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क्रांति त्रिवेदी

क्रांति त्रिवेदी

छाया : डॉ. विश्वपति त्रिवेदी 

प्रेरणा पुंज
विशिष्ट महिलाएं

क्रांति त्रिवेदी

• डॉ. विश्वपति त्रिवेदी

हिन्दी की प्रख्यात लेखिका क्रांति त्रिवेदी का जन्म 28 सितम्बर 1932 को अविभाजित मध्यप्रदेश के रायपुर में हुआ था। वे पं. रविशंकर शुक्ल की सबसे छोटी पुत्री तथा छः भाइयों अम्बिकाचरण, गिरिजाचरण, भगवती चरण, ईश्वरीचरण, श्यामाचरण और विद्याचरण की छोटी बहन थीं। सभी भाई स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे। अम्बिकाचरण शुक्ला संविधान सभा  के सदस्य थे। भगवतीचरण भी सांसद रहे । श्यामाचरण जी तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और विद्याचरण जी अनेक बार सांसद रहे। वे भारत सरकार में लम्बे अरसे तक मंत्री भी रहे।

पं. रविशंकर शुक्ल पेशे से अध्यापक और बाद में वकील रहे। वे स्वतंत्रता से पहले मध्य प्रान्त और बरार के प्रधान मंत्री ( उस समय यही पद होता था) रहे और बाद में मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। शुक्ल जी, महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा राष्ट्र के लिए समर्पित और हिंदी के प्रति निष्ठावान थे। उनके पूर्वज जनपद उन्नाव, उत्तर प्रदेश के ग्राम टेढ़ा बीघारपुर के मूल निवासी थे, जो बाद में ग्वालियर, सागर और फिर रायपुर में बस गए।

शुक्ल परिवार, रायपुर के संपन्न परिवारों में गिना जाता था, इसलिए स्वाभाविक रूप से क्रांति जी का बाल्यकाल ऐश्वर्य पूर्ण रहा। परिवार में सबसे छोटी होने के कारण भी वे सबकी दुलारी थीं। उनके बचपन का नाम रानी था। बड़े भाई भगवती ने उनका नाम क्रांति रखा , क्योंकि उस समय चारों ओर क्रांति का वातावरण था। पिता की लाड़ली होते हुए भी क्रांति जी, आंदोलनों के कारण पिता के प्रवास पर या फिर जेल में रहने के कारण माँ के संपर्क में अधिक रहीं। इसलिए उन पर माँ के धार्मिक विचारों और परंपरागत जीवन आदर्शों का प्रभाव पड़ा। यही संस्कार आगे चलकर उनकी रचनाओं की नींव  बने। रचनात्मकता उनमें बचपन से ही थी। मात्र 9 वर्ष की आयु में ही उन्होंने एक प्रहसन लिख डाला था। उन्होंने बाल कहानियां भी लिखीं।

क्रांति जी की आरंभिक शिक्षा रायपुर में ही हुई। औपचारिक शिक्षा आरंभ करने से पहले मास्टर जी घर पर आकर हिंदी वर्णमाला इत्यादि पढ़ाते थे। 1935 में प्राथमिक कन्या पाठशाला में इनका प्रवेश हुआ, लेकिन 1937 में परिवार के साथ नागपुर चली गई। कुछ कारणों से क्रांति जी वहां स्कूल न जा सकीं इसलिए उनकी पढ़ाई की व्यवस्था घर पर ही कर दी गई। 1940 में परिवार नागपुर से रायपुर आ गया। इसके बाद इन्होंने मिशन हाई स्कूल में प्रवेश लिया लेकिन वहां का वातावरण क्रांति जी के अनुकूल नहीं था, तो एक साल बाद उन्होंने उसे भी छोड़ दिया। परिवार के पुरुष सदस्यों के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय होने के कारण जेल हो गई थी। परिवार में किसी पुरुष की उपस्थिति न होने के कारण क्रांति जी को दोबारा स्कूल न भेजने का निर्णय लिया गया।

लेकिन घर में किताबों की कोई कमी न थी, न ही उन्हें पढ़ने के लिए बच्चों पर कोई रोक-टोक थी । क्रांति जी ने इसका लाभ उठाते हुए लगभग सभी साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन किया। 1942 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा व्यक्तिगत रूप से दी तब उनके पास हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल, गृह विज्ञान विषय थे। 1943 में उन्होंने नागपुर के सेंट्रल कॉलेज फॉर विमेन में इंटरमीडिएट की परीक्षा दी फिर 1947 ई. तक इसी कॉलेज के छात्रावास में रहकर नागपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा दी। यहां पर उन्होंने आत्मविश्वास के साथ अंग्रेज़ी बोलना सीखा और विभिन्न भाषा भाषी छात्राओं के संपर्क रहकर व्यापक अनुभव प्राप्त किया। उन्होंने 1949 में नागपुर विश्वविद्यालय से ही हिंदी में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की।

क्रांति जी का विवाह 9 फरवरी 1951 को श्री धरणीधर त्रिवेदी के साथ संपन्न हुआ। त्रिवेदी जी के पिता रघुनाथ प्रसाद जी इटावा के ज़िला न्यायाधीश थे और सेवनिवृत्ति के बाद इटावा में ही बस गए।  वे एक नामी जज थे। धरणीधर जी उत्तर प्रदेश के मुख्य आयकर आयुक्त के पद आसीन थे। 1986 में वे इस पद से सेवानिवृत्त हो गए। 06 अगस्त 1952 को क्रांति जी के बड़े पुत्र डॉ. प्रजापति त्रिवेदी का जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की, विश्व बैंक में सेवाएं दीं और फिर भारत सरकार में सचिव पद पर भी रहे।

क्रांति जी के छोटे पुत्र डॉ. विश्वपति त्रिवेदी का जन्म 27 नवंबर 1953 को हुआ। वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ने के बाद 1977 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए और मध्यप्रदेश शासन के अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) में विभिन्न पदों पर रहे। विश्वपति भारत सरकार के सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए। क्रांति जी की छोटी बेटी आराधना का जन्म 17 फरवरी 1963 को हुआ। वे भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हो उत्तर प्रदेश में अपनी सेवाएं दे रही हैं। क्रांति जी की पोती इरा त्रिवेदी युवा लेखिका हैं और योगाचार्य के रूप में योग शिक्षा एवं अभ्यास का भारत का सबसे बड़ा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म संचालित करती हैं।

क्रांति जी अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाने के साथ-साथ लेखन कार्य भी सुचारु रूप से करती रहीं। अमृता प्रीतम व अमृतलाल नागर, शिवानी जैसे समकालीन साहित्यकारों से समय-समय पर उनकी मुलाकात होती रहती थी। सन 1972 में डॉ. मिराशि महोदय की पुस्तक ‘स्टडीज इन इंडोलॉजी’ का हिंदी अनुवाद करने के उपरांत उनकी सुप्त प्रतिभा जागृत हुई। उनकी अनुप्रेरक लेखनी से 40 से अधिक कृतियों का निर्माण हुआ। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपने रचना कौशल का प्रदर्शन किया। उनकी भाषा सरल एवं विषय-वस्तु आकर्षक थी ताकि पाठकों में स्वत: रुचि पैदा हो तथा वे अधिक से अधिक हिन्दी साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित हों।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादंबिनी, नवनीत, सारिका जैसी लोकप्रिय हिन्दी पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी रचनाओं में भाषा की सरलता, सहज प्रवाह एवं विषय-वस्तु की प्रासंगिकता उजागर होती है। ‘फूलों को क्या हो गया’ उनकी सफलतम एवं लोकप्रिय कहानी ने इंटरनेट के अभिव्यक्ति कार्यक्रम में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। हिन्दी का प्रचार एवं महिलाओं से संबंधित विषय ही उनकी सभी रचनाओं के मूल आधार थे। ‘फूलों को क्या हो गया’ उनकी सफलतम एवं लोकप्रिय कहानी ने इंटरनेट के अभिव्यक्ति कार्यक्रम में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। हिन्दी का प्रचार एवं महिलाओं से संबंधित विषय ही उनकी सभी रचनाओं के मूल आधार थे।

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क्रांति जी के पहले छ: उपन्यास हिन्दी में रुचि पैदा करने तथा हिन्दी साहित्य का प्रचार में मील के पत्थर साबित हुए। इसके बाद, पौराणिक उपन्यासों चिरकल्याणी, राघव प्रिया, राधिका और  शतरूपा के आँसू  में उन्होंने महिलाओं की विभिन्न भावनाओं को उजागर किया। शुगन पक्षी, ‘कृष्ण पक्ष’, ‘अमृत घाट’, ‘मोह भंग’, ‘बूंद-बूंद अमृत’ एवं ‘आठवां जन्म’ उनके सशक्त सामाजिक उपन्यास हैं जिनमें महिलाओं की समस्याओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से उठाया गया है।

उनकी ‘फूलों का सपना’ कहानी का विषय जाति संबंधी भेद-भाव की समस्याओं के निराकरण पर आधारित है। ‘अशेष’ नामक उपन्यास में स्वतंत्रता संग्राम में ज़मीदारों के योगदान का उल्लेख है। ‘अगम’ में पूर्वी एवं पश्चिमी संस्कृतियों के बीच के टकराव का वर्णन है और इन दोनों संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित किए जाने पर ज़ोर दिया गया है। ‘मैं और मेरा समय’ उनके पिता पं. रविशंकर शुक्ल की आत्मकथा है, जो प्रथम पुरुष में लिखी गई है। ‘अतिशिक्षण’ स्वत: भावनाओं से ओत-प्रोत कविता संकलन है। ‘पत्ते की नाव’, ‘मीठी बोली’, ‘पीली हवेली’, ‘कुट कुट चूहा’ और ‘नन्हे जासूस’ उनकी लोकप्रिय बाल कहानियां हैं।

स्वाभाविक, सरल, आकर्षक एवं दिल को छू लेने वाली उनकी रचनाओं में मानवता के लिए बहुमूल्य संदेश भी निहित हैं। लता और वृक्ष नामक उनका उपन्यास, मानवीय संबंधों की गरिमा, सेवा भाव, सहानुभूति के साथ-साथ संबंधों में छल-प्रपंच, धन के प्रति व्यक्ति का पागलपन, नारी की इच्छा शक्ति, समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को रेखांकित करता है। इस उपन्यास में तो संस्कृतियों के बीच टकराव का वर्णन भी है और समन्वय का भी। जीवन के वे पक्ष जो अभी तक अन्य साहित्यकारों द्वारा अछूते थे उन्हें भी उजागर किया गया है। अनोखा आरोही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया एक सशक्त उपन्यास है। यह हेमचंद्र (हेमू) की फ़र्श से अर्श तक पहुंचने की कथा है।

श्रीमती त्रिवेदी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वर्ष 2002 के लिए हिन्दी सेवी सम्मान और उसी साल उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार’ भी उन्हें प्रदान किया गया। उन्हें यूनेस्को द्वारा ‘राष्ट्रीय हिन्दी सेवा मिलेनियम सम्मान’ तथा म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नारी लेखन पुरस्कार’ प्रदान किया गया। 29 अक्टूबर 2009 को क्रांति जी का निधन हो गया। उसके एक साल बाद 25 अक्टूबर 2010 को भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में 3 लाख डाक टिकट जारी किए। क्रांति जी की पुस्तक ‘अहाते वाली’ का लोकार्पण इस वर्ष सन 2020 में होने जा रहा है।

लेखक स्व. क्रांति त्रिवेदी के सुपुत्र हैं।

© मीडियाटिक

 

 

प्रेरणा पुंज

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  • कीर्तिशेष रानी मां ‘क्रांति त्रिवेदी’ के दर्शनलाभ का सुयोग स्मृतिशेष धरणीधर त्रिवेदी जी से भेंट के दौरान अनेकों बार हुआ। उन्होंने अपने कविता संग्रह की एक पुस्तक भी भेंट की थी। वर्ष 2010 माननीया शीला दीक्षित द्वारा रानी मां पर जारी डाक टिकट के लोकार्पण लोधी रॉड, नई दिल्ली का प्रत्यक्षदर्शी रहा। वे एक प्रतिष्ठ कुलीन परिवार से ताल्लुक रखने वाली हिंदी की सिद्धहस्त लेखिका रहीं हैं।
    उनकी स्मृति को सादर नमन।

  • मेरा यह सौभाग्य रहा कि पूज्या रानी माँ (श्रीमती कांति त्रिवेदी)का स्नेह मिला।उनके पति आदरणीय धरनीधर जी के स्नेहछाया में दो दशक से अधिक का कालखंड रामचरितमानस सम्मेलन के सहसंयोजक के रूप में कार्य करने को मिला।उनका परिवार इटावा का गौरव माना जाता है। सुसंस्कारों से मंडित इस आदर्श कुल के लोगों ने सदैव हमारी नगरी को गौरवान्वित किया है।रानी माँ का लेखन आम नागरिक की अपनी समस्याओं का दस्तावेज था।सहज,सरल और बोधगम्य शैली में बड़े अर्थ देने वाली उनकी लेखनी वंदनीय है।साहित्य और साहित्यकारों के प्रति उन्हें बहुत लगाव था।जिस परम्परा को उनके बच्चे विशेष रूप से आदरणीय विश्वपति जी निभा रहे हैं।आपकी यह पहल स्वागत योग्य है।
    (डॉ कुश चतुर्वेदी इटावा)

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