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उर्मि कृष्ण

उर्मि कृष्ण

छाया : उर्मि कृष्ण जी के एफ़बी अकाउंट से

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उर्मि कृष्ण

• विजय कुमार

कहानी लेखन महाविद्यालय की संचालक और प्रतिष्ठित लेखिका उर्मि कृष्ण का जन्म 14 अप्रैल 1938 को मप्र के हरदा में हुआ। उनके पिता श्री गुरुप्रसाद दुबे साहित्य मर्मज्ञ थे, जिन्होंने प्रयाग से ‘साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की थी। माँ श्रीमती रामलली दुबे गृहिणी थीं।  वर्ष 1944-45 में यह परिवार इंदौर आकर बस गया। दुबे जी ने आजीवन मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति की सेवा की। उनकी एक काव्य कृति ‘मंगला आशा’ एवं कुछ एकांकी प्रकाशित हैं। समिति और पत्नी के सहयोग से उन्होंने अपने घर को गुरुकुल का स्वरूप दिया था जिसमें रहकर अनेक विद्यार्थी पढ़ाई किया करते थे। 1979 में मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनका सार्वजनिक सम्मान किया था।

उर्मि जी की प्रारंभिक शिक्षा अनियमित सी रही। प्रयाग महिला विद्यापीठ, इलाहाबाद से उन्होंने ‘विद्या विनोदिनी’ की परीक्षा पास की जो मैट्रिक के समतुल्य हुआ करती थी। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से इंटर और स्नातक करने के बाद उर्मि जी ने अपने पिता की ही तरह हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से ‘साहित्य रत्न’ की उपाधि प्राप्त की। फिर इंदौर की प्रसिद्ध संस्था ‘बाल निकेतन’ से मॉन्टेसरी ट्रेनिंग में डिप्लोमा प्राप्त कर वर्ष भर शिक्षण कार्य भी किया। देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय से उन्होंने राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि की।  

उर्मि जी के बचपन का कुछ हिस्सा हरदा में बीता। माता-पिता की पहली संतान होने के कारण वे दादा-दादी की लाडली भी थीं। उनके दादा श्री दौलत राज मकड़ाई रियासत के दीवान थे। वे हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, मराठी भाषाओं और मोड़ी लिपि के भी जानकार थे। वहीं उर्मि जी के व्यक्तित्व की नींव तैयार हुई। उन्हें बचपन से ही उन्हें कुछ-कुछ लिखने का शौक रहा लेकिन उन्हें प्रकाशित करवाने का ख्याल मन में नहीं आया। 15 वर्ष की आयु में उनकी पहली कहानी इंदौर के स्थानीय दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई। वह दादाजी के वैभव के उतार एवं उनके पिताजी के लिए स्वयं को स्थापित करने की चुनौतियों का समय था, जिसने उर्मि जी को सहज ही शिक्षा और स्वावलंबन का महत्व समझा दिया।

इंदौर में भी परिवार संयुक्त ही था, पिताजी, ताउजी, दोनों भाइयों के बच्चों के साथ-साथ वहां रहकर पढ़ने वाले कुछ रिश्तेदारों के बच्चे – सभी एक साथ रहते। आर्थिक समस्याओं को देखते हुए उर्मिजी ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया एवं उसी समय बाल शिक्षण संस्थान से मांटेसरी कोर्स का डिप्लोमा किया, जिसे उन्होंने प्रथम श्रेणी से पास किया था। यह देखकर वहां की संचालिका शालिनी मोघे ने उन्हें अपनी संस्थान में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया। वहां उन्होंने साल भर काम किया जिसके बाद शासकीय प्राथमिक शाला में उन्हें नियुक्ति मिल गई।

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद उन्हें वह आत्मविश्वास हासिल हुआ जिसके कारण वे अपने भविष्य के महत्वपूर्ण फ़ैसले कर सकीं। इसके बाद ही यानि 1969 से उनके लेखन यात्रा प्रारंभ हुई। 1970 में किशोरवय के पाठकों के लिए उन्होंने इंदिरा गांधी की जीवनी लिखी, जिसे काफी पसंद किया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद ब्रेल लिपि में भी हुआ। उर्मि जी की साहित्यिक अभिरुचि को मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति से खूब प्रोत्साहन मिला। उनमें भाषा बरतने की तमीज और शैली को गढ़ने में समिति का भरपूर योगदान रहा। इसके अलावा 1969 में उन्होंने पत्राचार के जरिए ‘कहानी लेखन महाविद्यालय’ अम्बाला छावनी से कहानी-कला का कोर्स भी पूरा किया, जिसके बाद उनके लेखन ने गति पकड़ी।

इसी बीच वे कहानी लेखन महाविद्यालय के संस्थापक डॉ महाराज कृष्ण जैन से मिलने अम्बाला पहुंचीं। श्री जैन पोलियोग्रस्त होते हुए भी एक कमरे के अपने आवास से ही महाविद्यालय का संचालन करने के साथ ही ‘शुभ तारिका’ पत्रिका भी प्रकाशित कर रहे थे। उर्मि जी उनसे अत्यंत प्रभावित थीं। कुछ दिनों के बाद उन्होंने उनसे विवाह करने का निश्चय कर लिया। उर्मि जी की धारणा थी कि किसी हट्टे-कट्टे लेकिन असंवेदनशील व्यक्ति के बजाय बुद्धिमान व्यक्ति का साथ बेहतर होता है, भले ही उसमें शारीरिक कमियां हों। मात्र बीस किलो वजन वाले महाराज कृष्ण नम्रता और ज्ञान की प्रतिमूर्ति थे। 15 अगस्त 1971 को कोर्ट मैरिज के बाद दोनों तरफ के रिश्तेदारों को नवदंपत्ति ने आशीर्वाद प्रदान करने का निमंत्रण भेज दिया। हालाँकि इस नए सफ़र के लिए उर्मि जी को मध्यप्रदेश में अपनी सरकारी नौकरी और मित्रों-सम्बन्धियों  सभी को त्यागना पड़ा।

अब तक उर्मिजी की लगभग 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं: वन और पगडंडियाँ (उपन्यास), पांच कहानी संग्रह – महल-दुमहले, नए सफ़ेद गुलाब, अग्नि रथ, धुंए से ऊपर, उँगलियाँ, चुनी-बुनी कहानियां, एक लघुकथा संग्रह –दृष्टि, दो यात्रा वृतांत-मन यायावर एवं भारत: एक भावयात्रा, दो हास्य व्यंग्य – बीमार पड़ने का सुख तथा जंगल में अमंगल एवं आठ बाल साहित्य कृतियां।

5 जून 2001 को पति के निधन के बाद से संस्थान का सारा कामकाज उर्मि जी ही संभाल रही हैं। पहले संस्थान में मात्र कहानी लेखन की तकनीक ही पढ़ाई जाती थी, लेकिन बाद में सात नए पाठ्यक्रम जोड़े गए – कहानी -कला और फीचर लेखन, पत्रकारिता और संपादन, पत्रिका संचालन, पटकथा और टीवी लेखन, प्रैक्टिकल इंग्लिश एवं फ़ीचर एजेंसी संचालन। उर्मि जी शुभ तारिका की सम्पादक भी हैं। शुरुआत में यह संस्थान के मुखपत्र के रूप में प्रकाशित होती थी, लेकिन समय के साथ इसके स्वरूप में काफ़ी परिवर्तन आया है।

उपलब्धियां एवं पुरस्कार :

• वर्ष 2008 में मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा अक्षर आदित्य सम्मान

• हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा 2008-9 का साहित्यिक पत्रकारिता हेतु लाला देशबन्धु गुप्त सम्मान
इसके अलावा, साहित्य मंडल, राजस्थान द्वारा संपादक रत्न सम्मान, पञ्चमेरु आर्ट एंड कल्चरल सोसायटी, अम्बाला द्वारा सम्मान, राजकुमार जैन राजन, फाउंडेशन, चित्तौड़गढ़ द्वारा श्रीमती इंदिरा देवी हींगड़ सम्मान, पंजाब कला अकादमी, जालंधर, पंजाब द्वारा प्रतिष्ठित पंजाब कला साहित्य अकादमी (पंकस) अकादमी अवार्ड आदि। तीन पुस्तकें – वन और पगडंडियाँ, मन यायावर और नए सफ़ेद गुलाब, साहित्य अकादमी, हरियाणा द्वारा पुरस्कृत हैं।

उर्मि जी के साहित्य एवं जीवन पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की एक छात्र पीएचडी एवं दो अन्य छात्राएं यात्रा साहित्य एवं कहानियों पर लघु शोध प्रस्तुत कर चुकी हैं। उनकी एक कहानी  स्नातकोत्तर  पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित है।

लेखक मासिक पत्रिका ‘शुभ तारिका’ के सह संपादक एवं कहानी लेखन महाविद्यालय, अम्बाला के प्रबंधक हैं।

© मीडियाटिक

 

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