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गिरिजा कुलश्रेष्ठ 

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 

छाया : स्व संप्रेषित

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साहित्य
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गिरिजा कुलश्रेष्ठ 

मेरा जन्म ग्राम मामचौन कलां जिला मुरैना में 1 जनवरी 1959 को हुआ। छोटे भाई के जल्दी आ जाने के कारण मुझे तिलोंजरी गाँव में नानी की गोद की शरण लेनी पड़ी। पहली और दूसरी कक्षा की पढ़ाई वहीँ हुई, फिर  पाँचवी कक्षा तक बड़बारी में हुई जहाँ पिताजी शिक्षक थे। आगे की पढ़ाई की समस्या थी क्योंकि ज्यादातर गाँवों में प्राइमरी स्कूल ही थे। मामचौन में एक संस्था द्वारा संचालित मिडिल स्कूल से  छठवीं-सातवीं कक्षाएं पास कीं। इसके बाद वह स्कूल बन्द हो गया तो आठवीं की पढ़ाई  कैलारस कस्बे में पिता जी के एक मित्र के घर रहकर पूरी की। आठवीं के आगे की पढ़ाई जारी रखना काफी मुश्किल था क्योंकि  हायर सेकेन्डरी स्कूल या तो कैलारस में था या पहाड़गढ़ में- वह भी केवल लड़कों का लेकिन काकाजी(पिताजी) ने ठान लिया था कि वे मुझे पढ़ाएंगे, इसलिये उन्होंने पहाड़गढ़ के स्कूल में मुझे नौवीं कक्षा में भर्ती करा दिया। तिलोंजरी से पहाड़गढ़ अपेक्षाक़त पास था।. गाँव के कुछ लड़के भी पैदल पढ़ने जाया करते थे। मैं उनके साथ ही जाने लगी थी पर जल्दी ही उन्होंने मुझे साथ ले जाने से मना कर दिया,  इसलिये काकाजी ने मुझे अपनी साइकिल दे दी थी।  काकाजी ने दिल दिमाग में पढ़ने की अनिवार्यता इस तरह भर दी थी कि मुझे न रास्ते की मुश्किलें दिखती थीं न ही अपने सस्ते साधारण कपड़े। लोग हँसते थे कि देखो मास्टर अपनी लड़की को ‘इंदिरा गांधी’ बनाने चला है। उन दिनों पूरे ग्रामीण इलाके में ग्यारहवीं पास करने वाली लड़की केवल मैं थी। काकाजी स्वयं एक निष्ठावान् शिक्षक थे। शिक्षा का महत्त्व जानते थे ।

जहाँ तक मेरे लेखन के प्रारम्भ की बात है, वह प्रारम्भ तो ग्यारहवीं पास करते करते हो गया था। हालाँकि जब मैं पढ़ ही रही थी, मेरा रिश्ता तय कर दिया गया था। न मालूम क्यों काकाजी ,जो समाज और व्यवस्थाओं से लड़ते हुए मुझे  स्नातक, स्नातकोत्तर और पी.एच.डी. कराने का सपना देखा करते थे, मेरे विवाह के लिये तैयार कैसे हो गए, जबकि मैं मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार न थी। उन्ही दिनों मैंने ‘अधखिला फूल , ‘दहेज’ ,और ‘समाज को बदल डालो’ शीर्षक से तीन कहानियाँ, एक गीत –काँटों को मैं अपना लूँ या कलियों से प्यार करूँ और एक बाल उपन्यास ‘रानी नील गगन की’  लिखा था (जिसका एकमात्र पाठक व प्रशंसक मेरा छोटा भाई है) उपन्यास व कहानियाँ अब नहीं हैं पर गीत बच गया।

विवाह के छह माह बाद ही जून 1976 में मैंने शिक्षक-चयन परीक्षा उत्तीर्ण करली थी। बुनियादी प्रशिक्षण के दौरान हमें माध्यमिक कक्षाओं के लिये दस पाठ तैयार करने का कार्य मिला था। उस समय भी मैंने तीन कहानियाँ, दो निबन्ध, तीन कविताएं, एक व्यंग्य और एक एकांकी सहित दस पाठों का पाठ्यक्रम तैयार किया था जिसके लिये खूब शाबासी मिली।  उन दिनों सोचा ही नहीं था कि मैं साहित्य-सृजन की दिशा में कुछ कर रही , कि रचनाओं को सुरक्षित रखना चाहिये। जुलाई सन् 1977 में मेरी पोस्टिंग उसी स्कूल में हो गई जहाँ मैंने आ ई सीखे थे। मुझे ज्वाइन भी मेरे प्रथम गुरु पलिया जी ने ही कराया। सन् 1977 से 1987 तक के दस वर्ष जिन्दगी के बहुत संघर्षमय, व्यस्त और सक्रिय रहे। तीनों बच्चों के जन्म और लालन पालन के बीच ही, माँ के सहयोग और स्वाध्याय से बी. ए. और एम. ए. की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। एक खण्डकाव्य ध्रुवगाथा लगभग पूरा लिख लिया और सात आठ बड़ी कहानियाँ भी लिख लीं गईं।. यह वह समय था जब उस सुदूर गाँव में कोई समाचार पत्र तक भी नहीं पहुँचता था। किसी प्रकाशन या पत्रिका या किसी साहित्यकार से परिचय नहीं था।  कुए के मेंढक सी जिन्दगी थी। जितना कोर्स में था वही पढ़ लिया था। पढ़ने का शौक था पर किताबें नहीं थीं। पढ़ने के नाम पर काकाजी के सहेजे गुलशननन्दा के कुछ उपन्यास और माँ की गीताप्रेस की कुछ किताबें और अखण्ड-ज्योति के अंक ही थे।. ऐसे में स्कूल में चकमक का आना, किसी बिसाती के आने से कहीं ज्यादा रोचक और आनन्दमय था। यह सन् 1986 की बात है। मैं उन दिनों प्राइमरी स्कूल में पहली दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाया करती थी और उनकी शरारतों पर एक कविता लिखी थी –‘मेरी शाला चिड़ियाघर है ..’  चकमक को देखा तो उस कविता को चकमक के लिये भेज दिया।. चार पाच दिन बाद ही अन्तर्देशीय पत्र द्वारा कविता की स्वीकृति की सूचना मिली। पत्र लिखा था श्री राजेश उत्साही जी ने। वे उस समय चकमक के सहायक सम्पादक थे। वह पहला स्वीकृति पत्र मानो अँधेरे कमरे में किरण का आना था। 1987 का शायद जुलाई अंक था, उसमें यह पहली रचना प्रकाशित होकर आई । उत्साहित होकर मैंने दो कहानियाँ और लिखीं। एक अपनी गाय के बछड़े गबरू पर और दूसरी बाजरे की रखवाली करते बच्चे पर क्रमशः इन्तज़ार और छोटी चिड़िया। ये दोनों कहानियाँ नवम्बर 88 के अंक में आईं।  इसके बाद भैया का दोस्त, बिल्लू का बस्ता ..कहानियों का सिलसिला चल पड़ा।. कहने की जरूरत नहीं कि चकमक मेरे बाल-साहित्य सृजन का आधार बनी।

मेरी सभी कहानियाँ मेरे आसपास की हैं। गेंदा के पौधे को कहीं से उखाड़कर रोपने में पहले उसका मुरझाना फिर खिल उठना देखा तो ‘मिट्टी की बात’ कहानी बनी।. क्यारी में पौधों के बीच पपीते के पौधे को बढ़ते हुए देखा तो ‘मुझे धूप चाहिये’ कहानी बनी। इसी तरह ‘पेड़ किसका है ‘,’भैया का दोस्त ‘,इन्तज़ार’ , ‘बिल्लू का बस्ता’ ,’लड़ाकू’ , ‘मीकू फंसा पिंजरे में’, ‘पूसी की वापसी ‘…आदि अनेक कहानियाँ मेरे आसपास की ही हैं . सभी कहानियाँ व कविताएं मैंने केवल चकमक को ध्यान में रखकर ही लिखीं। मैं तो मानती हूँ कि प्रकाशन से लेखन का गहरा सम्बन्ध है। पाठकीय प्रतिक्रियाएं लेखन के लिये बड़ी प्रेरणाएं होती है। सन् 2000 व 2002 में मेरी दो कहानियाँ क्रमशः ‘खूबसूरत’ और ‘क्यों लगती है पैरों में धूल?,  चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट से पुरस्कृत हुईं। सन् 2001 में एक कहानी पर मिले आर्य सम्मान (किताबघर दिल्ली) के बाद मेरा रुझान फिर से बड़ी कहानियों की ओर हुआ। यह कहानी स्वर्गीय कमलेश्वर ने चुनी थी।. 2011 में फिर आर्य सम्मान हेतु तैयार किये गए कहानी संग्रह में मेरी कहानी पार्ट फाइनल को भी चुना गया।

काल्पनिक कहानी लिखने का हुनर मुझमें नहीं है। लिखने के लिये आसपास कितना कुछ बिखरा पड़ा है । समेटने के लिये सिर्फ संकल्प मेहनत और हौसले की जरूरत तो होती ही है , कहीं न कहीं उस माध्यम की भी जरूरत रहती है जो रचना को पाठकों तक रचनाएं पहुँचाए .

प्रकाशित कृतियाँ  

(1) ध्रुवगाथा –खण्डकाव्य

(2) अपनी खिड़की से –बाल कहानी संग्रह

(3) मुझे धूप चाहिये—बाल कहानी संग्रह

(4) कुछ ठहर ले और मेरी जिन्दगी –गीत संग्रह

(5) अजनबी शहर में –काव्य संग्रह

(6) क़र्ज़ा-वसूली –कहानी संग्रह .

बुकलेट—(1) मोर पंख (2) नई सुबह (3) चुग्गा (4) छोटी सी बात (5) बात बन गई –दो कहानियां नव साक्षरों हेतु

लगभग पचास कविताएं चकमक ,बालवाटिका ,हिन्दुस्तान ,बाल साहित्य की धरती आदि पत्रिकाओं में छप चुकी हैं लगभग साठ लघुकथाएं प्रकाशित व कुछ पुरस्कृत .

एक कहानी उत्तराखण्ड के रा. शि . द्वारा कक्षा 7 के पाठ्यक्रम में शामिल .

कर्जा वसूली कहानी पर दिसम्बर 2019 में कादम्बरी पुरस्कार मिला .

दो बाल उपन्यास –-किट्टू और गिलहरियाँ पूरा होने की पंक्ति में पड़े हुए हैं

स्व संप्रेषित 

© मीडियाटिक

 

 

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