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जिद, जुनून और हौसलों की कहानी

जिद, जुनून और हौसलों की कहानी

छाया : दैनिक भास्कर

विकास क्षेत्र
कृषि एवं उद्यानिकी
प्रमुख महिला किसान

मशीन और मिट्टी जेंडर नहीं देखती; जमीन जानती है उसे कैसे संवारा जा रहा है, वह उसी हिसाब से फसल देती है

• वंदना श्रोती 

राजधानी समेत पूरे प्रदेश में 60 लाख किसान हैं। इनमें से महिला किसानों की संख्या महज 5332 है। यानी एक फीसदी से भी कम। ऐसे में पुरुषों के वर्चस्व वाले इस पेशे में इन महिलाओं ने मिसाल पेश की है। लॉकडाउन और कोरोनाकाल में नौकरी गई तो ये इस पेशे में आईं। अब दूसरी लड़कियों को भी खेती करना सीखा रही हैं।

ट्रैक्टर चलाना सीखा, अब दूसरों को भी सिखा रही हूं -शिखा जैन

मैं भोपाल के सुरेंद्र प्लेस में रहती हूं। पीएचडी की है। काउंसलर थी, लेकिन नौकरी चली गई। हम दो बहनें हैं। ऐसे में पिता का खेती में साथ देना का निर्णय लिया। हमारी 70 एकड़ जमीन सिरोंज के पास है। टैक्टर चलाना नहीं आता था तो पिताजी ने प्रोत्साहित किया। लेकिन जब खेत में काम करना शुरू किया तो लोगों ने मजाक उड़ाया, कहा- बिटिया चूल्हा चौका संभालों। तभी ठान लिया कि खेती हर करूंगी। मुझे पिता गाइड करते रहे। पहली फसल गेंहू और चने की ली। जब मंडी में ट्रैक्टर पर फसल लेकर पहुंची तो लोगों ने वीडियो भी बनाया। जिन्होंने मजाक उड़ाया था, अब वे अपनी बेटियों को मेरे पास लाते हैं। कहते हैं, इन्हें भी काम सिखा दें।

गांव वाले मुझे अब जरबेरा वाली मैडम कहते हैंसंजीवनी सुकलीकर

मैं कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट हूं। पति मर्चेंट नेवी में थे। हमने खेती के लिए परवलिया सड़क के नजदीक खेती की जमीन ली थी। जब गांव पहुंची तो दबंगों ने मजदूरों को धमकी दी कि कोई मेरे खेत में काम नहीं करेगा। ऐसे में मैंने खुद ही तीन माह में जमीन को फसल लगाने लायक बना लिया। बाद में गांव के मजदूर सहयोग के लिए आए। मैंने पॉली हाउस बनाया, जिसमें जरबेरा और गुलाब की फसल लगाई। बाकी जमीन पर अनार। तभी किसी ने खेत में आग लगा दी। अनार की फसल बर्बाद हो गई। किसी तरह पॉली हाउस को बचाया। अब तक जरबेरा की कई फसल ले चुकी हूं। अब लोग मुझे जरबेरा वाली मैडम के नाम से बुलाते हैं।

साभार : दैनिक भास्कर 

 

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