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अंजली अग्रवाल

अंजली अग्रवाल

छाया : स्व संप्रेषित

विकास क्षेत्र
समाज सेवा
प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता

अंजली  अग्रवाल

समाज सेविका अंजली अग्रवाल का जन्म 31 मार्च 1963 को दिल्ली में हुआ, उनके पिता नारायणदास गुप्ता शिक्षा विभाग में कार्यरत थे एवं माँ सीता गुप्ता गृहिणी थीं। दोनों ही समाज सेवा के प्रति सदैव समर्पित रहे। ताऊजी रूपनारायण गुप्ता एक जाने माने समाजसेवी थे, जिन्होंने रैन बसेरा योजना की शुरूआत की और वे नशामुक्ति परिषद के महासचिव भी रहे। अंजली तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। परिवार में पढ़ाई का वातावरण  था, इसलिए सबका किताबों से  गहरा रिश्ता था। बड़े भाई और बहन दोनों एम्स से एमबीबीएस, एमडी करके डॉक्टर बने, जबकि अंजलि जी उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से केमिस्ट्री (ऑनर्स ) की पढ़ाई कर रही थीं। बस से आते-जाते डेल्ही स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क के भवन के सामने से गुजरते समय उनके मन में हर दिन यह ख्याल आता कि उन्हें समाज सेवा के क्षेत्र में जाना है और शायद उनकी नियति भी यही थी।

वर्ष 1985 में उन्होंने उसी संस्थान से एम.एस.डब्ल्यू की डिग्री हासिल की जिसके बाद वर्ष 1986 में इंदौर के नेत्र विशेषज्ञ डॉ.आदित्य अग्रवाल से उनका विवाह हो गया और वे इंदौर आ गईं। तब उन्होंने यह यह कल्पना भी नहीं की थी कि वह ऐसे घर में जा रही हैं जहाँ उनके भविष्य के लिए पहले से ही तैयार एक नींव मौजूद है। उनकी सास कृष्णा अग्रवाल लम्बे अरसे से समाज-सेवा के कार्यों में संलग्न थीं। उन्होंने भारतीय ग्रामीण महिला संघ की स्थापना की थी और उसके माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। अंजली जी ने महसूस किया कि यहाँ समाज सेवा की एक ऐसी विरासत प्राप्त हो रही है जिसे यदि सहेजा जाये और आगे बढ़ाया जाये तो समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

1987 में अंजली जी 1987 में अंजली भारतीय ग्रामीण महिला संघ के तत्वावधान में संचालित राज्य संसाधन केंद्र से जुड़ीं। तब तक यह स्पष्ट नहीं था कि किस दिशा में आगे बढ़ना है, वह स्वयं की तलाश का दौर था। केंद्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए अन्य जिलों की यात्राएं भी करनी होती थीं। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान सीधी जिले के एक छात्रावास में बालिकाओं की स्थिति देखने के बाद उनका लक्ष्य काफ़ी हद तक स्पष्ट हो गया।

सन 1991 में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संस्थान सीईडीपीए से डेढ़ माह का प्रशिक्षण वाशिंगटन डीसी से प्राप्त करने का अवसर मिला – विषय था प्रबंधन में महिलाएं। सीइडीपीए द्वारा किशोरियों एवं बालिकाओं के लिए ‘बेटर लाइफ ऑप्शन’ कार्यक्रम संचालित किया जाता था। सीइडीपीए के सहयोग से ग्रामीण महिला संघ ने वर्ष 1993 में 10 गाँवों की 250 किशोरियों के साथ यह कार्यक्रम शुरू किया, तब किशोरावस्थाके बारे में कोई सार्थक सोच नहीं थी और न ही कोई निर्धारित पाठ्यक्रम या कार्यक्रम था। अंजली जी और उनकी टीम के द्वारा किशोरियों की आवश्यकताओं को समझते हुए उनके साथ मिलकर जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम व उसका पाठ्यक्रम विकसित किया गया। धीरे- धीरे यह कार्यक्रम 60 से 65 गाँवों, बस्तियों, फिर स्कूलों में संचालित किए गए। कई किशोरियों को ‘पीयर एजुकेटर’ के रूप में विकसित किया गया जिन्होंने गाँवों में अन्य किशोरियों के साथ कार्य करना शुरू किया, आश्चर्य की बात यह है कि उनमें से बहुत सी लड़कियां आज भी यह कार्यक्रम चला रही हैं। कार्यक्रम के परिणाम इतने अच्छे थे कि सन 2000 में यूएनएफपीए ने उन्हें मध्यप्रदेश के 5 जिलों- रीवा, पन्ना, सतना, सीधी, छतरपुर में किशोर-किशोरियों के सशक्तिकरण का दायित्व सौंप दिया।

वर्ष 2007 से यूनिसेफ़ व राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल के साथ मिलकर प्रदेश में स्थित 485 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय व बालिका छात्रावास में वार्डन आदि के प्रशिक्षण कर व विशेष रूप से पाठ्यक्रम निर्मित कर जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम संचालित किया गया। हर बार परिणाम बहुत ही बेहतर मिले और इसी बीच उन्हें कई देशों की यात्रा करने व संयुक्त राष्ट्र की अनेक सभाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। यूनेस्को की पार्टनर संस्था के रूप में सन 2000 में राज्य संसाधन केंद्र का चयन हुआ और एशिया पेसिफिक कल्चरल सेंटर फॉर यूनेस्को, जापान के नेटवर्क   पार्टनर के रूप में वे कई बार जापान व अन्य देशों में शिक्षा संबंधी मुद्दों पर आयोजित सभाओं में शामिल हुई तथा पेपर भी प्रस्तुत किए।

वर्ष 2015 में यूएनएफपीए के सहयोग से इंदौर संभाग के 8 जिलों के 43 आरएमएसए छात्रावास सवा 4 हज़ार किशोरियों के साथ जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की जिसके परिणामों को देखते हुए स्कूल शिक्षा विभाग ने निर्णय लिया कि प्रदेश के समस्त शासकीय स्कूलों में कक्षा 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों के लिए जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम संचालित किया जाए।

यहीं से नींव रखी गई जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम ‘उमंग’ की, जिसका शुभारंभ स्कूल शिक्षा मंत्री द्वारा अक्टूबर 2017 में किया गया। कक्षा 9वीं से 12वीं का ग्रेडेड पाठ्यक्रम बनाया गया जिसमें प्रतिभागिता आधारित सत्रों को शामिल किया गया हर स्तर पर शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम को स्कूल शिक्षा विभाग के अकादमिक केलेण्डर में जोड़ा गया। प्रत्येक शनिवार विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों द्वारा लिए जाने वाले सत्रों का मॉनिटरिंग किया जाता था जिसके लिए मोबाइल एप बनाया गया। कार्यक्रम के कारण विद्यार्थियों में कई सकारात्मक बदलाव आए। उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उमंग हेल्प लाइन भी वर्ष 2019 में शुरू की गई। वर्तमान में जीवन कौशल शिक्षा कार्यक्रम एनीमेशन फिल्मों के माध्यम से ऑनलाइन संचालित किए जा रहे हैं व शिक्षकों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाए जा रहे हैं।

वर्ष 2017 में एसआरसी निदेशक के रूप में अंजली जी को तत्कालीन उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू व शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट  योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्तमान में वे इंदौर में अपने परिवार के साथ रहते हुए अपने सामाजिक दायित्वों की निर्वहन भी पूर्ववत कर रही हैं।

संदर्भ स्रोत – स्व संप्रेषित  

© मीडियाटिक

विकास क्षेत्र

 
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