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आर्थिक दृष्टि से मप्र के महिलाओं की स्थिति

आर्थिक दृष्टि से मप्र के महिलाओं की स्थिति

छाया : सीमा चौबे

आर्थिक दृष्टि से मप्र के महिलाओं की स्थिति

भारत के प्रायः सभी राज्यों में (मप्र अपवाद नहीं है) सामाजिक ढाँचे के अंतर्गत पारिवारिक व्यवस्था कुछ इस प्रकार की है जिसमें श्रम महिलाओं के हिस्से में एवं आर्थिक फैसले लेने का अधिकार पुरुषों के हिस्से में आता है। यहाँ कामकाजी और घरेलू महिलाओं की स्थिति में थोड़ी भिन्नता हो सकती है।

गाँव से लेकर महानगरों तक महिलाएं आज घर से निकलकर बाहर नौकरी कर रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर महीने मिलने वाले वेतन पर उनका अपना हक़ सुनिश्चित हो। अधिकाँश परिवारों में उन्हें अपना वेतन घर के मुखिया(ससुर अथवा पति) को सौंप देना पड़ता है। यहाँ भी व्यक्तिगत सामर्थ्य बहुत कुछ तय करता है। कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो अपने वेतन का एक निश्चित हिस्सा ही परिवार में व्यय करती हैं और शेष खुद के लिए बचाकर रखती हैं। यह अलग बात है कि वह समय-समय पर पारिवारिक अस्वीकार्यता की स्थिति को झेलने के लिए भी बाध्य होती हैं।

घरेलू महिलाओं की स्थिति आर्थिक क्षेत्र में और भी दयनीय है। आमतौर पर परिवार में दो तरह की व्यवस्था दिखाई देती है। पहली वयवस्था के तहत घर खर्च के लिए एक निश्चित राशि प्रतिमाह मिल जाना, जबकि दूसरी वयवस्था के तहत महिलाओं के हाथ पर नकद राशि नहीं रखे जाते बल्कि जरुरत की वस्तुएं लाकर दी जाती हैं। दोनों ही स्थितियों में कई बार आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाली स्थितियों का सामना उन्हें करना पड़ता है। महिलाओं के लिए अलग से जेब खर्च की व्यवस्था कुछ ही परिवारों में देखा जाता है। शायद ‘महिलाओं को पैसे की क्या जरूरत’ जैसी सामाजिक धारणा उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी कुछ ऐसी परम्पराएं जो समय के साथ धुंधली न होकर और मजबूत हो जाती हैं। आदिकाल से ही महिलाओंके वस्त्र में जेब की परिकल्पना की ही नहीं गई। यद्यपि वर्तमान में ऐसे कुछ प्रयोग देखे जा सकते हैं। घरेलू महिलाओं के ‘श्रम’ को आर्थिक आकलन की दृष्टि से न कभी देखा गया न निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना है।

आय बचत और बैंक खाते

पुराने जमाने में घरेलू महिलाओं के अलग से आय स्रोत न होने के बावजूद सामाजिक व्यवहार में चरण स्पर्श करने पर, मायके आने पर, तीज त्योहारों, जन्मोत्स, मुंडन, विवाह, जनेऊ आदि के अवसर पर शगुन स्वरूप घर के बड़ों के द्वारा नकद राशि अथवा जेवर देने का प्रचलन था जिसे महिलाएं खूब सहेजकर रखती थीं। यही उनका अपना धन हुआ करता था जिसे वह कभी चावल के डब्बों में, पुराने कपड़ों के संदूक में अथवा मसलों के डब्बों में छुपाकर रखती थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई महिलाएं बक्से या संदूक में ही अपना पैसा रखती हैं। जिन महिलाओं के बैंक खाते हैं वह भी घर के पुरुष सदस्यों की मदद के बिना अपने खाते की देख रेख नहीं कर सकतीं। यह स्थिति सिर्फ गाँव या कस्बों की नहीं है। शहरों की(लगभग सभी वर्गों की) ज्यादातर घरेलू महिलाएं बैंकों के कामकाज के लिए पुरुषों पर निर्भर हैं। इसलिए वे भी बैंकों की बजाय घर में ही  पैसे रखना पसंद करती हैं। खाते में जमा करवाने का एक नुक्सान परिवार की नज़र में आ जाना भी है जिसकी वजह से महिलाएं बैंक खातों में रूचि नहीं लेतीं।

इन सामाजिक तानों बानों की कहानी बैंक खातों के विश्लेषण से खुलकर सामने आती है। जनधन खाते खुलने के बाद हालांकि आंकड़ों का ग्राफ काफी ऊपर उठ गया, तथापि इनके जरिए वास्तविकता का आकलन नहीं किया जा सकता क्योंकि ज्यादातर मामलों में देखा गया कि ऐसे बैंक खाते सालों साल पड़े रह जाते हैं। यदि इन्हें छोड़ दिया जाए तो वास्तविक स्थिति निःसंदेह चिंताजनक कही जा सकती है। वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी किए गए ग्लोबल फाइनडेक्स डाटाबेस 2017 के अनुसार महिलाओं के 54 प्रतिशत बैंक खाते इस्तेमाल ही नहीं होते। इस डाटाबेस के अनुसार गोआ वह राज्य है जहां सबसे ज्यादा(लगभग 80 फीसदी) महिलाओं के बैंक खाते हैं जबकि बिहार में सबसे कम 26.4 फीसदी महिलाओं के नाम से ही खाते हैं। इनमें मध्यपरदेश की स्थति 33 वां हैं जहां लगभग 35 फीसदी महिलाएं बैंक खातों से जुड़ी हैं।

सेल्फ इम्प्लाईड वुमेन एसोसिएशन नामक संस्था द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 में जहां सेवा संस्था की परियोजना वित्त साथी( महिला बैंकर प्रतिनिधि) के माध्यम से नहीं चल रही थीं, वहाँ अधिकाँश महिलाओं दारा खाते में न्यूनतम राशि भी बैंकों में नहीं जमा की गई। मात्र 24 फीसदी महिलाओं ने अपनी आमदनी से बचत का हिस्सा निकल कर वित्तीय संस्थाओं यथा –बैंक आदि में जमा किये।

 सबसे बड़ी बकायेदार महिलाएं 

ज्यादातर आंकड़ों से इस बात की पुष्टि होती है कि महिलाएं अब भी बैंकिंग से जुड़ी गतिविधियों में सहज नहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे आंकड़े भी सामने आ रहे हैं जिसके मुताबिक़ प्रदेश में बैंकों की सबसे बड़ी कर्जदार महिलाएं ही हैं। मध्य प्रदेश राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी की बैठक में यह बात सामने आई कि वर्ष 2016 तक की स्थिति में विभिन्न सरकारी योजनाओं जैसे मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, महिला उद्यम निधि, महिला समृद्धि योजना, कल्याणी कार्ड योजना आदि के तहत बैंकों के द्वारा बांटी गई राशि में से कुल 23 हज़ार 816 करोड़ की राशि प्रदेश की महिलाओं पर बकाया है। प्रदेश के संस्थागत वित्त संचालनालय के माध्यम से यह राशि प्रदान की गई थी।

इन तथ्यों का विश्लेषण भी दो भिन्न कोणों से किया जा सकता है, प्रथम कि अपनी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए महिलाएं आगे आ रही हैं, ऋण लेने का जोखिम उठा रही हैं। अपने प्रयासों में कुछ सफल एवं कुछ असफल हो रही हैं। दूसरी संभाव्यता यह भी है कि कान्धा उनका और बन्दूक किसी और की है। प्रायः परिवारों में महिलाओं को दिए जाने वाले सरकारी लाभ उठाने के लिए लोग घर की महिलाओं का सहारा लेते हैं। वह कागज़ पर ही उस योजना की हितग्राही होती है असल में उसका लाभ घर के पुरुष ही उठाते हैं। एक बार ऋण मिल जाने के बाद उन पैसों के बारे उन्हें कुछ भी पता नहीं होता है। आज़ादी के 74 साल बाद भी महिलाएं आर्थिक निर्भरता के पहले या दूसरे सोपान पर ही हैं। इसे देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे का सफ़र अभी कितना लंबा है।

संपादन – मीडियाटिक डेस्क

 

 

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