीं। डालिया जी ने गुरु खगेन्द्रनाथ बर्मन से कुछ वर्ष भरतनाट्यम का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। बाद में रचनात्मक नृत्य शैली के लिए स्व. गुरु आनंद शंकर एवं तनुश्री शंकर से भी उन्हें सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। इस तरह विभिन्न नृत्य शैलियों से अवगत होती रहीं, लेकिन आख़िर में उन्होंने अपने आपको ओडिसी के लिए समर्पित कर दिया।

इस बीच एक संगीत कार्यक्रम में उनकी मुलाक़ात श्री अम्बुज दत्ता से हुई जिनके साथ कुछ वर्षों के मेलजोल के पश्चात दोनों 1991 परिणय सूत्र में बंध गए। अम्बुज जी की पदस्थापना मक्सी ( इंदौर-शाजापुर मार्ग पर स्थित एक कस्बा ) में थी, शादी के बाद डालिया जी भी वहां पहुँच गईं। कुछ वर्षों के बाद दोनों इंदौर में बस गए। विवाह के बाद छंदक कला अकादमी को बंद करना पड़ा था, इसलिए 1995 में इंदौर में उन्होंने अकादमी को फिर स्थापित किया। अकादमी में कथक के साथ ओडिसी की शिक्षा भी दी जाती थी। शुरू के सात सालों तक ओडिसी में रूचि रखने वाली छात्राओं की संख्या शून्य रही। उन्होंने सोचा कि लोगों को मौखिक रूप से यह बताने के बजाय कि ‘ओडिसी नृत्य शैली क्या है’, उन्हें दिखाना चाहिए। 2004 से अकादमी के कार्यक्रम ‘छंदक उत्सव’  में बाहर के राज्यों की ओडिसी नृत्यांगनाओं को उन्होंने आमंत्रित करना शुरू कर दिया जिसे लोगों ने खूब पसंद भी किया। इस दौरान उन्होंने देश की मूर्धन्य ओडिसी नृत्यांगनाओं को आमंत्रित किया जिसे देखकर लोगों में ओडिसी के प्रति एक समझ विकसित हुई और धीरे-धीरे इस विधा को सीखने के लिए भी उत्सुक हुए। इस तरह मध्यप्रदेश को ओडिसी नृत्य शैली से परिचित करवाने का श्रेय डालिया जी को जाता है।

2004 से उन्होंने कथक छोड़ दिया और ओडिसी सिखाने लगीं। कुछ वर्षों के प्रशिक्षण के बाद  प्रमुख मंचों पर उनके प्रस्तुतियों की सराहना भी होने लगी। उनके जीवन काल में छंदक कला अकादमी के विद्यार्थियों ने जगन्नाथ मंदिर (राऊ), कटक कला विकास केंद्र थिएटर ओलंपियाड-2009, भोज महोत्सव, अलाउद्दीन खां संगीत एवं नाटक अकादमी सहित अनेक सम्मानित मंचों पर उन्होंने अपनी प्रस्तुतियां दीं, साथ ही अनेक राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पुरस्कार भी जीते।  2008 से डालिया जी अकादमी के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर ओडिसी नृत्य पर आधारित प्रतियोगिताएं भी आयोजित करवाने लगीं। कालान्तर में यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने लगा। डालिया जी ने बहुत कम समय में ही मध्यप्रदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर अपना विशेष स्थान बना लिया और उनकी गिनती स्थापित नृत्यांगनाओं के साथ-साथ सम्मानित नृत्य गुरुओं में होने लगी।

राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित अनेक नृत्य प्रतियोगिताओं के निर्णायक मंडलों के बीच वे सुशोभित होने लगीं थीं। वे अपने जीवन में और भी बहुत कुछ करना चाहती थीं परन्तु  2021 में कोविड संक्रमण के कारण उनका निधन हो गया। अपने संक्षिप्त जीवन काल में भी डालिया जी को कई प्रतिष्ठित मंचों पर नृत्य प्रस्तुति देने का अवसर प्राप्त हुआ। वर्ष 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेल के सांस्कृतिक कार्यक्रम, वर्ष 1987 में कोलकाता में आयोजित सैफ़ गेम्स के सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं राज्य सरकार, असम द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘बंग सांस्कृतिक सम्मेलन’ इनमें प्रमुख हैं। एकल नृत्य प्रस्तुतियों के साथ ही उनकी अभिरुचि नृत्य निर्देशन में भी रहा। कोलकाता दूरदर्शन एवं अपनी संस्था ‘छंदक’ सहित विभिन्न संस्थाओं के तत्वावधान में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए उन्होंने अनेक नृत्य नाटिकाओं का निर्देशन किया। इसके अलावा अभिनव कला समाज, सत्य साईं विद्या विहार आदि संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में शामिल होने के साथ अपनी संस्था के छात्रों के लिए खुद भी कार्यशालाओं का आयोजन करती रहीं।

उनके पुत्र अनुराग दत्ता रचनात्मक लेखन में रूचि रखते हैं।

उपलब्धियां :

• वर्ष 2009 में शंकर भारती नाट्य केंद्र, आगरा द्वारा ‘मीरा अवार्ड’

•  वर्ष 2010 में थिएटर मूवमेंट, ओड़िसा द्वारा नृत्य विदुषी सम्मान

•  वर्ष 2010 में उत्कल युवा सांस्कृतिक संघ द्वारा ‘नृत्य शिरोमणि’ पुरस्कार

•  वर्ष 2014 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा देवी अहिल्या नारी गौरव सम्मान

संदर्भ स्रोत: श्री अनुराग दत्ता द्वारा प्रेषित जानकारी तथा सारिका ठाकुर की श्री अम्बुज दत्ता से बातचीत पर आधारित

 

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