अनिता दुबे

श्रीमती अनीता दुबे रंग और आकार की विशेषज्ञ हैं, इसलिए यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े और बेकार समझे जाने वाले पत्थरों के टुकड़ों में भी अर्थ और विश्लेषण के साथ सौंदर्य ढूंढ लेती हैं। प्रस्तुत है उनके द्वारा निर्मित प्रस्तर कला के कुछ बेजोड़ नमूने

  • यह तस्वीर दरअसल एक प्राचीन गीत है जिसका तर्ज हम भूल चुके हैं।
  • अपनी जान हथेली पर रखकर बसों की छत पर सफ़र करने वाले लोग क्या जानते हैं अगली मंजिल मौत की घाटी भी हो सकती है।
  • हाथ में तीर-धनुष, पीठ पर बच्चा और बालों फूल-पत्तियाँ सजाए यह युवती अनीता जी को एक बारे सपने में दिख गई और उन्होंने उसे पत्थरों में कैद कर लिया।
  • साथी, फूल-पत्तियाँ, गुब्बारे और खुला आकाश, बचपन की इस अमीरी को बड़ों की बुरी नज़र न लगे।
  • जिस रास्ते ‘बापू’ चले उसे देखने, समझने के लिए बापू जैसा चश्मा भी तो चाहिए।
  • कहा-सुनी अच्छी होती है अगर गवाह के तौर पर चाँद और तारे भी मौजूद हों।
  • क्योंकि सीढ़ियाँ/ कभी ख़त्म नहीं होतीं। -- नरेश‌ सक्सेना
  • तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं। किस लोभ से वे आज भी लेते नहीं विश्राम हैं।। -मैथिली शरण गुप्त
  • तेरा मिलना ऐसे होता है/ जैसे कोई हथेली पर/एक वक्त की रोजी रख दे। -अमृता प्रीतम