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गायत्री नायक

गायत्री नायक

छाया: मनोहर नायक के फेसबुक अकाउंट से

सृजन क्षेत्र
संगीत एवं नृत्य
प्रसिद्ध कलाकार

गायत्री नायक

गोपाल प्रसाद-सरस्वती नायक की तीन संतानों में गायत्री सबसे छोटी थीं। वे 22 जनवरी 1926 को जन्मी थीं और मंझली बाई कहलाती थीं, क्योंकि बाबू यानी उनके पिता अपने छह भाइयों में मंझले थे। वे कटनी से नैनी के बीच के स्टेशनों में स्टेशन मास्टर रहे। गांधीजी के अनुयायी, राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत नायक जी ने पथरिया स्टेशन में रहते हुए हड़ताल करा दी थी। 1942 में उन्होंने स्टेशन की इमारत पर तिरंगा फहरा दिया था तो कुछ समय निलम्बित रहे, बाद में दंडस्वरूप छोटी स्टेशनों पर ही नियुक्ति मिली। वे बेहद कार्यकुशल, मिलनसार, उदार, और सबको साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति थे और अपने समय से आगे की सोच वाले थे।

जब उन्होंने बड़ौदा की आर्य कन्या विद्यालय की छात्राओं की जबलपुर में प्रभात फेरी देखी तो उससे इस कदर अभिभूत हुए, कि अपनी छोटी-छोटी बेटियों (गायत्री और सावित्री) को – जो उस समय पिता के साथ स्टेशन पर सिग्नल अप-डाउन करतीं, ड्राइवरों को गोला देतीं, मुसाफ़िरों को पानी पिलातीं या किसी ट्रेन से एक-दो स्टेशन जाकर दूसरी से वापस आ जातीं, पढ़ने के लिए बड़ौदा भेज दिया। वहाँ वे साल-डेढ़ साल रहीं। 1935 में महादेवी जी ने इलाहाबाद में महिला विद्यापीठ शुरू किया तो दोनों बहनें वहां आ गईं, क्योंकि बाबू तब नैनी में थे और बड़ौदा दूर था। खान-पान, भाषा आदि की परेशानी तो थी ही।

विद्यापीठ छात्रावास की गायत्री जी और उनकी बड़ी बहन सावित्री जी, पहली छात्राएँ थीं। उनके पुत्र मनोहर नायक अपने संस्मरण में लिखते हैं कि – वे नवरात्र के दिन थे, मैं जबलपुर आया हुआ था, टीवी पर पंडालों में चल रहे गरबा नृत्य को दिखाया जा रहा था, एकाएक माँ ने कहा, मनोहर आज के फ़िल्मी गानों पर होने वाले गरबा को देखकर कोई विश्वास नहीं करेगा कि बड़ौदा में बहत्तर साल पहले हम छोटी-छोटी लड़कियां क्या गाते हुए गरबा करती थीं…यह कहते हुए वे गाने लगीं,’ देसड़िया नी भाजे गंधीजी अवे गांड्यो थयो ‘….. गरबा करते हुए ये बच्चियां गाती थीं – ये गाँधी तो देश के लिये पागल हो गया है !

गायत्री जी की बड़ी बहन सावित्रीजी दसवीं पास करने तक वहाँ रहीं, फिर उनका विवाह हो गया। दोनों लड़कियों के दसवीं पास करने पर बाबू ने, जो उस समय डभौरा में थे, पूरे गाँव को भोज दिया था। लड़कियों का उस ज़माने में इतना पढ़ना बड़ी बात थी। दसवीं के बाद उनके सबसे छोटे चाचा रामप्रसाद उन्हें इलाहाबाद के सिलाई-बुनाई विद्यालय में डालने का निर्णय करके उन्हें लेने आये। ट्रेन में बैठी गायत्री जी रो रही थीं और उनके बाबू उन्हें समझा रहे थे कि ‘हम तुम्हें पढ़ाएँगे, अभी नन्हे भैया की बात मान लो’। वहाँ पहुँचकर पता चला कि वह विद्यालय प्रौढ़ और विधवा स्त्रियों के लिये है तो कक्का उल्टे पाँव लौट आये।

गायत्री जी ने वहाँ रहते हुए 1946 में एम.ए. किया। उन्हें एमए की उपाधि मालवीय जी, नेहरू जी और डॉ. राधाकृष्णन की उपस्थिति में मिली। अपनी प्रिय शिष्या को अपने पास ही रखने के लिये गुरुजी यानी महादेवी जी ने उन्हें पढ़ाने का काम दे दिया। गायत्री जी 1948 तक वहां रहीं। उस समय लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था। बाबू को भी ताने सुनने पड़ते कि क्या लड़की से नौकरी करानी है, दूसरी तरफ़ आर्थिक बोझ भी था। कमरे का किराया और शिक्षण शुल्क तीन -तीन रुपये और मेस पहले बारह से फिर बीस रुपये हो गया था। गुरुजी की अनुमति से वे पहले तीसरी कक्षा को पढ़ाने लगीं तो कमरे का किराया माफ़ हो गया। धीरे -धीरे पढ़ाने के घंटे बढ़ाते हुए उन्होंने सारे शुल्क माफ़ करा लिए।

बाबू गायत्री जी का नाम हमेशा गायत्री नायक एम.ए. लिखते, हालांकि जन्म कुंडली में उनका नाम लोकप्रिया बाई था। वास्तविक जीवन में वे लोकप्रिय थीं भी। गायत्री जी ने विषय के रूप में पहले गायन लिया था, पुणे के सदाशिव दत्तात्रेय आप्टे संगीत शिक्षक थे। एक बार बाबू ने गायत्री जी को लखनऊ के मॉरिस कॉलेज भेजा, उनके चचेरे भाई जीवन भी मेडिकल में दाखिला लेने गये थे, उन्हें प्रवेश नहीं मिला तो दो महीने बाद लौट आये। लेकिन इस बीच गायत्री जी को मॉरिस कॉलेज की साप्ताहिक सभा में सितार बजाने का आमंत्रण मिलने लगा और वे जानी जाने लगीं थीं। बाबू संगीत प्रेमी थे, गायत्री जी को पहला भजन ‘बाज रही गिरधर की मुरलिया’ उन्होंने ही सिखाया था।

विद्यापीठ में रहते- पढ़ते हुए गायत्री जी  गुरुजी के निकट आती गईं। अनेक काम उनके सुपुर्द कर दिए गए। छात्रावास की सारी लड़कियों के हालचाल जानना, इंचार्ज मैडम को बताना और शाम को सभी को डाक बाँटना। यही काम करते हुए उन्हें जबलपुर सेंट्रल जेल से दो कैदियों के पत्र मिले थे, जिन्हें वे नहीं जानती थीं। इनमें एक थे भवानी प्रसाद तिवारी और दूसरे थे गणेश प्रसाद नायक। दोनों चाहते थे कि गायत्री जी उन्हें नियमित रूप से बाहर की गतिविधियों के बारे में लिखती रहें। तिवारी जी तो उनके बड़े भाई समान थे, आखिर वे उनके परिवार की सदस्य ही थीं। नायक जी से 1950 में गायत्री जी का विवाह हुआ। यह विवाह भवानी प्रसाद तिवारी के घर से हुआ, जिसमें रात को उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई बजी थी।

गायत्री जी ने इंटर से  सितार भी एक विषय के रूप में लिया था। गायन उन्हें आप्टे जी और सितार एसआर मावलंकर जी सिखाते। कॉलेज के वाद्यवृंद में वे जलतरंग भी बजातीं। गुरुजी को बिन बताये उन्होंने चुपचाप इलाहाबाद विश्वविद्यालय की संगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, निर्णायक उस्ताद अलाउद्दीन खान थे। गायत्री जी अव्वल रहीं और नियमानुसार विश्वविद्यालय के संगीत जलसे में पहली प्रस्तुति उनकी हुई। लखनऊ के मॉरिस कॉलेज से स्वाध्यायी छात्रा के रूप में मध्यमा और विशारद की क्रमशः प्रमाणपत्र और उपाधि परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में पास की। मध्यमा में तो परीक्षक बाबा अलाउद्दीन थे।

महादेवी जी का गायत्री जी पर विशेष स्नेह था इसलिए चिंतित रहतीं कि सितार के कारण यह पढ़ाई में न पिछड़ जाए,क्योंकि गायत्री जी समय मिलते ही घंटों सितार बजातीं। कुएँ की जगत पर रियाज़ करते रात दो बज जाते। एमए में जब वे सेकेंड डिवीजन पास हुईं तो गुरुजी ने उनसे रिजल्ट देखने के बाद पैर छुआए और  इनाम में किताबें दीं। गायत्री जी की पढ़ाई से आश्वस्त होने पर और सितार के प्रति लगन देखकर महादेवी जी ने उन्हें वाद्य विशारद की परीक्षा के लिये संगीत शिक्षक के साथ लखनऊ भेजा और अपनी सहेली कवयित्री तोरण देवी लली के यहां ठहरने की व्यवस्था कराई।  

गायत्री जी के जीवन में महादेवी जी और विद्यापीठ का महत्त्वपूर्ण स्थान था। विद्यापीठ की ओर से वे सभा- समारोह में राष्ट्रीय गीत आदि गाने जातीं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के एक समारोह में वे वंदे मातरम गाने गईं थीं। छोटी कक्षा में थीं तो मंच पर गांधी जी ने हाथ पकड़कर पूछा, वंदे मातरम गाओगी ! नन्ही गायत्री ने हामी भरी तो पीठ पर प्यारी धौल जमाते हुए उन्होंने कहा, ज़ोर से गाना ! विनोबा ने सितार सुनकर उन्हें हमेशा सरस्वती कहा। एक बार निराला जी छात्रावास में आये तो गुरुजी ने उन्हें बताया, कि गत्ती सितार अच्छा बजाती है। गायत्री जी ने महाप्राण निराला जी को पहले उन्हीं का गीत ‘फिर संवार सितार लो‘ सुनाया, फिर उसके बाद सितार।  

एक समय लखनऊ,इलाहाबाद और फिर जबलपुर में उनके बहुत कार्यक्रम होते थे। कालांतर में गायत्री जी भातखंडे विद्यालय में शिक्षिका बनीं। यह विद्यालय एस.बी. देशपांडे की कल्पना थी। उनके बाद गायत्री जी प्राचार्या बनीं। वे दोपहर तीन बजे वहां जातीं और रात साढ़े आठ तक लौटतीं। बैठकों के लिये खैरागढ़ और परीक्षाएँ लेने दूसरे शहरों का आना-जाना लगा रहता। वि.वि. अनुदान आयोग,दिल्ली व भोपाल के भी चक्कर लगते रहते। विद्यालय के काम को, उसके यश को उन्होंने ख़ूब आगे बढ़ाया, कोई कसर न छोड़ी। जबलपुर की सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेतीं, खूब अच्छा बोलतीं। उनका बहुत मान -सम्मान था। उन्होंने ‘सुरों के सहयात्री ‘ नाम से संस्मरणों की पुस्तक लिखी। 15 जनवरी 2012 को वे इस संसार से विदा हो गईं।

संदर्भ स्रोत – गायत्री जी के सुपुत्र  मनोहर नायक जी द्वारा संप्रेषित

© मीडियाटिक

 

 

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