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कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं

कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं

रस गागरी
साहित्य वीथिका
कहानी 

कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं

डॉ. गीता  पुष्प शॉ

लड़का-लड़की

दोनों सुखी थे। साथ पढ़ते हुए दोस्ती हो गयी। फिर सगाई। अब दोनों चौबीसों घंटे आपस में बातें करने को छटपटाते।वह मोबाइल फोन का जमाना नहीं था तो क्या हुआ। लड़की का बाप अफसर था। घर में मुफ्त का सरकारी फोन। उसके यहां सब्जी-भाजी भी फोन करके मंगवायी जाती। लड़के का बाप भी धनी था। एक दूसरे के फोन नंबर लिए और घंटों बतियाते।

-“हैलो” …. “हां बोलो”

“क्या कर रहे हो?”

“कुछ नहीं, बस तुम्हें याद कर रहा था।”

“झूठे कहीं के। खाओ मेरी कसम।”

तभी इधर लड़की की मां चीखी- “अरे किससे बतिया रही है घंटे भर से ?”

“कुछ नहीं माँ। सहेली का फोन है”, वह बोली। उधर उसका बाप भड़का- ‘मुझे जरूरी फोन करना है। तू क्यों फोन पकड़े बैठा है घंटे भर से!”- ‘कल चन्दू कॉलेज नहीं आया था पिताजी। उसे केमेस्ट्री समझा रहा था।”   

पति-पत्नी

दोनों की शादी हो गई। साल भर आपस में खूब मीठी-मीठी बातें होती रहीं। दोनों की केमेस्ट्री अच्छी थी तो एक-एक कर तीन बच्चे भी हो गये।अब केमेस्ट्री का सत्यानाश होने लगा। पत्नी घर-बार सम्भाले या बच्चे। दोनों में तू तू मैं मैं शुरू हो गयी। पत्नी कहती- ‘ए जी, तुम कुछ मदद क्यों नहीं करते? सब समझती हूं। जानबूझ कर ऑफिस से देर करके घर आते हो जिससे तुम्हें बच्चों को न सम्भालना पड़े।”  

पति चीखकर कहता- ‘हां हां मैं भी खूब समझता हूं, तुम रात को जानबूझकर खर्राटे मारकर सोती हो। बच्चे बीच रात में उठ जाते हैं। मुझे ही बच्चों की डायपर बदलनी पड़ती है। मैं ही उन्हें ठोक-ठोक कर सुलाता हूं। अब पति-पत्नी दोनों सामान फेंककर लड़ते। बच्चों को पीट-पीट कर लड़ते। सारा मोहल्ला सुनता।

 सास-ससुर

चिक चिक करते बच्चे बड़े हुए। दोनों सास-ससुर बन गये। फिर चख-चख शुरू। बाप-बेटों में खर्चों को लेकर। सास-बहुओं में काम को लेकर। सास टोकती- यह कर। वह कर। ससुर कहते- क्यों बहुओं के पीछे पड़ी रहती हो? कुछ देर तो उन्हें चैन से बैठने दो।  सास कहती-“तुम चुप रहो जी।  ये बहुएं निकम्मी बैठी खाती रहेंगी तो मोटी न हो जाएंगीं। अच्छा लगेगा फिर जीन्स-शर्ट पहनकर योगा क्लास या जिम जाना चाहेंगी। राम-राम क्या जमाना आ गया है। हमारे ज़माने में तो घर के काम करते हुए ही औरतों की कसरत हो जाती थी। झाड़ू-पोंछा खुद करती थीं। अपने हाथों से कपड़े बर्तन धोती थीं और सिलबट्टे से मसाला पीसती थीं। तुम बहुओं की तरफदारी करके उन्हें मत बिगाड़ो। बेटों को तो लाड़ प्यार करके पहले ही बिगाड़ चुके हो। ”

बूढ़ा-बुढ़िया 

 लड़ते-झगड़ते दोनों  उमर पार कर चुके हैं। आपस में वे बातें भी करते हैं, पर अब उनमें लड़ाई नहीं होती। वे फिर सुखी हो गये हैं क्योंकि दोनों की सुनने की शक्ति कम हो गयी है। एक दूसरे की सुने बिना दोनों प्रेम से बतियाते रहते हैं।

– ”आज क्या बना रही हो नाश्ते में?”

– ”हां नाते-रिश्तेदार जब-तब धमक जाते हैं। बड़ा तंग करते हैं।” 

– ”मुझे तो बैंगन का भरता अच्छा लगता है।”

– ”हां खर्चा बढ़ जाता है मेहमानों के आने से।”  

– ”भरता न बना सको तो पकौड़े बना देना। बहुत दिन हुए तुम्हारे हाथों के पकौड़े खाए हुए।”  

– “मुझे इस धीमे बल्ब में दिखाई नहीं देता। तेज बल्ब मंगवा दो।”

-”तेल क्यों? पिछले हफ्ते तो आया  था। छोटे-छोटे खर्चे मिलकर बड़े हो जाते हैं।”

– ”हां, तुम्हारे हाथों की बनी छोटी-छोटी फूली रोटियां मुझे बड़ी अच्छी लगती हैं। अच्छा जल्दी सोओ। कल रात में मच्छरों के कारण सो नहीं पाया।”

– ”मुझे  भी पूड़ी-रायता खाये बहुत दिन हो गए।”

बूढ़ा-बुढिय़ा की बेतुकी बातें सुनकर बेटे-बहू खूब हंसते। एक दिन बेटे से बहू बोली- ”ए जी, अम्मा बाबूजी के कान के लिए सुनने वाली मशीन ला दीजिये न!” बेटा-बोला-”’नहीं-नहीं। कान में सुनने वाली मशीन लगवाने की बात भूलकर भी मत करना। अगर ये ठीक से सुनने लगेंगे तो दोनों फिर पहले की तरह लडऩे लगेंगे। घर की सुख-शांति  भंग हो जायेगी। अभी तो अच्छा है- कहो खेत की, सुने खलिहान की। ऐसे कितने सुखी हैं दोनों। इन्हें सुखी ही रहने दो। कुछ तुम कहो, कुछ मैं सुनूं, करने दो।”

लेखिका के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए  क्लिक करें 

www.swayamsiddha.co/डॉ-गीता-शॉ-पुष्प/

  
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