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जयश्री बनर्जी

जयश्री बनर्जी

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जयश्री बनर्जी

मप्र के ताज़ा राजनीतिक इतिहास में जयश्री बनर्जी एक ऐसी शख्सियत हुई हैं, जिन्होंने विधायक, कैबिनेट मंत्री और फिर सांसद के तौर पर लोकहित में महत्वपूर्ण काम किए और जिस पद पर रहीं, उसकी गरिमा बढ़ाई। उनके पिता श्री हिरण्यमय सिकदार कृषि विशेषज्ञ थे और बागवानी अधीक्षक के तौर पर नगर पालिका में कार्यरत थे। माँ श्रीमती रानी सिकदार उस जमाने में अंग्रेजी माध्यम से मैट्रिक उत्तीर्ण थीं और वे संगीत में भी गहरी रूचि रखती थीं। शिक्षित और सुलझे हुए विचार के माता पिता ने अपने बच्चों को भी सुसंस्कृत वातावरण दिया। जिस तरह अनुकूल मिट्टी, पानी और खाद से पौधे लहलहा उठते हैं उसी प्रकार अच्छी परवरिश ने जयश्री जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का निर्माण किया।

चार भाई बहनों में जयश्री जी सबसे छोटी थीं। हालाँकि उनके जन्म से पूर्व सबसे बड़े भाई ‘सोना’ की मृत्यु पांच वर्ष की आयु में ही हो गई थी। 2 जुलाई 1938 को जयश्री जी का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ। वे कई मन्नतों के बाद पैदा हुई थीं इसलिए नामकरण हुआ ‘माना’। उनके माता पिता ने बेटे-बेटी में कभी भेद नहीं किया। उनकी प्राथमिक शिक्षा जगत तारन पूर्व माध्यमिक विद्यालय में हुई। इस विद्यालय का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि इसकी स्थापना सुप्रसिद्ध सिविल सर्जन और लेखक श्री वामनदास बसु ने अपनी बहन जगत मोहिनी और बहनोई तारन देव की स्मृति में की थी। यहाँ बंगाली माध्यम से शिक्षा दी जाती थी।

इसी के समानांतर उनकी संगीत की शिक्षा भी प्रारंभ हुई। मेधावी होने के कारण वे तीसरी कक्षा से सीधे पांचवी में आ गईं और वहां भी अव्वल रहीं। जिस दिन परीक्षा परिणाम आए,  उस दिन उनके घर उत्सव का आयोजन किया गया। छठी कक्षा में पहुँचने पर वे खेलकूद में भी हिस्सा लेने लगीं थी, हालाँकि पिताजी को यह पसंद नहीं था। वे अपनी बेटी कोई सिर्फ पढ़ाई-लिखाई में सबसे आगे देखना चाहते थे। उस ज़माने में यूं भी पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ने के डर से खेलकूद को तरजीह नहीं दी जाती थी। लेकिन माना को ये कहाँ मंजूर था, नतीजा ये हुआ कि खेल के कारण वे पढ़ाई में पिछड़ने लगीं। नाराज़  पिताजी ने एक दिन फटकार लगाकर उन्हें घर से बाहर खड़ा कर दिया। माना ने भी गुस्से में एक डोलची में अपने कपड़े डाले और उसी शहर (लखनऊ) में रहने वाली अपनी नानी के घर पहुँच गईं। उन्हें ढूंढते-ढूंढते पिताजी वहां आए और मनाकर घर ले आए। इस प्रसंग से माना ने एक सबक लिया और आगे की कक्षाओं में पहुँचते हुए उन्होंने पढ़ाई, खेलकूद और संगीत में तालमेल बिठाना सीख लिया। हमेशा अव्वल आने के कारण विद्यालय में एक मेधावी छात्रा के रूप में उनकी धाक पहले से थी। प्रधानाचार्य श्रीमती सुरभि सिन्हा तो उनकी मुरीद थीं। अच्छे अंकों से दसवीं पास करने के बाद पिता ने प्रसन्न होकर साइकिल खरीद दी थी। वे अपने छोटे भाई बहनों को साइकिल पर बिठाकर स्कूल जाने लगीं। 11वीं पास करने के साथ ही उनके बचपन की दहलीज भी पार हो गई।

मनोविज्ञान, संगीत और भूगोल विषय लेकर स्नातक के लिए माना ने इलाहबाद विश्वविद्यालय के महिला कॉलेज में दाखिला लिया। यह कॉलेज, विश्वविद्यालय परिसर में ही स्थित है। स्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद एक-एक कर उनकी सहपाठिनों की शादी होने लगी, लेकिन माना तो अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं। उन्होंने भूगोल विषय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। एम.ए. फाइनल ईयर की परीक्षा देने के बाद वे सिलाई बुनाई सीखने के लिए शिल्प भवन जाया करती थीं। पढ़ाई के अलावा संगीत, पुष्प सज्जा, सिलाई-कढ़ाई ऐसे क्षेत्र थे, जहां माना अपनी कलात्मक अभिरुचि को आकार देती थीं। इस अभिरुचि का स्थान भी कहीं से दोयम नहीं था। बचपन से ही सुबह साढ़े चार बजे का समय रियाज़ के लिए तय था। ताने, मुरकियों, स्केल जैसी चीजों पर उनकी माँ खुद नज़र रखती थीं। पुष्प सज्जा का शौक पिता के सहयोग से परवान चढ़ा क्योंकि वे खुद बागवानी में सिद्धहस्त थे। कहीं भी पुष्प सज्जा की प्रतियोगिता होती, माना उसमें हिस्सा जरुर लेती थीं। ऐसी ही एक प्रतियोगिता में उनकी प्रतिस्पर्धी थीं तेजी बच्चन, जिन्हें द्वितीय पुरस्कार मिला था, हमेशा की तरह पहले स्थान पर माना उर्फ़ जयश्री ही रहीं। उनकी एक अलग पहचान ‘वन्दे मातरम’ गायक के रूप में भी थी। अपने सुमधुर स्वर में वे जब राष्ट्रगीत गातीं तो सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे। उन्होंने सबसे पहले अपने स्कूल में वन्देमातरम् गाया था उन्होंने जिसके बाद विभिन्न समारोहों में उन्हें इसके लिए ख़ास तौर पर आमंत्रित किया जाने लगा।

2 जुलाई 1956 में माना का विवाह जबलपुर निवासी श्री अम्बिकाचरण बनर्जी के पुत्र सुभाष के साथ संपन्न हुआ। दरअसल सुभाष जी के दादा श्री गणेश चंद्र बनर्जी बंगाल से मध्यप्रान्त आए थे। वे डाकघर में काम करते थे। अम्बिकाचरण जी की शिक्षा दीक्षा जबलपुर में ही हुई, आगे चलकर वे सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे हितकारिणी महासभा के संस्थापक सदस्य थे। जबलपुर नगर पालिका  (वर्तमान में  नगर निगम) की स्थापना में भी अम्बिका बाबू का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस योगदान के कारण नगर पालिका  ने उन्हें प्रथम सचिव नियुक्त किया था। सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्मे सुभाष जी में नेतृत्व क्षमता स्वाभाविक रूप से विकसित हुई थी। 1951-52 में जनसंघ की स्थापना के समय वे प्रदेश इकाई के महामंत्री मनोनीत हुए थे। माना के रूप में उन्हें वैसा ही सुशिक्षित-संस्कारी जीवनसाथी मिला, जैसा उन्होंने चाहा था। इसी के साथ संगम नगरी में जन्मी माना का नाता संगमरमर के शहर से जुड़ गया। ससुराल में माना का नया नामकरण हुआ और वे जयश्री कहलाईं। कालांतर में इसी नाम के साथ उनकी पहचान बनीं। पति-पत्नी ने पाया कि उन दोनों की मंज़िल एक ही है, इसलिए शादी के बाद होने वाली अडचनें अपने आप ही दूर हो गईं। दोनों के बीच असहमति की स्थिति बनी नहीं, इसलिए आपसी तालमेल हमेशा अच्छा ही रहा।

जयश्री जी के साथ एक सुखद संयोग रहा कि उनके माता-पिता जिस प्रकार शिक्षित, सुसंस्कृत और प्रगतिशील विचारधारा के वाहक थे उसी तरह उनका ससुराल भी तत्कालीन समाज के लिहाज से उन्नत दृष्टिकोणों वाला था। सुभाष जी की माँ और छोटी चाची (काकी माँ) ने मिलकर अपने स्तर पर महिला समिति का गठन किया था जिसके माध्यम से महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे मुद्दों पर जागरूक करने का प्रयास किया जाता था। इसीलिए जयश्री जी को दहलीज के दोनों तरफ संतुलन साधने में कभी दिक्कत नहीं आई। शादी के दो साल बाद 15 अगस्त 1958 को जयश्री जी ने पुत्री रुमा को जन्म दिया। सुभाष जी उस समय पार्टी के जिलाध्यक्ष थे और जयश्री जी महिलाओं के जागरूकता के लिए काम कर रही थीं। अगले ही साल 10 जुलाई को जयश्री जी ने पुत्र आशीष को जन्म दिया। दो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सामाजिक जिम्मेदारियां निभाना मुश्किल ज़रूर था लेकिन परिवार के सहयोग से सारे काम होते चले गए।

उस समय जनसंघ की गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनर्जी परिवार का निवास स्थान ही था। तमाम महत्वपूर्ण बैठकें वहीं होती थीं। उस दौरान जयश्री जी की मुलाक़ात देश के दिग्गज नेताओं और समाजसेवियों से होती। उनकी बौद्धिकता का सभी सम्मान करते थे। वर्ष 1961 में जयश्री बनर्जी मप्र जनसंघ महिला कार्यकारिणी की सदस्य बनीं। इस बीच परिवार में कुछ छोटे बड़े हादसे भी हुए। जयश्री जी की माँ और काका ससुर का देहांत हो गया, पुत्र दुर्घटनाग्रस्त हो गया और समय से पूर्व दूसरी पुत्री मल्लिका का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी बड़ी पुत्री रुमा को अपने पिता के पास ही छोड़ दिया, क्योकि माँ की मृत्यु के बाद घर सूना हो गया था। दूसरे शिक्षा के प्रति अपने पिता की गंभीरता को देखते हुए उन्हें विश्वास था कि नाना के पास रुना की पढ़ाई बेहतर ढंग से हो पाएगी। परिस्थितियां सामान्य होने के बाद 1968 में चौथी संतान के रूप में दीपांकर का जन्म हुआ और उसी समय वे अखिल भारतीय जनसंघ की प्रांत उपाध्यक्ष और नगर अध्यक्ष चुनी गईं। वे अब तक एक प्रतिबद्ध समाजसेवी के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुकी थीं। उल्लेखनीय है कि जयश्री जी के प्रयासों से ही जबलपुर में आँगनबाड़ी योजना को सबसे पहले क्रियान्वित किया जा सका था।  

1975 का साल पूरे देश के लिए राजनीतिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस साल लगाए गए आपातकाल की गाज जनसंघी विचारधारा वाले बनर्जी परिवार के कई सदस्यों पर गिरी। जयश्री जी, सुभाष जी, उनके तीनों भाइयों और दो भतीजों को गिरफ़्तार कर लिया गया। घर में बूढ़ी सास और बच्चे रह गए। जयश्री जी सबसे छोटे पुत्र दीपांकर बहुत छोटे थे इसलिए बाद में उन्हें माँ के साथ रहने की अनुमति मिल गई। वह एक कठिन समय था। जेल में भोजन की उचित व्यवस्था नहीं थी। जयश्री समेत अन्य महिलाओं ने विरोध किया और अपना भोजन खुद बनाने की मांग रखी जो मान ली गई। आपातकाल समाप्ति के बाद 1977 में आम चुनाव हुए जिसमें जबलपुर की मध्य विधानसभा सीट से जयश्री जी भारी मतों से विजयी हुईं। वर्ष 1980 में श्री  सुन्दरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने और उनकी सरकार में जयश्री बनर्जी कैबिनेट मंत्री बनीं। उनके परिवार के विभाष बनर्जी भी चुनाव जीतकर आए और उन्हें शिक्षा राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त हुआ। यह अनोखा संयोग रहा कि देवर और भाभी दोनों एक साथ मंत्री पद पर आसीन हुए।

मंत्री रहते हुए कई उल्लेखनीय कार्य जयश्री के नाम से दर्ज है। जैसे सन 1978 में उन्होंने राष्ट्रीय बैडमिंटन प्रतिस्पर्धा के आयोजन करवाया, राज्य के उन्नीस नगरों की गन्दी बस्तियों में शिशु और गर्भवती माताओं के लिए पौष्टिक आहार योजना शुरू करवाई और रायपुर में निराश्रित महिला गृह’ स्थापित करवाया। सिर पर मैला ढोने वाली महिलाओं के प्रति जयश्री जी शुरू से ही संवेदनशील थीं, इसलिए मंत्री बनते ही गांधी जयंती के अवसर पर महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उन्होंने नगर निगम से जन जागरूकता अभियान की शुरुआत की। उन्होंने नारा दिया ‘मैला सर पर न ढोना’। सामाजिक सोच बदलने के लिए सरकारी व गैर सरकारी कर्मचारियों हाथ ठेला उपलब्ध करवाया गया, उन्हें अस्पृश्य की श्रेणी से सामान्य कर्मचारियों की श्रेणी में रखा गया। जयश्री जी विकास कार्य की अपनी समझ को परिष्कृत करने अन्य प्रदेशों का अक्सर दौरा किया करती थीं। सन 1979 में देहरादून, राष्ट्रीय विकलांग केंद्र जाकर उनके काम की बारीकियों को सीखा और विस्तृत जानकारी हासिल कर निःशुल्क अंध मूक बधिर विद्यालय की स्थापना की। इस विद्यालय की पूरी व्यवस्था जयश्री जी खुद देखती थीं। उस समय उन्होंने विद्यालय के अलावा दृष्टिहीनों के लिए छह पाठशालाएं और छह नगरों में एकीकृत शिक्षा अभियान, पांच विकलांग शिशु गृह, दो अपंग सह उत्पादन केंद्र, विकलांग रोजगार कार्यालय, कृत्रिम अंग प्रदान केंद्र, छात्रवृत्तियां, शासकीय कर्मचारियों के पुरस्कार के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं को अनुदान योजना को प्रारंभ किया।

इसी प्रकार स्वायत्त निकाय मंत्रालय में अपने कार्यकाल के दौरान भी जयश्री जी ने कई अभूतपूर्व कार्य किये। ख़ासतौर पर जबलपुर के मदन महल स्टेशन के पास अंडर ब्रिज का निर्माण, खेलकूद में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जबलपुर में पांचवी राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिता का आयोजन करवाया था। इसके अलावा आम खिलाड़ियों की सुविधा के लिए भी कई कार्य किए। 1999 से 2004 तक वे सांसद रहीं, इस दौरान भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण विकास कार्यों में अपना योगदान दिया। वर्तमान में यद्यपि वे राजनीति के गलियारे से दूर एक शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही हैं लेकिन समाज हित के कार्यों में अभी भी उनकी गहरी दिलचस्पी है।

उनकी बड़ी पुत्री रूमा भी एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं, वे भारत सरकार द्वारा चलाए जाने वाले सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत समावेशी शिक्षा सलाहकार के रुप में कार्य कर रही हैं। उनके पति श्री रूपनाथ बनर्जी बंगलुरु में डी.जी.एम. के पद पर कार्यरत हैं। पुत्र आशीष बनर्जी माँ के साथ ही रहते हैं। दूसरी बेटी मल्लिका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तेज तर्रार नेता रही हैं, उनका विवाह हिमाचल के छात्र नेता जगत प्रकाश नड्डा से हुआ। श्री नड्डा भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। छोटे पुत्र दीपांकर भी युवावस्था में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के चर्चित नेता रहे हैं। वे कई स्कूलों और कॉलेजों की कार्यकारिणी के  सदस्य होने के साथ स्पेशल ओलंपिक भारत, मप्र के उपाध्यक्ष हैं । 

उपलब्धियां :

• जनसंघ जबलपुर नगर अध्यक्ष : 1973-74

• जनसंघ की प्रदेश उपाध्यक्ष 1974-77

• महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ; दो बार

• पश्चिम बंगाल में महिला मोर्चा प्रभारी सन 1974-75

• प्रदेशाध्यक्ष भाजपा महिला मोर्चा: दो बार

• विधायक : 1977, 1990, 1993

• सांसद, कैबिनेट मंत्री, स्थानीय स्वशासन, समाज कल्याण एवं खेल और जेल मंत्री, मप्र शासन

 

संदर्भ स्रोत: जयश्री बनर्जी पर आधारित स्मारिका अनुसंकल्प से प्राप्त  विवरण पर आधारित

© मीडियाटिक

 

 

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